‘ताऊजी हमारे रिश्ते में दूरी जरूर आई है, पर हम सब एक ही परिवार तो है। मैं आपको किसी के हाथों पिटते हुए कैसे देख सकता था। आपकी बेइज्जती का मतलब हमारे परिवार की बेइज्जती।’
किशन जी की पत्नी राधा की मृत्यु सात साल पहले हो गयी थी। किशन जी ने अपने दोनों बच्चे, बड़े बेटे निशांत और छोटे बेटे प्रशांत, की शादी बहुत ही धूमधाम से करी। लेकिन कभी कभी बड़ी बहू नंदिनी और छोटी बहू मीता घर के काम को लेकर आपस में उलझ जाते।
किशन जी दोनों को समझते और कहते ‘घर के छोटे मोटे झगड़े आपस में ही सुलझा लिया करो। छोटे-छोटे झगड़े ही परिवार तोड़ने का काम करते हैं।’ परन्तु बड़ी बहु नंदिनी तुनक मिजाज की थी। वो कुछ कुछ दिनों में छोटी बहू मीता से झगड़े का कोई न कोई कारण ढूंढ लेती थी। फिर अपने पति निशांत से बढ़ चढ़ कर शिकायत करती और अलग होने की बात करती।
परन्तु मीता घर के झगड़े अपने तक ही रखती, अपने पति प्रशांत को कुछ नहीं बताती। वो नहीं चाहती थी कि दोनों बहुओं की वजह से दोनों भाईयों के बीच झगड़ा हो और पापा जी का दिल दुःखे।
मीता पापा जी का बहुत सम्मान करती थी और उनकी सब जरूरत पूरी करती थी। दोनों बहुओं के एक-एक बेटा दोनों आपस में मिल कर रहते।उनको घर के झगड़े से कोई मतलब नहीं था। उन्हें मतलब था तो अपने दादा जी से, दादा जी की उन पर जान बसती थी।
एक दिन किशन जी अपने दोनों पोतों को लेकर पास ही की दुकान में बच्चों को चॉकलेट दिलाने ले गए। घर आते समय दोनों बच्चे भाग कर आ रहे थे।
भागते समय निशांत का बेटा एक साइकिल वाले से टकरा गया और उसके सिर और पैर में चोट लग गयी। जब नंदिनी ने देखा तो उसने हल्ला मचा दिया, ‘जब आप बच्चों को संभाल ही नहीं पाते तो लेकर क्यों गए।’
‘बेटा मैं तो रोज ही शाम के समय बच्चों को लेकर दुकान जाता हूं।’
‘तो हाथ पकड़ना चाहिए था ना।’
‘बेटा मैं पैसे दे रहा था तब तक ये दोनों भागने लगे और साइकिल से टकरा गया।’
‘दीदी आप क्यों पापा जी से उलझ रही हो। उनकी क्या गलती है। जल्दी से बेटे को डाक्टर के पास ले चलो।’
‘मीता तेरा बेटा होता तो तब तुम्हें पता चलता।’
‘दीदी आप ने क्या तेरा मेरा लगा रखा है। मैं उदय को डाक्टर के पास लेकर जा रही हूॅं।’
पीछे पीछे नंदिनी भी चल पड़ी।
निशांत और प्रशांत जब ऑफिस से घर आए तो उदय को देख कर बोले, ‘अरे उदय बेटा ये चोट कैसे लगी?’
पिता जी ने बताया, ‘निशांत बेटे, मैं शाम को बच्चों को लेकर दुकान गया। तो ये दोनों भाग रहे थे तो साइकिल से टकर हो गयी। बहू डाक्टर के पास ले गयी तो डॉक्टर ने बोला घबराने के ज़रूरत नहीं है।’
तभी नंदिनी बोल पड़ी, ”देख लो आज तो पापा जी ने उदय को मार ही दिया था। वो तो भगवान ने बचा लिया। साइकिल थी अगर गाड़ी होती तो बेटे की जान भी जा सकती थी।’
‘शुभ- शुभ बोलो भाभी। छोटी सी चोट है, ठीक हो जाएगी।’
‘प्रशांत, नंदिनी ठीक तो बोल रही है।’ निशांत गुस्से में बोला।
‘भाइया आप भी ! आप दोनों पापा को क्यों शर्मिंदा कर रहे हो। उन्होंने जानबूझकर तो नहीं किया। भाईया, दोनों बच्चे तो उनकी जान है।’
‘जान है तो पापा जी को अपने पास ही रखो।’
क्या मतलब?’
