समर्पण की धूप

 सास-ससुर भी अपनी इस समझदार बहू पर जान छिड़कते थे। वे अक्सर कहते कि अनिका हमारे घर की बेटी बनकर आई है। कुछ सालों बाद उनके घर में किलकारी गूंजी और अनिका ने एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम उन्होंने आरव रखा। अब अनिका की व्यस्तता और अधिक बढ़ गई। बच्चे का लालन-पालन, उसकी परवरिश, उसके स्कूल का काम और साथ ही बुजुर्गों की सेवा। 

बरसात की एक भीगी शाम को बालकनी में खड़े होकर जब अनिका ने हाथ में थामी गर्म चाय की प्याली से उठती भाप को देखा, तो उसे अपने अतीत के वे सारे दिन चलचित्र की तरह याद आने लगे। गीली मिट्टी की सौंधी खुशबू में जैसे उसके गुजरे हुए बारह-तेरह सालों की यादें महक उठी थीं। कभी-कभी ज़िंदगी आपको सीधे रास्ते पर ले जाने के बजाय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर देती है, जहाँ चुनाव सही और गलत के बीच नहीं, बल्कि दो जिम्मेदारियों के बीच करना होता है। अनिका ने भी एक ऐसा ही चुनाव किया था, और आज उस बालकनी में खड़ी होकर वह मुस्कुरा रही थी, क्योंकि उसके जीवन की वह सांझ अब एक नए सवेरे में बदल चुकी थी।

बात तब की है जब अनिका ने अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई और इंटीरियर डिजाइनिंग का डिप्लोमा अव्वल दर्जे से पूरा ही किया था। उसके मन में अपने करियर को लेकर अनगिनत सपने थे, रंगों की दुनिया में अपनी पहचान बनाने का हौसला था। इसी दौरान उसके परिवार में उसके विवाह की चर्चा शुरू हुई। रिश्तेदार एक बहुत ही सुलझे हुए परिवार से देवेश का रिश्ता लेकर आए। देवेश एक निजी कंपनी में अच्छे पद पर था, शांत स्वभाव और जिम्मेदार इंसान। जब दोनों को अलग बैठकर बात करने का अवसर मिला, तो अनिका ने बिना किसी बनावट के सीधे अपने दिल की बात सामने रख दी थी।

अनिका ने हिचकिचाते हुए लेकिन स्पष्ट शब्दों में पूछा था, देवेश जी, मैंने डिजाइनिंग की पढ़ाई बहुत मेहनत से की है। क्या शादी के बाद अगर मैं अपना काम या कोई नौकरी शुरू करना चाहूँ, तो क्या मुझे इसकी इजाज़त होगी?

देवेश ने उस समय कोई झूठा दिखावा नहीं किया और न ही कोई हवाई वादा किया। उसने बड़ी संजीदगी से कहा था, अनिका, मैं सच कहूँगा। मेरे पिताजी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता और माँ अकेले पूरे घर की भागदौड़ संभालते हुए थक चुकी हैं। मेरा छोटा भाई अभी कॉलेज में है और मेरी नौकरी के घंटे बहुत लंबे हैं। इस समय हमारे घर को किसी ऐसी गृहलक्ष्मी की जरूरत है जो सबको एक धागे में पिरो सके, जो घर को अपनी ममता और सूझबूझ से संभाल ले। अगर तुम अभी तुरंत काम शुरू करोगी, तो शायद तुम भी पिस जाओगी और घर भी बिखर जाएगा। लेकिन यह हमेशा ऐसा नहीं रहेगा। ज़िंदगी में जब सही समय आएगा, परिस्थितियाँ अनुकूल होंगी, तो मैं खुद तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा। तुम उस वक्त जो करना चाहोगी, मैं तुम्हारा पूरा साथ दूँगा।

