राह के मोड़ पर बंधी उम्मीद

 जिंदगी के रास्ते अक्सर अनजाने मोड़ों पर ही जुड़ते हैं। अवनि, जो खुद को तन्हा और लाचार समझती थी, उसे रिश्तों का एक नया संसार मिल गया था। और समर, जो निराशा के दलदल में डूब चुका था, उसे अपने आत्मसम्मान और मेहनत के बल पर एक नई जिंदगी मिल गई थी। मुश्किलें कितनी भी बड़ी क्यों न हों, अगर नियत में सच्चाई और दिल में दूसरों के प्रति संवेदना हो, तो गलत नंबर भी सही मुकाम तक पहुंचा देते हैं।

सुबह की पहली धूप जब पुरानी खिड़की के धुंधले शीशों को चीरती हुई कमरे के फर्श पर पड़ी, तो अवनि की आंखें नींद से नहीं, बल्कि दिल के भारीपन से खुलीं। भोपाल शहर के एक शांत और संकरे इलाके में स्थित यह छोटा सा कमरा पिछले तीन वर्षों से उसकी पूरी दुनिया था। एक छोटी सी टेबल, दीवार से सटा हुआ लोहे का बिस्तर, और कोने में रखा गैस का चूल्हा—यही उसकी दिनचर्या के साक्षी थे। परिवार से दूर रहने का फैसला उसका अपना नहीं था, बल्कि परिस्थितियों का दिया हुआ एक खामोश घाव था। पिता के गुजर जाने के बाद सौतेले रिश्तों की कड़वाहट और तानों से बचने के लिए उसने यह एकांत चुना था। वह एक निजी फर्म में साधारण बैक-ऑफिस एग्जीक्यूटिव थी, जहां मिलने वाला वेतन महीने की बीस तारीख तक सांसें गिनने लगता था।

अवनि ने अंगड़ाई ली और चाय बनाने के लिए केतली चढ़ाई ही थी कि बिस्तर पर पड़े उसके पुराने फोन की स्क्रीन थरथरा उठी। किसी अनजान नंबर से कॉल थी। सुबह के सात बजे ऐसी कॉल आमतौर पर नहीं आती थी। उसने कुछ झिझकते हुए स्क्रीन को स्वाइप किया और फोन कान से लगाया।

“हेलो?” अवनि की आवाज में सुबह की हल्की भारीपन थी।

दूसरी तरफ से कोई सांस लेने की भी मोहलत नहीं दे रहा था। एक कांपती, हड़बड़ाई और पसीने में भीगी आवाज गूंजी, “हेलो… मैम! नमस्ते मैम, मैं आपके ऑफिस के नीचे वाली सड़क पर ही खड़ा हूं। मुझे बताया गया था कि आप सुबह जल्दी आ जाती हैं। क्या आप मुझे सिर्फ पांच मिनट का समय दे सकती हैं? मैं बस अपने सर्टिफिकेट्स और काम का पोर्टफोलियो दिखाना चाहता हूं।”

अवनि चौंक गई। उसने केतली की आंच धीमी की और संभलकर बोली, “सुनिए, आप कौन बोल रहे हैं? और मैं आपको मिलने का समय कैसे दे सकती हूं? आपने शायद गलत नंबर मिलाया है।”

“प्लीज मैम, फोन मत काटिएगा!” उस आवाज में इतनी घबराहट और मिन्नत थी कि अवनि का हाथ रुक गया। लड़का हांफते हुए तेजी से कहने लगा, “मैम, मुझे पता है आपका शेड्यूल बहुत व्यस्त रहता है, आप बड़ी डायरेक्टर हैं और कई कंपनियों का काम देखती हैं। लेकिन मैं बहुत दूर से आया हूं। मुझे बस एक मौका दीजिए मैम, मैं दिन-रात एक करके काम करूंगा। मैं कोई सिफारिश नहीं मांग रहा, बस अपनी मेहनत साबित करना चाहता हूं।”