‘मतलब यह कि इस घर के दो हिस्से होंगे।’
दो हिस्से !’
‘हाॅं, दो हिस्से। नंदिनी तो मुझे कब से कह रही थी कि पापा जी दोनों बच्चों में भेद भाव करते हैं। वीर को ज्यादा प्यार करते हैं। अपने साथ सुलाते है, उसके साथ खेलते हैं, अपनी थाली से खाना खिलाते हैं। और उदय को कहते हैं अपनी मम्मी के पास जाओ वो खाना खिलाएंगी। ये भेद भाव नहीं है तो क्या है? अरे वीर से तीन साल ही तो बड़ा है। है तो वो भी बच्चा!’
‘पापा जी आप कुछ बोलते क्यों नहीं?’
मीता बेटा मैं क्या बोलूं? इन्हें अलग होना था तो इन्होंने मुझे पर इल्जाम लगा दिया।’
‘भाईया आप लोगों को अलग होना है तो हो जाओ पर मैं आप को सचाई बताती हूॅं।’
‘रहने दो मीता बेटा।’
‘नहीं पापा जी, आज मुझे बोलने दो। मैंने कभी घर की बातें इन्हें भी नहीं बताती। मैं नहीं चाहती थी कि दोनों भाईयों में मन मुटाव हो। पापा जी जब भी उदय को अपनी थाली से खाना खिलाते तो दीदी कहती कि आप गंदे हाथों से खाना खिलाते हो, कभी कहती झुठा खाना खिलाते हो।
वो कहते बेटा मैं हाथ धोकर पहले बच्चों को खिलाता हूॅं और उनके खाने के बाद ही खाता हूॅं। खेलते हुए गिर जाएं तो आप लोगों ने जान बूझ कर उदय को गिरा दिया।
कभी मुझसे ही उलझ जाती है। कहती हैं तुमने पापा जी को ज्यादा ही सिर चढ़ रखा है। अरे मैंने क्या सिर चढ़ा रखा है। उनकी हर जरूरत का ध्यान रखना अगर सिर चढ़ना होता है तो हाॅं मैंने पापा जी को सिर चढ़ा रखा है। दीदी आप अलग होने की बात कर रही हो। घर का सब काम मैं करती हूॅं।
तीनों टाइम मैं खाना बनाती हूॅं। आप क्या करती हो, जब खाना बन जाता है तब खाना रखने आ जाती हो। अलग होने के बाद लोगी सब काम?’
घर के दो हिस्से हो गए। उदय अपने दादा जी के पास रोज आता वीर के साथ खेलने के लिए। नंदिनी उसे जाने से रोकती परन्तु उदय नहीं मानता। नंदिनी गुस्से में ‘निशांत उदय बिल्कुल भी कहना नहीं मानता है, जब देखो वीर के पास चला जाता है। तुम घर के बीच में दीवार लगवा दो तब देखती हूॅं कैसे जाएगा।’
‘नंदिनी, उदय बच्चा है। खेलने ही तो जा रहा है। क्यों तुम छोटी-छोटी बातों से परेशान होती हो।’
‘छोटी छोटी बातें ही बड़ा रूप ले लेती है। देखा था ना तुमने जब मैं तुम्हें अलग होने के लिए बोलती थी तो तुम नहीं माने फिर जब उदय को इतनी चोटे लगी तब तुम मानें। अब फिर तुम वही गलती कर रहे हो।’ निशांत ने कुछ नहीं बोला।
उदय और वीर अलग-अलग स्कूल में पढ़ने लगे।अब उनका मिलना बहुत कम हो गया। किशन जी ने भी अपना दायरा सीमित कर लिया। अब बच्चों के साथ ही कम बोलते और खेलते। बच्चों को लेकर दुकान जाना बिल्कुल ही बंद कर दिया। अकेले ही दुकान जा कर बच्चों के लिए कुछ ले आते।
बच्चे जिद करते जाने की तो कहते अपने मम्मी-पापा के साथ जाना। प्रशांत और मीता ने बहुत समझने की कोशिश की, ‘ऐसा तो किसी के साथ भी हो सकता है। पापा जैसा मैं आप का बेटा हूॅं वैसे ही वीर आप का बेटा है।
जितना अधिकार आप का मुझ पर है उतना ही अधिकार वीर पर है। अगर मैं आप के साथ या अपने दादा जी के साथ जा रहा होता और मेरे साथ ये सब होता तो क्या आप मुझे अपने साथ ले जाना छोड़ देते या दादा जी को मना कर देते कहीं ले जाने को?’
