आस्तीन का साँप

मनोरमा जी ने नंदिनी के सिर पर हाथ रखते हुए रुंधे गले से कहा, “बेटी, मुझे माफ़ कर दो। मैं एक माँ होकर भी एक ईर्ष्यालु औरत के बहकावे में आ गई और तुम्हारे जैसी साक्षात देवी स्वरूपा बच्ची को पहचानने में भूल कर बैठी। भारती जी, मुझे क्षमा कर दीजिए। अगर आप हमें क्षमा कर सकें, तो हम आज इसी पल, इस भरी सभा में अपनी भूल सुधारना चाहते हैं।”

कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था, जिसे केवल दीवार घड़ी की टिक-टिक और भारती की धीमी सिसकियों की आवाज तोड़ रही थी। हाथ में पकड़ी हुई काँच की चूड़ियाँ कब टूटकर हथेली में चुभ गईं, उसे इस बात का अहसास तक न हुआ। दर्द तो दिल के उस कोने में उठा था, जहाँ उसने ताउम्र अपनी सबसे अज़ीज़ सहेली के लिए एक पवित्र मंदिर बना रखा था। आँखें आंसुओं से धुँधली हो चुकी थीं और मन बार-बार इसी सवाल पर आकर अटक जाता था कि क्या कोई इंसान किसी की मुस्कान छीनने के लिए इस हद तक गिर सकता है? उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने पति उमेश का सामना कैसे करेगी, जिसने साफ़ लफ़्ज़ों में हिदायत दी थी कि जब तक बात पूरी तरह पक्की न हो जाए, घर की बात चौखट के बाहर नहीं जानी चाहिए।

भारती और कल्याणी की दोस्ती कोई दो-चार सालों की नहीं थी। दोनों ने साथ में बचपन की धूल भरी गलियों में गुड्डे-गुड़ियों का ब्याह रचाया था, एक ही थाली में रोटियाँ बांटी थीं और स्कूल-कॉलेज की हर धूप-छाँव साथ देखी थी। संयोग ऐसा सुखद रहा कि विवाह के बाद दोनों ही चंडीगढ़ जैसे सुंदर शहर में आ बसीं। कल्याणी का ब्याह एक बहुत बड़े कपड़ा व्यापारी के खानदान में हुआ था, जहाँ नौकर-चाकर और सुख-सुविधाओं का अंबार था। दूसरी ओर, भारती के पति उमेश एक सरकारी दफ्तर में मध्यम वर्गीय क्लर्क थे। आर्थिक हैसियत में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ होने के बावजूद भारती के दिल में कभी कल्याणी के वैभव को लेकर हीनभावना नहीं आई और न ही कल्याणी ने कभी ज़ाहिर तौर पर अपनी दौलत का घमंड दिखाया। दोनों परिवार तीज-त्योहारों पर साथ बैठते, सुख-दुख साझा करते और बाहरी दुनिया के लिए वे दो सहेलियाँ नहीं, बल्कि सगी बहनों जैसी थीं।

समय अपनी गति से पहिया घुमाता रहा। कल्याणी के दो बच्चे थे—बड़ा बेटा अर्णव और छोटी बेटी तान्या। भारती के घर भी दो फूल खिले—बड़ी बेटी नंदिनी और छोटी बेटी रिया। कल्याणी ने हर सुख-सुविधा और महंगे ट्यूशन के दम पर अपने बेटे अर्णव को चार्टर्ड एकाउंटेंट बना दिया था और वह अपनी बेटी को एक नामी प्राइवेट कॉलेज में फ़ैशन डिज़ाइनिंग करवा रही थी। कल्याणी को अपनी रईसी और बच्चों के ऊँचे मुकाम पर बेहद नाज़ था। वह अक्सर बातों-बातों में भारती को यह जतलाने से नहीं चूकती थी कि उसके बच्चे कितनी ऊँची उड़ान भर रहे हैं।

भारती की बेटियाँ अत्यंत शालीन और संस्कारी थीं। बड़ी बेटी नंदिनी बचपन से ही शांत स्वभाव की थी, लेकिन पढ़ाई के प्रति उसकी लगन असाधारण थी। बिना किसी महंगे कोचिंग संस्थान के, केवल अपनी कड़ी मेहनत और रातों के अध्ययन के बलबूते नंदिनी ने सिविल सेवा की राज्य प्रशासनिक परीक्षा (PCS) उत्तीर्ण कर ली और एक प्रतिष्ठित पद पर अधिकारी नियुक्त हो गई। जिस दिन नंदिनी का परिणाम आया था, भारती की आँखों से बहते आंसू उसकी तपस्या के फल थे। पूरे मोहल्ले में मिठाइयाँ बंटीं। कल्याणी भी बधाई देने आई, उसके होठों पर मुस्कान तो थी, मगर आँखों में एक गहरा, ठंडा खिंचाव था जो भारती की सीधी-सादी नज़रें नहीं पढ़ पाईं। कल्याणी के मन में एक अदृश्य ईर्ष्या की चिंगारी सुलग उठी थी—”मुझसे आधी हैसियत रखने वाली भारती की बेटी एक अफ़सर बन गई और मेरी बेटी सिर्फ़ कॉलेज के चक्कर काट रही है!”

