रेशमी पिंजरा और खुली उड़ान

उमेश जी ने अपनी बहन की तरफ देखा, जिनकी आंखों में अपनी गलती का जरा भी पछतावा नहीं था, बल्कि सिर्फ अपनी झूठी प्रतिष्ठा की चिंता थी। उमेश जी ने हाथ जोड़कर अत्यंत कठोर शब्दों में कहा, “दीदी, आपने अपने स्वार्थ और रिश्तेदारी चमकाने के लिए मेरी फूल सी बच्ची को उस दलदल में धकेल दिया। अगर आपको अपनी झूठी प्रतिष्ठा इतनी ही प्यारी है, तो वह आपको मुबारक हो। आज के बाद आपका और मेरा भाई-बहन का रिश्ता यहीं खत्म होता है। इस घर की दहलीज पर दोबारा कदम मत रखिएगा।” सावित्री जी पैर पटकती हुई वहां से चली गईं।

उमेश चंद्र जी अपने पुराने चश्मे को साफ़ करते हुए बैठक में रखी डायरी में कुछ हिसाब-किताब जोड़ ही रहे थे कि बाहर का लोहे का फाटक खड़खड़ाया और उनकी बड़ी बहन सावित्री हांफती हुई भीतर दाखिल हुईं। चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी और आंखों में जरूरत से ज्यादा चमक थी। उन्होंने अपने पल्लू से पसीना पोंछा और सीधे पानी का गिलास उठाए बिना ही तेज आवाज में बोलना शुरू कर दिया, “अरे उमेश, कहां खोए हो भाई? हाथ से इतना बड़ा मौका निकल जाएगा तो जिंदगी भर माथा पीटते रह जाओगे। मैं कहती हूं, आज के आज ही इंदौर चलने की तैयारी करो। ऐसा लड़का, ऐसा खानदान पूरे मध्य प्रदेश में चिराग लेकर ढूंढने निकलोगे तो भी नहीं मिलेगा। लड़का इकलौता है, करोड़ों का कारोबार है, चार-चार गाड़ियां दरवाजे पर खड़ी रहती हैं और लड़के का रूप-रंग ऐसा कि देखते ही आंखें ठहर जाएं। हमारी नंदिनी तो वहां साक्षात महारानी बनकर राज करेगी।”

उमेश जी ने चश्मा मेज पर रखा और थोड़ा संकोच के साथ बोले, “पर जीजी, आप तो जानती हैं कि हमारा परिवार एक सीधा-साधा, मध्यमवर्गीय परिवार है। नंदिनी अभी अपनी परास्नातक की पढ़ाई पूरी कर रही है और बैंक की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटी है। इतनी जल्दीबाजी क्या है? और फिर इतने बड़े रईस लोग हमारे सामान्य से घर में रिश्ता क्यों जोड़ना चाहेंगे?”

सावित्री जी ने तुरंत मुंह बनाया और डांटने के लहजे में बोलीं, “यही तो तुम्हारी छोटी सोच है उमेश! अरे, जमाने बदल गए हैं। उन लोगों को कोई लालच नहीं है। लड़के की मां मेरी पुरानी परिचित है, उन्हें तो बस सुशील, पढ़ी-लिखी और संस्कारी बहू चाहिए जो उनके बड़े घर को संभाल सके। मेरी बात का भरोसा नहीं है क्या तुम्हें? अपनी सगी बहन पर भी शक करोगे? अगर तुमने देर की, तो कोई और बाजी मार ले जाएगा।”

उसी समय उमेश जी की पत्नी मालती चाय की ट्रे लेकर कमरे में आई। उसने ननद की सारी बातें सुन ली थीं। चाय का कप मेज पर रखते हुए उसने धीरे से कहा, “दीदी, आपकी बात सिर माथे, पर बेटी का ब्याह है। जब तक हम अपनी आंखों से सब देख-परख न लें, इतनी जल्दी कैसे कह सकते हैं?” सावित्री जी ने तुरंत बात काटते हुए कहा, “तो चलो न, कल ही चलो मेरे साथ। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।”

