ओंकारेश्वर जी ने आगे बढ़कर सिद्धांत और अनन्या दोनों के सिर पर हाथ रखा और भावुक होकर कहा, “लोग कहते हैं कि बेटियां पराया धन होती हैं और शादी के बाद रिश्ते बदल जाते हैं। लेकिन आज मुझे गर्व है कि मेरी बेटियों ने मुझे दुनिया का सबसे अमीर पिता बना दिया है। मेरे पास बैंक बैलेंस नहीं था, गाड़ियां नहीं थीं, पर मेरे पास यह चार रत्न हैं, जिनका प्यार किसी भी दौलत से कहीं बढ़कर है। और सिद्धांत बेटा, तुमने जिस तरह मेरी बेटी के सम्मान और उसकी बहनों की भावनाओं का मान रखा है, उसने मेरा सिर फख्र से ऊंचा कर दिया।”
इंदौर के पुराने मोहल्ले में स्थित ‘सदाबहार’ नाम का वह दोमंजिला मकान केवल ईंट और चूने की इमारत नहीं था, बल्कि त्याग, समर्पण और आंसुओं से सींची गई एक जीती-जागती बगिया थी। उस घर के मुखिया थे ओंकारेश्वर जी। करीब बारह साल पहले जब उनकी पत्नी एक लंबी बीमारी के बाद इस दुनिया से रुखसत हुईं, तो ओंकारेश्वर जी के कंधों पर संसार का सबसे भारी बोझ आ टिका था—अपनी चार मासूम बेटियों की परवरिश का बोझ। रिश्तेदारों ने दूसरी शादी की सलाह दी थी, कुछ ने बेटियों को ननिहाल भेजने की बात कही, पर ओंकारेश्वर जी ने अपनी हथेलियों में बेटियों के नन्हें हाथ थामते हुए फैसला किया था कि वे खुद ही उनके पिता भी बनेंगे और मां का आंचल भी।
चारों बेटियां मानो चार अलग-अलग रंगों से सजी हुई थीं। सबसे बड़ी बेटी थी अनन्या। अनन्या केवल नाम से ही बड़ी नहीं थी, उसकी आत्मा में मां का वात्सल्य समाया हुआ था। जब मां गुजरीं, तब वह महज चौदह साल की थी। उस उम्र में जब लड़कियां अपनी सहेलियों के साथ गुड़िया खेलती हैं, अनन्या ने चूल्हा संभाल लिया था। स्कूल से आकर रोटियां बेलना, बहनों की चोटियों में तेल लगाना और पिता की थकी हुई आंखों में उम्मीद भरना उसकी दिनचर्या बन गई थी। वह बहुत कम बोलती थी, उसकी खामोशी में एक गहरी परिपक्वता और त्याग झलकता था।
दूसरे नंबर पर थी तन्वी। तन्वी घर का वह पटाखा थी जो बिना किसी चेतावनी के फूट जाता था। वह जो सोचती, वही बोलती। मुंहफट इतनी कि मोहल्ले की औरतें भी उससे बात करने से पहले दो बार सोचती थीं, लेकिन दिल शीशे जैसा साफ था। तीसरे नंबर पर थी पावनी। बचपन में हुई एक दुर्घटना के कारण पावनी का बायां पैर थोड़ा कमजोर रह गया था। वह लंगड़ाकर चलती थी, मगर उसके चेहरे की सौम्यता और मुस्कान इतनी पवित्र थी कि घर में कोई कितना भी दुखी हो, पावनी के चेहरे को देखकर उसका सारा तनाव दूर हो जाता था। वह घर की सबसे शांत और समझदार कड़ी थी। सबसे छोटी थी रिया। वह घर का खिलौना थी। तीनों बहनों के लाड़-प्यार ने रिया को निडर, चुलबुली और बेहद साहसी बना दिया था।
