बाबुल की छांव और सौ खुशियां

सूरत के तापी नदी के किनारे बने एक भव्य रिसॉर्ट में सुबह से ही चहल-पहल अपने चरम पर थी। चारों तरफ पीले गेंदे और सफेद चमेली के ताजे फूलों की महक फैली हुई थी। मंडप के बीचों-बीच लगे विशाल शामियाने में लगभग इक्यावन छोटे-छोटे वेदी कुंड सजाए जा रहे थे। हर वेदी के सामने पीतल के कलश, ताजे आम के पत्ते, कुमकुम और हल्दी के थाल करीने से रखे थे। साठ वर्षीय मनसुख भाई मेहता खुद धोती-कुर्ता पहने, कंधे पर अंगोछा डाले, एक-एक कोने का मुआयना कर रहे थे।

अरे कारीगर भाई, देखो ये बाईं तरफ का तोरण थोड़ा ढीला रह गया है। आज हमारी बेटियों की शादी है, कोई आम जलसा नहीं है। कहीं से भी कोई कमी या कसर नहीं रहनी चाहिए। फूलों की लड़ियां एकदम सीधी और सुंदर दिखनी चाहिए, जैसे साक्षात मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए द्वार सजाया गया हो। मनसुख भाई की आवाज में न कोई थकावट थी, न कोई हड़बड़ाहट, बस एक पिता का गहरा समर्पण और उत्साह था।

तभी उनकी धर्मपत्नी शारदा बेन हाथ में ताजे नारियल पानी का गिलास लिए उनके पास आईं। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन आंखों में पति की सेहत को लेकर स्वाभाविक चिंता थी।

मनसुख जी, मैं जानती हूं कि आज का दिन आपके जीवन का सबसे बड़ा सपना है। लेकिन सुबह के पांच बजे से आप एक पैर पर खड़े होकर सारा काम देख रहे हैं। न ठीक से नाश्ता किया और न दवा ली। जब तक आप खुद स्वस्थ और तरोताजा नहीं रहेंगे, तब तक इतने बड़े उत्सव का भार कैसे संभालेंगे? पहले शांति से यह नारियल पानी पीजिए, फिर आगे की बात करिएगा। शारदा बेन ने मनुहार भरे स्वर में कहा।

मनसुख भाई ने पत्नी के चेहरे को देखा, जिसमें पिछले पैंतीस सालों का अटूट साथ, त्याग और प्रेम झलक रहा था। उन्होंने गिलास हाथ में लेते हुए मुस्कुराकर कहा, शारदा, जब तक तुम मेरे साथ खड़ी हो, मुझे भला क्या थकान हो सकती है? हम दोनों ने मिलकर ही तो इस सफर को तय किया है। अकेले मैं पी लूं और तुम प्यासी खड़ी रहो, ऐसा कैसे हो सकता है? लाओ, पहले आधा घूंट तुम लो, फिर मैं पूरा पी जाऊंगा।

शारदा बेन ने प्यार से आंखें तरेरते हुए कहा, आप भी न, कभी नहीं सुधरेंगे। उन्होंने गिलास से एक घूंट लिया और बाकी मनसुख भाई की तरफ बढ़ा दिया। दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामकर कुछ पल गहरी सांस ली और फिर से आयोजन की तैयारियों में जुट गए।

यह कोई साधारण विवाह समारोह नहीं था। यह पचास उन अनाथ, बेसहारा और वंचित कन्याओं का सामूहिक विवाह था, जिनका समाज में न कोई अपना नामलेवा था और न कोई रिश्तेदार। लेकिन मनसुख भाई और शारदा बेन के लिए वे सिर्फ अनाथ नहीं, बल्कि उनकी अपनी सगी बेटियों से भी बढ़कर थीं। इससे ठीक दो साल पहले भी इस दंपती ने इक्यावन ऐसी ही अनाथ बेटियों का कन्यादान पूरे राजसी ठाट-बाट से किया था। आज वे पहली वाली इक्यावन बेटियां भी अपने-अपने पतियों, बच्चों और ससुराल वालों के साथ अपनी इन नई पचास बहनों के ब्याह में मदद करने के लिए आ पहुंची थीं।

तभी बाहर से गाड़ियों के रुकने की आवाज आई और एक-एक करके बेटियां मंडप में प्रवेश करने लगीं।

