कल्याणी देवी ने जोर-जोर से हंसते हुए कहा, “अरे जरा इधर तो देखो सब लोग! इसे देखो, यह है हमारे बड़े घर की बड़ी बहू का बायना! पुराने अखबार में लपेटकर भेजा है जैसे किसी भिखारी को दान दे रहे हों। यह पत्थर जैसे काले तिल के लड्डू और यह दो कौड़ी की सूती साड़ी! अरे समधन जी को शर्म भी नहीं आती। अगर इतनी ही कंगाली थी, तो बेटी को किसी मजदूर के पल्ले बांधते, हमारे बेटे के माथे क्यों मढ़ दिया? हमारे घर में तो कुत्ते भी ऐसे लड्डू न सूंघें!”
सुबह की पहली किरण जब हवेली की ऊंची खिड़कियों से छनकर आती, उससे बहुत पहले ही शारदा रसोई का मोर्चा संभाल चुकी होती थी। सिलबट्टे पर मसाले पीसने की धीमी आवाज, पीतल की केतली में खौलती अदरक वाली चाय की महक और घर के ठाकुर जी के मंदिर से आती अगरबत्ती की खुशबू, यह सब शारदा के अस्तित्व का हिस्सा बन चुका था। विवाह के तीन साल बीत चुके थे, पर शारदा के हिस्से में सिर्फ एक ही शब्द आया था—सहनशीलता।
मायके में वह तीन बहनों और दो भाइयों में सबसे बड़ी थी। पिता एक छोटे से कस्बे में कपड़े की फेरी लगाकर गृहस्थी चलाते थे। बचपन में जब भाई-बहनों में गुड़ की डली या कॉपी-किताब को लेकर झगड़ा होता, तो मां हमेशा शारदा के सिर पर हाथ रखकर कहती, “बड़ी है तू, थोड़ा झुक जा। घर समझौते से ही चलता है।” शारदा ने मां की इस सीख को अपनी आत्मा में बसा लिया था। जब विवाह की बात चली, तो लड़के वालों ने स्कूटर और पांच लाख नकद की मांग रख दी थी। शारदा ने बगावत की थी, उसने अपने पिता से साफ कहा था कि वह बिकने वाली चीज नहीं है। लेकिन पिता ने रोते हुए हाथ जोड़ लिए थे, “बेटी, समाज में इज्जत बचानी है तो यह दस्तूर निभाना ही पड़ता है। तू समझौता कर ले, वरना तेरी छोटी बहनों का ब्याह मुश्किल हो जाएगा।” अपने बूढ़े पिता के आंसुओं के आगे शारदा का स्वाभिमान हार गया था। उसने सिर झुकाकर समझौता कर लिया।
विवाह होकर वह इस बड़े से घराने में आई। पति आनंद स्वभाव के सीधे थे, पर मां के आगे कभी जुबान नहीं खोल पाते थे। सास कल्याणी देवी का मिजाज हुकूमत चलाने वाला था। शारदा ने आते ही घर की बागडोर संभाली। सुबह चार बजे से रात के ग्यारह बजे तक वह बिना किसी शिकायत के खटती रहती। कल्याणी देवी के घुटनों में दर्द रहता, तो वह घंटों तेल मालिश करती। ससुर जी के परहेज का खाना अलग बनाती। उसने अपनी हर इच्छा को घर की चौखट के भीतर ही दफन कर दिया था।
शादी के डेढ़ साल बाद परिवार में एक नया मोड़ आया। छोटे बेटे रोहन का विवाह हुआ। छोटी बहू रागिनी शहर के एक जाने-माने शराब और रियल एस्टेट कारोबारी की इकलौती बेटी थी। रागिनी के पास बड़ी-बड़ी डिग्रियां थीं, अंग्रेजी जुबान पर धाराप्रवाह थी और चाल-ढाल में एक रईसाना बेपरवाही थी। उसके साथ दहेज में जो सामान आया, उसने कल्याणी देवी की आंखें चौंधिया दीं। बड़ी गाड़ी, पचास तोले सोना, इटैलियन फर्नीचर और न जाने क्या-क्या।
रागिनी के आते ही हवेली की हवा बदल गई। रागिनी के कदम जैसे जमीन पर पड़ते ही नहीं थे। वह सुबह दस बजे से पहले अपने कमरे से बाहर नहीं निकलती थी। जब निकलती, तो हाथ में मोबाइल और चेहरे पर हल्का गुस्सा होता। लेकिन कल्याणी देवी का रवैया उसके लिए एकदम अलग था। वे खुद उसके लिए बादाम वाला दूध कमरे में भिजवातीं और नौकरों को हिदायत देतीं कि छोटी बहू की नींद में कोई खलल न पड़े।
