दरवाज़े के बाहर, सुमित्रा देवी का पूरा अस्तित्व जैसे काँप उठा था। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक चुकी थी। उनके सीने में एक ऐसा दर्द उठा, जिसने उनके भीतर जमे अविश्वास, स्वार्थ और संकीर्णता के सारे पहाड़ों को एक पल में ढहा दिया। उनकी आँखों से पश्चाताप के आँसू गंगा-जमुना की तरह बह निकले।
वे मन ही मन चीख उठीं, “हे ईश्वर! यह मैंने क्या करने की ठानी थी? मैं ममता का सौदा करने चली थी? जिस बच्चे ने मुझे अपनी सगी माँ से बढ़कर पूजा, जो मुझे अपनी दुनिया मानता रहा, मैं उसी के पीठ में छुरा घोंपने जा रही थी? समाज के तानों और अपने झूठे डर के पीछे अंधी होकर मैं माँ से डायन बनने जा रही थी!”
भोपाल के श्यामला हिल्स वाले उस पुराने और विशाल बंगले में अजीब सी ख़ामोशी पसरी हुई थी। वो ख़ामोशी, जो किसी तूफ़ान के आने से पहले हवा को भारी कर देती है। बैठक के बड़े से सोफ़े पर बैठीं 55 वर्षीया सुमित्रा देवी के चेहरे पर कठोरता की लकीरें खिंची हुई थीं। उनके हाथ में थामी हुई चाय की प्याली ठंडी हो चुकी थी, लेकिन अंदर सुलग रही चिंता की आँच ठंडी नहीं हुई थी। सामने एक फ़ाइल खुली थी, जिसके पन्नों पर दर्जनों संपत्तियों, दुकानों और बैंक खातों के ब्योरे लिखे थे।
“मिस्टर वर्मा, मैंने जो कहा है, बस वही होना चाहिए। कल सुबह ग्यारह बजे तक सारे दस्तावेज़ तैयार हो जाने चाहिए। मैं चाहती हूँ कि मेरे जीते-जी सब कुछ पूरी तरह साफ़ हो जाए।” सुमित्रा देवी ने फ़ोन के रिसीवर पर कड़े स्वर में कहा।
दूसरी तरफ़ पारिवारिक वकील मिस्टर वर्मा कुछ असहज थे। उन्होंने धीमी आवाज़ में हिचकिचाते हुए कहा, “भाभी जी, मैं पिछले पच्चीस सालों से स्वर्गीय देवेन्द्र जी के सारे कानूनी काम देखता आया हूँ। इस वसीयत में आपने अपने बड़े बेटे समर को पूरी तरह बाहर कर दिया है। देवेन्द्र जी की बनाई इस विशाल संपत्ति में से एक फूटी कौड़ी भी समर के नाम नहीं है। क्या यह फैसला जल्दबाज़ी में नहीं है? समर ने तो कभी…”
“वर्मा जी!” सुमित्रा ने उनकी बात बीच में ही काट दी। उनकी आवाज़ में तीखापन और अधिकार का ऐसा भाव था जिसने वकील को वहीं चुप करा दिया। “यह मेरा परिवार है और यह फैसला पूरी तरह मेरा है। कौन अपना है और कौन पराया, यह मुझे अच्छी तरह पता है। जो कहा है, वो कागज़ात तैयार रखिए। कल हस्ताक्षर होंगे।” इतना कहकर उन्होंने फ़ोन का चोंगा ज़ोर से पटक दिया।
सुमित्रा देवी गहरी साँस लेकर खिड़की के बाहर ताकने लगीं। देवेन्द्र जी के देहांत को अभी छह महीने ही हुए थे। देवेन्द्र जी के पहले विवाह से एक बेटा था—समर। जब समर महज़ चार साल का था, उसकी अपनी माँ एक असाध्य बीमारी के चलते गुज़र गई थीं। देवेन्द्र जी टूट गए थे, तब उनके जीवन में सुमित्रा का प्रवेश हुआ था। दो साल बाद उनके अपने बेटे, कबीर का जन्म हुआ।