अनन्या जब सत्ताईसवें साल में दाखिल हुई, तो ओंकारेश्वर जी की रातों की नींद उड़ने लगी। उन्हें अपनी पहली जिम्मेदारी को विदा करना था। एक दिन अचानक ओंकारेश्वर जी के एक पुराने बैंक सहयोगी ने अपने भतीजे सिद्धांत का रिश्ता सुझाया। सिद्धांत भोपाल में एक अच्छी आईटी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर था। परिवार संस्कारी था और लड़का भी सुलझा हुआ दिखता था। ओंकारेश्वर जी जब सिद्धांत से मिले, तो उसकी सादगी और नम्र व्यवहार ने उनका दिल जीत लिया। बिना किसी लंबे इंतजार के रिश्ते की बात पक्की हो गई।
शादी का दिन आया। ओंकारेश्वर जी ने अपनी जीवन भर की जमा पूंजी, प्रोविडेंट फंड का बड़ा हिस्सा और सेवानिवृत्ति के बाद मिले पैसों को अनन्या की शादी में झोंक दिया। तन्वी ने बरातियों की खातिरदारी में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी, पावनी ने धीरे-धीरे चलते हुए सारे रस्मों-रिवाज निभाए और रिया ने जीजाजी के जूते चुराकर पूरे माहौल को हंसी-खुशी से भर दिया। विदाई के वक्त ओंकारेश्वर जी ने सिद्धांत के पिता के हाथ जोड़कर कांपती आवाज में कहा था, “समधी जी, मैंने अपनी जान का टुकड़ा आपके हवाले किया है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार कोई कमी नहीं छोड़ी, फिर भी यदि कोई भूल-चूक रह गई हो, तो माफ कीजिएगा।”
सिद्धांत अनन्या को विदा कराकर भोपाल ले आया। पहले दो दिन तो सब कुछ किसी खूबसूरत सपने जैसा बीता। सिद्धांत का परिवार अनन्या को सिर-आंखों पर बिठाए हुए था। सिद्धांत का व्यवहार भी अनन्या के प्रति बेहद प्रेमपूर्ण और आदर से भरा था। पगफेरे की छोटी सी रस्म ससुराल में ही पास के एक मंदिर में पूरी कर ली गई थी। अनन्या मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद कर रही थी कि मां के जाने के बाद जिस प्यार और सुरक्षा की उसे तलाश थी, वह उसे इस नए घर में मिल गई है।
लेकिन चौथे दिन की सुबह, वह खूबसूरत सपना अचानक एक भयानक दुस्वप्न में बदल गया।
सिद्धांत बेडरूम में आया। उसका चेहरा उतरा हुआ था, आंखों में अजीब सी कशमकश और झिझक थी। उसने कमरे का दरवाजा बंद किया और अनन्या के पास आकर धीमे, लेकिन गंभीर स्वर में बोला, “अनन्या, तुम्हें आज ही अपने मायके चलना होगा। मैं तुम्हें इंदौर छोड़ आता हूँ।”
अनन्या जो अलमारी में अपने कपड़े सहेज रही थी, ठिठक गई। उसने पलटकर सिद्धांत को देखा, “इंदौर? अचानक? अभी तो पगफेरे की रस्म भी हो चुकी है और आपने कहा था कि अगले हफ्ते हम दोनों साथ में पापा से मिलने जाएंगे। क्या कोई बात हो गई है? क्या मेरी किसी बात से बाबूजी या मां जी नाराज हैं?”