नंदिनी अब विवाह योग्य हो चुकी थी। उमेश और भारती अपनी बेटी के लिए एक योग्य, सुसंस्कृत वर की तलाश में जुट गए। कुछ ही हफ़्तों बाद उमेश के एक पुराने और सम्मानीय मित्र ने पटियाला के एक प्रतिष्ठित, संभ्रांत और उच्च शिक्षित परिवार का रिश्ता सुझाया। लड़का, विवान, विदेश से उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपना सफल सॉफ़्टवेयर स्टार्टअप चला रहा था। परिवार बेहद संस्कारी, खुले विचारों वाला और समाज में अत्यंत प्रतिष्ठित था।

उमेश और भारती जब विवान के परिवार से मिले, तो दोनों पक्षों के विचार एक-दूसरे से पूरी तरह मेल खा गए। विवान के माता-पिता, श्रीधर जी और मनोरमा जी, नंदिनी की सादगी, उसकी पद-प्रतिष्ठा और उसके संस्कारों से अत्यंत प्रभावित हुए। विवान ने भी नंदिनी से बातचीत की और दोनों ने एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करते हुए इस रिश्ते को अपनी मूक सहमति दे दी। सब कुछ इतनी सहजता से तय हो गया कि भारती की आँखों में कृतज्ञता के आंसू छलक आए।

विदा लेते समय विवान के पिता ने विनम्रता से कहा, “उमेश जी, हमें आपकी बेटी बहुत पसंद है। हमारे पारिवारिक पुरोहित जी दो दिनों के लिए बाहर गए हैं। जैसे ही वे लौटते हैं, हम सब मिलकर बैठेंगे और रोका तथा सगाई की तारीख तय कर लेंगे। तब तक हम चाहते हैं कि यह बात हमारे और आपके परिवार तक ही सीमित रहे।”

घर लौटते हुए उमेश ने भारती को समझाया, “भारती, दुनिया की नज़र बहुत बुरी होती है। जब तक बात कागज़ों और रस्मों में पक्की न हो जाए, तुम अपनी इस आदत पर काबू रखना और किसी के कान में भी यह बात मत डालना।”

भारती ने सिर तो हिला दिया, मगर खुशी का वह उफान उसके सीने में समा नहीं पा रहा था। अगली ही सुबह, जब वह मंदिर से लौट रही थी, तो उसकी नज़र कल्याणी की गाड़ी पर पड़ी। कल्याणी ने उसे देखते ही रोक लिया और चाय पर अपने घर चलने का आग्रह किया। कल्याणी के बैठकखाने में बैठकर गपशप करते-करते भारती का मन मचल गया। उसने सोचा, “कल्याणी तो मेरी अपनी है, मेरी रूह की हमराज़ है। इससे भला क्या छुपाना!”

भारती ने दबी ज़बान में पूरी बात कल्याणी के सामने उड़ेल दी। उसने विवान के परिवार, उनके कारोबार, उनकी प्रतिष्ठा और नंदिनी की तय होने वाली शादी के बारे में एक-एक विवरण साझा कर दिया। यहाँ तक कि बातों-बातों में जब कल्याणी ने पूछा कि लड़के वालों का कोई नंबर या पता है ताकि ज़रूरत पड़ने पर काम आ सके, तो भोली भारती ने विवान के पिता का विज़िटिंग कार्ड भी उसके सामने रख दिया।

यह सब सुनते ही कल्याणी के चेहरे का रंग उड़ गया। उसके सीने पर जैसे सांप लोटने लगा। एक मामूली क्लर्क की बेटी इतने बड़े घराने की बहू बनेगी, यह बात कल्याणी के अहंकार को बर्दाश्त नहीं हुई। उसकी अपनी बेटी तान्या के लिए अभी तक कोई मनमाफिक रईस घराना नहीं मिल पा रहा था। ईर्ष्या की आग ने कल्याणी की बुद्धि और आत्मा को पूरी तरह अंधा कर दिया। उसने मुस्कुराते हुए भारती को बधाई दी, मगर मन ही मन एक खौफ़नाक साजिश का ताना-बाना बुन लिया।

