फर्ज की डोर

 क्या तुम नौकरी छोड़ने की सोच रही हो। विशाखा ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया और कहा कि नहीं, नौकरी छोड़ना कोई समाधान नहीं है। मैंने आज अपनी कंपनी की नीति को दोबारा पढ़ा है। हमारी कंपनी में वरिष्ठ कर्मियों को घर से काम करने का विकल्प मिलता है, भले ही उसमें वेतन थोड़ा कम हो जाए या प्रमोशन की गति धीमी पड़ जाए। मैंने अपने प्रोजेक्ट मैनेजर से बात करने का मन बनाया है कि मुझे अगले दो सालों के लिए पूरी तरह से वर्क फ्रॉम होम दे दिया जाए। इससे मैं घर पर रहकर अर्णव को खुद संभाल सकूंगी, मां जी के स्वास्थ्य का ध्यान रख सकूंगी और अपनी आर्थिक आत्मनिर्भरता भी नहीं खोऊंगी।

दीवार पर टंगी घड़ी में सुबह के ठीक पौने सात बजे थे और रसोई में कढ़ाई की छनछनाहट के साथ कुकर की दूसरी सीटी गूंज चुकी थी। विशाखा तेजी से चकला-बेलन चला रही थी। साढ़े आठ बजे तक उसे और उसके पति प्रणय को घर से निकलना होता था। दोनों शहर की एक जानी-मानी टेलीकॉम कंपनी में काम करते थे और अपनी कार से निकलते तो ट्रैफिक से जूझते हुए ठीक नौ बजे अपने-अपने डेस्क पर पहुंच जाते। इस छोटे से फ्लैट में उन दोनों के अलावा प्रणय के वृद्ध माता-पिता और उनका छह साल का बेटा अर्णव भी रहते थे।

किचन के दरवाजे के पास से प्रणय की आवाज आई कि क्या चाय बन गई है। वह बाथरूम में अर्णव को नहलाकर उसके बाल सुखा रहा था। बेटे को सुबह जगाने से लेकर उसका बस्ता तैयार करने और मोजे पहनाने का जिम्मा प्रणय ने खुशी-खुशी अपने कंधों पर ले रखा था। विशाखा जब अदरक वाली चाय की प्यालियां और अर्णव के लिए गर्म दूध का गिलास लेकर डाइनिंग टेबल पर आई, तब प्रणय बेटे के स्कूल यूनिफॉर्म की टाई ठीक कर रहा था। विशाखा ने दूध की चुस्की लेते बेटे के माथे को चूमा और खुद तैयार होने के लिए बेडरूम की तरफ बढ़ गई।

प्रणय की मां सुमित्रा जी दिल की मरीज थीं और घुटनों के दर्द की वजह से उनसे ज्यादा देर खड़ा नहीं रहा जाता था। इसलिए विशाखा ने दोपहर के भोजन के लिए जानकी बाई नाम की एक रसोइया लगा रखी थी, जो ग्यारह बजे आकर सास-ससुर के लिए ताजा रोटियां सेंक जाती थी। ससुर हरिप्रसाद जी बहत्तर साल के होने के बावजूद काफी चुस्त थे। सुबह आठ बजकर चालीस मिनट पर सोसाइटी के मुख्य गेट पर अर्णव की स्कूल वैन आती थी, जिसे छोड़ने और दोपहर डेढ़ बजे वापस लाने का सारा जिम्मा दादाजी ने संभाल रखा था। वे अर्णव की उंगली पकड़कर जब चलते, तो पूरे रास्ते उसे तरह-तरह की चिड़ियों और पेड़ों के किस्से सुनाते जाते।