“भाई साहब, आप मेरी बात समझने की कोशिश कीजिए,” अवनि ने संयम बरतते हुए कहा, “आपको किसी ने गलत नंबर दे दिया है। मैं किसी कंपनी की हेड या डायरेक्टर नहीं हूं। मैं खुद एक छोटी सी कर्मचारी हूं। कृपया सही जगह संपर्क करें।”

अवनि ने बात खत्म कर फोन काट दिया। उसने राहत की सांस ली और कप में चाय छानी। लेकिन अभी उसने पहला घूंट ही भरा था कि वही नंबर फिर से स्क्रीन पर चमकने लगा। अवनि के माथे पर हल्की सिलवटें उभरीं। उसने फोन उठाकर कुछ कड़े लहजे में कहा, “देखिए, मैंने आपसे कहा न कि यह गलत नंबर है।”

उस पार कुछ पलों के लिए सन्नाटा छा गया। फिर एक बहुत धीमी, टूटती हुई सिसकी सुनाई दी। उस रुंधे हुए गले ने जो कहा, उसने अवनि के हाथ से चाय का कप वहीं मेज पर रखवा दिया।

“मैम… मुझे माफ कर दीजिएगा। अगर मेरे पास कोई दूसरा रास्ता होता, तो मैं आपको यूं परेशान नहीं करता। मैं बहुत लाचार हूं। घर में मेरी छोटी बहन है, उसकी शादी अगले महीने तय है। पिता की बीमारी में हमारा सब कुछ बिक गया और छह महीने पहले वो भी हमें छोड़कर चले गए। पूरे घर का बोझ अब मेरे अकेले के कंधों पर है। जिस रिश्तेदार ने मुझे आपका यह नंबर दिया था, उसने कहा था कि आप भोपाल की बहुत बड़ी आर्किटेक्चरल और डिजाइनिंग फर्म चलाती हैं और अगर आप चाहें, तो मुझे तुरंत साइट सुपरवाइजर या ड्राफ्ट्समैन की नौकरी मिल सकती है। मुझे अपनी बहन की शादी के लिए अग्रिम पैसों की सख्त जरूरत है। अगर मुझे यह काम नहीं मिला, तो मैं बारात के स्वागत का खर्च नहीं उठा पाऊंगा। मेरी बहन की डोली नहीं उठेगी, उसका पूरा जीवन बिखर जाएगा। मुझे भीख नहीं चाहिए मैम, मुझे काम चाहिए। आप मेरी पगार से हर महीने पैसे काट लीजिएगा, पर मुझे बचा लीजिए।”

उस लड़के के एक-एक शब्द में छुपा दर्द अवनि के सीने में तीर की तरह चुभ गया। उस अनजान शहर में किसी नौजवान की बेबसी साफ झलक रही थी। अवनि की आंखें नम हो गईं, लेकिन वह चाहकर भी उसकी कोई सीधी मदद नहीं कर सकती थी।

उसने अपने स्वर को अत्यंत कोमल बनाते हुए कहा, “सुनिए भाई… मैं सच कह रही हूं, आपसे झूठ बोलकर मुझे क्या मिलेगा? जिसने भी आपको यह नंबर दिया, उसने आपके साथ बहुत भद्दा मजाक किया है। मैं अवनि हूं, मैं कोई बड़ी मैम नहीं हूं। मैं खुद अपने महीने का खर्च बमुश्किल चला पाती हूं। मेरे पास इतनी भी जमा-पूंजी नहीं है कि मैं किसी को उधार दे सकूं या किसी को नौकरी पर रख सकूं। काश मैं आपकी मदद कर पाती, पर मैं सचमुच बेबस हूं।”

दूसरी तरफ गहरा सन्नाटा पसर गया। फिर एक कांपती हुई सांस के साथ उस लड़के ने कहा, “गलत नंबर… मतलब सब खत्म।” और इसके साथ ही फोन कट गया।

