घर की जीवित देवी

“बड़ी अम्मा, हिलना मत, अभी काजल लगाना है,” पीहू ने बिल्कुल अपनी मम्मी के अंदाज में आदेश दिया।

भगवती देवी आंखें बंद करके शांत बैठ गईं। उन्हें लग रहा था जैसे बरसों बाद किसी ने उन्हें इतने प्यार, इतने अधिकार से छुआ है। जब इंसान बूढ़ा हो जाता है, तो लोग उसे छूना कम कर देते हैं। दवा देने या सहारा देने के अलावा कोई उनके पास कहां बैठता है? पीहू की नन्हीं उंगलियों का स्पर्श बड़ी अम्मा की आत्मा को तृप्त कर रहा था। उनकी बंद आंखों के कोनों से खुशी की एक बूंद छलक आई, जिसे पीहू देख न सकी

  शरद नवरात्रि की अष्टमी की वह सुबह चतुर्वेदी सदन में एक अलग ही रौनक लेकर आई थी। बड़ा-सा आंगन, चारों तरफ बने हवादार कमरे और उन कमरों में बसने वाला भरा-पूरा संयुक्त परिवार। आज के दौर में जहां परिवार टूटकर फ्लैटों के छोटे डिब्बों में सिमट रहे हैं, वहीं हरिवंश राय जी का यह पुश्तैनी मकान आज भी तीन पीढ़ियों की किलकारियों और ठहाकों से गूंजता था।

सुबह के छह बजते ही घर में ऐसी चहल-पहल शुरू हुई मानो कोई बड़ा उत्सव हो। रसोई से देसी घी में भुनते सूजी के हलवे की सोंधी खुशबू हवा में तैरती हुई पूरे घर में फैल रही थी। साथ ही, कुकर की सीटियां और बर्तनों की खनखनाहट मिलकर एक अलग ही संगीत पैदा कर रही थीं। इसी शोर-शराबे और हंसी-ठिठोली की आवाजों ने सात साल की नन्हीं पीहू की कच्ची नींद तोड़ दी।

पीहू अपनी आंखें मलती हुई, अपने गुलाबी फ्रॉक को संभालती हुई कमरे से बाहर निकली। बाहर का नजारा देखकर उसकी आंखों की सारी नींद गायब हो गई और चेहरे पर एक बड़ी-सी मुस्कान खिल उठी। आंगन के बीचो-बीच गेंदे और गुलाब के ताजे फूलों के बड़े-बड़े टोकरे रखे थे। उसके ताऊजी कमलेश और चाचा नीरज सीढ़ी लगाकर मुख्य द्वार और मंदिर के मंडप को आम के पत्तों की वंदनवार और फूलों की लड़ियों से सजा रहे थे। पीहू के पापा आलोक बिजली की झालरों को ठीक करने में जुटे थे।

रसोई की तरफ नजर गई, तो वहां बड़ी ताईजी मंजुला और छोटी चाची रोहिणी पूरी तन्मयता से कन्या पूजन के लिए काले चने और पूरियां तलने में व्यस्त थीं। पूरा घर एक टीम की तरह काम कर रहा था। हर किसी के पास कोई न कोई जिम्मेदारी थी, हर कोई महत्वपूर्ण था।

तभी पीहू की दादी शकुंतला देवी ने उसे देखा और प्यार से पुकारा, “अरे, मेरी गुड़िया रानी उठ गई! जाओ बेटा, जल्दी से ब्रश करके हाथ-मुंह धो लो और नहाकर नए कपड़े पहन लो। देखो, मैंने तुम्हारे लिए केसर वाला दूध ठंडा होने रख दिया है।”

पीहू ने एक आज्ञाकारी बच्ची की तरह सिर हिलाया और पंद्रह मिनट में नहा-धोकर, लाल रंग का घेरदार लहंगा-चोली पहनकर बाहर आ गई। उसने एक ही सांस में दूध का गिलास खत्म किया और दौड़ती हुई घर के विशाल पूजा घर की ओर भागी।