अगले ही दिन उमेश जी और मालती अपनी बहन सावित्री के साथ इंदौर के एक बेहद पॉश इलाके में स्थित उस आलीशान कोठी के सामने खड़े थे। मकान क्या था, मानो कोई छोटा-मोटा राजमहल हो। संगमरमर के फर्श, विदेशी झूमर और वर्दी पहने नौकर-चाकर। लड़के के पिता महेंद्र प्रताप और मां कल्याणी देवी ने उनका स्वागत तो बहुत गर्मजोशी से किया, लेकिन उस बनावटी हंसी के पीछे एक अजीब सा उथलापन था। कुछ ही देर में लड़का, जिसका नाम अनिरुद्ध था, बैठक में आया। कद-काठी और पहनावे से वह किसी बड़े मॉडल जैसा लग रहा था। उसने हाथ जोड़कर सबको नमस्ते किया और कुछ ही मिनटों में अपनी किसी ‘जरूरी बिजनेस मीटिंग’ का बहाना बनाकर वहां से निकल गया।

बातों के दौरान कल्याणी देवी ने बड़ी सहजता से कहा, “देखिए भाई साहब, भगवान की दया से हमारे पास किसी चीज की कोई कमी नहीं है। हमें आपकी एक पाई भी नहीं चाहिए। न कोई दान, न कोई दहेज। हम तो बस यह चाहते हैं कि नंदिनी हमारे घर की लक्ष्मी बनकर आए। बस एक ही शर्त है, शादी इसी महीने की बीस तारीख को करनी होगी, क्योंकि हमारे गुरुजी के अनुसार इसके बाद दो साल तक कोई शुभ मुहूर्त नहीं है।”

उमेश जी तो यह सुनकर गद्गद हो गए कि बिना किसी दहेज के इतनी बड़ी जगह उनकी बेटी का ब्याह तय हो रहा है। उन्होंने वहीं हां कर दी। लेकिन भोपाल लौटते समय पूरी ट्रेन यात्रा में मालती का मन किसी अनहोने भय से कांप रहा था। घर पहुंचकर जब दोनों अपने कमरे में गए, तो मालती ने अपने पति से कहा, “सुनिए जी, मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा। आज के इस दौर में इतना अमीर घराना, जो अपनी बराबरी में एक से बढ़कर एक रिश्ते ढूंढ सकता था, वह हम जैसे साधारण स्कूल मास्टर के परिवार में इतनी हड़बड़ी में रिश्ता क्यों पक्का कर रहा है? न उन्होंने नंदिनी से ठीक से बात की, न हमारे परिवार की पृष्ठभूमि जानी। इतनी जल्दी शादी करने का क्या मतलब है? रिश्ता हमेशा बराबरी में ही शोभा देता है।”

उमेश जी ने हंसते हुए पत्नी की चिंता को खारिज कर दिया, “मालती, तुम भी न जरूरत से ज्यादा सोचती हो। मेरी बहन हमारे बुरे के बारे में कभी सोच सकती है क्या? सावित्री दीदी ने खुद गारंटी ली है। और फिर लड़के वालों ने साफ कह दिया है कि उन्हें सिर्फ संस्कारी लड़की चाहिए। हमारी नंदिनी की किस्मत अच्छी है जो उसे ऐसा राजसी घराना मिल रहा है। तुम बस शादी की तैयारियों में लगो।”

नंदिनी ने भी जब सुना, तो उसने एक बार अपनी मां से दबी आवाज में कहा था, “अम्मा, मैं पहले अपनी परीक्षा देकर आत्मनिर्भर बनना चाहती थी।” लेकिन पिता के चेहरे की खुशी और समाज में मिलने वाली वाहवाही के आगे उसकी आवाज दब गई। पंद्रह दिनों के भीतर ही सादे लेकिन गरिमामय तरीके से विवाह संपन्न हो गया।