भारती के जाते ही कल्याणी ने बिना एक पल गँवाए विवान के पिता का नंबर मिलाया। उसने अपना परिचय एक अत्यंत सम्मानित और निष्पक्ष पारिवारिक हितैषी के रूप में दिया। कल्याणी ने बहुत ही गंभीर और हमदर्दी भरी आवाज़ बनाकर कहा, “श्रीधर जी, मैं नंदिनी के परिवार को बहुत करीब से जानती हूँ। एक भले परिवार का नुकसान होते देखना मेरा ज़मीर गवारा नहीं करता, इसलिए अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर आपको सचेत करने के लिए फ़ोन किया है।”

श्रीधर जी चौंक गए, “जी कहिए, क्या बात है?”

कल्याणी ने ज़हर उगलते हुए कहा, “नंदिनी बिटिया भले ही अफ़सर बन गई हो, लेकिन उसका चाल-चलन ठीक नहीं है। वह अपने ही विभाग के एक कनिष्ठ कर्मचारी के साथ गहरे प्रेम संबंध में है और उसी से भागकर शादी करना चाहती थी। उसके माता-पिता अपनी सामाजिक साख बचाने के लिए आनन-फानन में जबरन उसकी शादी आपके सुपुत्र से करवा रहे हैं। अगर यह शादी हुई तो आपके कुल की मर्यादा मिट्टी में मिल जाएगी।”

श्रीधर जी और मनोरमा जी यह सुनकर सन्न रह गए। जिस परिवार को वे इतना सुलझा हुआ समझ रहे थे, उसके बारे में ऐसी बातें सुनकर उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। बिना पूरी सच्चाई जाने, केवल बदनामी के डर से उन्होंने तुरंत अपना मन बदल लिया।

अगले दिन दोपहर को मनोरमा जी का फ़ोन भारती के मोबाइल पर आया। भारती ने जैसे ही उत्साह से ‘नमस्ते’ कहा, दूसरी तरफ से कड़वे और तीखे शब्दों की बौछार शुरू हो गई।

“भारती जी, आप जैसी पढ़ी-लिखी और समझदार माँ से हमें ऐसी उम्मीद नहीं थी! अपनी बेटी के पापों और उसकी मनमर्जियों पर पर्दा डालने के लिए आपने हमारे भोले-भाले बेटे की बलि चढ़ाने की सोची? अगर आपकी बेटी अपने किसी सहकर्मी से प्यार करती है और उसी के साथ रहना चाहती है, तो जबरदस्ती उसका ब्याह हमारे सिर पर क्यों मढ़ रही थीं? क्या हमारे संस्कारों की कोई कीमत नहीं है?”

भारती के होश उड़ गए। वह कांपती आवाज़ में बोली, “बहन जी… यह आप क्या कह रही हैं? मेरी नंदिनी… उसने कभी आँख उठाकर किसी गैर की तरफ नहीं देखा। वह तो पूजा की थाली की तरह पवित्र है। आपको किसी ने बहुत गलत खबर दी है!”

“बस कीजिए!” मनोरमा जी ने रूखेपन से कहा, “झूठ की दीवारें ज़्यादा देर नहीं टिकतीं। यह रिश्ता यहीं खत्म समझिए। हम किसी ऐसी लड़की को अपने घर की बहू नहीं बना सकते जो किसी और के नाम का कलंक अपने दामन पर लिए बैठी हो।”

और फ़ोन कट गया।

भारती के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक चुकी थी। वह ज़मीन पर बैठ गई। कलेजा फटा जा रहा था। उमेश शाम को घर लौटे और जब उन्हें यह बात पता चली, तो वे गुस्से और अपमान से कांप उठे। उन्होंने जब भारती से पूछा कि यह बात बाहर कैसे गई, तो भारती को कबूल करना पड़ा कि उसने सिर्फ़ कल्याणी को बताया था।

उमेश ने भारी मन से कहा, “भारती, तुमने अपनी नासमझी से अपनी ही बेटी के चरित्र पर कीचड़ उछलवा दिया। अब समाज में हम क्या मुँह दिखाएंगे?”