पूजा घर में उसकी मम्मी नंदिनी बहुत ही बारीकी से माता रानी की मूर्ति का श्रृंगार कर रही थीं। नंदिनी के पास एक बड़ी-सी थाली थी जिसमें लाल चुनरी, छोटे-छोटे चमकदार गहने, मोतियों की मालाएं, कुमकुम, चंदन और तरह-तरह के चमकीले सितारे रखे थे। पीहू को शुरू से ही सजना-संवरना और दूसरों को सजाना बहुत पसंद था। मम्मी को इस तरह देवी मां को सजाते देख उसके नन्हें हाथों में भी खुजली होने लगी।

वह दबे पांव नंदिनी के पास गई और अपनी छोटी-छोटी हथेलियां आगे बढ़ाते हुए बड़ी मासूमियत से बोली, “मम्मी, ये चमकने वाली बिंदिया और माला मुझे दो न! आज माता रानी को मैं सजाऊंगी। मैं भी आपकी मदद करूं?”

नंदिनी, जो उस वक्त मुकुट को सही ढंग से पहनाने में उलझी हुई थीं, थोड़ा हड़बड़ा गईं। काम के दबाव और पूजा के कड़े नियमों के ध्यान से उन्होंने पीहू का हाथ धीरे से पीछे हटाते हुए कहा, “नहीं पीहू! बेटा, अभी यहां कुछ मत छूना। ये पूजा का सामान है और बहुत नियम-धरम से माता रानी का श्रृंगार होता है। तुम अभी छोटी हो, तुमसे कुछ गिर-पड़ जाएगा या सिंदूर फैल जाएगा तो सब खराब हो जाएगा। जाओ, बाहर जाकर खेलो। जब आरती होगी तब बुला लूंगी, फिर तुम्हें सबसे पहले गरमा-गरम हलवा-पूरी का प्रसाद मिलेगा।”

पीहू का खिलता हुआ चेहरा अचानक मुरझा गया। उसे हलवा-पूरी का लालच नहीं था, उसे तो बस इस उत्सव का एक हिस्सा बनना था। उसे भी अपने हाथों से कुछ सुंदर रचना थी। उसने उम्मीद भरी नजरों से पापा की तरफ देखा और पूछा, “पापा, मैं आपके साथ फूलों की माला लटका दूं?”

आलोक ने ऊपर सीढ़ी से ही नीचे देखते हुए कहा, “अरे नहीं बेटा, यहां नीचे तार और कीलें पड़ी हैं। तुम्हारे पैर में चुभ जाएंगी। तुम जाओ, दादाजी के पास बैठो।”

पीहू धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई रसोई के दरवाजे तक गई, लेकिन इससे पहले कि वह कुछ बोलती, ताईजी मंजुला ने प्यार से डांटते हुए कहा, “पीहू बेटा, रसोई में मत आना, यहां बड़ी कड़ाही में खौलता हुआ तेल है। जाओ, बाहर आंगन में खेलो।”

पीहू अपने छोटे-छोटे कदमों को घसीटती हुई आंगन के कोने में रखे झूले पर आकर बैठ गई। उसका मुंह गुब्बारे की तरह फूल गया था। इतने बड़े घर में, जहां हर कोई कुछ न कुछ कर रहा था, वहां उसके लिए कोई काम नहीं था। वह खुद को बिल्कुल फालतू और उपेक्षित महसूस कर रही थी।

तभी उसके दादाजी हरिवंश राय जी, जो धोती-कुर्ता पहनकर पूजा की सुपारी और पान के पत्ते छांट रहे थे, उन्होंने अपनी पोती का उतरा हुआ चेहरा देख लिया। वे उसके पास आए और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, “क्या बात है मेरी राजकुमारी का चेहरा क्यों लटका हुआ है? चलो, मैं हॉल का टीवी चला देता हूं, तुम अपना पसंदीदा कार्टून देख लो।”

पीहू ने अपना सिर घुटनों में छिपाते हुए धीमी आवाज में कहा, “नहीं दादाजी, मुझे कार्टून नहीं देखना। मुझे किसी से बात ही नहीं करनी। सब मुझे भगा देते हैं।”

दादाजी मुस्कुराए ही थे कि तभी ताऊजी ने उन्हें किसी काम से आवाज लगा दी और दादाजी को वहां से जाना पड़ा। पीहू फिर अकेली रह गई। उसने उदास आंखों से पूरे घर में नजर दौड़ाई। सब व्यस्त थे, सब हंस-बोल रहे थे। तभी उसकी नजर आंगन के सबसे आखिरी कोने में बने उस शांत कमरे की तरफ गई, जिसका दरवाजा आधा खुला था।

