“माथुर साहब, मैं मजाक के मूड में बिल्कुल नहीं हूँ। सुनिए मेरी बात ध्यान से। ईश्वर की दया से मेरे पास धन की कोई कमी नहीं है। मैंने अपनी मेहनत से कमाया है और मेरे बेटे अक्षत ने अपनी योग्यता से अपने लिए एक मुकाम बनाया है। आपके जीवन भर की पसीने की कमाई, आपके पेंशन के पैसे या आपके दिए हुए गहनों से मेरे बेटे और बहू की जिंदगी नहीं चलने वाली। वे दोनों पढ़े-लिखे हैं, खुद कमाते हैं, अपना घर चलाने के लिए वे खुद सक्षम हैं।”
ड्राइंग रूम की पुरानी दीवार घड़ी की टिक-टिक इस वक्त कमरे में बैठे हर इंसान की धड़कन से तेज़ सुनाई दे रही थी। हल्के भूरे रंग के सोफ़े पर बैठे देवेश माथुर बार-बार अपनी हथेलियों को पोंछ रहे थे। माथुर साहब भोपाल म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के पीडब्ल्यूडी विंग में एग्जीक्यूटिव इंजीनियर के पद से बस दो महीने बाद रिटायर होने वाले थे। ताउम्र फाइलों के बीच ईमानदारी से काम किया, शहर भर में पुल और सड़कें बनवाईं, मगर जब अपनी बड़ी बेटी तान्या के ब्याह की बात आई, तो उनका आत्मविश्वास अंदर से डगमगा जाता था।
समाज में कायस्थ परिवारों के बीच शादी-ब्याह के खर्चे और लेन-देन का जो चलन उन्होंने अपनी आँखों से देखा था, उसने उनके दिल में एक अजीब सा डर बिठा दिया था। बेटी तान्या ने अभी पिछले ही साल इंदौर के एक प्रतिष्ठित संस्थान से फाइनेंस में एमबीए पूरा किया था और शहर के ही एक प्राइवेट बैंक में असिस्टेंट मैनेजर के तौर पर काम शुरू किया था। तान्या समझदार, शालीन और घर के हर छोटे-बड़े काम में माहिर थी। छोटा बेटा सौम्य, जो पुणे में एक डेटा एनालिटिक्स फर्म में था, अभी करियर की शुरुआत में ही था। माथुर साहब ने अपनी पूरी जिंदगी का पीएफ और बचत बेटी की पढ़ाई और घर की छत में लगा दी थी।
तभी बाहर पोर्च में एक चमचमाती काली सेडान कार आकर रुकी। कार का दरवाज़ा बंद होने की भारी आवाज़ सुनकर देवेश जी की पत्नी, मंजरी जी, जो रसोई में समोसे और खुरमे प्लेटों में सजा रही थीं, घबराकर बाहर झाँकने लगीं।
“सुनिए, लगता है वे लोग आ गए। लड़के के पिताजी खुद गाड़ी चला रहे हैं,” मंजरी ने पल्लू संभालते हुए धीमी आवाज़ में कहा।
देवेश जी ने चश्मा ठीक किया और तुरंत दरवाज़े की ओर बढ़े। दरवाज़े पर जो शख्स मुस्कुराते हुए खड़ा था, उनका रोब और सादगी दोनों ही हैरान करने वाले थे। वे थे सूर्यकांत श्रीवास्तव। राज्य सरकार की एक बड़ी पॉवर ग्रिड कॉर्पोरेशन में मैनेजिंग डायरेक्टर। अखबारों और टीवी पर अक्सर उनके बड़े प्रोजेक्ट्स के इंटरव्यू आते रहते थे। उनके साथ उनका बेटा अक्षत खड़ा था—सफेद शर्ट और फॉर्मल पैंट में एकदम सधा हुआ, चेहरे पर सहज विनम्रता। अक्षत खुद हैदराबाद की एक मल्टीनेशनल टेक फर्म में सीनियर क्लाउड आर्किटेक्ट था, पर वर्तमान में घर से ही काम संभाल रहा था।
माथुर साहब ने अखबार के वैवाहिक कॉलम में तान्या का बायोडाटा दिया था। उम्मीद थी कि किसी साधारण सरकारी नौकरी वाले या बैंक कर्मचारी का रिश्ता आएगा। लेकिन जब कल शाम सीधे सूर्यकांत जी का फोन आया कि वे खुद लड़के को लेकर आ रहे हैं, तो माथुर दंपत्ति की रात की नींद ही उड़ गई थी।