पापा! मम्मी! देखो हम सब आ गए! सबसे आगे पल्लवी, वैशाली, तन्वी, हिमानी और चारु जैसी वे बेटियां थीं, जिनका कन्यादान मनसुख भाई ने पहले किया था। उनके चेहरों पर मायके आने की वही रौनक और खिलखिलाहट थी, जो किसी भी लाडली बेटी के चेहरे पर होती है। उनके पीछे उनके पति यानी मनसुख भाई के दामाद भी हाथों में उपहार, मिठाइयों के डिब्बे और फल लिए चले आ रहे थे।

अरे तुम सब आ गईं! आओ मेरी बच्चियों, आओ! शारदा बेन ने अपनी बाहें फैला दीं। एक-एक करके सभी बेटियां उनसे और मनसुख भाई से लिपट गईं। कोई उनके पैर छू रही थी तो कोई गले मिलकर लाड़ जता रही थी।

दामाद जयेश ने आगे बढ़कर मनसुख भाई के हाथ से फूलों की टोकरी ले ली और बोले, बाबूजी, अब आप और मां जी बैठिए। हम सब किसलिए आए हैं? सारा काम हम दामाद और बेटियां मिलकर संभाल लेंगे। आप बस आराम से कुर्सी पर बैठिए और निर्देश दीजिए कि कहां क्या करना है।

पल्लवी ने मंडप की सजावट को ध्यान से देखते हुए कहा, पापा, मैंने मुख्य वेदी के आसपास का पर्दा थोड़ा पीछे करवा दिया है। इससे जब बारात आएगी तो दूर बैठे अतिथियों को भी रस्में साफ दिखाई देंगी और किसी को धक्का-मुक्की नहीं करनी पड़ेगी।

वैशाली ने भी हां में सिर हिलाते हुए कहा, बिल्कुल सही दीदी। और पापा, हमने सभी पचास कमरों में जाकर देख लिया है। नई दुल्हनों के तैयार होने के लिए ब्यूटीशियन की टीम पहुंच चुकी है। हर कमरे में नाश्ता, पानी और उनके गहनों के बक्से सही सलामत रखवा दिए गए हैं।

शारदा बेन सभी बेटियों को भीतर के बड़े हॉल में ले गईं, जहां नए लहंगे, रेशमी साड़ियां, सोने-चांदी के आभूषण, पायल, बिछिया और गृहस्थी का सारा सामान रखा हुआ था।

शारदा बेन ने गर्व और संतोष के साथ कहा, बेटियों, देखो, मैंने और तुम्हारे पापा ने मिलकर हर दुल्हन को उसकी पसंद का लहंगा और जेवर दिलवाया है। हमने पहले ही कह दिया था कि किसी भी बेटी के मन में यह मलाल नहीं रहना चाहिए कि काश मुझे लाल की जगह गुलाबी रंग मिल जाता या कुंदन की जगह मीनाकारी मिल जाती। अगर दिल में थोड़ी सी भी कमी रह गई, तो कन्यादान का पुण्य अधूरा रह जाता है।

तन्वी की आंखें भर आईं। उसने भावुक होकर कहा, मां, आप दोनों सच में साक्षात भगवान का रूप हैं। जब हमारी शादी हुई थी, तब भी आपने हमारी एक-एक छोटी से छोटी पसंद का ध्यान रखा था। हमें कभी एक पल के लिए भी यह महसूस नहीं होने दिया कि हम अनाथालय की चारदीवारी में बड़ी हुई लड़कियां हैं। हमें लगा ही नहीं कि हमारी अपनी कोई मां नहीं है।

दोपहर होते-होते रिसॉर्ट का कोना-कोना उत्सव के रंग में रंग गया। शहनाई की मंगल ध्वनि गूंजने लगी। नगाड़ों की थाप पर खुशियां नाच रही थीं। तभी वह भावुक पल आया जिसका सबको इंतजार था। आज ब्याहने वाली पचास दुल्हनें, सुर्ख लाल और सुनहरे परिधानों में सजी, घूंघट की ओट में मंद-मंद मुस्कुराती हुई मंडप की ओर बढ़ने लगीं। उनके साथ उनकी बड़ी बहनें—पल्लवी, तन्वी, हिमानी और बाकी सब—हाथ में फूलों की चादर ताने उन्हें बड़े नाजों से ला रही थीं।

उन पचास दुल्हनों का रूप और उनकी आंखों में नया संसार बसाने की चमक देखकर मनसुख भाई और शारदा बेन की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। वे दोनों हाथ जोड़े एकटक उस दृश्य को निहारते रहे।