वह कमरा था घर की सबसे बुजुर्ग सदस्य—उसकी परदादी, यानी ‘बड़ी अम्मा’ भगवती देवी का। नब्बे साल की भगवती देवी इस विशाल वटवृक्ष रूपी परिवार की जड़ थीं। लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर आकर जड़ें जैसे जमीन के नीचे दबकर अदृश्य हो जाती हैं, वैसे ही बड़ी अम्मा भी इस भागदौड़ भरे घर में कहीं पीछे छूट गई थीं।

ऐसा नहीं था कि परिवार के लोग उनका सम्मान नहीं करते थे या उनसे प्यार नहीं करते थे। उन्हें समय पर दवाई, गरम खाना, साफ कपड़े—सब कुछ मिलता था। लेकिन उनकी बढ़ती उम्र और कांपते हाथों को देखकर घर के लोगों ने उन्हें हर काम, हर जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया था। घर वालों को लगता था कि वे उन्हें ‘आराम’ दे रहे हैं, पर वे यह नहीं समझ पाते थे कि जरूरत से ज्यादा आराम इंसान को ‘अकेलेपन’ और ‘अनुपयोगी’ होने के अहसास से भर देता है। तीज-त्योहारों पर जब पूरा घर व्यस्त होता, तो बड़ी अम्मा अपने कमरे की खिड़की के पास बैठकर बस बाहर की हलचल को निहारा करती थीं। उन्हें कोई काम नहीं देता था, क्योंकि वे तो ‘सबसे बड़ी’ थीं।

पीहू को अचानक अहसास हुआ कि आज इस घर में सिर्फ वह अकेली नहीं है जिसे किसी ने काम नहीं दिया, बड़ी अम्मा भी तो बिल्कुल उसकी ही तरह अकेली हैं! वह झूले से उतरी और छोटे-छोटे कदम रखती हुई बड़ी अम्मा के कमरे में दाखिल हुई।

कमरे में हल्की-सी धूप छनकर आ रही थी। भगवती देवी एक आरामकुर्सी पर बैठी अपनी तुलसी की माला फेर रही थीं। उन्होंने एक साधारण-सी सफेद सूती साड़ी पहन रखी थी। उनके चेहरे पर झुर्रियों का जाल था, लेकिन आंखों में एक अजीब-सी शांति और सूनापन था। दरवाजे पर पायल की छम-छम सुनकर उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया और देखा कि नन्हीं पीहू मुंह फुलाए खड़ी है।

बड़ी अम्मा के पोपले मुंह पर तुरंत एक बेहद प्यारी और निश्छल मुस्कान तैर गई। उन्होंने अपनी कांपती हुई बांहें फैलाकर कहा, “अरे, मेरी सोने की चिड़िया आज इस कोने में कैसे उड़ आई? आओ मेरे पास आओ। क्या हुआ, किसने डांटा मेरी लाडो को? ये चेहरा बारह क्यों बजा रहा है?”

पीहू दौड़कर उनके पास गई और उनके घुटनों पर अपना सिर टिकाकर बैठ गई। बड़ी अम्मा ने अपने झुर्रीदार, पर बेहद कोमल हाथों से उसके बालों को सहलाया। उस स्पर्श में इतना अपनापन था कि पीहू का सारा गुस्सा पिघलकर शिकायत में बदल गया।

वह अपनी तोतली और मासूम आवाज में बोली, “बड़ी अम्मा, इस घर में सब गंदे हैं। मम्मी माता रानी का श्रृंगार कर रही हैं। मैंने कहा कि मुझे भी श्रृंगार करना है, तो मम्मी ने मना कर दिया। पापा और ताईजी ने भी भगा दिया। आप ही बताओ, आज अष्टमी है न? मेरा भी तो मन करता है कि मैं किसी को सुंदर-सा सजाऊं। पर मैं किसका श्रृंगार करूं? मुझे तो कोई छूने ही नहीं देता!”