सालों तक सब कुछ सामान्य चलता रहा, लेकिन समाज और रिश्तेदारों की कड़वी बातों ने धीरे-धीरे सुमित्रा के मन में एक अदृश्य डर का बीज बो दिया था। लोग अक्सर पीठ पीछे फुसफुसाते थे, “सौतेली माँ का बेटा कभी अपना नहीं होता। देखना, बड़ा होकर समर सारी दौलत हड़प लेगा और कबीर सड़क पर आ जाएगा।” यह डर सुमित्रा के अंतर्मन में दीमक की तरह बैठ गया था। उन्हें लगता था कि कबीर स्वभाव से सीधा, भावुक और दुनियादारी से अनजान है; अगर आज सब कुछ समर के हाथ में चला गया, तो कबीर का भविष्य सुरक्षित नहीं रहेगा। इसी असुरक्षा की भावना ने आज उन्हें ममता और स्वार्थ की उस अंधी दीवार के पीछे धकेल दिया था, जहाँ सही और गलत की पहचान खो जाती है।
अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही घर का माहौल बेहद तनावपूर्ण था। नाश्ते की मेज़ पर समर और कबीर दोनों बैठे थे, लेकिन सुमित्रा ने किसी से आँखें नहीं मिलाईं। समर अपनी फाइलों को समेट रहा था, जबकि कबीर गुमसुम सा अपनी प्लेट में चम्मच घुमा रहा था। ठीक पौने ग्यारह बजे बाहर कार का हॉर्न बजा।
वकील मिस्टर वर्मा हाथ में लेदर का मोटा ब्रीफ़केस लिए अंदर दाख़िल हुए। उनके चेहरे पर अब भी संकोच साफ़ झलक रहा था। सुमित्रा देवी ने उनका स्वागत किया और औपचारिकता निभाते हुए उन्हें बैठक में बिठाया।
“वर्मा जी, आप बैठिए। पानी भिजवाती हूँ। मैं ज़रा कबीर को बुला लाऊँ, ताकि उसके सामने ही सारी प्रक्रिया पूरी हो जाए।” सुमित्रा ने कहा और भारी कदमों से गलियारे की ओर बढ़ गईं।
कबीर का कमरा पहली मंज़िल के कोने में था। जैसे ही सुमित्रा सीढ़ियाँ चढ़कर कबीर के कमरे के पास पहुँचीं, दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ दिखा। अंदर से धीमी आवाज़ें आ रही थीं। सुमित्रा दरवाज़ा पूरा खोलने ही वाली थीं कि अंदर से समर की आवाज़ सुनकर उनके कदम अचानक ठिठक गए।
कमरे के अंदर कबीर रोने के करीब था। उसकी आवाज़ में गहरा आक्रोश और बेबसी थी। “भैया, आप इतने शांत कैसे रह सकते हैं? मुझे सब पता चल चुका है। माँ वकील वर्मा अंकल से मिलकर क्या करवा रही हैं, मुझे कल रात ही उनके कमरे के बाहर से अंदाज़ा हो गया था। वो पिताजी की पूरी संपत्ति, सारे शेयर्स, ये कोठी, यहाँ तक कि इंदौर वाली ज़मीन भी मेरे नाम कर रही हैं! आपको एक इंच ज़मीन भी नहीं दी जा रही है। क्या यह अन्याय नहीं है? आप बड़े हैं, पिताजी के काम को आपने संभाला है, फिर यह भेदभाव क्यों?”
सुमित्रा के दिल की धड़कन तेज़ हो गई। उनके माथे पर पसीने की बूँदें छलक आईं। उन्हें लगा कि अब समर अपने असली रूप में आएगा, अपनी माँ के खिलाफ ज़हर उगलेगा, गाली-गलौज करेगा या अदालत जाने की धमकी देगा। वह साँस रोके सुनने लगीं।
लेकिन समर की आवाज़ में न तो गुस्सा था, न कड़वाहट। उसने बेहद प्यार से कबीर के कंधे पर हाथ रखा और शांत भाव से कहा, “छोटे, चुप हो जा। तू अभी बहुत नादान है। दुनिया को सिर्फ़ कागज़ों और पैसों के तराज़ू में मत तौल। माँ जो भी कर रही हैं, अपनी समझ से हमारे भले के लिए ही कर रही हैं। उन्हें ज़िंदगी का तजुर्बा है। बड़ों के फैसलों पर इस तरह सवाल नहीं उठाते।”
“कैसा भला भैया?” कबीर लगभग चिल्ला पड़ा, “आपकी तो वो सौतेली माँ हैं न! सच तो यही है। अगर आप उनकी अपनी कोख से जन्मे होते, तो क्या वो आपके साथ ऐसा करतीं? वो केवल मुझसे प्यार करती हैं, आपसे सिर्फ़ दिखावा करती आई हैं। आज जब पिताजी नहीं रहे, तो उनका सौतेलापन सबके सामने आ गया!”
