मान की डोरी

सुनैना वहीं चौखट के पास पत्थर की मूरत बनी खड़ी थी। उसके पैरों तले से जैसे पूरी कायनात खिसक चुकी थी। उसके दिमाग में वे सारे मंज़र बिजली की तरह कौंधने लगे—जब उसने सुमित्रा जी के हाथ से पानी का लोटा झटक दिया था क्योंकि उनके हाथ कांपते थे; जब उसने उन्हें डांटा था कि वे उस चादर की बात न करें; जब उसने उस औरत को ‘कीटाणुओं से भरी’ कहकर अपमानित किया था, जिसने अपनी पूरी देह को गलाकर उनके लिए यह ऐशो-आराम का साम्राज्य खड़ा किया था।

 हर बहू अपनी सास को सुमित्रा देवी से मिलवाना चाहती थी ताकि उसकी सास भी उनसे कुछ प्रेरणा ले सके और अपने सख्त मिजाज को थोड़ा नरम कर सके।

इसी बीच एक दिन किटी पार्टी में बातचीत के दौरान नयना ने बहुत शालीनता से एक प्रस्ताव रखा। उसने कहा, “सखियों, हम सब हर पंद्रह दिन में यहाँ आकर दो घंटे मौज-मस्ती करती हैं, अच्छा खाना खाती हैं। लेकिन हमारे यहाँ आ जाने से हमारे घरों में सासू माँ अकेली रह जाती हैं। क्यों न अगली बार हम सब अपनी-अपनी सासू माँ को भी इस दोपहर की चाय और जलपान पर साथ लेकर आएं? हम सब मिलकर बैठेंगे, उनका भी मन बहल जाएगा।”

भोपाल शहर के एक शांत और प्रतिष्ठित इलाके अरेरा कॉलोनी में नयना का नया संसार बसा था। इंदौर के एक खुले, हंसमुख और सुलझे हुए परिवार से ताल्लुक रखने वाली नयना ने अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी ही की थी कि उसका विवाह क्षितिज के साथ संपन्न हो गया। क्षितिज का अपना एक उभरता हुआ ऑटोमोबाइल का कारोबार था। वह दिन-रात काम में जुटा रहता—सुबह नौ बजे घर से निकलता और रात को थकान से चूर होकर ही वापस लौटता। परिवार में सिर्फ तीन लोग थे—क्षितिज, उसकी माँ सुमित्रा देवी और अब नई बहू नयना।

क्षितिज स्वभाव से जितना शांत और सरल था, उसकी माँ सुमित्रा देवी उतनी ही अनुशासनप्रिय, सख्त और कड़े मिजाज की थीं। घर में उनकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता था। शुरुआत के कुछ दिन तो मेहमानों की आवाजाही और नएपन की औपचारिकता में बीत गए, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, नयना पर अकेलेपन और सास के कड़े व्यवहार का दबाव बढ़ने लगा।

नयना का दिन सुबह छह बजे से शुरू हो जाता। वह उठकर स्नान करती, पूजा का प्रबंध करती और रसोई में जाकर चाय और नाश्ता तैयार करती। जैसे ही वह दिन का काम निपटाकर किसी पत्रिका के पन्ने पलटने बैठती या ड्राइंग रूम में टीवी चालू करती, तुरंत भीतर के कमरे से सुमित्रा देवी की खनकदार और सख्त आवाज गूंज उठती, “नयना! अरे कहां गुम हो? देखो तो डाइनिंग टेबल पर धूल जमी है। ऐसे ही घर संभाला जाता है क्या? जरा उठो और दालान की सफाई दोबारा करवाओ।”