इतना ही नहीं, रागिनी के मायके से हर महीने गाड़ी भरकर उपहार आते थे। कभी बासमती चावल की दर्जनों बोरियां, कभी शुद्ध देसी घी के टीन, कभी ड्राई फ्रूट्स के डब्बे तो कभी सोने-चांदी के सिक्के। जब भी रागिनी के मायके से कोई गाड़ी आती, कल्याणी देवी का सीना चौड़ा हो जाता। वे पूरे मोहल्ले में घूम-घूम कर बतातीं, “हमारे समधी जी तो दिल खोलकर लुटाते हैं। खानदानी रईस हैं ना, अपनी बेटी को रानी बनाकर रखा है और हमारे पूरे खानदान को निहाल कर दिया।”
दूसरी तरफ शारदा थी, जो बारहवीं के बाद अपने पिता की लाचारी देखकर आगे पढ़ नहीं पाई थी। वह भले ही कॉलेज की डिग्रियां न ला पाई हो, लेकिन मर्यादा, संस्कार और अपनों के दर्द को समझने की जो डिग्री उसके पास थी, वह किसी विश्वविद्यालय में नहीं मिलती। रूप-रंग में भी वह सादगी की मूरत थी, एक ऐसी सुंदरता जिसमें पवित्रता झलकती थी। लेकिन इस हवेली में इंसान का मोल उसके गुणों से नहीं, बल्कि उसके मायके की हैसियत से तय हो रहा था।
शारदा के मायके से भी तीज-त्योहार पर उपहार आते थे। उसके पिता अपनी औकात से बढ़कर अपनी बेटी के ससुराल मान-सम्मान भेजने की कोशिश करते। कभी बाजरे के लड्डू, कभी घर की बनी बेसन की चक्कियां और सूती साड़ियां। लेकिन कल्याणी देवी उन उपहारों को हाथ भी नहीं लगाती थीं। वे नौकरों के सामने ही उन्हें एक कोने में फिंकवा देतीं और कहतीं, “यह दरिद्रता का टोकरा हमारे घर में रखने लायक नहीं है। पता नहीं कैसे-कैसे लोग समधी बन गए।” शारदा यह सब देखती, उसका दिल छलनी हो जाता, आंखों में आंसू उमड़ आते, लेकिन वह चुपचाप कमरे में जाकर अपनी सिसकियों को दबा लेती। उसने फिर समझौता कर लिया था कि शायद किस्मत में यही लिखा है।
लेकिन किसी भी इंसान के सब्र का एक बांध होता है। और आज वह बांध टूटने वाला था।
आज करवा चौथ का पावन पर्व था। घर में चारों तरफ सजावट थी। दोपहर के वक्त रागिनी के मायके से ‘करवा चौथ का बायना’ आया। तीन बड़ी गाड़ियां सामान लेकर पहुंची थीं। काजू, पिस्ता, बादाम, महंगी बनारसी साड़ियां, सोने की चेन और चांदी के पूजा के बर्तन। पूरा ड्राइंग रूम उपहारों से भर गया था। कल्याणी देवी की खुशी का ठिकाना नहीं था। वे एक-एक साड़ी को हवा में लहरा-लहरा कर देख रही थीं और पास बैठी अपनी देवरानियों और ननदों को दिखा रही थीं, “देखो, इसे कहते हैं खानदानी लोगों का नजराना! मेरी छोटी बहू ने तो पूरे खानदान की तकदीर बदल दी।”
उसी समय एक कोने में एक पुराना सा खादी का झोला रखा हुआ था। वह झोला शारदा के छोटे भाई ने सुबह आकर चुपचाप दे दिया था। उसके पास भीतर आने की हिम्मत नहीं थी, क्योंकि पिछली बार कल्याणी देवी ने उसे दरवाजे पर ही बेइज्जत कर दिया था। उस झोले में शारदा की मां के हाथों की बनी गोंद की राब, तिल के लड्डू, एक सादी लाल चुनरी और पिता की मेहनत की कमाई से खरीदी गई पांच सौ रुपये की एक सूती साड़ी थी।