सब कुछ एक सधी हुई दिनचर्या के तहत चल रहा था कि अचानक एक दिन घर की सफाई करने वाली बाई मालती बिना बताए गायब हो गई। झाड़ू, पोंछा, बर्तन और कपड़ों का ढेर लग गया। शाम को जब थके-हारे प्रणय और विशाखा घर लौटे, तो सिंक में बर्तनों का पहाड़ देखकर दोनों के माथे पर बल पड़ गए। मालती का घर सोसाइटी के पीछे वाली बस्ती में ही था। विशाखा ने तुरंत अपनी स्कूटी निकाली और उसके पते पर पहुंची। वहां जाकर देखा तो घर के बाहर बड़ा सा ताला लटका हुआ था। पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि मालती अपने परिवार के साथ गांव में चल रहे किसी बड़े कुल-देवता के अनुष्ठान में गई है और कम से कम तीन हफ्ते तक उसके लौटने का कोई नामोनिशान नहीं है। विशाखा समझ गई कि मालती ने जानबूझकर पहले से छुट्टी नहीं मांगी थी, क्योंकि कोई भी उसे इतने लंबे अवकाश की मंजूरी नहीं देता।

अगले दिन विशाखा ने अपनी पड़ोसन माधुरी से बात की। माधुरी ने अपनी सहायिका रंभा का पता दिया। रविवार की सुबह दरवाजे की घंटी बजी तो सामने रंभा खड़ी थी। वह करीब पैंतीस साल की, सांवले रंग और शांत चेहरे वाली औरत थी। विशाखा ने उसे घर का सारा काम समझाया। उसने बिना किसी सवाल के सिर हिलाया, तय मेहनताने पर राजी हुई और उसी वक्त से काम शुरू कर दिया। विशाखा ने चैन की सांस ली कि चलो, एक बड़ा सिरदर्द टल गया।

विशाखा मूलतः इंदौर के एक मध्यमवर्गीय परिवार की सीधी-सादी लड़की थी। एमबीए पूरा करने के बाद प्रणय से उसका विवाह हुआ था। शादी के कुछ समय बाद ही उसने भी उसी कंपनी के मार्केटिंग विभाग में नौकरी पा ली थी। विशाखा के पिता डाक विभाग से सेवानिवृत्त हो चुके थे और छोटा भाई अपनी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था। प्रणय का एक बड़ा भाई सुमित भी था, जो बेंगलुरु की एक सॉफ्टवेयर कंपनी में ऊंचे पद पर कार्यरत था। सुमित की पत्नी शालिनी गृहिणी थी और उनके दो प्यारे बच्चे थे। पूरा परिवार सुखी और संपन्न था।

लेकिन रंभा के आने के कुछ ही दिनों बाद घर में रोज शाम को सास का असंतोष फूटने लगा। जैसे ही विशाखा दफ्तर से लौटती, सुमित्रा जी अपनी लाठी टेकते हुए आकर बैठ जातीं और रंभा की कमियां गिनाने लगतीं। रंभा बर्तनों को ठीक से नहीं धोती, फर्श पर पोंछे के निशान छोड़ जाती है और कपड़े भी बेमन से सुखाती है। विशाखा ने सोचा कि सप्ताहांत पर वह खुद रंभा के काम पर नजर रखेगी। जब रविवार को उसने देखा, तो सास की शिकायतें काफी हद तक सही निकलीं। रंभा हर काम में जल्दबाजी करती थी और काम की गुणवत्ता बेहद खराब थी। लेकिन तुरंत दूसरी सहायिका न मिलने के कारण विशाखा ने मजबूरी में उसी से काम चलाने का फैसला किया।

मुसीबतें कभी अकेली नहीं आतीं। मंगलवार की तड़के सुबह बेंगलुरु से जेठानी शालिनी का रोते हुए फोन आया। सुमित का ऑफिस से लौटते वक्त एक भयानक कार एक्सीडेंट हो गया था। उनके पैर में गहरा फ्रैक्चर आया था और रीढ़ की हड्डी में भी चोट थी, जिसके कारण उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शालिनी घबराई हुई थी और उसने ससुर हरिप्रसाद जी से फौरन बेंगलुरु आने की गुहार लगाई, ताकि वे अस्पताल की भागदौड़ संभाल सकें और वह घर पर बच्चों की देखरेख कर सके। फोन पर यह भी तय हुआ कि बाकी सबको परेशान होकर आने की जरूरत नहीं है।