फोन कटने की ‘बीप-बीप’ आवाज अवनि के कानों में देर तक गूंजती रही। वह स्तब्ध बैठी रही। उसके सामने एक अनजान लड़के की मजबूरी का चेहरा तैरने लगा—एक ऐसा लड़का जो अपनी बहन के सपनों को बचाने के लिए अनजान शहर की धूल फांक रहा था।

उधर, शहर के चौराहे पर एक पेड़ की छांव में बैठा समर अपने फोन की काली स्क्रीन को देख रहा था। उसके पैरों के छाले जूते के फटे हुए तलवों से झांक रहे थे। जेब में केवल बीस रुपये बचे थे, जिनसे वह या तो एक वक्त का खाना खा सकता था या फिर अपने गांव लौटने के लिए टिकट के कुछ पैसे जुटा सकता था। चंदेरी के पास के एक छोटे से कस्बे से वह बड़ी उम्मीदें लेकर भोपाल आया था। उसके पास सिविल डिप्लोमा था, हाथों में काम करने का हुनर था, लेकिन किस्मत ने उसे ऐसे चौराहे पर ला खड़ा किया था जहां चारों तरफ सिर्फ बंद दरवाजे नजर आ रहे थे। अभी आधा घंटा पहले ही उसकी मां का फोन आया था, जिन्होंने कांपती आवाज में पूछा था, “बेटा, कुछ बात बनी? समधी जी फोन करके टेंट और हलवाई के बयाने के बारे में पूछ रहे थे।” समर ने तब अपनी रुलाई दबाकर झूठ कहा था, “हां मां, सब ठीक हो जाएगा, मैं बस मैडम से मिलने ही वाला हूं।” और अब, वह उम्मीद भी एक गलत नंबर के धोखे में तब्दील हो चुकी थी। भूख और अपमान से उसकी आंखें भर आईं। उसने अपनी फाइल को सीने से चिपका लिया और सिर घुटनों के बीच छुपा लिया।

इधर, अवनि तैयार होकर अपने दफ्तर के लिए निकली। बस के सफर में भी उसका ध्यान उसी अनजान लड़के की बातों में अटका रहा। उसे अपना वह समय याद आ गया जब पिता के गुजरने के बाद वह भी इसी तरह दर-दर भटकी थी, जब हर कोई वादे करके मुकर जाता था। उस लड़के की लाचारी अवनि को अपनी ही पुरानी लाचारी जैसी लगी।

दफ्तर पहुंचते ही अवनि सीधे अपने मैनेजर मिस्टर वर्मा के केबिन की ओर बढ़ी। मन में एक हल्की सी उम्मीद थी कि शायद वह अपनी तीन महीने की सैलरी एडवांस मांग ले और उस लड़के की कुछ मदद कर सके, या फिर उसे अपने ऑफिस में किसी खाली पद पर लगवा सके।

“सर, क्या मैं अंदर आ सकती हूं?” अवनि ने धीरे से दरवाजा खटखटाया।

मिस्टर वर्मा फाइलों में उलझे हुए थे। उन्होंने चश्मे के ऊपर से देखा और बेरुखी से बोले, “हां अवनि, बोलो। पर देखो, अगर तुम फिर से सैलरी एडवांस मांगने आई हो, तो इस बार कंपनी की पॉलिसी इजाजत नहीं देती। ऑडिट चल रहा है और ऊपर से सख्त निर्देश हैं कि किसी को कोई अग्रिम भुगतान नहीं होगा। अगर काम से जुड़ी कोई बात है, तो बताओ।”

अवनि के लफ्ज उसके हलक में ही सूख गए। उसने संकोच से कहा, “सर… हमारे वेयरहाउस या डिस्पैच सेक्शन में कोई जगह खाली है क्या? कोई बहुत मेहनती लड़का है, उसे तुरंत काम की जरूरत है।”