विदाई के बाद जब नंदिनी उस विशाल कोठी की चौखट लांघकर भीतर आई, तो उसे लगा कि वह किसी तिलस्मी दुनिया में आ गई है। घर के सभी लोग मुस्कुरा रहे थे, लेकिन उस मुस्कुराहट में आत्मीयता का कोई नामोनिशान नहीं था। रस्मों के बाद नंदिनी को उसके सुसज्जित शयनकक्ष में पहुंचा दिया गया। कमरे में चारों तरफ गुलाब की महक फैली थी, लेकिन नंदिनी का दिल किसी अज्ञात आशंका से तेजी से धड़क रहा था।

रात के ग्यारह बज गए, फिर बारह, और फिर घड़ी ने रात के दो बजा दिए। पूरे कमरे में सन्नाटा पसरा हुआ था। अनिरुद्ध का कोई अता-पता नहीं था। नंदिनी भारी लहंगे और गहनों के बोझ तले दबी, पलंग के कोने पर बैठी दरवाजे की ओर टकटकी लगाए देखती रही। इंतजार की घड़ियां आंसुओं में बदलने लगीं। सुबह की पहली किरण जब खिड़की के शीशे से छनकर आई, तब जाकर थकावट के मारे उसकी आंखें मूंदने लगीं।

तभी कमरे का दरवाजा खुला और उसकी सास कल्याणी देवी भीतर आईं। नंदिनी को उसी तरह दुल्हन के कपड़ों में बैठा देख उनके चेहरे पर एक क्षण के लिए घबराहट उभरी, लेकिन उन्होंने तुरंत संभलते हुए नजरें चुरा लीं और बोलीं, “अरे बहू! तुम अभी तक सोई नहीं? असल में… बात यह हुई कि अनिरुद्ध के बचपन के दोस्त अचानक आ गए थे, तो पार्टी में थोड़ा ज्यादा वक्त लग गया और वह वहीं फार्महाउस पर ही रुक गया। तुम फिक्र मत करो। चलो, जल्दी से नहा-धोकर यह भारी साड़ियां और गहने पहनकर नीचे आ जाओ, मुंह दिखाई की रस्म के लिए मेहमान आने लगे हैं।”

नंदिनी ने बिना कुछ कहे सिर झुका लिया। नीचे हॉल में शहर की तमाम रईस औरतें जमा थीं। सब नंदिनी के रूप और उसके भाग्य की सराहना कर रही थीं कि उसे इतना रईस परिवार मिला। लेकिन सोने के भारी कंगन और हीरों का हार नंदिनी को लोहे की बेड़ियों जैसे लग रहे थे। उसका मन भीतर ही भीतर घुट रहा था।

अगली शाम करीब आठ बजे अनिरुद्ध घर लौटा। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे और कमरे में घुसते ही शराब की तीखी दुर्गंध फैल गई। उसके बाल बिखरे थे और आंखें लाल थीं। नंदिनी सहम कर एक कोने में खड़ी हो गई। अनिरुद्ध ने धड़ाम से दरवाजा बंद किया और सीधे बिस्तर पर गिर पड़ा। उसके हाथ में शराब की आधी खाली बोतल थी।

नंदिनी ने अपनी सारी हिम्मत बटोरकर आगे बढ़कर कहा, “यह क्या हालत बना रखी है आपने? क्या बात है, आप इतने परेशान क्यों हैं? कृपया यह बोतल रख दीजिए।”