सुमित्रा देवी खुद पूरे दिन केवल तख्त पर बैठी रहतीं या माला फेरती रहतीं, लेकिन उनकी पैनी निगाहें हमेशा नयना के हर कदम पर टिकी रहती थीं। नयना ने कभी चाय में अदरक कम डाली तो कभी सब्जी में नमक ज्यादा हो गया—कोई न कोई खोट निकालना सुमित्रा देवी की दैनिक आदत बन चुकी थी। नयना जब भी थोड़ा सुस्ताने का प्रयास करती, सास उसे कोई न कोई नया काम सौंप देतीं।

परंतु सुमित्रा देवी का एक विचित्र पहलू भी था। वह समाज के सामने अपनी प्रतिष्ठा को लेकर बेहद सजग थीं। वह जब भी मंदिर जातीं, किसी परिचित के यहाँ शादी-ब्याह में शरीक होतीं या पास के बाजार में खरीदारी के लिए निकलतीं, तो नयना को सज-धजकर अपने साथ ले जाना कभी नहीं भूलती थीं। वे दोनों जब साथ निकलतीं, तो सुमित्रा देवी अपनी बहू के कंधे पर हाथ रखकर मुस्कुराते हुए चलतीं और नयना भी अपने चेहरे पर एक सलीकेदार मुस्कान सजाए उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलती। कॉलोनी के लोग उन्हें देखकर आहें भरते और कहते कि देखो, सास-बहू हो तो ऐसी, जैसे माँ-बेटी की जोड़ी हो। लेकिन उस चमकते मुखौटे के पीछे का सच केवल नयना का उदास मन ही जानता था।

दिनभर की इसी घुटन और अकेलेपन को कम करने के लिए नयना ने अपनी सोसाइटी की हमउम्र महिलाओं के साथ जुड़ना शुरू किया। सोसायटी के क्लब हाउस में महीने में दो बार महिलाओं की एक छोटी सी किटी पार्टी आयोजित होती थी। इस महफिल में आसपास के घरों की छह-सात बहुएं एकत्रित होती थीं। वहां तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनते, तंबोला खेला जाता और गपशप होती। लेकिन उस महफिल की सबसे पसंदीदा और आम गतिविधि थी—अपनी-अपनी सासों के कड़वे व्यवहार का कच्चा-चिट्ठा खोलना।

कोई बहू कहती, “मेरी सास तो इतनी कंजूस हैं कि घी का डिब्बा भी छुपाकर रखती हैं।” दूसरी बहू कहती, “अरे तुम्हारी तो फिर भी ठीक है, मेरी सास तो मेरे मायके वालों के सामने मेरी ऐसी बेइज्जती करती हैं कि मेरा सिर शर्म से झुक जाता है।” तीसरी अपनी सास की जासूसी की दास्तान सुनाती।

लेकिन नयना का मिजाज बिल्कुल जुदा था। वह अच्छी तरह जानती थी कि चार दीवारी की बातें सड़क पर उछालने से कभी समस्याओं का समाधान नहीं होता, बल्कि खुद की ही गरिमा गिरती है। नयना जब भी उस महफिल में बोलती, तो वह अपनी सास की किसी न किसी बात का सकारात्मक पहलू खोजकर उसकी तारीफ करती।

वह मुस्कुराकर कहती, “मेरी माँ जी अनुशासन की बहुत पक्की हैं। वह मुझे हर काम इतनी बारीकी से सिखाती हैं कि मुझे कभी किसी के सामने नीचा न देखना पड़े। और सबसे बड़ी बात, वह जहां भी जाती हैं, मुझे अपने साथ सम्मान से लेकर जाती हैं। उन्होंने मुझे पूरे समाज में अपनी बेटी की तरह पेश किया है।”

जब किसी ने पूछा कि क्या तुम्हारी सास रसोई में तुम्हारी मदद करती हैं, तो नयना ने बहुत सहजता से कह दिया, “माँ जी कहती हैं कि सुबह उठकर बहु को गरम चाय खुद बनाकर देना उन्हें सुकून देता है, हालांकि मैं उन्हें मना करती हूँ, पर उनका प्यार ऐसा ही है।”