सिद्धांत ने नजरें चुरा लीं। उसकी आवाज में एक अजीब सी घबराहट और बनावटी कठोरता थी। उसने कहा, “नहीं, कोई नाराज नहीं है… पर बात यह है कि तुम्हारे पापा ने शादी के वक्त बहुत बड़ी-बड़ी बातें की थीं। उन्होंने कहा था कि वे अपनी लाडली की विदाई में कोई कमी नहीं रखेंगे। लेकिन हकीकत यह है कि शायद बहुत बड़ी कमी रह गई है।”
अनन्या के हाथ से साड़ी का पल्लू छूट गया। उसका कलेजा मुंह को आ गया। उसने कांपती आवाज में पूछा, “कमी? कैसी कमी? पापा ने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई लगा दी थी। जो कुछ उनके पास था, सब तो दे दिया…”
“सब दे दिया?” सिद्धांत ने थोड़ा तीखे लहजे में कहा, उसके चेहरे पर एक नकली बेरुखी छा गई, “तुम्हारे पापा ने शादी में कोई ठोस नकद रकम नहीं दी। आजकल के जमाने में खाली हाथ बेटी को विदा करना कहां का रिवाज है? हमारे रिश्तेदारों में कितनी बातें बन रही हैं, तुम्हें अंदाजा भी है? जब तक यह मामला सुलझ नहीं जाता, तुम्हारा यहां रहना ठीक नहीं है।”
अनन्या की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। वह अवाक रह गई। जिस इंसान को वह अपना जीवनसाथी मान चुकी थी, वह दहेज की बात कर रहा था? उसका दिल टूटकर बिखर गया। वह सिद्धांत के पैरों के पास बैठ गई और हाथ जोड़कर रोते हुए बोली, “सिद्धांत जी, मैं आपके पैर पड़ती हूँ, ऐसा मत कहिए। मेरे पापा एक साधारण रिटायर्ड इंसान हैं। हम चार बहनें हैं। मेरे पीछे अभी तीन बहनों की जिंदगी संवरनी बाकी है। पापा की जितनी हैसियत थी, उन्होंने उससे बढ़कर किया। उनके पास अब कुछ नहीं बचा है। प्लीज, उन्हें इस उम्र में जिल्लत मत दीजिए। आप जो कहेंगे मैं करूंगी, पर मेरे पिता को मत घसीटिए।”
सिद्धांत का दिल शायद अंदर से कांप गया, लेकिन उसने अपने चेहरे को सख्त बनाए रखा। उसने अनन्या को ऊपर उठाया और रूखे स्वर में कहा, “रोना-धोना बंद करो अनन्या। जब तक बात साफ नहीं होती, तुम अपने घर ही रहोगी। जाओ, अपनी अलमारी से अपना सामान पैक कर लो।”
अनन्या की रूह छलनी हो चुकी थी। उसने कोई प्रतिवाद नहीं किया। अपने आंसुओं को पोंछते हुए, खामोशी से उसने अपना सूटकेस तैयार किया। जिस खामोशी के साए में वह बचपन से पली-बढ़ी थी, वही खामोशी आज उसका सबसे बड़ा सहारा बन गई।
गाड़ी पूरे रास्ते खामोश रही। सिद्धांत बीच-बीच में उसे देखता, कुछ कहने की कोशिश करता, लेकिन फिर चुप हो जाता। अनन्या की नजरें खिड़की से बाहर दौड़ते पेड़ों पर टिकी थीं, लेकिन उसका दिमाग उस मंजर की कल्पना करके सहम रहा था कि जब पिता को यह सच पता चलेगा, तो उनका दिल बैठ जाएगा। क्या वे यह आघात सह पाएंगे?
