धूप का एक टुकड़ा

 कबीर ने थाली को साइड टेबल पर रखा और बोला, “दादी, जब लड़की वाले हॉल में बैठे थे, तो उनके पिता जी बार-बार पूछ रहे थे कि शादी में ये इंतज़ाम कैसे होंगे, वो रस्में कैसे होंगी। पापा और मम्मी जवाब दे रहे थे, लेकिन जब उन्होंने पूछा कि कबीर की परवरिश में इतनी सादगी और ठहराव कहाँ से आया, तो पापा ने कहा कि यह इसकी दादी के संस्कार हैं। पर दादी, मुझे उस वक्त पापा पर और खुद पर बहुत गुस्सा आया। अगर आपके संस्कार इतने बड़े हैं, तो आप हमारे साथ उस सोफे पर क्यों नहीं बैठी थीं?”

खिड़की के शीशे पर बाहर लगे अमलतास की पीली पत्तियाँ थरथरा रही थीं। दोपहर की तीखी धूप अब धीरे-धीरे ढलकर मद्धिम सुनहरी रंगत में बदलने लगी थी। कमरे के एक कोने में रखे दीवान पर बैठी देवकी जी ने अपनी उँगलियों से चादर की सिलवटों को बराबर किया। नजरें बार-बार दीवार घड़ी की सुइयों पर टिक जाती थीं, जो टिक-टिक करती हुई आगे बढ़ रही थीं, मानो वक्त को किसी के ठहरने की कोई परवाह न हो। आज सुबह से ही उनके सीने में एक अजीब सी भारी उदासी जमी हुई थी। दिल बार-बार कह रहा था कि काश कोई आए, उनका हाथ थामे और पूछे कि अम्मा, आज तुम इतनी चुप क्यों हो? लेकिन चौखट पर हर आहट सिर्फ गुजर जाने के लिए होती थी, भीतर कदम रखने के लिए नहीं।

घर के मुख्य हॉल से कहकहों की आवाजें गूँज रही थीं। कटोरियों और चमचों की खनक बता रही थी कि चाय और नाश्ते का दौर पूरे शबाब पर है। आज उनके पोते कबीर का रिश्ता पक्का करने के लिए लड़की वाले जयपुर के वैशाली नगर स्थित उनके इस बड़े से मकान में आए हुए थे। सब कुछ कितना भव्य था। दूर तक महकती हुई इलायची वाली कड़क चाय, समोसे, काजू की कतली और मेवों की खुशबू पूरे घर में तैर रही थी। देवकी जी का कमरा हॉल से लगा हुआ ही था, महज एक परदे और पतले दरवाजे की ओट थी। अंदर आती खुशबू और हंसी की आवाजें उनके अकेलेपन को और गहरा कर रही थीं।

हर बार जब हॉल में कोई खिलखिलाकर हँसता, देवकी जी का दिल चौंक उठता। उन्हें लगता कि अब उनका बेटा आलोक कहेगा, “अरे, अम्मा से तो मिल लीजिए, हमारे घर की नींव वही हैं।” या फिर बहू नलिनी किसी मेहमान को हाथ पकड़कर अंदर ले आएगी कि “दादी जी का आशीर्वाद तो ले लीजिए।” लेकिन वक्त बीतता गया। बातचीत आगे बढ़ी, लेन-देन की रस्में तय हुईं, शगुन के लिफाफे बदले गए और फिर विदाई के वक्त का औपचारिक शोर भी हुआ। गाड़ियों के स्टार्ट होने की आवाज आई और सब कुछ खत्म हो गया। किसी ने एक बार भी उस बंद कमरे की सिटकनी को छूने की जहमत नहीं उठाई।