भारती से रहा नहीं गया। वह अपनी बेगुनाही और अपनी बेटी की सच्चाई साबित करने के लिए तुरंत उस नंबर पर दोबारा कॉल करने लगी। उसने हाथ जोड़कर, रोते हुए मनोरमा जी से विनती की, “बहन जी, मुझे सिर्फ़ उस इंसान का नाम बता दीजिए जिसने मेरी ममता और मेरी बेटी की अस्मिता की इतनी बेरहमी से हत्या की है? मैं अपने भगवान की कसम खाकर कहती हूँ कि मेरी बेटी निष्कलंक है।”

मनोरमा जी को भारती के रोने की आवाज़ में एक सच्ची पीड़ा का अहसास हुआ। उन्होंने गहरी सांस लेकर कहा, “भारती जी, यह बात हमें किसी गैर ने नहीं, बल्कि आपकी ही सहेली कल्याणी जी ने बताई थी। और सिर्फ़ बताई ही नहीं, उन्होंने तो यह भी कहा कि इस टूटे रिश्ते के दुख से हमें उबारने के लिए वे अपनी बेटी तान्या का रिश्ता हमारे बेटे विवान के लिए देने को तैयार हैं। वे आज शाम अपने पति के साथ हमारे यहाँ आने भी वाली हैं।”

यह सुनना था कि भारती के कानों में मानो पिघला हुआ सीसा उतर गया। वह अवाक रह गई। जिस कल्याणी को उसने अपनी सगी बहन माना था, जिसे अपनी हर सांस का राज़दार बनाया था, वह अपनी बेटी का घर बसाने के लिए उसकी मासूम बच्ची के दामन पर इतना घिनौना दाग लगा सकती है? यह कैसी दुनिया थी? यह कैसा माया का खेल था?

भारती के भीतर की कमज़ोर औरत उस पल मर गई और एक स्वाभिमानी, वीरांगना माँ जाग उठी। उसने अपने आँसू पोंछे। उसने तय किया कि वह रोकर अपनी किस्मत को कोसने के बजाय सत्य को उसके असली मुकाम तक पहुँचाएगी। उसने उमेश और नंदिनी को सब सच बताया। नंदिनी की आँखों में पानी ज़रूर था, मगर उसके चेहरे पर उसके आत्मसम्मान का तेज़ था। नंदिनी ने शांत स्वर में कहा, “माँ, जिसने झूठ का सहारा लिया है, उसका पर्दाफ़ाश होना ही चाहिए। अगर हम आज चुप रहे, तो यह दुनिया हमारे मौन को हमारा अपराध मान लेगी।”

उसी शाम, जब कल्याणी और उसके पति अपनी बेटी तान्या का बायोडाटा और मिठाइयों का डिब्बा लेकर श्रीधर जी के भव्य निवास पर पहुँचे, तो वे बहुत आश्वस्त थे कि मैदान मार लिया गया है। कल्याणी के चेहरे पर एक कुटिल विजयी मुस्कान तैर रही थी।

कल्याणी ड्राइंग रूम में सोफ़े पर बैठते हुए बोली, “मनोरमा जी, अच्छा हुआ जो आप लोग उस धोखे से बच गए। देखिए, मेरी तान्या कितनी सुशील और आधुनिक विचारों की है। विवान के साथ इसकी जोड़ी स्वर्ग में बनी जोड़ी जैसी लगेगी।”

श्रीधर जी और मनोरमा जी कुछ बोलते, उससे पहले ही दरवाज़े की घंटी बजी। नौकर ने दरवाज़ा खोला तो सामने उमेश, भारती और उनके साथ वर्दी में एक वरिष्ठ महिला पुलिस अधिकारी और नंदिनी खड़े थे। साथ में नंदिनी के विभाग के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी भी मौजूद थे, जो उमेश के पारिवारिक परिचित होने के साथ-साथ नंदिनी के कार्यक्षेत्र के संरक्षक भी थे।

कल्याणी का रंग एक पल में फ़क़ पड़ गया। उसकी मुस्कान होठों पर ही जम गई।

भारती ने बिना किसी हिचकिचाहट के आगे कदम बढ़ाया। उसकी आँखों में अब आंसुओं की जगह अंगारे दहक रहे थे। उसने कल्याणी की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “कल्याणी, बचपन से आज तक मैंने तेरी हर खुशी में अपनी खुशी ढूंढी। तेरी अमीरी पर कभी रश्क नहीं किया, तेरे बच्चों की कामयाबी पर हमेशा ताली बजाई। लेकिन तूने अपनी बेटी की शादी की सेज सजाने के लिए मेरी बेटी के चरित्र की चिता जलाने की कोशिश की? क्या यही तेरी दोस्ती का मोल था?”