कल्याणी देवी की नजर उस झोले पर पड़ी। उन्होंने मुंह बिचकाते हुए उस झोले को अपनी पैर की उंगली से सरकाया और जोर से हंसीं। उन्होंने लड्डू का एक डिब्बा खोला, जो अखबार में लिपटा हुआ था।
कल्याणी देवी ने जोर-जोर से हंसते हुए कहा, “अरे जरा इधर तो देखो सब लोग! इसे देखो, यह है हमारे बड़े घर की बड़ी बहू का बायना! पुराने अखबार में लपेटकर भेजा है जैसे किसी भिखारी को दान दे रहे हों। यह पत्थर जैसे काले तिल के लड्डू और यह दो कौड़ी की सूती साड़ी! अरे समधन जी को शर्म भी नहीं आती। अगर इतनी ही कंगाली थी, तो बेटी को किसी मजदूर के पल्ले बांधते, हमारे बेटे के माथे क्यों मढ़ दिया? हमारे घर में तो कुत्ते भी ऐसे लड्डू न सूंघें!”
कमरे में ठहाका गूंज उठा। रागिनी सोफे पर बैठी चाय की चुस्कियां लेते हुए मुस्कुरा रही थी।
रसोई की चौखट पर खड़ी शारदा के कानों में जब ये शब्द पड़े, तो उसके पैरों के नीचे से जमीन नहीं खिसकी, बल्कि उसके भीतर कुछ बहुत जोर से चटका। वह जो बरसों से ‘समझौते’ की चादर ओढ़कर सोई हुई थी, वह एक झटके में उतर गई। उसने अपनी मां की कांपती उंगलियों को याद किया जो इन लड्डुओं को बनाते वक्त चूल्हे की आंच में जली होंगी। उसने अपने पिता के पसीने की उस बूंद को याद किया जो उस पांच सौ की साड़ी को खरीदने के लिए बही होगी।
शारदा के चेहरे का रंग बदल गया। उसकी आंखों में आंसू नहीं थे, बल्कि आत्मसम्मान की एक दहकती हुई ज्वाला थी। वह सधे हुए कदमों से आगे बढ़ी। उसने आगे बढ़कर कल्याणी देवी के हाथ से वह अखबार में लिपटा लड्डू का टुकड़ा धीरे से वापस ले लिया।
पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। कल्याणी देवी भौंचक्की रह गईं।
शारदा ने बड़े ही शांत लेकिन भारी स्वर में कहा, “मां जी, सम्मान करना सीखिए। जो हाथ देने वाले होते हैं ना, वे किसी के अहसान के नीचे नहीं दबते। मेरी मां ने इन लड्डुओं में अपनी ममता और मेरे पिता ने अपने पसीने की ईमानदारी डाली है। और जिस इंसान की नीयत में खोट हो, उसकी भूख कभी सोने के बर्तनों से भी नहीं मिट सकती।”
कल्याणी देवी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। वे सोफे से उठ खड़ी हुईं और चिल्लाईं, “तेरी यह मजाल! तू मेरे सामने जुबान लड़ा रही है? कल की आई छोकरी मुझे सिखाएगी कि सम्मान क्या होता है? भूल गई कि किस फटेहाल घर से आई है?”
“मैं कुछ नहीं भूली मां जी,” शारदा की आवाज में गजब का ठहराव और दृढ़ता थी, “मैं नहीं भूली कि मैं एक स्वाभिमानी और सच्चे परिवार से आई हूं। और आज मैं जुबान नहीं लड़ा रही, आज मैं उस सच को जुबान दे रही हूं जिसे आपने अपनी दौलत की हनक तले तीन साल से दबा रखा था।”
शारदा ने एक नजर रागिनी की तरफ डाली और फिर कल्याणी देवी की आंखों में आंखें डालकर बोली, “मां जी, आप रोज अपनी इस पूंजीपति बहू के मायके के गुण गाती हैं ना? आप रोज मुझे ताने देती हैं कि मेरे मायके से गाड़ियां भरकर सामान नहीं आता। तो आज मुझे एक बात का जवाब दीजिए। पिछले डेढ़ साल में, जब-जब आप बीमार पड़ीं, जब आपके घुटनों में इतना दर्द था कि आप बिस्तर से उठ नहीं पाती थीं, तब आपकी इस डिग्रियों और दौलत वाली बहू ने कभी आपको एक घूंट गर्म पानी भी पूछा? कभी उसने आपके सिर में तेल की एक बूंद लगाई?”
कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि सांसों की आवाज भी सुनी जा सकती थी।
शारदा रुकी नहीं, उसने आगे कहा, “सुबह चार बजे उठकर आपके लिए कड़वा काढ़ा मैं बनाती हूं। ससुर जी के बीपी और शुगर की दवाइयों का हिसाब मैं रखती हूं। आपके रिश्तेदारों के आने पर चौदह घंटे चूल्हे के सामने मेरा चेहरा जलता है। आपकी छोटी बहू तो दोपहर बारह बजे सज-धज कर केवल ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाती है। अगर दौलत ही सब कुछ होती मां जी, तो अपनी इस छोटी बहू से कहिए कि वह अपने मायके से आए उन काजू-बादामों से आपके पैर दबा दे! कहिए उन सोने की चूड़ियों से कि वे आपके लिए सुबह की चाय बनाकर ले आएं!”
कल्याणी देवी की जबान जैसे तालू से चिपक गई। वे अवाक होकर शारदा का चेहरा देख रही थीं।
शारदा ने अपनी लाल चुनरी को ठीक किया और सीधे ससुर जी और आनंद की तरफ देखा, जो अभी-अभी कमरे में दाखिल हुए थे। शारदा ने कहा, “आनंद जी, मैंने इस घर को मंदिर समझा, हर अपमान को यह सोचकर पी लिया कि परिवार में संतुलन बना रहे। लेकिन जहां मेरे मां-बाप के स्वाभिमान को पैरों तले रौंदा जाए, वहां मेरा यह समझौता खत्म होता है। अगर इस घर में मेरी सेवा, मेरे समर्पण और मेरी निष्ठा की कोई कीमत नहीं है, और सब कुछ दौलत की तराजू पर ही तौला जाना है, तो मुझे भी इस तराजू का हिस्सा नहीं बनना। कल से मैं अपनी गृहस्थी अलग बसा लूंगी। मैं मेहनत मजदूरी कर लूंगी, सुखी रोटी खा लूंगी, लेकिन अपने माता-पिता के आंसुओं का सौदा नहीं होने दूंगी। फिर देखती हूं कि आपकी यह हवेली मायके से आने वाले अनाजों और डिग्रियों के दम पर कैसे चलती है!”
इतना कहकर शारदा ने वह खादी का झोला अपने सीने से लगाया और अपने कमरे की तरफ मुड़ने लगी।
तभी एक सन्नाटे को चीरती हुई आवाज आई, “बहू… रुक जा!”