बड़ी अम्मा ने पीहू की ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया। एक तरफ सात साल का बचपन था जिसे अपनी क्षमता दिखाने का मौका चाहिए था, और दूसरी तरफ नब्बे साल का बुढ़ापा था जिसे किसी के साथ और समय की तलाश थी। दोनों का दर्द एक जैसा था।

भगवती देवी अपनी पोपली मुस्कान के साथ खिलखिलाकर हंस पड़ीं और बोलीं, “बस इतनी-सी बात! अरे पगली, पत्थर की मूरत को सजाने के लिए तो वहां बहुत लोग हैं। तुझे कोई नहीं मिल रहा सजाने के लिए, तो ले… मैं तो खाली बैठी हूं न! आज तू मेरा ही श्रृंगार कर दे। बना दे मुझे भी सुंदर!”

बड़ी अम्मा ने तो यह बात बस बच्ची का मन बहलाने के लिए मजाक में कही थी, लेकिन पीहू की आंखों में जैसे हजार वाट के बल्ब जल उठे। वह उछलकर खड़ी हो गई, “सच्ची बड़ी अम्मा? आप मुझे मना तो नहीं करोगी न? आप डांटोगी तो नहीं?”

“अरे बिल्कुल नहीं मेरी रानी! आज मैं तेरी गुड़िया हूं, जैसे मन करे वैसे सजा ले,” बड़ी अम्मा ने स्नेह से कहा।

फिर क्या था! पीहू तीर की तरह कमरे से बाहर भागी। सब लोग अपने-अपने काम में इतने मग्न थे कि किसी ने ध्यान ही नहीं दिया कि पीहू कब मम्मी के कमरे में घुसी। उसने ड्रेसिंग टेबल से मम्मी का बड़ा वाला मेकअप किट उठाया, अलमारी से मम्मी की एक नई लाल रंग की जरी के बॉर्डर वाली चुनरी निकाली, जो किसी पूजा के लिए रखी थी, और साथ में मम्मी के नकली गहनों का डिब्बा भी बगल में दबा लिया। वह यह सारा खजाना लेकर चुपचाप बड़ी अम्मा के कमरे में वापस आ गई और दरवाजा भेड़ दिया।

अब शुरू हुआ उस बंद कमरे में प्रेम और मासूमियत का सबसे अनोखा खेल। पीहू ने सबसे पहले बड़ी अम्मा का चश्मा उतारा और अपने छोटे-छोटे हाथों से उनके चेहरे पर खुशबूदार पाउडर लगाया। पाउडर थोड़ा ज्यादा लग गया था, जिससे बड़ी अम्मा का चेहरा सफेद हो गया, पर उन्होंने चूं तक नहीं की।

फिर पीहू ने मम्मी की कंघी उठाई और बड़ी अम्मा के चांदी जैसे सफेद बालों को बड़े जतन से संवारा। इसके बाद उसने लाल रंग की लिपस्टिक निकाली। उसके नन्हें हाथ कांप रहे थे और बड़ी अम्मा की झुर्रियों की वजह से लिपस्टिक होंठों से थोड़ी बाहर भी निकल गई, लेकिन पीहू की तन्मयता किसी बड़े कलाकार से कम नहीं थी।

“बड़ी अम्मा, हिलना मत, अभी काजल लगाना है,” पीहू ने बिल्कुल अपनी मम्मी के अंदाज में आदेश दिया।

भगवती देवी आंखें बंद करके शांत बैठ गईं। उन्हें लग रहा था जैसे बरसों बाद किसी ने उन्हें इतने प्यार, इतने अधिकार से छुआ है। जब इंसान बूढ़ा हो जाता है, तो लोग उसे छूना कम कर देते हैं। दवा देने या सहारा देने के अलावा कोई उनके पास कहां बैठता है? पीहू की नन्हीं उंगलियों का स्पर्श बड़ी अम्मा की आत्मा को तृप्त कर रहा था। उनकी बंद आंखों के कोनों से खुशी की एक बूंद छलक आई, जिसे पीहू देख न सकी।

पीहू ने उनके माथे पर एक बड़ी-सी लाल गोल बिंदी लगाई और उसके चारों तरफ चमकीले सितारे चिपका दिए—बिल्कुल वैसे ही जैसे मम्मी माता रानी के माथे पर लगाती थीं। फिर उसने बड़ी अम्मा के गले में मोतियों के दो-तीन हार पहना दिए, हाथों में लाल-हरी चूड़ियां डाल दीं और अंत में वह लाल जरी वाली चुनरी उनके सिर से उढ़ाकर कंधों पर फैला दी।