देवकी जी ने एक ठंडी साँस भरी और अपनी कमजोर आँखों पर से चश्मा उतारकर पल्लू से पोंछा। मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुए साल भर बीत चुका था, पर अब भी रोशनी पहले जैसी साफ नहीं थी। कानों से भी ऊँचा सुनाई देने लगा था, इसलिए कभी-कभी जब कोई उनसे कुछ कहता, तो उन्हें दो बार पूछना पड़ता था। शायद इसी वजह से घर के लोगों ने उनसे बात करना कम कर दिया था। उन्हें लगता था कि अम्मा को समझाने में वक्त ज्यादा लगता है।

कभी एक जमाना था जब इसी हवेलीनूमा घर की धड़कन देवकी जी हुआ करती थीं। सुबह चार बजे जब उनकी पायल छनकती थी, तो पूरा घर जागता था। रसोई में कौन सी दाल बनेगी, आलोक के दफ्तर का टिफिन कैसा सजेगा, नलिनी के मायके क्या सौगात भेजी जाएगी और कबीर की स्कूल की फीस से लेकर उसकी हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश तक—सब कुछ देवकी जी के इशारे पर तय होता था। रिश्तेदार आते तो पहले उनके पाँव छूते, मोहल्ले में किसी के यहाँ शादी-ब्याह होता तो नेग और रीति-रिवाज पूछने सबसे पहले देवकी जी के पास आते थे। उनके बिना तो जैसे घर की दीवारें भी अधूरी थीं।

और आज? आज उसी घर में एक बड़ा फैसला हो गया और घर की सबसे बुजुर्ग औरत अपने ही कमरे में एक अनदेखी तस्वीर की तरह टंगी रह गई।

शाम ढल चुकी थी। घर में सन्नाटा तो नहीं था, पर मेहमानों के जाने के बाद की थकान सब पर हावी थी। रात के नौ बज चुके थे। आलोक कमरे में आया। उसके चेहरे पर दिन भर की भागदौड़ की थकान थी, पर साथ ही रिश्ता तय होने की चमक भी थी। उसने मेज पर से पानी की बोतल उठाई और देवकी जी की तरफ देखकर सामान्य लहजे में कहा, “अम्मा, खाना खा लो। नलिनी टेबल पर खाना लगा रही है।”

देवकी जी ने अपनी सूखी जुबान से होंठों को छुआ। मन में एक बवंडर था, पर उन्होंने सिर्फ इतना कहा, “भूख नहीं है आज बेटा। दोपहर में कुछ भारी खा लिया था, पेट भरा हुआ लग रहा है।”

उनका मन भीतर ही भीतर तड़प रहा था कि आलोक एक बार पलटकर पूछे—”क्यों अम्मा, तबीयत तो ठीक है? कुछ हल्का दलिया बना दूँ? क्या सोच रही हो?” लेकिन आलोक ने सिर हिलाया और राहत की सांस लेते हुए बोला, “हाँ, सही बात है। उम्र के इस पड़ाव पर रात को हल्का ही रहना चाहिए। अच्छा किया, आराम करो। वैसे भी आज दिन भर काफी चहल-पहल थी।” इतना कहकर वह कमरे से बाहर निकल गया और ड्राइंग रूम में टीवी चलाकर आराम से भोजन करने लगा। टीवी के किसी सीरियल के संवाद कमरे तक आ रहे थे।

देवकी जी की आँखों के कोरों से दो बूँद आँसू चुपचाप ढुलककर तकिए में समा गए। इंसान जब भूखा होता है तो सिर्फ रोटी का भूखा नहीं होता, वह अपनेपन, मनुहार और इस बात का भूखा होता है कि कोई उसकी खामोशी को अपनी आवाज दे सके। उन्होंने करवट बदल ली। क्या उम्र बढ़ जाने का मतलब यह है कि इंसान की भावनाएँ भी बूढ़ी और सुन्न हो जाती हैं? क्या जरूरतें सिर्फ खाने-पहनने तक सीमित रह जाती हैं?

