उसी शाम मायके से बड़े चचेरे भाई का फोन मालती के मोबाइल पर घनघनाने लगा। मालती ने जैसे ही ‘हैलो’ कहा, दूसरी तरफ से तीखी आवाज़ गूंजी, “मालती, तुम्हारी यह हिम्मत? मेरा बेटा पहली बार तुम्हारे दरवाजे पर कोई उम्मीद लेकर गया था और तुमने उसे खाली हाथ लौटा दिया? शहर जाकर इतनी मगरूर हो गई हो? याद रखो, कल को जब चाची जी नहीं रहेंगी, तो यह मायका हमीं से रहेगा। अगर भाइयों की कद्र नहीं करोगी, तो कभी मायके की चौखट पर कदम रखने की हिम्मत मत करना।”
गाँव की मिट्टी से उठी सोंधी खुशबू के बीच एक पुराना खपरैल वाला दालान आज भी उन दो बहनों की किलकारियों की गवाही देता था। जानकी और मालती, दो सगी बहनें, जिनके बीच का अपनत्व पूरे इलाके में एक मिसाल माना जाता था। माँ यशोदा के आंगन में कोई बेटा नहीं था, पर उन्होंने कभी इस बात का मलाल नहीं किया। यद्यपि घर की बड़ी चाची कौशल्या अपनी तीन औलादों—जो तीनों बेटे थे—के घमंड में अक्सर ताने कसने से नहीं चूकती थीं। कौशल्या चाची अक्सर आँगन में खाट पर बैठते हुए कहतीं, “यशोदा, बेटियाँ तो पराया धन हैं, उड़ जाएंगी। बुढ़ापे में जब चौखट पर कोई पूछने वाला नहीं होगा, तब मेरे ये बेटे ही तुम्हारे मान-सम्मान की लाठी बनेंगे।” यशोदा सिर्फ़ एक फीकी मुस्कान से इन तानों को पी जाती थीं, क्योंकि उनकी दोनों बेटियाँ उनके कलेजे का टुकड़ा थीं।
दोनों बहनों का स्वभाव दो अलग छोरों जैसा था। बड़ी बहन जानकी घरेलू कार्यों में इतनी दक्ष थी कि चूल्हे-चौके से लेकर मेहमानों की आवभगत तक, पूरा गाँव उसकी गृहस्थी के तौर-तरीकों का कायल था। पढ़ाई में उसका मन कभी नहीं लगा, आठवीं के बाद उसने बस्ता खूँटी पर टांग दिया। वहीं छोटी मालती का संसार किताबों के पन्नों में बसता था। गाँव की तंग गलियों और सीमित साधनों के बावजूद मालती ने घर बैठकर पत्राचार से स्नातक की डिग्री ली और फिर अपनी लगन से प्राथमिक शिक्षक बनने की तैयारी में जुट गई। जानकी हमेशा अपनी छोटी बहन की पीठ थपथपाती और कहती, “मेरी गुड़िया पढ़-लिखकर बड़ा नाम करेगी।”
समय का पहिया घूमा और विवाह योग्य होने पर जानकी का रिश्ता पास के एक समृद्ध ज़मींदार परिवार के इकलौते वारिस सतीश के साथ तय हो गया। भरा-पूरा खलिहान, चौड़े दालान और दर्जनों एकड़ ज़मीन देखकर पूरा मायका फूला नहीं समाया। जानकी ब्याह कर उस बड़े घर की बहु और मालकिन बन गई। कुछ समय बाद मालती का विवाह भी हुआ। मालती पढ़ी-लिखी और सुलझी हुई थी, इसलिए उसके लिए एक छोटे से कस्बे में रहने वाले सरकारी स्कूल के अध्यापक देवेश का रिश्ता चुना गया।
शादी के बाद मालती पति के साथ गया शहर के एक शांत मुहल्ले में रहने लगी। कुछ ही महीनों में मालती की अपनी मेहनत रंग लाई और उसे पास के एक कन्या विद्यालय में शिक्षिका की नौकरी मिल गई। देवेश और मालती ने मिलकर अपनी एक छोटी सी, अनुशासित दुनिया बसाई। समय बीता, उनके दो बेटे हुए। दोनों पति-पत्नी सुबह तैयार होकर अपने-अपने स्कूल जाते, शाम को बच्चों को पढ़ाते और महीने के अंत में पाई-पाई जोड़कर अपने भविष्य को संवारते। जीवन में कोई फिजूलखर्ची नहीं थी, बस एक सादगी भरा तालमेल था।