“अरे माथुर साहब, नमस्कार! अंदर आने का रास्ता देंगे या चौखट पर ही हमारा टेस्ट लेंगे?” सूर्यकांत जी की बुलंद और जिंदादिल आवाज़ ने माहौल की सारी घबराहट को एक झटके में तोड़ दिया।
“अरे नहीं-नहीं श्रीवास्तव साहब, आइए, पधारिए। आपका बहुत-बहुत स्वागत है,” देवेश जी ने हाथ जोड़कर झुकते हुए कहा और उन्हें भीतर ड्राइंग रूम में ले आए। अक्षत ने झुककर देवेश जी और मंजरी जी दोनों के पैर छुए, जिससे मंजरी के चेहरे पर एक राहत भरी मुस्कान तैर गई।
कमरे में बैठने के बाद औपचारिक बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। भोपाल के मौसम, पुराने मोहल्लों, सरकारी महकमों की कार्यशैली और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर बातें हुईं। अक्षत ने बड़ी शालीनता से बताया कि उसका काम कैसा है और वह कैसे तकनीक के जरिए बड़े डेटा सिस्टम्स को संभालता है। मंजरी जी ने मेज़ पर नाश्ते की प्लेटें सजा दीं—घर के बने ताज़ा समोसे, गुलाब जामुन और अदरक वाली चाय।
सूर्यकांत जी ने चाय की चुस्की लेते हुए सीधे बात का रुख बदला, “माथुर साहब, मैं बातों को घुमाने-फिराने का आदी नहीं हूँ। जीवन भर प्रोजेक्ट्स को सीधे और साफ़ तरीके से हैंडल किया है। अखबार में बिटिया का प्रोफाइल देखा तो मुझे लगा कि हमारे परिवार के लिए इससे बेहतर संस्कार और योग्यता कहीं नहीं मिल सकती। इसलिए मैं खुद अक्षत को लेकर चला आया ताकि आप लोग आमने-सामने लड़के को देख-परख लें। आपको हमारे पीछे कोई गुप्त जाँच-पड़ताल न करवानी पड़े। अब आप तान्या बिटिया को बुलाइए, ताकि दोनों बच्चे एक-दूसरे से खुलकर बात कर सकें।”
मंजरी जी ने अंदर जाकर तान्या को इशारा किया। हल्के नीले रंग के सिल्क के कुर्ते में तान्या धीमे कदमों से बाहर आई। उसके चेहरे पर न कोई बनावटी शर्म थी और न ही बेमतलब का संकोच; बस एक स्वाभाविक गरिमा थी। उसने सूर्यकांत जी को हाथ जोड़कर प्रणाम किया।
सूर्यकांत जी की आँखें चमक उठीं। उन्होंने तान्या से उसके काम, उसके बैंक के माहौल और भविष्य के लक्ष्यों के बारे में दो-चार सीधे सवाल किए। तान्या ने बिना किसी हिचकिचाहट के, बेहद सलीके और स्पष्टता से उत्तर दिया। इसके बाद दोनों बड़ों की सहमति से तान्या और अक्षत बालकनी की तरफ चले गए ताकि वे अपनी प्राथमिकताओं, सोच और करियर को लेकर बात कर सकें।
बालकनी का दरवाज़ा बंद होते ही ड्राइंग रूम का सन्नाटा फिर से भारी होने लगा। देवेश जी की उँगलियाँ आपस में उलझ रही थीं। उनका मन एक पुराने डर के साए में घिर रहा था। वे कई दिनों से हिसाब लगा रहे थे—रिटायरमेंट की ग्रैच्युटी, बैंक एफडी, और शायद एक छोटा सा पर्सनल लोन। समाज में श्रीवास्तव जैसे बड़े ओहदे वाले परिवार जब रिश्ता लेकर आते हैं, तो उनके पीछे एक लंबी अघोषित माँगों की सूची होती है—महंगी गाड़ियाँ, भारी ज़ेवर, पाँच सितारा वेन्यू और लाखों के नकद लिफ़ाफ़े।