पीहू ने दो कदम पीछे हटकर कमर पर हाथ रखा और अपनी कलाकारी को निहारा। “वाह! बड़ी अम्मा, आप तो बिल्कुल देवी मां जैसी लग रही हो!” उसने ताली बजाते हुए कहा।

बड़ी अम्मा ने चश्मा पहनकर जब पास रखे छोटे से आईने में अपना चेहरा देखा, तो वे दंग रह गईं। सफेद सूती साड़ी के ऊपर लाल चुनरी, चेहरे पर ढेर सारा पाउडर, टेढ़ी-मेढ़ी लिपस्टिक और माथे पर चमकीली बिंदियों का ताज! वे अपनी इस अनोखी सूरत को देखकर बच्चों की तरह खिलखिलाकर हंस पड़ीं। दशकों बाद उन्होंने खुद को इस तरह सजे हुए देखा था।

तभी बाहर आंगन से पूजा की घंटी बजने की आवाज आई और नंदिनी ने जोर से आवाज लगाई, “पीहू! बेटा, कहां हो? जरा बड़ी अम्मा के कमरे में जाकर उन्हें सहारा देकर बाहर मंदिर में ले आओ, आरती का समय हो गया है। सब लोग इकट्ठे हो गए हैं!”

पूरा परिवार पूजा घर के सामने आंगन में हाथ जोड़े खड़ा था। नौ कन्याएं भी आ चुकी थीं और उन्हें आसन पर बिठाया जा रहा था। धूप और कपूर की सुगंध से वातावरण एकदम पवित्र हो गया था। सभी की नजरें बड़ी अम्मा के कमरे के दरवाजे पर टिकी थीं।

दरवाजा खुला। पीहू ने बहुत ही गर्व और नजाकत के साथ बड़ी अम्मा का हाथ थाम रखा था और उन्हें धीरे-धीरे चलाते हुए बाहर ला रही थी। जैसे ही दोनों आंगन की रोशनी में आए, वहां खड़े हर सदस्य की आंखें फटी की फटी रह गईं।

आंगन में एकदम सन्नाटा छा गया। पापा, ताऊजी, चाचा, दादी, ताईजी, चाची—सब लोग कभी बड़ी अम्मा के अजीबोगरीब पर बेहद मासूम श्रृंगार को देखते, तो कभी पीहू के गर्व से दमकते चेहरे को!

बड़ी अम्मा ने सफेद साड़ी के ऊपर जो लाल चुनरी ओढ़ रखी थी, वह उनके झुके हुए कंधों पर फब रही थी। चेहरे पर लगा अतिरिक्त पाउडर और माथे की चमकीली बिंदियां उन्हें किसी दूसरी ही दुनिया की आभा दे रही थीं।

पीहू ने बड़ी सावधानी से बड़ी अम्मा को पूजा घर के ठीक पास रखी कुर्सी पर बिठाया और उनके पैरों के पास बैठ गई।

मम्मी नंदिनी अपने मुंह पर हाथ रखकर अपनी हंसी और हैरानी दोनों को रोकने की कोशिश कर रही थीं। उन्होंने आगे बढ़कर पूछा, “हे भगवान! पीहू, ये तुमने बड़ी अम्मा का क्या हाल बना दिया? ये क्या किया तुमने?”

नंदिनी की आवाज में हल्की-सी डांट थी, जिसे सुनकर घर के बाकी लोग भी थोड़ा असहज हो गए कि कहीं बड़ी अम्मा बुरा न मान गई हों।

लेकिन पीहू ने बिना डरे, पूरी मासूमियत और खिलखिलाहट के साथ अपनी बांहें फैलाकर कहा, “देखो मम्मी! आपने मुझे मंदिर से भगा दिया था न? आपने कहा था कि आप देवी मां का श्रृंगार करोगी। तो देखो, आपने अंदर वाली देवी मां को सजाया और मैंने बाहर वाली सबसे बड़ी देवी मां का श्रृंगार कर दिया! दादी कहती हैं न कि बड़े-बुजुर्ग भगवान का रूप होते हैं, तो बड़ी अम्मा भी तो हमारी देवी मां हुईं न!”