दूसरी तरफ, जानकी के संसार का विस्तार बहुत तेजी से हुआ। एक के बाद एक उसने पाँच संतानों को जन्म दिया—तीन बेटे और दो बेटियाँ। ससुराल में ज़मीन-जायदाद तो बहुत थी, लेकिन योजना और समझदारी की घोर कमी थी। सतीश जी को दिखावे का बहुत शौक था और जानकी भी उसी रंग में रंग गई थी। बच्चों की अच्छी शिक्षा पर ध्यान देने के बजाय समाज में अपनी झूठी शान बनाए रखने की होड़ लगी रही। बेटियों की शादी आई तो हैसियत से कहीं आगे बढ़कर दहेज, आतिशबाजी और दावतों में पैसे पानी की तरह बहाए गए। नतीजा यह हुआ कि बेटियों के ब्याह और बेटों के शौक पूरे करते-करते पुश्तैनी ज़मीन का एक बहुत बड़ा हिस्सा बिक गया। भरा-पूरा घर अब धीरे-धीरे आर्थिक तंगहाली की चादर में सिमटने लगा था।
एक दोपहर, बिना किसी पूर्व सूचना के जानकी अपने सबसे छोटे बेटे, नौ वर्षीय मयंक की उंगली थामे मालती के घर पहुँची। वर्षों बाद दीदी को अपनी चौखट पर देखकर मालती की आँखें खुशी से छलक आईं। उसने दौड़कर जानकी के चरण छुए, मयंक को गोद में उठा लिया और देवेश ने भी अपनी जेठानी का भरपूर आदर-सत्कार किया। दो दिन पुरानी यादों, हँसी-ठिठोली और मायके की बातों में पंख लगाकर उड़ गए।
तीसरे दिन सुबह जब जानकी के जाने का समय आया, तो उसने अपना झोला उठाया और अचानक मयंक का हाथ मालती के हाथ में थमाते हुए बोली, “मालती, मैं मयंक को यहीं तेरे पास छोड़कर जा रही हूँ। गाँव में पढ़ाई-लिखाई का कोई माहौल नहीं बचा, ज़मीन भी अब उतनी नहीं रही। तू तो शहर में रहती है, स्कूल में पढ़ाती है। इसे अपने पास रख, किसी अच्छे स्कूल में दाखिला करा दे। तेरे साए में रहेगा तो पढ़-लिखकर कोई अच्छी नौकरी पा लेगा।”
मालती एकदम सन्न रह गई। वह कुछ बोल पाती, इससे पहले ही जानकी ने ऑटो रिक्शा पकड़ा और स्टेशन के लिए निकल गई। मालती दरवाजे पर खड़ी कभी उस मासूम बच्चे को देखती तो कभी अपने पति देवेश को। देवेश के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आई थीं। मालती का बड़ा बेटा उस समय बोर्ड की परीक्षा की तैयारी के लिए शहर के छात्रावास में था और छोटा बेटा अभी पाँचवीं में पढ़ रहा था। दोनों की सीमित आय, स्कूल की व्यस्त दिनचर्या और अब एक तीसरे बच्चे की पूरी जिम्मेदारी, वह भी बिना किसी योजना के। फिर भी मालती ने अपने मन को समझाया कि यह उसकी लाडली दीदी का बेटा है, वह अपनी बहन का मान कभी कम नहीं होने देगी।
