जलन – दीपा माथुर

आंटी ,कैसी है आप?

बालकनी से एक नन्ही आवाज सुनकर मै चौक गई।

आप?

मै तो यहां नई नई आई हु ना?

आप मुझसे बात करेंगी?

हा,क्यों नहीं उसकी बात का जवाब देते देते तुलसी की क्यारी में पानी डालने लगी।

आंटी देखिये मैने इस क्यूब के सारे कलर मैजिक से एक जगह कर लिए”

मै अनदेखा नहीं कर सकी ओर बोली ” अरे वाह आप तो बहुत इंटेलिजेंट हो?”

आपकी मम्मी कहा है?मेरे इतना पूछते ही वो खिलखिला पड़ी।

वो तो ऑफिस गई है तभी तो आपसे बात कर रही हु।”

तो अभी आपके साथ कौन है?

मेरे पूछते ही उसने क्यूब के रंगों को पुनः बिखेरते हुए बोला 

” कोई नहीं”

“मतलब आप अकेली”

इतना बोलते ही वो बोली :” हा”

जब स्कूल की छुट्टी होती है बस तब ही।

मै शॉक्ड हो गई।

फिर उससे पूछा :” तुम्हारे खाने का क्या होता है “

वो मम्मी टिफिन पैक कर देती है दो तीन बोतल पानी की भरकर रख देती है फ्रूट्स होते है।

खा लेती हु।

तुम शाम तक अकेली रहोगी?

नहीं आंटी मेरी दादी साहब तो अभी आने वाली है मैं उन्हीं का वेट कर रही हु।

ओह ,फिर थोड़ी राहत मिली।

आजकल के बच्चों का जीवन भी कैसा हो गया ?

पर बच्ची में भी कटस अकेली रह भी लेंगी खा भी लेंगी मेरी पीहू तो पानी भी अपने आप नहीं पी सकती ओर क्यों पिये मै हु ना?

फिर मैने उसकी तरफ देखा ओर पूछा :” तुम्हारा नाम?

वो जोर से बोली :’ मायरा”

ओर फिर चिल्लाई देखो आंटी मेरी दादी आ गई।

ओर अंदर की तरफ भाग गई।

मेरी निगाहें बालकनी से नीचे झांकने लगी।

एक बुजुर्ग सी महिला जिसकी ऐज करीब ५७ – ५८ ईयर होंगी फ्लैट की तरफ बढ़ रही थी बाल आधे सफेद आधे काले थे।

आंखों में चश्मा ओर साड़ी बहुत ही करीने से पहनी थी साइड में पर्स लटक रहा था।

फिर वो बच्ची भी नहीं दिखी ओर दादी भी नहीं।

पर मेरा मन बहुत बैचेन रहा।

क्या पैसों की इतनी वैल्यू हो गई कि लोग बच्चो को अकेला छोड़ कर जाने लगे।

मुंह बिदका कर मै अंदर आ गई।

तभी पिहू चिल्लाती हुई आई मम्मी आपको कितनी आवाजें देनी पड़ेगी मुझे प्यास लगी है।”

अगले ही पल तो मेरे मन में उस बच्ची के प्रति जलन होने लगी कितनी प्यारी प्यारी बाते करती हुई वो अपने खाने पीने का ध्यान खुद रख रही ओर उसी के बराबर की पीहू है बल्कि दो चार साल बड़ी ही होंगी पानी भी अपने हाथ से नहीं पीती।

शाम को मैने देखा कि मायरा गार्डन में अपनी दादी के साथ लुका छिपी खेल रही थी।

दादी कभी इस वृक्ष के पीछे छिपती कभी उस वृक्ष के पीछे मायरा उन्हें ढूंढती रहती ओर अंत में थप्पी कर देती।

पर छुपने का काम दादी ही कर रही थी आजकल सावधानी भी जरूरी है कही बच्ची छिपने के चक्कर में इधर उधर चली जाए तो?

तभी मायरा के घर पर नजर पड़ी ओर मन चंचल हो आया :” ये तो सोनम जैसी लग रही है।

उधर एक महिला चिड़ियों को पानी ओर दाना देने की व्यवस्था कर रही थी।

मेरे दिमाग में बार बार आ रहा था इसे कही देखा है।

फिर अचानक याद आया :” सोनम जैसी नहीं सोनम ही है।

कितना आत्मविश्वास उसके चेहरे से टपक रहा था।

एक यहां कोई कमी नहीं है पर फिर भी इस सोने के पिंजरे में फड़फड़ा रहे है उनकी मर्जी का तो कुछ नहीं चलता।

पर ये चुनाव भी तो मेरा ही था :” जब शादी हो रही थी तब सब हंसते थे। नौकर चाकर वाले घर में जा रही हो पत्ता भी नहीं हिलाना पड़ेगा।”.