पीहू के इन निश्छल शब्दों ने वहां खड़े हर इंसान के दिल पर जैसे हथौड़े की तरह चोट की, पर वह चोट दर्द देने वाली नहीं, बल्कि आंखें खोलने वाली थी।

आंगन में मौजूद हर बड़े व्यक्ति का सिर शर्म और आत्मग्लानि से थोड़ा झुक गया। वे सब सुबह से पत्थर की मूर्ति को खुश करने, कन्याओं को खिलाने और रीति-रिवाजों को निभाने में इतने अंधे हो गए थे कि घर के कोने में बैठी उस जीवित देवी को पूरी तरह भूल गए थे, जिनकी कोख और संस्कारों से यह पूरा परिवार पल्लवित हुआ था। उन्होंने बड़ी अम्मा को सिर्फ ‘आरती के समय बुलाने वाली एक औपचारिकता’ समझ लिया था। किसी ने सुबह से जाकर उनसे यह तक नहीं पूछा था कि अम्मा, आज अष्टमी है, आपका मन कैसा है? क्या आप भी हमारे साथ फूलों की माला पिरोएंगी?

इस गहरी खामोशी को खुद बड़ी अम्मा भगवती देवी ने तोड़ा। उन्होंने अपने पोपले मुंह से हंसते हुए, अपनी लाल चुनरी को थोड़ा संभालते हुए कहा, “क्यों रे हरिवंश! क्यों बहू नंदिनी! ऐसे क्या घूर रहे हो सब के सब? जरा बताओ तो सही, मेरी पोती ने मेरा मेकअप कैसा किया है? मैं अच्छी लग रही हूं या नहीं?”

बड़ी अम्मा की उस जिंदादिल हंसी और मासूम सवाल ने माहौल के भारीपन को एक पल में धो दिया। दादाजी हरिवंश राय जी की आंखें भर आईं। वे आगे बढ़े और अपनी मां के चरणों में झुककर बोले, “अम्मा, आज से पहले तुम इतनी सुंदर कभी नहीं लगीं। आज इस सात साल की बच्ची ने हम सबको वो पाठ पढ़ा दिया, जो बड़ी-बड़ी पोथियां नहीं सिखा पाईं।”

नंदिनी ने आगे बढ़कर पीहू को गले से लगा लिया और उसके माथे को चूमते हुए बोली, “सॉरी मेरी गुड़िया। सच में, आज सबसे सुंदर श्रृंगार मेरी बेटी ने ही किया है।”

ताईजी, चाची और दादी—सबने एक स्वर में तालियां बजाते हुए कहा, “वाह पीहू वाह! आज तो तुमने कमाल कर दिया!”

उस दिन चतुर्वेदी सदन में अष्टमी की पूजा एक नए अहसास के साथ संपन्न हुई। आरती की थाली सबसे पहले नंदिनी या शकुंतला देवी ने नहीं, बल्कि पीहू और बड़ी अम्मा ने मिलकर पकड़ी। नौ कन्याओं के साथ-साथ उस दिन घर की सबसे बुजुर्ग ‘देवी’ की भी उतनी ही श्रद्धा से आरती उतारी गई।

पीहू बहुत खुश थी। वह बड़ी अम्मा का हाथ पकड़कर शांति से पूजा में बैठी रही। उस दिन के बाद से उस घर का नियम बदल गया। हर त्योहार, हर खुशी में सबसे पहली भागीदारी बड़ी अम्मा और नन्हीं पीहू की होने लगी, क्योंकि परिवार समझ चुका था कि मंदिर की देवी तभी प्रसन्न होती हैं, जब घर की जीवित देवियों के चेहरे पर मुस्कान हो।

दोस्तों, अक्सर हम भी अपने घरों में तीज-त्योहारों और रोजमर्रा की भागदौड़ में अपने बुजुर्गों को ‘आराम’ देने के नाम पर अकेला छोड़ देते हैं। क्या आपके घर में भी कोई ऐसे बुजुर्ग हैं जो बस आपके थोड़े से समय और अपनेपन का इंतजार कर रहे हैं? नन्हीं पीहू की इस मासूम हरकत और सोच के बारे में आपका क्या कहना है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें, आपके कमेंट्स का हमें बेसब्री से इंतजार रहेगा!

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लेखिका : गरिमा चौधरी

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