गाँव के खुले माहौल में बिना किसी रोक-टोक के पले-बढ़े नौ साल के मयंक के लिए शहर का यह छोटा सा, अनुशासित घर किसी पिंजरे जैसा था। सुबह छह बजे उठना, दाँत साफ करना, तय समय पर नाश्ता करना और शाम को दो घंटे मेज़ पर बैठकर पढ़ना उसके स्वभाव के बिल्कुल विपरीत था। मालती स्कूल से थककर लौटती, फिर घर का खाना बनाती और इसके बाद मयंक को लेकर बैठती। मयंक पढ़ाई में मन लगाने के बजाय दिनभर टीवी देखता या बालकनी से बाहर झांकता। जब मालती उसे प्यार से डांटती या होमवर्क पूरा न करने पर टीवी बंद कर देती, तो वह मुँह फुलाकर बैठ जाता।
दो महीने ऐसे ही भारी जद्दोजहद में बीते। मालती की सेहत गिरने लगी थी, लेकिन वह कर्तव्य से पीछे नहीं हटी। तभी एक दिन जानकी के पति सतीश अपने बेटे से मिलने आए। मयंक जैसे ही अपने पिता को देखा, वह रोते हुए उनके पैरों से लिपट गया और ज़िद पकड़ ली, “बाबूजी, मुझे यहाँ नहीं रहना! मुझे घर ले चलो। मौसी मुझे बहुत डांटती हैं, खेलने भी नहीं देतीं और दिनभर पढ़ाई के लिए परेशान करती हैं।”
मालती ने समझाने की बहुत कोशिश की, “जीजाजी, यह बच्चा है, अभी नियम-कायदों की आदत नहीं है इसलिए ऐसा कह रहा है। आप इसे समझाइए।” लेकिन सतीश के चेहरे का रंग बदल चुका था। उन्होंने रूखे स्वर में कहा, “नहीं मालती, जो बच्चा अपनी माँ के बिना घुट रहा हो, उसे हम जबरदस्ती यहाँ नहीं रखेंगे।” और वे मयंक का सामान समेटकर उसी शाम उसे लेकर चले गए।
मालती का मन भारी था, लेकिन असली वज्रपात तो अगले दिन हुआ। शाम को जानकी का एक लंबा, तीखा और कड़वाहट से भरा संदेश मालती के फोन पर आया:
“मालती, मुझे नहीं पता था कि शहर की हवा लगते ही और चार पैसे कमाते ही तुम्हारा खून इतना सफेद हो जाएगा। मैंने अपनी जान के टुकड़े को तुझ पर अंधा भरोसा करके सौंपा था, और तूने उस मासूम पर जुल्म ढाए? अपनी अमीरी और ओहदे के घमंड में तूने अपनी सगी बहन के बेटे को नौकरों जैसा समझा। आज से मेरा और तेरा नाता यहीं खत्म होता है। अब कभी अपनी इस बहन को अपनी सूरत मत दिखाना।”
वह संदेश पढ़कर मालती की रूह कांप गई। जिस बहन के लिए उसने दिन-रात एक कर दिया, उसने बिना सच्चाई जाने, बिना एक बार बात किए इतना बड़ा इल्ज़ाम लगा दिया? मालती कई रातों तक तकिए में मुँह छिपाकर रोती रही। देवेश ने उसे संभाला, “मालती, जब नीयत साफ हो तो इंसान को वक्त पर भरोसा रखना चाहिए। वक्त हर गलतफहमी का जवाब खुद दे देता है।” धीरे-धीरे वक्त का मरहम लगा और मालती ने अपने आँसू पोंछकर फिर से अपनी गृहस्थी संभाल ली।
इस घटना के लगभग डेढ़ साल बीत चुके थे। जानकी के परिवार से बातचीत पूरी तरह बंद थी। एक रविवार की सुबह, कौशल्या चाची का बड़ा पोता, जिसका नाम विवेक था, अचानक मालती के घर पहुँचा। उसने औपचारिकता के बाद सीधे अपने आने का मकसद बताया, “फूफी जी, मैंने अभी-अभी एक निजी कंपनी में जीवन बीमा का काम शुरू किया है। इस महीने मुझे अपना लक्ष्य पूरा करना है। आप तो जानती ही हैं कि शहर में आप दोनों सरकारी नौकरी में हैं, पैसे की तो कोई कमी है नहीं। आप मेरे नाम से ढाई लाख का एक बड़ा बीमा करवा लीजिए, मेरी नौकरी पक्की हो जाएगी।”