रात के करीब ग्यारह बजे घर की बत्तियाँ बुझने लगी थीं। अचानक देवकी जी के कमरे का दरवाजा धीरे से खुला। हल्की सी आहट हुई और फिर कोई दबे पाँव अंदर आया। वह कबीर था। उसका लंबा कद, उसकी गहरी आँखें और वही चिर-परिचित मासूमियत, जो बचपन में देवकी जी की गोद में खेलते वक्त हुआ करती थी।

कबीर के हाथ में स्टील की एक छोटी सी थाली थी। थाली में एक कटोरी गर्म दूध, दो फुल्के और थोड़ा सा गुड़ रखा हुआ था। उसने कमरे की मंद पीली बत्ती जलाई। देवकी जी ने आँखें मूँद लीं, जैसे वह सो रही हों।

कबीर पलंग के पास आया और नीचे कालीन पर अपने घुटनों के बल बैठ गया। उसने अपना सिर देवकी जी के कमजोर हाथों पर रख दिया। उसके स्पर्श में एक जानी-पहचानी गरमी थी।

“दादी, मुझे पता है आप जागी हुई हैं,” कबीर की आवाज में एक अजीब सी नरमी थी।

देवकी जी ने आँखें खोलीं, पर कुछ बोली नहीं। सिर्फ उसकी तरफ देखा।

कबीर ने उनका हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उसकी आँखें थोड़ी नम थीं। उसने कहा, “दादी, आज पूरा दिन जो हुआ, उसके लिए मैं आपसे माफी माँगने आया हूँ। मुझे पता है आप अंदर ही अंदर घुट रही थीं। आपको लगा न कि हम सब आपको भूल गए? आपको लगा कि आपकी अब इस घर में कोई अहमियत नहीं बची?”

देवकी जी के होंठ काँपे, पर शब्द गले में ही अटक गए।

कबीर ने थाली को साइड टेबल पर रखा और बोला, “दादी, जब लड़की वाले हॉल में बैठे थे, तो उनके पिता जी बार-बार पूछ रहे थे कि शादी में ये इंतज़ाम कैसे होंगे, वो रस्में कैसे होंगी। पापा और मम्मी जवाब दे रहे थे, लेकिन जब उन्होंने पूछा कि कबीर की परवरिश में इतनी सादगी और ठहराव कहाँ से आया, तो पापा ने कहा कि यह इसकी दादी के संस्कार हैं। पर दादी, मुझे उस वक्त पापा पर और खुद पर बहुत गुस्सा आया। अगर आपके संस्कार इतने बड़े हैं, तो आप हमारे साथ उस सोफे पर क्यों नहीं बैठी थीं?”

देवकी जी ने कबीर के सिर पर हाथ फेरा, “बेटा, मेरी उम्र हो गई है। लोग क्या कहते… बूढ़ी औरत बीच में बैठी है, ठीक से सुनती भी नहीं, देखती भी नहीं… तुम लोगों के नए तौर-तरीके हैं…”

“नहीं दादी!” कबीर ने बात काटते हुए बड़े दृढ़ स्वर में कहा। “तौर-तरीके नए हो सकते हैं, पर जड़ें तो पुरानी ही रहती हैं न? मैंने आज लड़की वालों से साफ कह दिया कि रोका या शगुन तभी पक्का माना जाएगा जब मेरी दादी अपने हाथों से मुझे और मेरी होने वाली जीवनसंगिनी को आशीर्वाद देंगी। वे लोग तो औपचारिक बातें करने आए थे, लेकिन असली रस्म तो अभी बाकी है।”

इतने में दरवाजे पर हल्की सी आहट हुई। देवकी जी ने देखा कि आलोक और नलिनी भी दरवाजे पर खड़े थे। आलोक की आँखों में एक गहरा पछतावा तैर रहा था। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और अपनी माँ के पैरों के पास बैठ गया।