मिस्टर वर्मा ने फाइल बंद करते हुए चिढ़कर कहा, “अवनि, तुम्हें पता है कि पिछले हफ्ते ही मैनेजमेंट ने कॉस्ट कटिंग के तहत चार लोगों को निकाला है। हम नए लोगों को कहां से रखेंगे? तुम अपने काम पर ध्यान दो।”

निराश होकर अवनि अपनी डेस्क पर लौट आई। दिन भर कंप्यूटर स्क्रीन पर काम करते हुए भी उसका मन अशांत रहा। घड़ी की सुइयां आगे बढ़ रही थीं, और उसके साथ ही अवनि के भीतर की बेचैनी भी। दोपहर के लंच ब्रेक में उसने हिम्मत करके उसी नंबर पर दोबारा कॉल किया। फोन की घंटी बजती रही, पर किसी ने नहीं उठाया। अवनि की घबराहट और बढ़ गई। उसने सोचा, कहीं वह लड़का हताशा में कोई गलत कदम न उठा ले? जब इंसान के पास खोने को कुछ नहीं बचता, तो वह बहुत कमजोर हो जाता है।

उसने एक संक्षिप्त मैसेज भेजा: “भाई, आप जहां भी हैं, हिम्मत मत हारिए। गलत कदम मत उठाना। जिंदगी रास्ते निकाल ही लेती है।”

शाम के पांच बजे, जब समर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर बैठकर अपनी वापसी की ट्रेन का इंतजार कर रहा था, तब उसके फोन पर वह मैसेज चमका। उस छोटे से संदेश ने समर के भीतर बुझती हुई लौ को एक झटका दिया। उसने फोन उठाया और कांपती उंगलियों से कॉल बैक किया।

“हेलो?” समर की आवाज बेहद कमजोर थी।

अवनि ने तुरंत फोन उठाया, “हेलो भाई! भगवान का शुक्र है आपने फोन उठाया। आप कहां हैं? आप ठीक तो हैं?”

समर की आंखों से आंसू छलक पड़े, “मैम, मैं ठीक नहीं हूं। मैं रेलवे स्टेशन पर हूं। गांव वापस जा रहा हूं। बहन की शादी टूटने वाली है और मैं अपनी मां से नजरें मिलाने के काबिल नहीं बचा।”

अवनि ने दृढ़ता से कहा, “आप कहीं नहीं जा रहे हैं। स्टेशन से बाहर आइए। मैं आपको एक पता भेज रही हूं, वहां पहुंचिए। मेरे ऑफिस के पास एक चाय का स्टॉल है, मैं वहां आपका इंतजार कर रही हूं।”

समर को समझ नहीं आया कि जिस लड़की ने सुबह कहा था कि वह कुछ नहीं कर सकती, वह अब उसे क्यों बुला रही है। लेकिन डूबते को तिनके का सहारा भी बहुत होता है। उसने अपना बैग उठाया और स्टेशन से बाहर निकल पड़ा।

शाम के धुंधलके में जब दोनों आमने-सामने आए, तो औपचारिकताएं खुद-ब-खुद खत्म हो गईं। समर के चेहरे की धूल, फटे जूते और अवनि की आंखों में झलकता अपनापन—दोनों ने एक-दूसरे की स्थिति को बिना कहे समझ लिया। अवनि ने उसे चाय और समोसा खिलाया। समर ने अपनी फाइल खोलकर दिखाई। अवनि ने देखा कि लड़के के पास वास्तव में ड्राफ्टिंग, साइट मेजरमेंट और बेसिक इंटीरियर डिजाइनिंग का बेहतरीन हुनर था। उसके द्वारा बनाए गए नक्शे बेहद सधे हुए थे।