दोपहर के वक्त गाड़ी इंदौर वाले घर के सामने रुकी। अनन्या का गला सूख रहा था। उसने भारी मन से कदम घर के मुख्य द्वार की तरफ बढ़ाए। सिद्धांत भी उसका सूटकेस लिए पीछे-पीछे आ गया। दरवाजे पर ताला नहीं था, बस कुंडी लगी थी। अनन्या ने कांपते हाथों से कुंडी खटखटाई।
जैसे ही दरवाजा खुला, अनन्या हैरान रह गई।
सामने पूरा घर गुब्बारों और रंग-बिरंगी झालरों से सजा हुआ था। हॉल में पिता ओंकारेश्वर जी एक नई शेरवानी पहने मुस्कुराते हुए खड़े थे। तन्वी, पावनी और रिया के चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान तैर रही थी। किसी के भी चेहरे पर किसी अनहोनी या दुख का कोई निशान नहीं था। इससे पहले कि अनन्या कुछ समझ पाती, सिद्धांत अचानक अनन्या के पीछे से आगे आया और जोर से ठहाका लगाकर हंस पड़ा। ओंकारेश्वर जी भी आगे बढ़े और सिद्धांत के कंधे पर हाथ रख दिया।
अनन्या ने स्तब्ध होकर सबको देखा और रुंधे गले से पूछा, “यह… यह सब क्या है? आप सब इतने खुश क्यों हैं? पापा, आपको पता भी है कि क्या हुआ है?”
तन्वी आगे आई और अनन्या की नाक खींचते हुए बोली, “अरे मेरी भोली दीदी! जरा अपने उस छोटे से दिमाग पर जोर डाल और सोच कि आज तारीख क्या है? आज क्या कोई आम दिन है?”
पावनी ने लंगड़ाते हुए आगे बढ़कर अनन्या का हाथ थामा और बोली, “दीदी, यहां तो आओ…”
तभी सबसे छोटी रिया ने भागकर कमरे की मुख्य लाइट बंद कर दी। दीवार पर लगी छोटी-छोटी फेयरी लाइट्स जल उठीं और टेबल पर रखे एक बड़े से चॉकलेट केक पर लगी मोमबत्तियां जगमगाने लगीं। अचानक तीनों बहनों और ओंकारेश्वर जी ने एक सुर में तालियां बजाते हुए गाना शुरू कर दिया—
“हैप्पी बर्थडे टू यू… हैप्पी बर्थडे प्यारी अनन्या दीदी… हैप्पी बर्थडे टू यू!”
अनन्या की आंखें फटी की फटी रह गईं।
आज उसका अठाईसवां जन्मदिन था! पिछले बारह सालों से अपनी बहनों की परवरिश, घर के खर्चों और शादी की भागदौड़ में वह खुद यह भूल चुकी थी कि उसका भी कोई जन्मदिन होता है। मां के जाने के बाद उसने कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया था; वह हमेशा बहनों के जन्मदिन पर कुछ मीठा बना देती थी, पर अपने लिए उसने कभी कुछ नहीं चाहा था।
अनन्या ने नम आंखों से सिद्धांत की तरफ देखा। सिद्धांत अब मुस्कुरा रहा था, उसकी आंखों में वही पुराना आदर और असीम स्नेह था।
अनन्या ने रोते हुए सिद्धांत के सीने पर अपनी मुट्ठी से हल्का सा वार किया और बोली, “आप… आप भी इन तीनों की साजिश में शामिल हो गए? आपने मुझे इतनी भयानक बातें क्यों कहीं? आपको अंदाजा भी है कि रास्ते भर मेरे दिल पर क्या गुजरी है? मैं तो मर ही गई थी यह सोचकर कि…”
सिद्धांत ने अनन्या के दोनों हाथ थाम लिए और बहुत प्यार से बोला, “अनन्या, मुझे माफ कर देना। सच तो यह है कि जब तुम्हारी बहनों ने मुझे फोन करके यह प्लान बताया, तो मैंने पहले मना किया था। लेकिन तुम्हारी इन तीनों लड़ाकू बहनों ने मुझे धमकी दी कि अगर जीजाजी ने दीदी को सरप्राइज देने में मदद नहीं की, तो वे घर में घुसने नहीं देंगी। तन्वी ने तो यहां तक कहा था कि दीदी इतनी सीधी हैं कि अगर कोई बहाना साधारण हुआ, तो वे कभी तुरंत मायके नहीं आएंगी। उन्हें मायके लाने के लिए कोई बड़ा और चौंकाने वाला झटका ही देना पड़ेगा।”
तन्वी जोर से हंसी और बोली, “हां जीजाजी, और आपने एक्टिंग भी क्या गजब की की! दीदी का तो रंग ही उड़ गया था।”
पावनी ने अनन्या के गले में बांहें डालते हुए कहा, “दीदी, जब से मां गई हैं, तुमने अपनी हर खुशी हमारे लिए कुर्बान कर दी। खुद पुराने कपड़े पहनती रहीं ताकि हम नए कपड़े पहन सकें। आज जब तुम अपने घर चली गई हो, तो हम तुम्हारा पहला जन्मदिन ऐसे ही फीका कैसे जाने देते? यह दिन तो हमारे लिए किसी त्योहार से कम नहीं है।”
रिया केक के पास आकर बोली, “और सुनो दीदी, यह केक हमने बाहर से नहीं मंगवाया है। पावनी दीदी ने खड़े रहकर बनवाया है और तन्वी दीदी ने इस पर अपने हाथों से क्रीम सजाई है। अब जल्दी से मोमबत्ती बुझाओ, मुझसे अब सब्र नहीं हो रहा!”