“अम्मा, मुझे माफ कर दो,” आलोक की आवाज भर्रा गई। “जिंदगी की आपाधापी और जिम्मेदारियों के बोझ में मैं इतना अंधा हो गया था कि यह देखना ही भूल गया कि जो पेड़ हमें छांव देता रहा, वह खुद धूप में तप रहा है। मुझे लगा कि तुम्हें आराम की जरूरत है, शोर-शराबे से दूर शांति चाहिए। पर मैं यह भूल गया कि शांति और अकेलेपन में बहुत बड़ा फर्क होता है। कबीर ने जब अभी बाहर आकर मुझे यह बात कही, तो लगा जैसे किसी ने मेरे चेहरे पर ठंडा पानी फेंक दिया हो।”

नलिनी ने आगे बढ़कर देवकी जी के कंधे पर हाथ रखा, “अम्मा जी, हम सच में बहुत लापरवाह हो गए थे। हमें लगा कि आपकी जरूरतें सिर्फ समय पर दवाई और खाना देने से पूरी हो जाती हैं। हमने कभी आपकी उस खामोशी को सुनने की कोशिश ही नहीं की, जो हर रोज इस कमरे में गूँजती थी।”

कमरे में कुछ पलों के लिए एक गहरा सन्नाटा छा गया, लेकिन यह सन्नाटा दोपहर के अकेलेपन जैसा नहीं था; यह सन्नाटा पश्चाताप, प्रेम और पुनर्मिलन की गर्माहट से भरा हुआ था।

कबीर ने थाली उठाई, रोटी का एक छोटा सा निवाला तोड़ा, उसमें थोड़ा सा गुड़ लगाया और देवकी जी के मुँह के पास ले गया। “अब पहले मेरी प्यारी दादी खाना खाएंगी। जब तक आप अपने हाथों से यह निवाला नहीं खाएंगी और मुझे डाँटेंगी नहीं, तब तक मेरी शादी की कोई बात आगे नहीं बढ़ेगी। और सुनिए, कल शाम को रोके की असली रस्म होगी, और वह भी किसी होटल या हॉल में नहीं, इसी कमरे में, आपके सामने।”

देवकी जी की सूखी, बुझी हुई आँखों में से बहते आँसू अब खुशी के मोतियों जैसे चमक रहे थे। उन्होंने काँपते हाथों से वह निवाला अपने मुँह में लिया। कई दिनों बाद उस सादे खाने में उन्हें एक ऐसा स्वाद महसूस हुआ जो किसी छप्पन भोग में नहीं था—वह स्वाद था अपने होने के अहसास का, अपनी पहचान के लौट आने का।

उन्होंने कबीर का सिर अपने सीने से लगा लिया और आलोक व नलिनी के सिर पर अपना काँपता हुआ हाथ रख दिया। घर का वह छोटा सा, उपेक्षित कोना अब उपेक्षित नहीं रहा था। वहाँ प्रेम का एक ऐसा दीया जल उठा था, जिसकी रोशनी ने बरसों की जमी हुई धूल और खामोशी को एक पल में धो दिया था।

जिंदगी के इस मोड़ पर बुजुर्गों को महलों जैसी सुख-सुविधाएँ या नए जमाने की महँगी चीजें नहीं चाहिए होतीं; उन्हें बस यह भरोसा चाहिए होता है कि वे आज भी उसी परिवार का अटूट हिस्सा हैं जिसे उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा था। देवकी जी के चेहरे पर खिली वह हल्की सी मुस्कान बता रही थी कि उनके घर की वह पुरानी, ममतामयी धूप आज फिर से लौट आई थी।

अक्सर हम अपने बुजुर्गों को ‘आराम’ देने के नाम पर अनजाने में उन्हें एक कोने में अकेला छोड़ देते हैं। क्या आपके घर में भी कोई ऐसा कोना है जहाँ कोई बुजुर्ग आपकी सिर्फ एक मीठी बात या दस मिनट के साथ का इंतजार कर रहा है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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 है।

मूल लेखिका : लतिका श्रीवास्तव

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