नयना की यह बातें सुनकर किटी पार्टी की बाकी बहुएं दंग रह जातीं। उनके दिलों में एक हल्की सी जलन और गहरी ईर्ष्या पैदा होने लगी कि काश उन्हें भी नयना जैसी सास मिली होती! वे सभी अपने-अपने घर लौटकर अपनी सासों के सामने नयना की सास के कसीदे पढ़तीं। कोई अपनी सास से कहती, “अरे, अरेरा कॉलोनी के बी-ब्लॉक वाली सुमित्रा जी को देखिए, अपनी बहू को हथेली पर रखती हैं। कभी तेज आवाज में बात नहीं करतीं और आप हैं कि हर वक्त ताने मारती रहती हैं।” धीरे-धीरे पूरी कॉलोनी में यह बात फैल गई कि अगर इस शहर में कोई साक्षात ‘आदर्श सास’ है, तो वह केवल सुमित्रा देवी हैं।

हर बहू अपनी सास को सुमित्रा देवी से मिलवाना चाहती थी ताकि उसकी सास भी उनसे कुछ प्रेरणा ले सके और अपने सख्त मिजाज को थोड़ा नरम कर सके।

इसी बीच एक दिन किटी पार्टी में बातचीत के दौरान नयना ने बहुत शालीनता से एक प्रस्ताव रखा। उसने कहा, “सखियों, हम सब हर पंद्रह दिन में यहाँ आकर दो घंटे मौज-मस्ती करती हैं, अच्छा खाना खाती हैं। लेकिन हमारे यहाँ आ जाने से हमारे घरों में सासू माँ अकेली रह जाती हैं। क्यों न अगली बार हम सब अपनी-अपनी सासू माँ को भी इस दोपहर की चाय और जलपान पर साथ लेकर आएं? हम सब मिलकर बैठेंगे, उनका भी मन बहल जाएगा।”

यह सुनते ही कुछ बहुओं के चेहरे फक पड़ गए। एक बहू तुनककर बोली, “नयना, तुम्हारा दिमाग तो ठीक है? महीने में सिर्फ दो दिन तो हमें उस रोज-रोज की टोका-टोकी से आजादी मिलती है, तुम वह भी हमसे छीनना चाहती हो?”

तभी दूसरी बहू ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा, “नहीं-नहीं, सोचो तो सही! अगर हमारी सासें यहाँ आएंगी, तो वे सुमित्रा जी से मिलेंगी। जब वे देखेंगी कि सुमित्रा जी अपनी बहू के साथ कितना गरिमामय और प्यार भरा व्यवहार करती हैं, तो शायद उन्हें भी अपनी गलतियों का अहसास हो। यह तो बहुत अच्छा मौका है अपनी सासों को आईना दिखाने का!”

काफी वाद-विवाद के बाद अंततः सभी बहुएं इस बात पर सहमत हो गईं कि अगली किटी पार्टी ‘सास-बहू मिलन’ के रूप में मनाई जाएगी।

अगले पखवाड़े सोसाइटी के सामुदायिक भवन का नजारा देखने लायक था। सभी सास-बहू की जोड़ियां बेहतरीन साड़ियों और गहनों में सज-धजकर पहुंची थीं। लेकिन उस पूरे हॉल में जो सबसे खास व्यक्तित्व बनकर उभरीं, वे थीं सुमित्रा देवी। जैसे ही सुमित्रा देवी ने नयना के साथ हॉल में कदम रखा, सभी महिलाओं की नजरें उन पर टिक गईं।

सुमित्रा देवी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हर कोई उन्हें इतनी इज्जत और हैरानी भरी नज़रों से क्यों देख रहा है। पार्टी शुरू होते ही सोसाइटी की बुजुर्ग महिलाएं और बहुएं सुमित्रा देवी के इर्द-गिर्द आकर बैठ गईं।