देवेश की यह खरी और ईमानदार बात अनिका के दिल को छू गई। उसने देखा कि देवेश ने उसे बहलाने के लिए कोई झूठी तसल्ली नहीं दी, बल्कि अपने परिवार की हकीकत उसके सामने रख दी। अनिका ने महसूस किया कि जो इंसान अपने माता-पिता और घर के प्रति इतना सच्चा और निष्ठावान है, वह कभी उसका भरोसा नहीं तोड़ेगा। उसने खुशी-खुशी इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया।

विवाह बहुत ही सादगी और पारिवारिक उल्लास के साथ संपन्न हुआ। नई नवेली दुल्हन बनकर जब अनिका उस घर में आई, तो उसने देवेश के शब्दों को सिर्फ सुना नहीं था, बल्कि उन्हें अपनी जिम्मेदारी मानकर जिया। ससुर जी की दवाइयों का समय याद रखना, सास के घुटनों के दर्द में उनके साथ बैठना, देवर की पढ़ाई-लिखाई का ध्यान रखना और देवेश की व्यस्त दिनचर्या में उसे मानसिक शांति देना—अनिका ने हर काम को पूरे मनोयोग से निभाया। उसने अपने डिग्रियों वाले कागजात को अलमारी के एक सुरक्षित कोने में सहेज कर रख दिया, मगर अपने भीतर की रचनात्मकता को कभी मरने नहीं दिया। वह घर के हर कोने को अपनी सुरुचि से सजाती, पर्दों के मेल से लेकर दीवारों के रंगों तक, उसने पूरे मकान को एक सुंदर आशियाना बना दिया।

सास-ससुर भी अपनी इस समझदार बहू पर जान छिड़कते थे। वे अक्सर कहते कि अनिका हमारे घर की बेटी बनकर आई है। कुछ सालों बाद उनके घर में किलकारी गूंजी और अनिका ने एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम उन्होंने आरव रखा। अब अनिका की व्यस्तता और अधिक बढ़ गई। बच्चे का लालन-पालन, उसकी परवरिश, उसके स्कूल का काम और साथ ही बुजुर्गों की सेवा। कई बार अनिका देर रात जब थककर बिस्तर पर जाती, तो उसे अपने कॉलेज के दिन याद आते, अपने वे स्केच याद आते जो उसने कभी बनाए थे। पर जब वह बगल में सोते हुए अपने बच्चे और देवेश के शांत चेहरे को देखती, तो उसकी सारी थकान मिट जाती। उसने कभी किसी से कोई शिकायत नहीं की, न कभी अपनी पढ़ाई का ताना किसी को दिया। उसने परिस्थितियों का सम्मान किया था।

वक़्त का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। धीरे-धीरे साल बीतते गए। आरव अब नौवीं कक्षा में पहुँच गया था और अपनी छोटी-मोटी ज़रूरतें खुद संभालने लगा था। देवर की पढ़ाई पूरी होकर उसकी अच्छी नौकरी लग गई थी और घर के आर्थिक हालात भी पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ हो चुके थे। ससुर जी का स्वास्थ्य भी अब काफी स्थिर था। घर में एक ठहराव आ चुका था, और उसी ठहराव के साथ अनिका के पास अब दिन में कुछ खाली समय बचने लगा था।

एक शाम जब घर के सभी लोग अपने-अपने कमरों में थे, अनिका ड्राइंग रूम में बैठकर डायरी में कुछ नए डिज़ाइन्स उकेर रही थी। तभी देवेश वहाँ आया और चुपचाप उसके बगल में बैठ गया। उसने देखा कि अनिका कितनी तन्मयता से उन रेखाओं में रंग भर रही थी।