कल्याणी घबराकर खड़ी हो गई और लड़खड़ाती आवाज़ में बोली, “भ… भारती, तुम यहाँ क्या तमाशा करने आई हो? मैंने तो बस…”

तभी नंदिनी के विभाग के उच्चाधिकारी ने गंभीर आवाज़ में कहा, “श्रीधर जी, मुझे बेहद अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आपके सामने एक बहुत घिनौना षड्यंत्र रचा गया था। नंदिनी हमारे पूरे प्रशासनिक मंडल की सबसे ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और बेदाग चरित्र वाली अधिकारी हैं। जिस तथाकथित ‘सहकर्मी’ के साथ इनके रिश्ते का झूठ फैलाया गया, वह व्यक्ति तो पिछले तीन वर्षों से विदेश में प्रतिनियुक्ति पर है। कल्याणी जी ने एक लोक सेवक और एक निर्दोष कन्या की छवि धूमिल करने के लिए जो मनगढ़ंत कहानी गढ़ी है, उसके लिए हमारे पास इनके कॉल रिकॉर्ड्स और मानहानि का पूरा कानूनी आधार मौजूद है।”

महिला पुलिस अधिकारी ने कल्याणी के सामने आकर कड़े स्वर में कहा, “श्रीमती कल्याणी, झूठे साक्ष्य गढ़ने, किसी की सामाजिक प्रतिष्ठा को जानबूझकर आघात पहुँचाने और आईटी एक्ट के दुरुपयोग के तहत आपके ख़िलाफ़ औपचारिक शिकायत दर्ज की जा चुकी है।”

कल्याणी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसके पति, जो इस पूरी साज़िश से बिल्कुल बेखबर थे और सिर्फ़ यह सोचकर आए थे कि लड़के वालों ने खुद उन्हें बुलाया है, शर्म से अपना सिर झुका चुके थे। उन्होंने कल्याणी की तरफ़ देखा और बोले, “कल्याणी, तुमने अपने लालच और जलन में इतना नीच काम किया? आज तुमने मेरी बरसों की इज़्ज़त एक झटके में नीलाम कर दी!”

श्रीधर जी और मनोरमा जी की आँखें खुल चुकी थीं। वे समझ गए थे कि उन्होंने एक निर्मल मोती को ठुकराकर कांच के टुकड़े पर भरोसा करने की कितनी बड़ी भूल कर दी थी। मनोरमा जी की आँखों में पश्चाताप के आंसू भर आए। वे तुरंत उठकर भारती और नंदिनी के पास आईं।

मनोरमा जी ने नंदिनी के सिर पर हाथ रखते हुए रुंधे गले से कहा, “बेटी, मुझे माफ़ कर दो। मैं एक माँ होकर भी एक ईर्ष्यालु औरत के बहकावे में आ गई और तुम्हारे जैसी साक्षात देवी स्वरूपा बच्ची को पहचानने में भूल कर बैठी। भारती जी, मुझे क्षमा कर दीजिए। अगर आप हमें क्षमा कर सकें, तो हम आज इसी पल, इस भरी सभा में अपनी भूल सुधारना चाहते हैं।”

श्रीधर जी ने आगे आकर उमेश के हाथ थाम लिए और कहा, “उमेश जी, जो लड़की अपने आत्मसम्मान और सत्य के लिए इतनी अडिग खड़ी रह सकती है, वह जिस घर में जाएगी, वहाँ कभी अधर्म नहीं हो सकता। यदि आपकी अनुमति हो, तो हम अपने विवान के लिए नंदिनी का हाथ पूरे मान-सम्मान और ढोल-नगाड़ों के साथ मांगना चाहते हैं।”

कल्याणी उस कमरे में एक ज़िंदा लाश की तरह खड़ी थी। उसकी साज़िश उसी के गले का फंदा बन चुकी थी। उसने जिस रिश्ते को छीनना चाहा था, वह रिश्ता अब पहले से भी दस गुना अधिक सम्मान और गरिमा के साथ स्थापित हो रहा था। उसके अपने पति ने उसका हाथ पकड़ा और भारी अपमान के साथ उसे खींचते हुए वहाँ से ले गए। कल्याणी का सिर हमेशा-हमेशा के लिए समाज की नज़रों में झुक चुका था।

भारती ने अपनी बेटी नंदिनी को गले से लगा लिया। आज उसे समझ आ गया था कि रिश्ते दौलत या बचपन की पुरानी यादों से नहीं, बल्कि नीयत की शुद्धता से टिकते हैं। बुराई चाहे कितनी भी तेज़ी से जाल बिछाए, लेकिन सत्य का एक छोटा सा दीपक ईर्ष्या के घने से घने अंधकार को पल भर में चीर कर रख देता है।

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