अवनि ने गहरी सांस ली और कहा, “समर, मेरे पास तुम्हें देने के लिए न तो लाखों रुपये हैं और न ही मेरे दफ्तर में कोई नौकरी। लेकिन मेरे एक पुराने परिचित हैं, श्रीकांत जी। वह शहर के बाहरी इलाके में छोटे-छोटे घरों और दुकानों के निर्माण का ठेका लेते हैं। कल ही उनके सुपरवाइजर ने अचानक काम छोड़ दिया था। काम छोटा है, धूप और धूल का है, लेकिन वह मेहनती लोगों की कद्र करते हैं। अगर तुम मेहनत करने को तैयार हो, तो मैं उनसे बात कर सकती हूं।”

समर की आंखों में चमक लौट आई, “मैम, मुझे धूप और पसीने से डर नहीं लगता। मुझे बस काम चाहिए।”

अवनि उसी वक्त समर को लेकर श्रीकांत जी के दफ्तर पहुंची। उसने अपनी साख पर समर की ईमानदारी की गारंटी ली और उसके बनाए नक्शे दिखाए। श्रीकांत जी समर के काम और उसकी विनम्रता से प्रभावित हुए। उन्होंने न केवल समर को तुरंत काम पर रख लिया, बल्कि अवनि के कहने पर और समर की पारिवारिक स्थिति को समझते हुए, शादी के खर्च के लिए उसकी तीन महीने की पगार के बराबर राशि का अग्रिम चेक भी काट दिया।

उस चेक को हाथ में लेते ही समर के हाथ कांपने लगे। वह जमीन पर बैठकर फूट-फूट कर रो पड़ा। यह केवल पैसे नहीं थे, यह उसकी बहन की डोली का सम्मान था, उसकी मां की उम्मीद थी, और एक परिवार का बिखरने से बचना था।

उसने हाथ जोड़कर अवनि से कहा, “मैम, अगर आज आपका यह गलत नंबर नहीं मिलता, तो शायद मेरी जिंदगी का सही रास्ता कभी नहीं खुलता। आपने अनजान होकर भी मेरे लिए वो किया जो अपने भी नहीं करते।”

अवनि मुस्कुराई, उसकी अपनी आंखें भी भीगी हुई थीं। उसे महसूस हुआ कि भले ही उसकी अपनी जिंदगी में बहुत से अभाव थे, लेकिन किसी दूसरे के अंधेरे सफर में एक छोटा सा दीया जला देना ही इंसानियत की सबसे बड़ी दौलत है।

अगले एक महीने तक समर ने दिन-रात एक करके साइट पर काम किया। उसने अपनी लगन से श्रीकांत जी का दिल जीत लिया। शादी के दिन, जब उसकी बहन की बारात उसके गांव के दरवाजे पर पहुंची, तो दरवाजे पर स्वागत करने वालों में केवल समर और उसकी मां ही नहीं थे, बल्कि वहां अवनि भी मौजूद थी, जिसे समर ने अपनी बड़ी बहन का दर्जा देकर सबसे पहले न्योता भेजा था। जब मंडप में समर की बहन फेरे ले रही थी, तब समर की मां ने अवनि के सिर पर हाथ रखकर रोते हुए कहा, “बेटी, तू सिर्फ एक अनजान फोन कॉल नहीं थी, तू हमारे घर के लिए भगवान का भेजा हुआ फरिश्ता थी।”

जिंदगी के रास्ते अक्सर अनजाने मोड़ों पर ही जुड़ते हैं। अवनि, जो खुद को तन्हा और लाचार समझती थी, उसे रिश्तों का एक नया संसार मिल गया था। और समर, जो निराशा के दलदल में डूब चुका था, उसे अपने आत्मसम्मान और मेहनत के बल पर एक नई जिंदगी मिल गई थी। मुश्किलें कितनी भी बड़ी क्यों न हों, अगर नियत में सच्चाई और दिल में दूसरों के प्रति संवेदना हो, तो गलत नंबर भी सही मुकाम तक पहुंचा देते हैं।

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