अनिरुद्ध ने एक झटके में नंदिनी की कलाई मरोड़ दी और हिंसक आवाज में गुर्राया, “अपनी जबान बंद रख! मुझे सिखाने की जरूरत नहीं है। तुझे क्या लगता है, मैंने तुझसे अपनी मर्जी से शादी की है? मेरे बाप ने मेरी जायदाद छीनने की धमकी देकर तुझ जैसी एक दो कौड़ी की मास्टर की लड़की को मेरे गले बांध दिया ताकि समाज में हमारी अय्याशियों का पर्दा ढका रहे। अपने इस कमरे की सीमा में रहना, मेरे मामले में टांग अड़ाने की कोशिश की तो जान से मार दूंगा!” इतना कहकर उसने नंदिनी को जोरदार धक्का दिया। नंदिनी का सिर पास रखी ड्रेसिंग टेबल के कोने से टकराया और माथे से खून की एक पतली लकीर बह निकली।

नंदिनी फर्श पर गिरकर सिसक पड़ी। वह पूरी रात उस अंधेरे कमरे के फर्श पर बैठकर रोती रही। अब जाकर उसके सामने उस ‘बिना दहेज’ और ‘जल्दबाजी’ में हुई शादी की खौफनाक सच्चाई खुली थी। अनिरुद्ध एक आदतन शराबी, जुआरी और हिंसक प्रवृत्ति का इंसान था। शहर के अमीर परिवारों में उसकी इस सच्चाई की वजह से कोई उसे अपनी बेटी नहीं दे रहा था। इसलिए उसके माता-पिता ने सावित्री जी के जरिए एक सीधे-साधे, शरीफ परिवार को अपनी झूठी चमक-दमक के जाल में फंसा लिया था ताकि बहू के आने से शायद बेटा सुधर जाए या कम से कम समाज में खानदान की नाक बच जाए।

सुबह होते ही जब अनिरुद्ध बेसुध सो रहा था, नंदिनी उठी। उसने अपने आंसू पोंछे और आईने में अपना चेहरा देखा। माथे पर जमा सूखा खून और आंखों के नीचे पड़े काले घेरे उसके जीवन का सच बयां कर रहे थे। उसके सामने दो रास्ते थे—या तो वह अपनी किस्मत को कोसते हुए उस नरक में चुपचाप घुट-घुट कर जीती रहे और एक दिन किसी दर्दनाक हादसे का शिकार हो जाए, या फिर अपने आत्मसम्मान के लिए खड़ी हो। उसने दूसरा रास्ता चुना।

उसने कांपते हाथों से फोन उठाया और सीधे अपने पिता को मिलाया। फोन उठते ही नंदिनी अपनी सिसकियां रोक न सकी और उसने पहली रात से लेकर पिछली रात के थप्पड़ और अनिरुद्ध की सारी सच्चाई एक सांस में अपने माता-पिता को बता दी।

भोपाल में फोन की दूसरी तरफ उमेश जी के हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। मालती का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। उमेश जी अपना माथा पकड़कर बैठ गए। ग्लानि और पश्चाताप की आग में वे जल रहे थे। “हे भगवान! यह मैंने क्या कर दिया? अपनी ही फूल जैसी बच्ची को अपने हाथों से नरक की आग में झोंक दिया! सिर्फ झूठी अमीरी और बहन के अंधे विश्वास में आकर मैंने अपनी ही औलाद का जीवन दांव पर लगा दिया!”

मालती ने फौरन अपने आंसू पोंछे, अपने पति के कंधे को मजबूती से पकड़ा और एक दृढ़ आवाज में बोली, “सुनिए जी! अब पछताने और रोने का वक्त नहीं है। गलती हमसे हुई है, पर उसकी सजा हमारी बच्ची क्यों भुगते? अभी तो सिर्फ दो दिन हुए हैं, हमारी बेटी की सांसें चल रही हैं, वह सुरक्षित है। अगर आज हमने समाज और लोक-लाज के डर से कदम पीछे खींचे, तो कल हमें अपनी बेटी की लाश देखने को मिलेगी। गाड़ी निकालिए, हम अभी इसी वक्त इंदौर जाएंगे और अपनी बेटी को वापस लाएंगे!”