अनन्या के आंसू अब दुख के नहीं, बल्कि परम आनंद और तृप्ति के थे। उसने मोमबत्ती बुझाई और केक काटा। पहला टुकड़ा उसने अपने पिता ओंकारेश्वर जी के मुंह में डाला। ओंकारेश्वर जी की आंखों से भी खुशी के दो कतरे छलक पड़े।
ओंकारेश्वर जी ने आगे बढ़कर सिद्धांत और अनन्या दोनों के सिर पर हाथ रखा और भावुक होकर कहा, “लोग कहते हैं कि बेटियां पराया धन होती हैं और शादी के बाद रिश्ते बदल जाते हैं। लेकिन आज मुझे गर्व है कि मेरी बेटियों ने मुझे दुनिया का सबसे अमीर पिता बना दिया है। मेरे पास बैंक बैलेंस नहीं था, गाड़ियां नहीं थीं, पर मेरे पास यह चार रत्न हैं, जिनका प्यार किसी भी दौलत से कहीं बढ़कर है। और सिद्धांत बेटा, तुमने जिस तरह मेरी बेटी के सम्मान और उसकी बहनों की भावनाओं का मान रखा है, उसने मेरा सिर फख्र से ऊंचा कर दिया।”
सिद्धांत ने ओंकारेश्वर जी के चरण स्पर्श किए और कहा, “बाबूजी, दौलत तो इंसान मेहनत करके कमा लेता है, लेकिन ऐसे संस्कार और ऐसा अटूट प्यार नसीब वालों को ही मिलता है। अनन्या जैसी गुणी जीवनसंगिनी पाकर मेरा घर धन्य हो गया है।”
हॉल में चारों बहनें एक-दूसरे से लिपट गईं। उनके चेहरे पर वही बचपन वाली निश्छल हंसी लौट आई थी। चारों ने मिलकर एक स्वर में कहा, “हम चारों एक जान हैं, और एक-दूसरे से बेइंतहा प्यार करते हैं!”
वह घर एक बार फिर हंसी, आंसुओं और अटूट पारिवारिक प्रेम की महक से सराबोर हो गया था। जहां सच्चा प्रेम और आपसी विश्वास होता है, वहां शक और लालच की कोई जगह नहीं बचती।
यह कहानी हमें सिखाती है कि पारिवारिक रिश्तों की सबसे बड़ी पूंजी एक-दूसरे के प्रति किया गया निस्वार्थ त्याग और आत्मीयता है। जब परिवार एक साथ खड़ा होता है, तो हर गलतफहमी और मुश्किल हंसी में तब्दील हो जाती है।
आपको अनन्या और उसकी बहनों के इस अटूट प्रेम और सिद्धांत के इस अनोखे सरप्राइज ने कैसा महसूस कराया? क्या आज के दौर में भी ऐसे रिश्तों की मिठास जीवित है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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