‘प्रशांत बेटा अब मेरे बस में कुछ भी नहीं है। मैं बच्चों को नहीं संभाल पाऊंगा। अब मुझसे कुछ नहीं हो पाएगा। और अगर तुम लोगों को मैं बोझ लगूं तो बता देना, मैं फिर अपना इंतजाम कहीं और कर लूंगा।
‘
‘पापा आप कैसी बात कर रहे हो। आज तो आप ने ये सब बोल दिया, फिर कभी ये शब्द नहीं बोलना। पापा हम सब, ये घर सब कुछ आप का है। आपने अपनी मेहनत की कमाई से ये घर बनाया वरना हम दोनों भाईयों के बस में था क्या इतना बड़ा घर बनाना? भाईया अभी रास्ता भटक गये है। देखना एक ना एक दिन वह आप से माफी मांगने जरूर आएंगे।’
समय बीतता गया, बीच में दीवार रख दी। दोनों बच्चे बड़े हो गए। उदय नौकरी के लिए अमरीका चला गया। वीर अभी काॅलेज में था। वीर अपने दादा जी को हफ्ते में एक बार घूमने ले जाता। किशन जी मना करते ‘मुझ बुढ़े के साथ क्यों घूम रहा है। अपने दोस्तों के साथ घूमा कर।’
‘अरे दादा जी जो मजा आप के साथ घूमने में है वो दोस्तों के साथ कहाॅं। पहले आपने मुझे घूमाया अब मेरी बारी, दोस्तों के साथ तो मैं काॅलेज में भी घूम लेता हूॅं।’
एक दिन वीर काॅलेज से जब घर आ रहा था तो उसने अपने ताऊजी ( निशांत) को किसी रिक्शेवाले से उलझते देखा। वहाॅं और भी रिक्शेवाले थे जो निशांत जी को धक्का मार रहे थे। वीर जल्दी से वहां पहुॅंचा और अपने ताऊजी को बचा कर ले आया। उनके सिर में चोट लगी थी। वहीं से डाॅक्टर के पास ले गया और पट्टी करा कर घर ले आया।
‘बेटा आज तुमने मुझे बचा लिया। अगर तुम नहीं आते तो वो तो मुझे मार ही देते। तुम चाहते तो मुझे पीटते हुए देखकर जा सकते थे। अगर वो तुम्हें कुछ कर देते तो।’
‘ताऊजी अगर मुझे कुछ होना होता तो वो कहीं भी कुछ भी हो जाता। और फिर आप तो मेरे अपने हो। हमारे रिश्ते में दूरी आयी है, परिवार तो एक ही है। मैं आपको पिटते हुए कैसे देख सकता था?’
निशांत ने उसी समय ठेकेदार को फोन किया कहा ‘हमारे घर के बीच की दीवार तोड़नी है।’
‘क्या कहे रहे हो? तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या?’
‘नंदिनी दिमाग तो मेरा अब ठीक हुआ है। मुझे अफसोस इस बात का है कि मैं तुम्हारी बातों में आकर अपने परिवार से अलग हो गया। जिस बेटे के लिए तुम अलग हुई, बीच में दीवार रखी, आज वही बेटा हमसे दूर चला गया। अगर आज वीर नहीं आता तो मेरे साथ कुछ भी हो सकता था।’
‘पर हुआ तो नहीं ना! कोई जरूरत नहीं है दीवार तोड़ने की।’
:खबरदार एक शब्द भी बोला। मुझे से बुरो कोई नहीं होगा।’
उसी समय ठेकेदार दो मजदूर को लेकर आया और बीच की दीवार तोड़ने लगा। निशांत अपने पापा के पास गया और उनके पैरों में गिर कर माफी मांगने लगा। ‘पापा मुझे माफ कर दो, मुझे अफसोस इस बात का है कि मैं नंदिनी की बातों में आ गया और घर के दो हिस्से कर दिया।’
‘बेटा मुझे इस बात की खुशी है कि तुम्हें अपनी गलती का एहसास हो गया। बेटा झगड़े किस घर में नहीं होते इस का मतलब ये नहीं की अलग हो जाओ। बेटा हर समस्या का समाधान होता है। पर मुझे खुशी है कि मेरे रहते तुम दोनो भाईयों का मेल हो गया।’
‘पापा मुझे अफसोस इस बात का है कि मैंने इतने साल आप के प्यार के बिना गुजारे।’
– बिमला रावत जड़धारी
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