“कबीर!” समर की आवाज़ पहली बार इतनी गंभीर और सख्त हुई कि कमरे में सन्नाटा छा गया।
समर ने कबीर को अपने सीने से लगा लिया और भर्राए हुए गले से बोला, “छोटे, आज के बाद अपनी ज़बान से यह शब्द कभी मत निकालना। माँ कभी सगी या सौतेली नहीं होती। माँ तो सिर्फ़ माँ होती है, जो ईश्वर का साक्षात रूप बनकर धरती पर ममता बरसाती है। तू तो बहुत छोटा था, तुझे कुछ याद नहीं होगा। लेकिन मुझे वो सब याद है जो तू सोच भी नहीं सकता।”
दरवाज़े की ओट में खड़ी सुमित्रा के पाँव जैसे ज़मीन में गड़ गए।
समर आगे कह रहा था, “तुझे याद है जब मैं आठवीं कक्षा में था और मुझे जानलेवा टायफाइड हो गया था? डॉक्टर ने भी हाथ खड़े कर दिए थे। उस वक़्त माँ सात दिन और सात रात बिना सोए, बिना अन्न का दाना खाए मेरे सिरहाने बैठी रही थीं। अपनी हथेलियों से मेरे पैर मलती थीं और आँसुओं से भगवान के आगे गिड़गिड़ाती थीं कि ‘मेरे समर की उम्र मुझे दे दो प्रभु।’ क्या कोई सौतेली माँ किसी दूसरे के बच्चे के लिए अपनी जान दांव पर लगाती है? पिताजी जब मुझे किसी गलती पर डांटते थे या हाथ उठाने लगते थे, तो यही माँ अपनी देह आगे करके मुझे बचाती थीं। रोज़ सुबह मेरे टिफिन में मेरे पसंदीदा बेसन के लड्डू छुपाकर रखती थीं ताकि मुझे कमज़ोरी न लगे।”
समर की आँखों से आँसू छलक कर कबीर के कुर्ते पर गिर रहे थे। “कबीर, माँ ने मुझे माँ का आँचल दिया, मुझे पहचान दी, मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं अपने पैरों पर खड़ा हूँ। क्या उनकी इस ममता की कोई क़ीमत कागज़ के टुकड़ों से चुकाई जा सकती है? अगर माँ को लगता है कि सारी दौलत तेरे पास सुरक्षित रहेगी, तो मुझे इस बात की रत्ती भर भी तकलीफ़ नहीं है। मेरा भाई सुखी रहेगा, तो मैं समझूँगा कि मुझे दुनिया की सबसे बड़ी जागीर मिल गई। मेरी असली दौलत तो तू और माँ हैं। अगर तुम दोनों मेरे साथ हो, तो मैं झोपड़ी में भी राजा बनकर रहूँगा। मुझे दौलत नहीं चाहिए छोटे, मुझे सिर्फ़ माँ का वो हाथ अपने सिर पर चाहिए, जो हर मुश्किल में मेरी ढाल बनता रहा है।”
कमरे में सन्नाटा पसर गया था। कबीर अपने भाई के सीने से लगकर फूट-फूट कर रो रहा था।
और दरवाज़े के बाहर, सुमित्रा देवी का पूरा अस्तित्व जैसे काँप उठा था। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक चुकी थी। उनके सीने में एक ऐसा दर्द उठा, जिसने उनके भीतर जमे अविश्वास, स्वार्थ और संकीर्णता के सारे पहाड़ों को एक पल में ढहा दिया। उनकी आँखों से पश्चाताप के आँसू गंगा-जमुना की तरह बह निकले।
वे मन ही मन चीख उठीं, “हे ईश्वर! यह मैंने क्या करने की ठानी थी? मैं ममता का सौदा करने चली थी? जिस बच्चे ने मुझे अपनी सगी माँ से बढ़कर पूजा, जो मुझे अपनी दुनिया मानता रहा, मैं उसी के पीठ में छुरा घोंपने जा रही थी? समाज के तानों और अपने झूठे डर के पीछे अंधी होकर मैं माँ से डायन बनने जा रही थी!”
