ऐसी भाभी सबको मिले – सुदर्शन सचदेवा

“भाभी… एक बात पूछूँ?”

“हाँ, पूछ न।”

“अगर कभी मैं आपको छोड़कर चली गई, तो आप मुझे याद करेंगी?”

भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा, “पगली! तू घर से विदा होगी, मेरे दिल से थोड़ी।”

इतना सुनते ही ननद की आँखें भर आईं और वह भाभी के गले लग गई।

यह रिश्ता भले ही खून का नहीं था, लेकिन दोनों के बीच का प्यार किसी सगे रिश्ते से कम भी नहीं था।

जब रिया के भाई रोहन की शादी हुई और नई बहू स्नेहा घर आई, तब रिया को सबसे ज्यादा डर इसी बात का था कि अब उसकी भाभी उसे पसंद करेंगी या नहीं।

रिया अपनी भाभी को लेकर बहुत उत्साहित थी, लेकिन मन में एक डर भी था।

उसने अपनी सहेली से कहा था, “पता नहीं भाभी कैसी होंगी… कहीं ऐसी न हों कि हर बात पर मुझे डाँटें।”

लेकिन स्नेहा ने घर में कदम रखते ही रिया का हाथ पकड़कर कहा—

“तुम मेरी ननद नहीं, मेरी छोटी बहन हो। बस एक बात याद रखना, मुझसे कभी कोई बात छिपाना मत।”

रिया मुस्कुरा दी।

धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती गहरी होती गई।

रिया कॉलेज से आती तो सबसे पहले अपनी भाभी के कमरे में जाती। दोनों घंटों बातें करतीं—कभी कपड़ों की, कभी दोस्तों की, कभी घर की और कभी जिंदगी की।

एक दिन रिया का अपनी माँ से किसी बात पर झगड़ा हो गया। वह गुस्से में अपने कमरे में जाकर रोने लगी।

स्नेहा चुपचाप उसके पास गई और बिना कुछ पूछे उसके पास बैठ गई।

रिया ने कहा, “भाभी, आप भी मुझे समझाने आई हैं?”

स्नेहा ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “नहीं… आज मैं तुझे समझाने नहीं, सुनने आई हूँ।”

रिया ने सारी बात बता दी।

स्नेहा ने उसे समझाया, “माँ-बेटी के रिश्ते में कभी-कभी नाराज़गी हो जाती है, लेकिन प्यार कम नहीं होता।”

उस रात रिया अपनी माँ के पास गई और उन्हें गले लगाकर रो पड़ी।

कुछ दिनों बाद स्नेहा को मायके जाना था। रिया पूरे दिन उदास रही।

स्नेहा ने पूछा, “क्या हुआ?”

रिया बोली, “आप चली जाओगी तो घर खाली-खाली लगेगा।”

स्नेहा हँसकर बोली, “दो दिन के लिए जा रही हूँ, हमेशा के लिए थोड़ी!”

लेकिन उन दो दिनों में रिया को एहसास हुआ कि उसकी भाभी उसके लिए कितनी खास बन चुकी थी।

समय बीतता गया।

एक दिन रिया की शादी तय हो गई।

घर में खुशी का माहौल था, लेकिन स्नेहा सबसे ज्यादा भावुक थी।

शादी से एक रात पहले रिया अपनी भाभी के कमरे में गई।

उसने कहा, “भाभी, कल मैं इस घर से चली जाऊँगी।”

स्नेहा ने उसे गले लगाते हुए कहा, “तू इस घर से जाएगी, मेरे दिल से नहीं।”

रिया रोते हुए बोली, “मुझे डर लग रहा है।”

“किस बात का?”

“नए घर का… नए लोगों का।”

स्नेहा ने उसका माथा चूमकर कहा—

“जब भी डर लगे, मुझे फोन करना। रात हो या दिन, मैं हमेशा तेरे साथ हूँ।”

अगली सुबह जब रिया की विदाई हुई तो सबसे ज्यादा आँसू स्नेहा की आँखों में थे।

गाड़ी चलने लगी तो रिया ने खिड़की से हाथ बाहर निकाला और चिल्लाकर कहा—

“भाभी! मुझे भूलना मत!”

स्नेहा ने आँसू पोंछते हुए जवाब दिया—

“तू मेरी ननद नहीं, मेरी बहन है… बहनों को कोई भूलता है क्या?”

कुछ महीनों बाद रिया मायके आई।

घर में कदम रखते ही वह सीधे अपनी भाभी के कमरे में गई और उन्हें कसकर गले लगा लिया।

“भाभी, मैंने आपको बहुत याद किया।”

स्नेहा मुस्कुराई और बोली—

“मैंने भी।”

रिया ने कहा, “आप जैसी भाभी हर लड़की को मिले।”

स्नेहा ने हँसकर कहा—

“और मेरे जैसी ननद भी हर भाभी को मिले।”

दोनों हँस पड़ीं।

क्योंकि ननद और भाभी का रिश्ता सिर्फ रिश्तेदारी का नाम नहीं है। अगर इसमें सम्मान, दोस्ती और प्रेम हो, तो दो अलग घरों से आई दो लड़कियाँ भी सगी बहनों से बढ़कर बन सकती हैं।

सच में, ऐसी भाभी सबको मिले… और ऐसी ननद

सुदर्शन सचदेवा

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