कब तक चुप रहोगे – विनीता सिंह

गाँव के आखिरी छोर पर एक छोटा-सा घर था। घर की दीवारें मिट्टी की थीं, लेकिन उनमें रहने वालों के सपने बहुत बड़े थे। उस घर में रघु अपनी पत्नी सीता और बारह साल के बेटे मोहन के साथ रहता था।

रघु गाँव के जमींदार के खेत में मजदूरी करता था। दिनभर तपती धूप में काम करने के बाद भी उसकी मजदूरी अक्सर पूरी नहीं मिलती। जमींदार की डाँट और अपमान उसके लिए रोज की बात थी। रघु सब सह लेता था।

सीता कई बार कहती, “तुम कुछ बोलते क्यों नहीं? आखिर कब तक चुप रहोगे?”

रघु बस मुस्कुरा देता, “गरीब आदमी की आवाज कौन सुनता है, सीता?”

एक दिन मोहन स्कूल से रोता हुआ घर लौटा। उसकी आँख के नीचे चोट का निशान था।

सीता घबरा गई। “क्या हुआ?”

मोहन ने सिर झुकाकर कहा, “मास्टरजी ने मारा।”

“क्यों?”

“मैं फीस नहीं दे पाया था।”

रघु ने बेटे को देखा। उसकी आँखों में आँसू आ गए, लेकिन वह फिर चुप रहा।

उस रात मोहन ने पहली बार पिता से पूछा, “बाबा, आप हर बात पर चुप क्यों हो जाते हो?”

रघु ने कोई जवाब नहीं दिया।

कुछ दिनों बाद गाँव में तेज बारिश हुई। नदी का पानी बढ़ गया। खेतों में काम बंद हो गया और मजदूरों के घरों में चूल्हे ठंडे पड़ने लगे। जमींदार के गोदाम में अनाज भरा था, मगर उसने किसी मजदूर की मदद नहीं की।

उसी रात मोहन की छोटी बहन गुड़िया भूख से रोते-रोते सो गई।

मोहन उठकर पिता के पास गया। उसने धीरे से पूछा, “बाबा, क्या गरीब होना हमारा अपराध है?”

रघु के पास कोई उत्तर नहीं था।

मोहन की आवाज काँप रही थी, “अगर आप आज भी चुप रहे, तो कल मैं भी चुप रहूँगा। फिर गुड़िया भी चुप रहेगी। हम सब चुप रहेंगे। लेकिन बाबा… हमारी चुप्पी से क्या बदल जाएगा?”

रघु की आँखों से आँसू बह निकले।

वह रात उसकी जिंदगी की सबसे लंबी रात थी।

सुबह सूरज निकला तो रघु अकेला नहीं था। उसके साथ गाँव के कई मजदूर खड़े थे। पहली बार उन्होंने जमींदार के सामने अपनी मजदूरी और अधिकार की बात रखी।

जमींदार ने धमकाया, “तुम लोगों की इतनी हिम्मत?”

रघु की आवाज काँपी,लेकिन इस बार वह रुका नहीं।

“हिम्मत नहीं मालिक… मजबूरी है। बहुत साल चुप रहे हैं। अब अपने बच्चों की आँखों में डर नहीं, भविष्य देखना चाहते हैं।”

पीछे खड़ा मोहन पिता को देख रहा था। उसके चेहरे पर गर्व था।

उस दिन कोई बड़ा चमत्कार नहीं हुआ। न जमींदार तुरंत बदल गया, न गरीबी खत्म हुई। लेकिन एक चीज जरूर बदल गई—गाँव के लोगों ने अपनी आवाज पहचान ली।

शाम को घर लौटते हुए मोहन ने पिता का हाथ पकड़कर पूछा, “बाबा, अब तो चुप नहीं रहोगे?”

रघु मुस्कुराया और बोला—

“नहीं बेटा। अन्याय के सामने चुप रहना भी एक तरह का डर है। और डर से बड़ी कोई गरीबी नहीं होती।”

दूर आसमान में सूरज डूब रहा था, मगर रघु के घर में पहली बार उम्मीद का दिया जल रहा था।

विनीता सिंह

error: Content is protected !!