हरिप्रसाद जी उसी दोपहर की फ्लाइट से बेंगलुरु रवाना हो गए। अब घर में एक नया संकट खड़ा हो गया। अर्णव को स्कूल वैन तक छोड़ने और दोपहर को वापस लाने का काम कौन करे। सास सुमित्रा जी ने साफ कह दिया कि उनके घुटने इतने जवाब दे चुके हैं कि वे सीढ़ियां उतरकर गेट तक नहीं जा सकतीं। विशाखा और प्रणय दोनों की नौकरी ऐसी थी कि दोपहर के वक्त बीच में ऑफिस छोड़कर आना मुमकिन नहीं था। अंततः विशाखा ने रंभा से बात की और उसे कुछ अतिरिक्त पैसे देने का लालच देकर अर्णव को वैन स्टॉप से लाने और छोड़ने की जिम्मेदारी सौंप दी। रंभा ने तुरंत हामी भर दी।

दो दिन तो सब कुछ ठीक चला। रंभा समय पर अर्णव को ले आई और छोड़ भी आई। लेकिन तीसरे दिन जो हुआ, उसने पूरे परिवार के होश उड़ा दिए। दोपहर को अर्णव की वैन जब सोसाइटी के गेट पर पहुंची, तो वहां उसे लेने के लिए कोई मौजूद नहीं था। वैन चालक ने दस मिनट तक हॉर्न बजाया, पर कोई नहीं आया। सुरक्षा नियमों के कारण ड्राइवर बच्चे को अकेले गेट पर नहीं छोड़ सकता था, इसलिए वह अर्णव को वापस स्कूल ले गया और वहां के प्रशासन को सौंप दिया।

दोपहर ढाई बजे प्रणय के फोन पर स्कूल के प्रिंसिपल का फोन आया कि आपके बच्चे को कोई लेने नहीं आया और वह रो रहा है। प्रणय के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने तुरंत विशाखा को साथ लिया और दोनों बदहवास हालत में दफ्तर से आधे दिन की छुट्टी लेकर स्कूल की तरफ भागे। वहां जाकर देखा तो छह साल का अर्णव डर के मारे सुबक रहा था। उसे सीने से लगाते ही विशाखा की आंखें भर आईं। घर लौटते ही प्रणय का सारा गुस्सा विशाखा पर फूट पड़ा। उसने तीखे शब्दों में कहा कि जब तुम्हें पता था कि रंभा घर का काम भी ठीक से नहीं करती, तो तुमने उस लापरवाह औरत के भरोसे मेरे बेटे को कैसे छोड़ दिया। विशाखा स्तब्ध रह गई। उसके पास अपने बचाव में कोई शब्द नहीं थे। उसने यह सब परिवार की व्यवस्था बनाए रखने के लिए ही तो किया था, लेकिन सारा दोष उसी के सिर मढ़ दिया गया।

अगले दिन विशाखा ने ऑफिस से छुट्टी ले ली। वह सुबह से रंभा का इंतजार करती रही, लेकिन रंभा काम पर नहीं आई। शायद वह अपनी गलती समझकर डर गई थी या फिर उसे काम ही नहीं करना था। विशाखा ने किसी से कोई शिकायत नहीं की। उसने खुद घर का सारा काम किया, झाड़ू लगाई, बर्तन मांजे और फिर अर्णव को वैन तक छोड़ने गई। घर लौटकर उसने बेंगलुरु फोन किया तो पता चला कि जेठ जी की सर्जरी सफल रही है, लेकिन ससुर जी को लौटने में अभी कम से कम पंद्रह दिन का समय और लगेगा।

दोपहर को विशाखा खुद गेट पर खड़ी होकर अर्णव का इंतजार करने लगी। जैसे ही वैन रुकी, अर्णव अपनी मां को सामने देखकर दौड़ता हुआ आया और उसकी गोद में लिपट गया। घर आकर विशाखा ने उसके जूते उतारे, हाथ-मुंह धुलवाए और अपने हाथों से उसे खाना खिलाया। बहुत अरसे बाद मां और बेटे को इस तरह एक साथ सुकून के पल मिले थे। अर्णव जब हंसता था, तो उसकी दोनों गालों पर विशाखा की तरह ही प्यारे से गड्ढे पड़ते थे। खाना खाने के बाद अर्णव मां के आंचल में दुबक कर सो गया। विशाखा की आंखें भी भर आई थीं और थकान के कारण उसे भी नींद आ गई। जब उसकी आंख खुली तो शाम के साढ़े चार बज रहे थे। अर्णव उसके सीने पर सिर रखकर चैन की नींद सो रहा था। विशाखा ने उसके मासूम चेहरे को देखा और भीतर ही भीतर एक अजीब सा खालीपन महसूस किया। क्या जिंदगी सिर्फ पैसे कमाने, घर की व्यवस्था बिठाने और रोज-रोज के इन तनावों से जूझने का नाम है।