देवेश ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और बहुत ही आत्मीय स्वर में कहा, अनिका, आज मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ। तुमने पिछले चौदह सालों में इस घर को जो दिया है, उसकी कीमत कोई नहीं चुका सकता। तुमने माँ-बाबूजी को संभाला, आरव को इतने अच्छे संस्कार दिए, और सबसे बढ़कर, उस दिन जब मैंने तुमसे वक्त माँगा था, तुमने बिना एक भी सवाल उठाए मेरी बात का मान रखा। तुमने अपने सपनों को पीछे रखकर हमारे परिवार को आगे बढ़ाया। लेकिन मैंने अपना वह वादा कभी नहीं भुलाया जो मैंने शादी से पहले तुमसे किया था।

अनिका ने चौंककर देवेश की तरफ देखा। देवेश की आँखों में गहरा प्रेम और कृतज्ञता थी। देवेश ने आगे कहा, अब आरव बड़ा हो गया है, घर में सब कुछ संभला हुआ है। अब तुम्हारा वक्त है। तुम जो करना चाहती थी, अपनी पहचान बनाना चाहती थी, अब उसे पूरा करो। कल से तुम अपनी इंटीरियर डिजाइनिंग की कंसल्टेंसी शुरू करने की तैयारी करो। जहाँ मेरी ज़रूरत हो, बताओ। पूरा परिवार अब तुम्हारे साथ खड़ा है।

अगले ही दिन जब नाश्ते की मेज पर देवेश ने यह बात अपने माता-पिता के सामने रखी, तो सास ने तुरंत अनिका का माथा चूम लिया और बोलीं, बहू, तूने इतने साल हमें संभाला है, अब क्या हम तेरा थोड़ा सा साथ नहीं दे सकते? घर की चिंता तू बिल्कुल छोड़ दे, आरव और रसोई हम देख लेंगे। तू अपने पैरों पर खड़ी हो, हमें तुझ पर गर्व होगा।

परिवार का ऐसा अगाध प्रेम और समर्थन पाकर अनिका की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। उसने समझा कि संयम और त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाते। जब आप अपनों के लिए सही समय पर झुकते हैं, तो अपने भी आपको उठाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं।

अनिका ने एक छोटी सी इंटीरियर फर्म के साथ फ्रीलांस काम करना शुरू किया। शुरुआती दिनों में जब उसे देर हो जाती, तो देवेश खुद रसोई में हाथ बंटाता, बेटा आरव माँ के आने से पहले घर का सामान समेट कर रखता। धीरे-धीरे अनिका के काम की तारीफ पूरे शहर में होने लगी। उसकी समझ, उसकी सादगी और घरों को सजाने का उसका हुनर लोगों को बहुत भाया। दो साल के भीतर ही उसने अपनी खुद की एक छोटी सी डिजाइनिंग एजेंसी खोल ली।

उद्घाटन के दिन, जब उसने अपने ऑफिस का फीता काटा, तो उसने पहली कैंची अपने सास-ससुर और देवेश के हाथों में थमा दी। उस पल अनिका को लगा कि उसने केवल अपने सपनों को ही नहीं पाया, बल्कि अपने पूरे परिवार के मान-सम्मान को एक नई ऊँचाई दी है। दोनों ने एक-दूसरे की भावनाओं और परिस्थितियों का जिस तरह आदर किया था, उसी का मीठा फल आज उनके पूरे जीवन में मिठास घोल रहा था।

जीवन में सब कुछ एक ही समय पर नहीं मिलता। कभी-कभी रिश्तों की खातिर अपने कदमों को कुछ पलों के लिए थामना पड़ता है, लेकिन अगर नीयत सच्ची हो और जीवनसाथी समझदार, तो समझौते कभी मजबूरी नहीं बनते बल्कि भविष्य की सबसे मजबूत बुनियाद बन जाते हैं। क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में रिश्तों को सफल बनाने के लिए समझदारी, धैर्य और एक-दूसरे के प्रति सम्मान ही सबसे बड़ी ताकत है? आपकी इस बारे में क्या राय है, हमें नीचे लिखकर जरूर बताएं।

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मूल लेखिका : नीरजा नामदेव

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