तभी एक साथ सभी पचास दुल्हनें और पहले ब्याही गई इक्यावन बेटियां आकर मनसुख भाई और शारदा बेन के चरणों के पास बैठ गईं। उन्होंने अपनी अंजुलियों में भरे ताजे गुलाब के फूल उन दोनों के चरणों में न्योछावर कर दिए और एक साथ सिर झुकाकर उनका आशीर्वाद लिया।

यह नजारा देखकर वहां मौजूद हर इंसान, चाहे वह कोई हलवाई हो, सजावट वाला हो या दामादों के रिश्तेदार, सबकी आंखें नम हो गईं। पूरे परिसर में एक ऐसा गहरा, पवित्र मौन छा गया जिसे सिर्फ आंसुओं की भाषा में समझा जा सकता था।

मनसुख भाई हाथ जोड़ते हुए बोले, अरे बेटा, यह क्या कर रही हो तुम सब? उठो, अपने बाबुल के सीने से लगो। ये फूल तो हमारे आंसुओं से भी हल्के हैं। हमें यह सब नहीं चाहिए, तुम बस सुखी रहो, यही हमारा सबसे बड़ा फल है।

तभी हिमानी आगे आई। उसके हाथ कांप रहे थे और आवाज में अश्रुपूर्ण कृतज्ञता थी। वह बोली, पापा, आप हमें मत रोकिए। आज अगर हम अपने लहू से भी आपके चरण पखारें, तो भी आपके उपकार का एक कतरा नहीं चुका सकते। दुनिया में लोग अपनी सगी औलादों को जायदाद के लिए छोड़ देते हैं, पर आपने हम जैसी बेसहारा लड़कियों को, जिनका इस भरी दुनिया में कोई नामलेवा नहीं था, अपनी छाती से लगाया। पहले पचास बहनों का कन्यादान करके उन्हें परिवार, ससुराल और मान-सम्मान दिया। और आज फिर पचास अनाथ बेटियों के सिर पर मां-बाप का साया बनकर खड़े हो गए। हमें बहनें दीं, जीजा दिए, भाई दिए और सबसे बढ़कर एक ऐसा मायका दिया जहां हम जब चाहें सिर ऊंचा करके आ सकते हैं।

मनसुख भाई ने आगे बढ़कर हिमानी का सिर सहलाया और रुंधे हुए गले से कहा, पगली, जब तुम मुझे पापा कहती हो, तो फिर खुद को अनाथ क्यों कहती हो? सुनो मेरी बात, खुशनसीब तुम नहीं हो, खुशनसीब तो मैं और तुम्हारी मां हैं। भगवान ने हमें खूब धन दिया, बड़ा कारोबार दिया, कोठियां और गाड़ियां दीं, लेकिन हमारी कोख हमेशा सूनी रखी। हम सालों-साल एक बच्चे की किलकारी के लिए तरसते रहे, मंदिरों में माथा टेकते रहे। फिर एक दिन तुम्हारी मां ने मुझसे कहा कि अगर भगवान ने हमारी झोली में अपनी संतान नहीं डाली, तो क्या हुआ, दुनिया में हजारों ऐसी बेटियां हैं जिनकी झोली में मां-बाप का प्यार नहीं है। क्यों न हम उनका सहारा बनें? आज जब मैं तुम सौ से ज्यादा बेटियों को मुस्कुराते, सजते और घर बसाते देखता हूं, तो मुझे लगता है कि भगवान ने मेरी एक औलाद छीनकर मुझे सौ-सौ देवियों का पिता बना दिया। कन्यादान का जो सुख मुझे मिला है, उसके लिए तो देवता भी तरसते हैं। चलो अब आंसुओं को पोंछो, बारात के स्वागत का वक्त हो गया है।

तभी पल्लवी ने हाथ जोड़कर कहा, पापा, बारात के स्वागत से पहले, मेरी छोटी बहन हिमानी और हम सबने मिलकर आपके लिए कुछ शब्द लिखे हैं। क्या हम वो सुना सकते हैं?

मनसुख भाई ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। हिमानी ने अपनी डायरी से एक पन्ना निकाला और कांपती, मगर बेहद मीठी आवाज में पढ़ने लगी:

“तन्हा रातों में जब सूनापन सताता था,

हर चेहरा बेगाना और पराया नजर आता था।

अनाथालय की खिड़की से देखती थी जब मैं,

बाबुल का हाथ थामे किसी गुड़िया को जाते हुए,

सोचती थी कि क्या कोई ऐसा भी रिश्ता होता है,

जो बिन कहे हर दर्द को अपने सीने में समोता है?