एक बुजुर्ग महिला ने हाथ जोड़ते हुए कहा, “सुमित्रा जी, सचमुच धन्य हैं आप! आज के जमाने में जहाँ सास-बहू के झगड़े थाने और अदालतों तक पहुँच जाते हैं, आपने अपनी बहू को बेटी बनाकर घर को स्वर्ग बना दिया है।”

तभी एक दूसरी बहू ने सुमित्रा देवी के चरण स्पर्श करते हुए कहा, “आंटी जी, आपकी बहू नयना आपकी इतनी तारीफ करती है कि हम सब रश्क करते हैं। वह बता रही थी कि आप किस तरह सुबह खुद उठकर उसके लिए चाय बनाती हैं और उसे किसी बात की फिक्र नहीं होने देतीं। काश मेरी सास भी आपकी तरह थोड़ी समझदार होतीं, वे तो मुझे एक पल भी चैन से बैठने नहीं देतीं।”

एक अन्य सास ने सुमित्रा देवी से हाथ मिलाते हुए धीमी आवाज में कहा, “बहन जी, हमें भी कुछ सीख दीजिए कि आपने अपनी बहू को इतना संस्कारी और आज्ञाकारी कैसे बनाया? हमारी बहू तो हर वक्त मुँह फुलाए रहती है, जबकि आपकी नयना आपकी तारीफ करते नहीं थकती। वह पूरे ग्रुप में कहती है कि मेरी सास जैसी ममतामयी औरत पूरे भोपाल में नहीं मिलेगी।”

सुमित्रा देवी यह सब सुनकर अंदर तक सन्न रह गईं। उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई। उन्होंने अचरज से भरी आँखों से सामने खड़ी एक महिला से पूछा, “यह सब बातें… नयना ने आप सबसे कहीं?”

महिला ने मुस्कुराकर कहा, “और कौन कहेगा बहन जी! आपकी बहू तो आपके गुण गाते नहीं थकती। वह कहती है कि अगर सास मिले तो सुमित्रा देवी जैसी, जिसने कभी अपनी बहू को पराया नहीं समझा।”

सुमित्रा देवी की नजरें दूर कोने में जलपान का प्रबंध कर रही नयना पर जाकर ठहर गईं। नयना बहुत सादगी से मुस्कुराती हुई सभी बुजुर्गों की थालियों में नाश्ता परोस रही थी।

सुमित्रा देवी का अंतर्मन भीतर ही भीतर गहरे अपराधबोध से कांप उठा। वे सोचने लगीं—मैंने इस बच्ची के साथ क्या किया? मैंने इसे एक पल चैन से बैठने नहीं दिया। हर बात पर ताने मारे, हर काम में नुक्स निकाला, इसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाई। लेकिन इस मासूम ने जमाने के सामने मेरे उन सारे तानों को ढककर मुझे एक देवी का दर्जा दे दिया! इसने अपने दुख का ढिंढोरा पीटने के बजाय मेरे सम्मान की रक्षा की। समाज में मुझे ‘आदर्श सास’ की पदवी दिला दी, जिसकी मैं शायद हकदार भी नहीं थी।

उस दोपहर पार्टी खत्म होने के बाद जब सभी अपने-अपने घरों के लिए विदा हुए, तो हर कोई सुमित्रा देवी और नयना की जोड़ी की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहा था।

घर लौटते समय गाड़ी में सुमित्रा देवी बिल्कुल शांत बैठी रहीं। घर पहुंचकर जैसे ही नयना ने जूते उतारे और रसोई की ओर पानी लाने के लिए कदम बढ़ाए, सुमित्रा देवी ने भर्राई हुई आवाज में पुकारा, “नयना…!”

नयना ठिठक गई। उसने पीछे मुड़कर देखा तो उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं। हमेशा तनी रहने वाली उसकी सास की आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी।

नयना घबराकर दौड़ी और उनके पास आकर बोली, “माँ जी! क्या हुआ? आपकी तबीयत तो ठीक है? कहीं कोई बात बुरी लग गई क्या?”