देवेश जी ने एक गहरी सांस ली। उनका गला सूख रहा था। उन्होंने सामने रखी पानी की ग्लास से एक घूँट पिया और फिर हिम्मत जुटाकर सीधे सूर्यकांत जी की आँखों में देखा।
“श्रीवास्तव साहब, आप बहुत बड़े पद पर हैं। आपका रुतबा, आपकी हैसियत सब हम जानते हैं। हम तो एक अदना से इंजीनियर रहे, जिंदगी भर ईमानदारी से दाल-रोटी चलाई। इसलिए मैं कोई बात छिपाना नहीं चाहता। आप साफ़-साफ़ बता दीजिए कि आपकी क्या अपेक्षाएं हैं? मतलब… हमारे समाज में जो रस्म-रिवाज का नाम देकर दिया-लिया जाता है… कितना दहेज, गाड़ी या नगद का आपका विचार है? ताकि मैं देख सकूं कि मेरी चादर कितनी है।”
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। मंजरी जी की साँसें जैसे हलक में अटक गईं। उन्हें लगा कि शायद देवेश जी ने बात बहुत रूखी कह दी और कहीं बात बिगड़ने न लगे।
सूर्यकांत जी ने अपनी चाय का कप धीरे से मेज़ पर रखा। उन्होंने अपना चश्मा उतारा, उसे जेब से निकाले रूमाल से साफ किया और फिर देवेश जी की तरफ देखा। उनके चेहरे पर पहले एक हल्की सी मुस्कान आई, जो देखते ही देखते एक गंभीर गरिमा में बदल गई।
“माथुर साहब, आपकी इस बात का जवाब यह है कि हमें आपकी तरफ से सिर्फ एक रुपया भी नहीं चाहिए।” सूर्यकांत जी ने बहुत शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा।
मंजरी जी की आँखें फटी की फटी रह गईं। वे अपने पति की तरफ देखने लगीं, जैसे यह तय करना चाह रही हों कि उन्होंने जो सुना, वह सच है या कोई भ्रम। देवेश जी भी चौंक उठे। उनके चेहरे पर अविश्वास की लकीरें खिंच गईं। हमारे समाज में, जहाँ लड़के की डिग्री और पैकेज के हिसाब से बोली लगती हो, वहाँ इतनी बड़ी पोस्ट का अफ़सर बिना एक पैसे के शादी की बात कर रहा था? यह तो किसी चमत्कार जैसा था।
देवेश जी हकलाते हुए बोले, “श्रीवास्तव साहब, क्या आप मज़ाक कर रहे हैं? हमारे समाज में तो लड़के की नौकरी लगते ही लोग बोली लगाने लगते हैं। आप जैसे बड़े अफसर के यहाँ…”
सूर्यकांत जी ने हाथ उठाकर उन्हें बीच में ही रोक दिया। उनका लहज़ा अब बेहद आत्मीय और भारी था।
“माथुर साहब, मैं मजाक के मूड में बिल्कुल नहीं हूँ। सुनिए मेरी बात ध्यान से। ईश्वर की दया से मेरे पास धन की कोई कमी नहीं है। मैंने अपनी मेहनत से कमाया है और मेरे बेटे अक्षत ने अपनी योग्यता से अपने लिए एक मुकाम बनाया है। आपके जीवन भर की पसीने की कमाई, आपके पेंशन के पैसे या आपके दिए हुए गहनों से मेरे बेटे और बहू की जिंदगी नहीं चलने वाली। वे दोनों पढ़े-लिखे हैं, खुद कमाते हैं, अपना घर चलाने के लिए वे खुद सक्षम हैं।”
सूर्यकांत जी थोड़ा आगे की ओर झुके और बोले, “मैं यहाँ अपनी किसी मजबूरी के तहत नहीं आया हूँ। मैंने अखबार में पढ़ा, आपकी पृष्ठभूमि जानी, मुझे लगा कि आप एक स्वाभिमानी इंसान हैं जिन्होंने अपनी बेटी को पैरों पर खड़ा किया है। इसलिए मैं सीधे यहाँ चला आया। मुझे कोई सौदागर नहीं बनना। अगर शादी करनी है, तो हम शहर के किसी खुले, खूबसूरत से रिसॉर्ट में एक सादा लेकिन गरिमामय समारोह रखेंगे। वहीं आपकी बिटिया की विदाई होगी, वहीं से हम उसे अपने घर की लक्ष्मी बनाकर ले जाएंगे। रिसेप्शन और शादी दोनों एक ही दिन, एक ही जगह हो जाएगी ताकि न तो भागदौड़ हो और न ही आप पर बारातियों की खातिरदारी का कोई मानसिक दबाव पड़े।”