पत्नी के इन शब्दों ने उमेश जी के भीतर के कायर बाप को जगाकर एक रक्षक पिता बना दिया। बिना एक पल गंवाए दोनों तुरंत इंदौर के लिए रवाना हो गए। जब वे अनिरुद्ध की कोठी पर पहुंचे, तो वहां का माहौल सामान्य था। सास कल्याणी देवी ड्राइंग रूम में बैठकर आराम से चाय पी रही थीं।

उमेश जी और मालती सीधे ऊपर नंदिनी के कमरे में पहुंचे। नंदिनी का सूजा हुआ चेहरा और माथे की चोट देखकर उमेश जी की आंखों से अंगारे बरसने लगे। नंदिनी दौड़कर अपने पिता के सीने से लग गई और फूट-फूट कर रोने लगी। उमेश जी ने अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरा और कहा, “चलो बेटा, अपने कपड़े समेटो। तुम इस घर में अब एक पल भी नहीं रहोगी।”

हंगामे की आवाज सुनकर कल्याणी देवी और महेंद्र प्रताप भी कमरे में आ गए। उमेश जी के तेवर देखकर कल्याणी देवी ने चालाकी से बात संभालनी चाही, “अरे समधी जी, यह क्या बचपना है? पति-पत्नी में तो शुरुआत में थोड़ा-बहुत मनमुटाव होता ही है। अनिरुद्ध गुस्से में थोड़ा तेज है, पर दिल का बुरा नहीं है। आप इतनी सी बात पर अपनी बेटी का घर बिगाड़ेंगे? समाज क्या कहेगा कि दो दिन में ही बेटी वापस आ गई?”

महेंद्र प्रताप ने भी रौब झाड़ते हुए कहा, “सोच लीजिए मास्टर साहब, हमारे पास दौलत और रसूख की कमी नहीं है। आपकी लड़की अगर यह चौखट लांघकर गई, तो जमाने में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी। कानून भी हमारे इशारों पर चलता है।”

उमेश जी ने उस रईस के चेहरे पर अपनी उंगली तानते हुए गरज कर कहा, “अपनी दौलत का यह घमंड अपने पास ही रखिए महेंद्र प्रताप जी! मुझे अपनी बेटी के सम्मान और उसकी जान से बढ़कर न आपकी झूठी दौलत प्यारी है और न ही इस पाखंडी समाज का डर। जिस घर में मेरी बेटी का अस्तित्व और सुरक्षा ही नहीं, वह घर नहीं, कसाईखाना है। और रही बात समाज की, तो समाज मेरी बेटी की अर्थी उठने पर सांत्वना देने नहीं आएगा। मैं अपनी बेटी को अपने साथ ले जा रहा हूं, रोक सको तो रोक लो!”

मालती ने आगे बढ़कर नंदिनी का हाथ पकड़ा। नंदिनी ने अपने गले का मंगलसूत्र और सारे गहने उतारकर वहीं मेज पर पटक दिए और अपने माता-पिता के साथ सिर ऊंचा करके उस आलीशान कोठी से बाहर निकल आई।

भोपाल लौटते ही सावित्री जी भी उनके घर पहुंच गईं और उमेश जी को खरी-खोटी सुनाने लगीं, “यह क्या अनर्थ कर दिया उमेश! खानदान की नाक कटवा दी तुमने। लड़के में थोड़ी बहुत बुराई थी तो क्या हुआ, समय के साथ सब ठीक हो जाता। अब इस तलाकशुदा लड़की को कौन अपनाएगा?”