देवेश उस समय वहीं बैठे थे। उन्होंने बहुत शांति से कहा, “बेटा विवेक, हमारी कमाई सीमित है। हमने पहले से ही अपने दोनों बच्चों की पढ़ाई और भविष्य के लिए छोटी-छोटी बचत योजनाएं ले रखी हैं। अभी हमारे पास एकमुश्त इतना बड़ा प्रीमियम भरने की गुंजाइश बिल्कुल नहीं है।”
विवेक का चेहरा उतर गया। उसने ज़िद की, पर देवेश ने शालीनता से असमर्थता जता दी। विवेक चाय का घूँट भरे बिना ही वहाँ से पैर पटकते हुए निकल गया।
उसी शाम मायके से बड़े चचेरे भाई का फोन मालती के मोबाइल पर घनघनाने लगा। मालती ने जैसे ही ‘हैलो’ कहा, दूसरी तरफ से तीखी आवाज़ गूंजी, “मालती, तुम्हारी यह हिम्मत? मेरा बेटा पहली बार तुम्हारे दरवाजे पर कोई उम्मीद लेकर गया था और तुमने उसे खाली हाथ लौटा दिया? शहर जाकर इतनी मगरूर हो गई हो? याद रखो, कल को जब चाची जी नहीं रहेंगी, तो यह मायका हमीं से रहेगा। अगर भाइयों की कद्र नहीं करोगी, तो कभी मायके की चौखट पर कदम रखने की हिम्मत मत करना।”
कॉल कट गया। मालती का हाथ कांपने लगा और फोन जमीन पर गिर पड़ा। वह सोफे पर बैठकर सिर पकड़कर रोने लगी। उसका दिल चीत्कार कर उठा—आखिर उसका गुनाह क्या था? क्या सिर्फ़ इसलिए कि वह पढ़-लिखकर एक सम्मानित नौकरी करने लगी, अपने सीमित संसाधनों में स्वाभिमान से जी रही थी, तो पूरे खानदान की उम्मीदों का बोझ उसके कंधों पर था? अगर वह किसी की हर गलत मांग को पूरा न कर सके, तो क्या वह घमंडी हो गई? क्या सारे रिश्ते केवल अपनी जरूरतों और स्वार्थ की बुनियाद पर ही टिके होते हैं?
दिन बीतते गए, पर मालती के मन में अपने मायके और खासकर दीदी जानकी की दूरियों का घाव हरा रहा।
लगभग तीन साल बाद, अचानक एक दिन गाँव के एक पुराने पड़ोसी का फोन देवेश के पास आया। पड़ोसी ने घबराई हुई आवाज़ में बताया कि जानकी के पति सतीश जी को अचानक दिल का गंभीर दौरा पड़ा है और गाँव के अस्पताल ने हाथ खड़े कर दिए हैं। उन्हें तुरंत पटना के बड़े अस्पताल ले जाया जा रहा है, लेकिन परिवार के पास इलाज के लिए तुरंत देने को पैसे नहीं हैं और उनके अपने रिश्तेदार मुँह मोड़ चुके हैं।
मालती ने जैसे ही यह सुना, उसके भीतर की सारी कड़वाहट एक पल में बह गई। उसने यह नहीं सोचा कि जानकी ने उस पर क्या इल्ज़ाम लगाए थे या भाई ने उसे मायके से बेदखल करने की धमकी दी थी। उसने बस इतना देखा कि उसकी बड़ी बहन आज गहरे संकट में थी।
मालती ने देवेश की ओर देखा। देवेश ने बिना एक शब्द कहे मालती का हाथ थाम लिया। दोनों ने अपनी बरसों की मेहनत से बचाई गई फिक्स्ड डिपॉजिट की रसीद उठाई, बैंक से आपातकालीन पैसे निकाले और उसी रात अपनी गाड़ी से पटना के उस अस्पताल में पहुँच गए।