देवेश जी अवाक होकर सुन रहे थे। उनकी आँखों के कोरों से नमी रिसने लगी थी।
सूर्यकांत जी आगे बोले, “शादी का जो भी रिसॉर्ट और व्यवस्था का खर्च होगा, वह हम आधा-आधा बांट लेंगे या जैसा भी आपको सहज लगे। लेकिन लेन-देन, गाड़ियों की मांग, या लड़की वालों को झुकाने वाली सड़ी-गली रीतियाँ मेरे घर की चौखट के बाहर ही रहेंगी। अगर आपको मेरी यह सोच, मेरा बेटा और हमारा यह सीधा-सादा तरीका मंजूर है, तो हम इस रिश्ते को पक्का समझें। और अगर आपको लगता है कि आप अपनी बेटी को किसी बहुत बड़े दिखावे वाले तामझाम में ही विदा करना चाहते हैं, तो कोई बात नहीं… चाय बहुत अच्छी थी, हमारी आपकी दोस्ती पक्की रही, हम इजाज़त चाहेंगे।”
यह कहते हुए सूर्यकांत जी अपनी जगह से उठ खड़े हुए।
उसी पल बालकनी का दरवाज़ा खुला। तान्या और अक्षत अंदर आए। दोनों के चेहरों पर एक सहज संतोष और आपसी समझ की चमक थी। अक्षत ने पिता की ओर देखकर सिर हिलाया, जो इस बात का संकेत था कि दोनों बच्चों की सोच और विचार पूरी तरह मिल चुके हैं।
देवेश माथुर से अब और रुका नहीं गया। वे अपनी सोफ़े से उठे और सीधे सूर्यकांत जी के पास पहुँचकर उनके दोनों हाथ थाम लिए। उनकी आँखों से बरसों का संचित डर, समाज का दबाव और बेटी के ब्याह का तनाव आंसुओं के रूप में बह निकला।
“श्रीवास्तव साहब, माफ कीजिएगा। मैंने आपको अपनी तंग और डरी हुई दुनिया के चश्मे से देख लिया था। आपने आज सिर्फ मेरी बेटी का हाथ नहीं माँगा, बल्कि एक पिता का सिर समाज में हमेशा के लिए ऊँचा कर दिया। मुझे गर्व है कि मेरी बेटी आपके घर जाएगी, जहाँ दौलत से ज्यादा संस्कारों और इंसान की कद्र है।”
मंजरी जी ने तुरंत जाकर मंदिर से मिठाई की थाली उठाई। उन्होंने पहले भगवान को नमन किया और फिर अक्षत और तान्या का मुँह मीठा कराया। कमरे में एक ऐसा उल्लास भर गया, जो किसी कृत्रिम दिखावे का मोहताज नहीं था।
यह रिश्ता सिर्फ दो युवाओं का मिलन नहीं था, बल्कि उस खोखली सामाजिक रूढ़ि पर एक करारा तमाचा था जो बेटियों के पिताओं को सिर्फ याचक समझती है। सूर्यकांत जी ने दिखा दिया था कि सच्चा सम्मान मांगने से नहीं, बल्कि अपनी सोच को बड़ा करने से मिलता है। शादी तय हो गई—बिना किसी शर्त के, बिना किसी लेन-देन के, सिर्फ और सिर्फ स्वाभिमान और आपसी विश्वास की नींव पर।
आपकी राय हमारे लिए अनमोल है:
आज भी हमारे समाज में जब लड़के की नौकरी और पैकेज बड़ा होता है, तो अक्सर उम्मीदें भी उसी अनुपात में बढ़ जाती हैं। क्या आपको लगता है कि हर पढ़े-लिखे और सक्षम परिवार को सूर्यकांत जी की तरह आगे बढ़कर दहेज मुक्त और बराबरी के रिश्ते की पहल करनी चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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