शाम को जब प्रणय थका हुआ घर लौटा, तो उसका गुस्सा अब शांत हो चुका था। उसने अपनी गलती का अहसास करते हुए विशाखा के कंधे पर हाथ रखा और अपने कल के व्यवहार के लिए क्षमा मांगी। रात के खाने के बाद दोनों बालकनी में चाय लेकर बैठे।

विशाखा ने बहुत ही शांत स्वर में कहा कि प्रणय, हम दोनों अंधी दौड़ में भाग रहे हैं। हम सोचते हैं कि हम यह सब अर्णव के भविष्य के लिए कर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि हम उसका वर्तमान छीन रहे हैं। माता-पिता बूढ़े हैं, उन्हें भी हमारी सेवा और समय की जरूरत है। बाहरी सहायिकाओं और ड्राइवरों के भरोसे हम अपने कलेजे के टुकड़े को नहीं छोड़ सकते।

प्रणय ने पूछा कि फिर इसका उपाय क्या है। क्या तुम नौकरी छोड़ने की सोच रही हो। विशाखा ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया और कहा कि नहीं, नौकरी छोड़ना कोई समाधान नहीं है। मैंने आज अपनी कंपनी की नीति को दोबारा पढ़ा है। हमारी कंपनी में वरिष्ठ कर्मियों को घर से काम करने का विकल्प मिलता है, भले ही उसमें वेतन थोड़ा कम हो जाए या प्रमोशन की गति धीमी पड़ जाए। मैंने अपने प्रोजेक्ट मैनेजर से बात करने का मन बनाया है कि मुझे अगले दो सालों के लिए पूरी तरह से वर्क फ्रॉम होम दे दिया जाए। इससे मैं घर पर रहकर अर्णव को खुद संभाल सकूंगी, मां जी के स्वास्थ्य का ध्यान रख सकूंगी और अपनी आर्थिक आत्मनिर्भरता भी नहीं खोऊंगी।

प्रणय विशाखा के इस परिपक्व और सकारात्मक दृष्टिकोण को देखकर चकित रह गया। उसने विशाखा का हाथ थामते हुए कहा कि अगर तुम यह त्याग करने को तैयार हो, तो घर के बाकी कामों में मैं तुम्हारा पूरा हाथ बंटाऊंगा। हम दोनों मिलकर इस घर को संभालेंगे, किसी बाहरी के सहारे अपने बच्चे का बचपन नहीं दांव पर लगाएंगे।

अगले हफ्ते कंपनी ने विशाखा के आवेदन को स्वीकार कर लिया। जब ससुर जी बेंगलुरु से लौटे, तो घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। अब अर्णव को स्कूल से लाने के लिए किसी नौकरानी का मुंह नहीं देखना पड़ता था। विशाखा अपने लैपटॉप पर काम करते हुए भी घर की धुरी बनी हुई थी। सुमित्रा जी को समय पर दवाइयां मिलने लगीं और घर में जो रोज की किचकिच और तनाव था, वह प्यार और शांति में बदल गया। परिवार की गाड़ी एक बार फिर पटरी पर लौट आई थी, लेकिन इस बार उसकी लगाम किसी अजनबी के हाथ में नहीं, बल्कि अपनों के विश्वास और आपसी समझदारी की डोर से बंधी थी।

क्या आपको भी लगता है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में करियर और परिवार के बीच सही संतुलन बनाना ही सबसे बड़ी समझदारी है? अपनी राय हमें नीचे लिखकर जरूर बताएं।

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मूल लेखिका : मधुलता पारे

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