सुमित्रा देवी ने बिना कुछ कहे नयना को अपने सीने से लगा लिया। उनके आंसुओं ने नयना के कंधे को भिगो दिया। उन्होंने नयना के सिर पर ममता से हाथ फेरते हुए कहा, “मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची… मुझे माफ कर दे। मैं उम्र में बड़ी होकर भी सोच में कितनी छोटी निकली। मैंने तुझे हमेशा पराए घर से आई एक लड़की समझा, हर वक्त तुझ पर हुक्म चलाया, तेरे आत्मसम्मान को चोट पहुंचाई। लेकिन तूने… तूने उस पूरी महफिल में मेरी कमियों पर पर्दा डालकर मुझे इतना बड़ा मान दे दिया! तूने मुझे वह सम्मान बख्शा जो शायद मैंने कभी कमाया ही नहीं था।”

नयना की आँखों में भी आंसू छलक आए। उसने अपनी सास के हाथ थाम लिए और बहुत ही कोमलता से कहा, “माँ जी, ऐसा मत कहिए। मेरी माँ ने मुझे विदा करते समय यही सिखाया था कि घर की बात घर में ही रहनी चाहिए। बाहर जाकर अपने ही परिवार की बुराई करने से हमारा ही घर छोटा होता है। आप मेरी सास हैं, मेरी माँ जैसी हैं। अगर माँ डांट भी दे, तो क्या बेटी चौराहे पर जाकर उसका ढिंढोरा पीटेगी? मैंने कोई एहसान नहीं किया माँ जी, मैंने बस अपने परिवार की मर्यादा संभाली है।”

उस दिन के बाद से उस घर की आबोहवा पूरी तरह बदल गई। सुमित्रा देवी के सख्त चेहरे पर अब हमेशा एक वात्सल्य भरी मुस्कान रहने लगी। अगले ही दिन जब सुबह नयना सोकर उठी, तो उसने देखा कि सुमित्रा देवी खुद रसोई में चाय की केतली चढ़ाए खड़ी थीं। नयना जब हड़बड़ाकर रसोई में पहुंची, तो सुमित्रा देवी ने प्यार से उसके गाल थपथपाए और कहा, “चल पगली, आज से तू मेरी सिर्फ बहू नहीं, मेरी लाडली बेटी है। जब तूने मुझे माँ का दर्जा दिया है, तो मैं भी माँ का फर्ज निभाऊंगी।”

घर में अब कड़वे तानों की जगह मीठी हंसी गूंजने लगी। नयना को अब दिनभर खालीपन का अहसास नहीं होता था, क्योंकि अब उसके पास एक ऐसी माँ थी जो उसकी हर छोटी-बड़ी खुशी का ख्याल रखती थी।

समय बीतता गया और सचमुच वह घर प्रेम का मंदिर बन गया। पूरी कॉलोनी के लोग आज भी उन्हें देखकर गर्व करते हैं, लेकिन अब उनके चेहरों पर वह मुस्कान नकली नहीं थी—वह दिल की गहराइयों से निकली उस सच्ची आत्मीयता की चमक थी, जिसे नयना के संयम और सुमित्रा देवी के पश्चाताप ने सींचा था। किसी ने सच ही कहा है कि संबंध केवल अधिकारों की मांग से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सम्मान की रक्षा करने से मजबूत होते हैं।

पाठकों के लिए विचार:

क्या आपको लगता है कि आज के दौर में भी अगर बहुएं और सासें एक-दूसरे की कमियों को बाहर उछालने के बजाय घर के भीतर ही प्रेम और समझदारी से सुलझाएं, तो टूटने की कगार पर खड़े अनगिनत परिवार बिखरने से बच सकते हैं? अपनी अनमोल राय और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर साझा करें।

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