फिर एक दिन फरिश्ता बनकर आप आए,

सूनी आंखों में खुशियों के दीप जलाए।

न कोई खून का रिश्ता था, न कोई पहचान थी,

फिर भी आपकी ममता हम सब पर मेहरबान थी।

मिला जो बाबुल का साया, तो हर गम भुला दिया,

आपने हम अनाथों को एक भरा-पूरा परिवार बना दिया।

अब तो हर सांस में बाबुल का ही नाम रहे,

आपके कदमों की धूल ही मेरा मुकाम रहे।

अगर मिले जन्म दोबारा इस जहान में,

तो बस यही दुआ मांगूंगी उस भगवान से,

कि हर जन्म में आप ही मेरे मां-बाप हों,

और आपकी ममता की छांव ही मेरी पहचान हो।”

जब हिमानी की कविता समाप्त हुई, तो पूरा शामियाना तालियों और सिसकियों की मिली-जुली आवाज से गूंज उठा। शारदा बेन ने हिमानी को अपनी छाती से भींच लिया।

चारु ने सिसकते हुए कहा, हिमानी दीदी ने हम सबके दिल की बात कह दी। दुनिया हमें अनाथ कहती थी, पर आज हमारे पास वो सब कुछ है जो एक बड़े से बड़े रईस घर की बेटी के पास होता है। हमारा मायका है, हमारा मान है।

शाम ढलते ही ढोल-नगाड़ों के साथ पचास दूल्हों की बारातें रिसॉर्ट के विशाल द्वार पर पहुंचीं। मनसुख भाई और उनके दामादों ने आगे बढ़कर हर समधी का, हर दूल्हे का स्वागत पूरे आदर-सत्कार, इत्र और साफे के साथ किया। कहीं भी किसी को यह महसूस नहीं हुआ कि यह कोई सामूहिक औपचारिकता है। हर दूल्हे का तिलक उसी तरह हुआ जैसे किसी इकलौते दामाद का होता है।

रात के शांत पहर में, वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पचास हवन कुंडों में आहुतियां दी जाने लगीं। मनसुख भाई और शारदा बेन ने बारी-बारी से हर मंडप में जाकर, अपने हाथों में गंगाजल लेकर, एक-एक बेटी का हाथ उसके जीवनसाथी के हाथ में सौंपा। हर कन्यादान के साथ उनकी आंखों से गिरते आंसू पवित्र अग्नि में गिरकर जैसे ईश्वर की सबसे बड़ी आराधना बन रहे थे।

देर रात जब विदाई की वेला आई, तो वहां का माहौल ऐसा था कि पत्थर दिल इंसान भी रो पड़े। बेटियां अपने बाबुल के गले लगकर ऐसे रो रही थीं जैसे उनका कलेजा फटा जा रहा हो।

पापा, हमें भूल मत जाना… समय-समय पर हमें फोन करते रहना… जब भी मन करे हमारे घर आना… बेटियां हिचकियों के बीच कह रही थीं।

मनसुख भाई ने अपने आंसुओं को पोंछते हुए हर बेटी के सिर पर हाथ रखा और कहा, बेटियां कभी भुलाई जाती हैं क्या? यह तुम्हारा मायका है और हमेशा रहेगा। कोई भी परेशानी हो, कोई भी दुख हो, याद रखना कि तुम्हारा यह बूढ़ा बाप हमेशा तुम्हारे पीछे चट्टान की तरह खड़ा है। जाओ अपनी ससुराल को स्वर्ग बनाओ और हमेशा मुस्कुराती रहो।

गाड़ियां एक-एक करके रवाना होने लगीं। रिसॉर्ट का वह विशाल प्रांगण धीरे-धीरे खाली होने लगा, लेकिन उस खालीपन में कोई वीराना नहीं था। वह आंगन उन बेटियों की दुआओं, उनकी हंसी और उनके आंसुओं की पावन महक से हमेशा के लिए महक उठा था। मनसुख भाई और शारदा बेन ने एक-दूसरे का हाथ थामा और आसमान की तरफ देखकर हाथ जोड़ लिए। उनकी कोख भले ही सूनी रही हो, लेकिन उनका जीवन सौ-सौ बेटियों के आशीर्वाद से अमर हो चुका था।

आज के भौतिकवादी युग में जहां लोग अपनी सगी औलादों से मुंह मोड़ लेते हैं, वहीं मनसुख भाई और शारदा बेन जैसे दंपती समाज के लिए एक प्रेरणा पुंज हैं। क्या आपको लगता है कि समाज के सक्षम परिवारों को ऐसे पुनीत कार्यों के लिए आगे आना चाहिए? आपके विचार इस पर क्या हैं, हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

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