अस्पताल के आईसीयू के बाहर का मंजर बड़ा दर्दनाक था। जानकी फर्श पर बैठी बदहवास रो रही थी। मयंक और उसके बड़े भाई असहाय खड़े थे। डॉक्टर बार-बार ऑपरेशन के लिए जरूरी रकम जमा करने का तगादा कर रहे थे, लेकिन कोई भी रिश्तेदार, जो कभी उनकी ज़मीनों की दावतों में शरीक होते थे, वहाँ नजर नहीं आ रहा था।
तभी जानकी की नज़र सामने से तेज कदमों से आती मालती पर पड़ी। मालती ने बिना एक पल गंवाए सीधे जाकर काउंटर पर पूरी रकम जमा की, डॉक्टरों से बात की और वरिष्ठ सर्जन को बुलाकर तुरंत ऑपरेशन की प्रक्रिया शुरू करवाई।
जब डॉक्टरों ने आकर कहा, “मरीज अब खतरे से बाहर हैं, सही समय पर इलाज शुरू हो गया,” तब जानकी के होश ठिकाने आए। वह लड़खड़ाते कदमों से मालती के पास आई। उसकी आँखें अपराधबोध, शर्म और आंसुओं से भरी हुई थीं।
जानकी ने कांपते हाथों से मालती के कंधे पकड़े और सिसकते हुए बोली, “मालती… तू? जिस बहन ने तुझ पर इतने नीच इल्ज़ाम लगाए, जिसका तूने कभी मुँह न देखने की कसम खाई होगी, उस बहन के लिए तू अपनी पूरी जमा-पूँजी लेकर यहाँ खड़ी है? और वे लोग, जिनके लिए हम अपनी ज़मीनें लुटाते रहे, जिन्हें अपनी शान दिखाते रहे, आज इस अंधेरे में कोई झांकने तक नहीं आया।”
मालती ने आगे बढ़कर अपनी दीदी को कसकर गले से लगा लिया। दोनों बहनों के आँसू एक-दूसरे के कन्धों पर बह निकले। मालती ने बड़े प्यार से कहा, “दीदी, रिश्ते किसी कागज़ के लिफ़ाफ़े या लेन-देन की रसीद पर नहीं टिकते। आपने गुस्से में जो कहा, वह आपकी परिस्थिति की मजबूरी थी। लेकिन हमारे बचपन का प्यार, माँ के संस्कार और हमारे खून का रिश्ता इतना कमजोर नहीं हो सकता कि चंद गलतफहमियों की आंधी में बिखर जाए। आप मेरी बड़ी बहन हैं, और आपका सुख-दुख मेरा अपना है।”
वहीं कोने में खड़ा मयंक भी अपनी मौसी के पास आया और हाथ जोड़कर बोला, “मौसी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं छोटा था और समझ नहीं पाया कि आप जो डांटती थीं, वह मेरे भले के लिए था।” मालती ने उसे भी खींचकर अपने सीने से लगा लिया।
अगले दिन जब सतीश जी को होश आया, तो उन्होंने भी हाथ जोड़कर मालती और देवेश से अपनी पुरानी भूलों की माफी मांगी। उस अस्पताल के गलियारे में न केवल एक इंसान की जान बची थी, बल्कि बरसों से गलतफहमियों की धूल में दबे दो सगी बहनों के पवित्र रिश्ते को एक नया जीवनदान मिला था। जानकी को यह समझ आ चुका था कि झूठी शान और दिखावे से ज्यादा कीमती अपनों का सच्चा समर्पण होता है, और मालती के स्वाभिमान को यह तसल्ली मिल चुकी थी कि अगर नीयत में सच्चाई हो, तो वक्त हर बिखरे हुए रिश्ते को दोबारा समेट ही देता है।
दोस्तों, क्या आपके जीवन में भी कभी ऐसा हुआ है कि अपनों की बेजा उम्मीदें पूरी न करने पर आपको ही गलत और मतलबी ठहरा दिया गया हो? क्या रिश्तों को हमेशा लेन-देन और स्वार्थ की कसौटी पर तौलना उचित है? अपनी अनमोल राय हमें नीचे कमेंट में ज़रूर बताएं।
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