सुमित्रा को अपने आप से घिन आने लगी। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर शून्य में देखा और ईश्वर को धन्यवाद दिया कि आज उन्होंने सही समय पर उनके कानों में सच्चाई डाल दी, वरना वे ज़िंदगी भर अपने ही बनाए पाप के नरक में जलती रहतीं।
वे पीछे मुड़ीं, अपनी साड़ी के पल्लू से आँखों को पोंछा और सीधे कदमों से नीचे बैठक की ओर उतर आईं। उनके चेहरे पर अब कोई कठोरता नहीं थी, बल्कि एक ऐसी शांति और संकल्प था जो सिर्फ़ एक सच्ची माँ के चेहरे पर हो सकता है।
बैठक में वकील मिस्टर वर्मा कागज़ात निकालकर पेन तैयार रखे हुए थे। “आइए भाभी जी, यह रहा वसीयत का ड्राफ्ट। इस पर आपके हस्ताक्षर होते ही सब कानूनी रूप से पक्का हो जाएगा।”
सुमित्रा देवी सीधे मेज़ के पास पहुँचीं। उन्होंने एक भी पल गँवाए बिना उस ड्राफ्ट को उठाया और बीच से दो टुकड़े करते हुए उसे फाड़ दिया।
वकील भौंचक्के रह गए। “भाभी जी! यह आप क्या कर रही हैं? इतनी मेहनत से तैयार किए थे यह दस्तावेज़!”
तभी सीढ़ियों से उतरते हुए समर और कबीर भी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने माँ को कागज़ फाड़ते देखा, तो दोनों चौंक गए।
सुमित्रा आगे बढ़ीं और उन्होंने दोनों हाथ फैलाकर समर को अपने सीने से लगा लिया। उनका गला रुंधा हुआ था। “मुझे माफ़ कर दे मेरे बच्चे… मुझे माफ़ कर दे! मैं भटक गई थी। समाज की बातों ने मेरी आँखों पर पट्टी बाँध दी थी। मैं भूल गई थी कि औलाद कोख से नहीं, दिल के प्यार और संस्कारों से अपनी बनती है। तूने आज मुझे सिखा दिया कि माँ होना क्या होता है।”
समर की आँखों में भी आँसू आ गए। “माँ, आप यह क्या कह रही हैं? आपने हमें सब कुछ तो दिया है।”
सुमित्रा ने समर के माथे को चूमा और फिर कबीर का हाथ पकड़कर दोनों भाइयों के हाथों को आपस में मिला दिया। उन्होंने वकील मिस्टर वर्मा की तरफ़ देखकर दृढ़ स्वर में कहा,
“वर्मा जी, इन फटे हुए कागज़ों को कचरे के डिब्बे में डालिए और एक नया दस्तावेज़ तैयार कीजिए। स्वर्गीय देवेन्द्र जी की पाई-पाई, सारी ज़मीन-जायदाद, यह घर और सारा कारोबार मेरे दोनों बेटों—समर और कबीर में बिल्कुल बराबर-बराबर बाँटा जाएगा। और हाँ, उस वसीयत में यह भी साफ़ लिखिएगा कि इस पूरे परिवार का मुखिया और संरक्षक मेरा बड़ा बेटा समर होगा। जब तक बड़ा भाई मौजूद है, इस घर में कोई फैसला उसकी मर्ज़ी के बिना नहीं होगा।”
वकील साहब के चेहरे पर एक गहरी और आश्वस्त मुस्कान तैर गई। कबीर ने आगे बढ़कर अपने बड़े भाई और माँ दोनों के पैर छू लिए।
उस दिन भोपाल के उस पुराने बंगले की हवा में जो भारीपन था, वह हमेशा के लिए मिट चुका था। घर के मंदिर में जलता हुआ दीया पहले से कहीं अधिक रोशनी बिखेर रहा था, क्योंकि आज उस घर में सिर्फ़ संपत्ति का नहीं, बल्कि दिलों का बँटवारा नहीं, मिलन हुआ था—एक ऐसा मिलन, जिसे दुनिया की कोई दौलत कभी तोड़ नहीं सकती थी।
दोस्तों, जब रिश्तों की बुनियाद स्वार्थ और शक पर टिकती है, तो सबसे पहले परिवार बिखरते हैं। लेकिन जहाँ समर जैसा निस्वार्थ प्रेम और समझदारी हो, वहाँ नफ़रत के बड़े से बड़े मंसूबे भी घुटने टेक देते हैं। क्या आज के इस दौर में, जहाँ चंद पैसों और ज़मीन के टुकड़ों के लिए सगे भाई एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं, समर जैसे बेटे और भाई की सोच हर घर में नहीं होनी चाहिए? क्या सच में माँ कभी सगी या सौतेली हो सकती है, या माँ सिर्फ़ ममता की मूरत होती है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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