तब कितनी खुश थी।

पत्ता तो आज भी हिलाना नहीं पड़ता पर इतने बड़े बिजनस मैंन की पत्नी हु तो हर कही जाना बातचीत करना भी 

तौहीनं समझी जाती रही है।

लेकिन मस्तिष्क की लहरें फिर सोनम की तरफ चल दी।

यें वही सोनम जिससे मेरी कभी नहीं बनी।

वो हर काम में परफेक्ट थी हर समय सबकी मदद करने को तत्पर रहती थी ।

उसके गुण उसके व्यक्तित्व का कवच बन गए थे।

हमने अपनी कॉलेज लाइफ हसी ठिठोली में गुज़ार दी ओर उसने अपने सपनों को साकार करने में।

मुझे याद है एक दिन तो एग्जाम समय में मैने उसकी कॉपी छीन ली।

टाइम होने वाला था ।

उसने बहुत मना किया था पर मैने एक सफाई से उसने बीच के दो पेज निकाल लिए थे।

टाइम होने के जस्ट पहले कॉपी दे दी।

उसे देखने का टाइम कहा मिला था?

तुरंत मेम ने ले ली थी।

पर मैं बहुत खुश थी।

मेरे मन में जो उसके प्रति जलन का भाव था उसने ठंडक पड़ गई थी।

उस सब्जेक्ट में सोनम के बहुत कम नबर थे ओर मेरे बहुत अधिक।

ओर यही वजह है कि बधाईयों का रुख सोनम की तरफ न होकर मेरी तरफ हो गया।

पर …

ऐसा लगा जैसे सोनम के कोई फर्क ही नहीं पड़ा।

मन ही मन तो मैं जलती थी पर ये भी जानती थी कि कोई किसी की कॉपी के पन्ने तो चोरी कर सकता है पर उसके भाग्य ओर हूनर ,मेहनत को नहीं बदल सकता 

यही वजह है कि सोनम आज मेरे सामने ऑफिसर पद पर है।

ओर मै बस किसी बड़े बिजनस मैन की पत्नी।

जिसके पास धन दौलत की कमी नहीं है पर अपनेपन की कमी है।

जहां इतनी दौलत हो वहां रिश्तों की कदर तो यदा कदा जगह हो होती है।

इसीलिए पीहू को अकेले संभालती हु।

क्योंकि नौकर के भरोसे छोड़ने का मेरा मन नहीं करता।

नीचे इतना बड़ा घर गार्डन है ऊपर के कमरे के कमरे की बालकनी से ही कभी कभी बाहर के दृश्य देखने को मिल जाते है।

अचानक सोनम की आवाज से चोक गई।

दीदी आप?

हा,मैने हामी में सिर हिलाया ओर नीचे मायरा की तरफ इशारा करती हुई बोली :” वो तुम्हारी बेटी है “

उसने मुस्कुरा कर कहा ;” हा वो मेरी सासू मां है और मायरा मेरी बेटी है।

इस फ्लैट कुछ दिनों से रहने आये है।

ओर इसके पापा?

मैने दूसरा सवाल पूछ डाला।।

सोनम वे तो बैंगलोर में किसी कम्पनी में काम करते है।

तुम अपनी बच्ची को अकेले छोड़ कर चली जाती हो?

मैने फिर पूछा :” हा,अब स्कूल की छुट्टी होती है तो क्या करे

मम्मी जी के रिटायरमेंट के दो तीन साल बाकी है जब तक तो यही व्यवस्था रहेंगी।

ना जाने क्यों आज सोनम के प्रति कोई जलन नहीं थी बल्कि

कोई बहुत दिल के करीब हो वैसी अपनी सी लगी ।

शायद अनुभवों का ही फर्क था।

पर उसके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं था।

मन में फिर विचारों ने करवट बदली ” , जैसा व्यक्तित्व होता है वैसा ही

सबका अपना अपना संघर्ष अपना अपना आसमां होता है।”

दीपा माथुर

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