यह आवाज कल्याणी देवी की थी, लेकिन इस आवाज में वह पुराना घमंड नहीं था। वह आवाज कांप रही थी। शारदा के एक-एक शब्द ने कल्याणी देवी के अंतर्मन पर हथौड़े की तरह वार किया था। पिछले तीन सालों का पूरा दृश्य उनकी आंखों के सामने किसी चलचित्र की तरह घूम गया। कैसे जब उन्हें हैजा हुआ था, तो शारदा ने बिना घिन खाए उनके गंदे कपड़े धोए थे। कैसे जब वे रात को दर्द से कराहती थीं, तो शारदा अपनी नींद भूलकर रात भर उनके सिरहाने बैठी रहती थी। और रागिनी? रागिनी तो बदबू का बहाना बनाकर दूसरे कमरे में सोने चली गई थी।
कल्याणी देवी के पैरों तले से जमीन खिसक चुकी थी। उन्हें अपनी भूल का ऐसा अहसास हुआ जैसे कोई गहरी नींद से जागा हो। अगर शारदा चली गई, तो इस घर का चूल्हा ठंडा पड़ जाएगा। यह हवेली, हवेली नहीं रहेगी, ईंट-पत्थरों का एक वीरान ढेर बन जाएगी जहां कोई किसी का हाल पूछने वाला नहीं होगा।
कल्याणी देवी लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ीं और उन्होंने शारदा का हाथ पकड़ लिया। शारदा चौंक कर रुक गई।
कल्याणी देवी की आंखों से अविरल आंसुओं की धारा बह निकली। उन्होंने थरथराते हाथों से शारदा का हाथ अपने सिर पर रख लिया और रुंधे गले से बोलीं, “मुझे माफ कर दे बहू… मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची! आज तूने मेरी अंधी आंखों पर से दौलत की पट्टी उतार दी। मैं कितनी अंधी थी कि पत्थरों की चमक में उस हीरे को ठुकराती रही जो बिना किसी स्वार्थ के मेरे घर को रौशन कर रहा था।”
शारदा स्तब्ध रह गई। उसने कभी अपनी सास को इस रूप में नहीं देखा था।
कल्याणी देवी ने मुड़कर मेज पर रखे रागिनी के महंगे उपहारों को देखा और फिर शारदा के हाथ में थमे उस खादी के झोले को देखा। उन्होंने आगे बढ़कर उस झोले में से तिल का वह लड्डू निकाला, जो जमीन पर गिरते-गिरते बचा था। कल्याणी देवी ने बड़े आदर से उस लड्डू को अपनी आंखों से लगाया और उसका एक टुकड़ा अपने मुंह में रख लिया।
उनकी आंखों से आंसू टपक कर लड्डू पर गिर पड़े। वे रोते हुए बोलीं, “इस लड्डू में सचमुच ममता की मिठास है शारदा। तेरे पिता गरीब हो सकते हैं, लेकिन संस्कारों में वे हम सबसे बड़े अमीर हैं। उन्होंने अपनी सबसे अनमोल पूंजी, अपनी संस्कारी बेटी हमें सौंप दी, और हम अभागे उसकी कद्र नहीं कर पाए। तू कहीं नहीं जाएगी बहू। अगर तू इस घर से चली गई, तो यह कल्याणी जीती जी मर जाएगी। इस घर की असली मालकिन रागिनी की दौलत नहीं, तेरी सेवा और तेरा स्वाभिमान है।”
कमरे में मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं। रागिनी जो अब तक घमंड से बैठी थी, शर्म से उसका सिर झुक गया था। उसे भी पहली बार अहसास हुआ कि रिश्ते सिर्फ मायके के पैसों से नहीं, बल्कि खुद के समर्पण से कमाए जाते हैं। वह धीरे से उठी, शारदा के पास आई और धीरे से बोली, “दीदी… मुझे माफ कर दीजिए। मैंने कभी समझा ही नहीं कि एक बड़ी बहू और एक बेटी का क्या फर्ज होता है। आज आपने मुझे जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखा दिया।”
शारदा, जो संस्कारों की धनी थी, अपनी सास के आंसुओं को देख न सकी। उसने तुरंत झुककर कल्याणी देवी के चरण स्पर्श किए। कल्याणी देवी ने उसे उठाकर अपने सीने से भींच लिया।
उस दिन हवेली में एक नया सवेरा हुआ। वह करवा चौथ सिर्फ एक व्रत नहीं रहा, बल्कि उस घर में रिश्तों के पुनर्जन्म का दिन बन गया। उस दिन के बाद से कल्याणी देवी ने कभी किसी के मायके के उपहारों की तुलना नहीं की। हवेली में अब दो बहुएं थीं, लेकिन किसी की हैसियत उसके मायके के धन से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से आंकी जाती थी। शारदा को अब समझौते के सहारे नहीं जीना पड़ा, क्योंकि उसने अपने स्वाभिमान की रक्षा करके उस घर में अपनी वह जगह बना ली थी, जो किसी भी दौलत से कहीं ऊंची थी।
दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि आज के आधुनिक समाज में भी कई घरों में बहुओं का मान-सम्मान उनके मायके से आने वाले दहेज और उपहारों के आधार पर तय किया जाता है? क्या शारदा का अपने आत्मसम्मान और अपने माता-पिता की मर्यादा के लिए यूं आवाज उठाना सही था? अपनी अनमोल राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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