उमेश जी ने अपनी बहन की तरफ देखा, जिनकी आंखों में अपनी गलती का जरा भी पछतावा नहीं था, बल्कि सिर्फ अपनी झूठी प्रतिष्ठा की चिंता थी। उमेश जी ने हाथ जोड़कर अत्यंत कठोर शब्दों में कहा, “दीदी, आपने अपने स्वार्थ और रिश्तेदारी चमकाने के लिए मेरी फूल सी बच्ची को उस दलदल में धकेल दिया। अगर आपको अपनी झूठी प्रतिष्ठा इतनी ही प्यारी है, तो वह आपको मुबारक हो। आज के बाद आपका और मेरा भाई-बहन का रिश्ता यहीं खत्म होता है। इस घर की दहलीज पर दोबारा कदम मत रखिएगा।” सावित्री जी पैर पटकती हुई वहां से चली गईं।

घर का माहौल कुछ दिनों तक गमगीन रहा। नंदिनी गुमसुम सी रहने लगी थी। उसे लगता था कि शायद वह अपने माता-पिता पर बोझ बन गई है। लेकिन एक दिन उमेश जी और मालती उसके कमरे में गए। उमेश जी के हाथ में प्रतियोगी परीक्षाओं की नई किताबों का एक बंडल और एक फॉर्म था।

उन्होंने किताबें नंदिनी की गोद में रखीं और उसका माथा चूमते हुए बोले, “बेटा, जो हुआ वह एक बुरा सपना था। उस दो दिन के हादसे को अपनी पूरी जिंदगी की परिभाषा मत बनने दो। जिंदगी किसी के छोड़ देने से या गलत इंसान के मिल जाने से खत्म नहीं होती। तुमने जो हिम्मत उस दिन दिखाई, वही तुम्हारी ताकत है। अब तुम्हें रोना नहीं, लड़ना है। अपने पैरों पर खड़े होओ, अपनी पहचान बनाओ और दुनिया को दिखाओ कि एक औरत किसी के सहारे की मोहताज नहीं होती।”

मां-बाप के अटूट विश्वास ने नंदिनी के भीतर एक नई लौ जला दी। अगले ही हफ्ते उमेश जी ने एक काबिल वकील की मदद से अनिरुद्ध के खिलाफ घरेलू हिंसा और धोखेबाजी का मुकदमा दर्ज कराया और तलाक की अर्जी दाखिल कर दी। ससुराल वालों ने दौलत के दम पर डराने की बहुत कोशिश की, लेकिन उमेश जी चट्टान की तरह अपनी बेटी के आगे खड़े रहे।

नंदिनी ने अपने आंसुओं को अपनी ताकत बना लिया। वह दिन-रात पढ़ाई में जुट गई। कमरे की चारदीवारी से निकलकर उसने अपनी पूरी ऊर्जा बैंक प्रोबेशनरी ऑफिसर (PO) की परीक्षा की तैयारी में लगा दी।

दो साल का समय बीत गया। अदालत से नंदिनी को अनिरुद्ध से कानूनी तौर पर तलाक की डिक्री मिल गई और वह उस काले साए से हमेशा के लिए मुक्त हो गई। और उसी महीने जब बैंक भर्ती परीक्षा का अंतिम परिणाम घोषित हुआ, तो नंदिनी ने पूरे राज्य में शीर्ष दस में स्थान हासिल किया था। उसे एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीयकृत बैंक में अधिकारी का पद मिला।

नियुक्ति पत्र हाथ में लेकर जब नंदिनी अपने घर लौटी, तो उसने सबसे पहले अपने पिता के पैर छुए और पत्र उनके हाथों में रख दिया। उमेश जी की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। आज वही समाज, जो दो साल पहले ताने मार रहा था, उमेश जी की समझदारी और नंदिनी के हौसले की मिसालें दे रहा था। नंदिनी आज किसी की दया पर नहीं, बल्कि अपनी मेहनत और माता-पिता के स्वाभिमान के दम पर सिर उठाकर जी रही थी।

आपकी राय हमारे लिए अनमोल है:

अगर किसी बेटी की शादी गलत जगह हो जाए, तो क्या माता-पिता को समाज के डर से उसे उसी नरक में घुटने के लिए छोड़ देना चाहिए, या उमेश जी और मालती की तरह ढाल बनकर अपनी बेटी का जीवन संवारना चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : नीलम शर्मा

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