अपनों के आने की चमक

  कल्याणी जी बैठी हुई पूजा की थाली सजा रही थीं। उनकी आँखों में अपनों के आने की चमक थी। कुछ ही देर में मुख्य दरवाज़े पर ऑटो आकर रुका और उनकी छोटी बेटी नीलिमा अपने दोनों बच्चों के साथ उतरती दिखाई दी।

“अरे आ गई नीलिमा! कितनी देर कर दी तूने बेटा, सुबह से आँखें दरवाज़े पर ही टिकी थीं,” कल्याणी जी ने चेहरे पर खिली मुस्कान के साथ कहा और नाती-नातिन को गले से लगा लिया।

“क्या बताऊँ माँ, ससुराल में ननद रानी और उनके परिवार के लिए पकवान बनाते-बनाते ही दोपहर हो गई। वहां से छुट्टी मिली तो तुरंत गाड़ी पकड़कर भागी चली आ रही हूँ,” नीलिमा ने हाँफते हुए सोफे पर अपना हैंडबैग रखा और पानी का गिलास उठाते हुए पूछा, “बड़ी दीदी आई थीं क्या माँ? और अवनि भइया और नेहा भाभी कहाँ दिख नहीं रहे?”

“तेरी बड़ी दीदी अंजलि तो सुबह नौ बजे ही आई थी। बच्चों की पढ़ाई थी तो राखी बाँधकर, शगुन लेकर जल्दी निकल गई। और अवनि-नेहा अभी थोड़ी देर पहले ही अपनी ससुराल गए हैं, वहाँ नेहा के भाइयों को राखी बाँधने। बस आधा-पौना घंटा लगेगा, आ ही रहे होंगे। तब तक तू एक काम कर, पास वाली गली में जाकर पहले प्रणय और साक्षी से मिल आ। प्रणय सुबह से तीन बार पूछ चुका है कि नीलिमा कब तक पहुँचेगी,” कल्याणी जी ने सहज भाव से कहा।

नीलिमा के माथे पर हल्की सी शिकन उभर आई। उसने होंठ सिकोड़ते हुए कहा, “माँ, अभी वहाँ गई तो व्यर्थ का समय खराब होगा। साक्षी भाभी फिर चाय-नाश्ता और खाना खाने की मनुहार करने लगेंगी। उनका घर भी इतना छोटा है, गर्मी में बैठने का मन भी नहीं करता। मैं भइया के आने तक यहीं आराम करती हूँ, बाद में रस्म पूरी करने चली जाऊँगी।”

कल्याणी जी का चेहरा गंभीर हो गया। उन्होंने बेटी की ओर देखते हुए कहा, “बेटा, प्रणय भी तो तेरा सगा छोटा भाई है। बचपन में जिस भाई की उंगली पकड़कर तू स्कूल जाती थी, आज उसके घर जाने में तुझे संकोच हो रहा है? छोटा है तो क्या, उसका घर भी तो तेरा ही है।”

“अच्छा बाबा ठीक है, जा रही हूँ,” नीलिमा ने अनमने ढंग से उठते हुए अपने बड़े से ट्रॉली बैग में से एक बड़ा और भारी गिफ्ट पैक निकाला और कल्याणी जी की मेज पर रख दिया, “माँ, ये बैग यहीं रख दो। इसमें अवनि भइया के लिए ब्रैंडेड सिल्क का कुर्ता-पायजामा और भाभी के लिए डिज़ाइनर कांजीवरम साड़ी है। पिछले महीने ही मैंने दिल्ली के एक बड़े मॉल से खरीदी थी।”

कल्याणी जी ने उस बड़े से पैकेट को देखा और फिर नीलिमा के हाथों की तरफ नज़र दौड़ाई, जहाँ केवल एक छोटी सी प्लास्टिक की डिब्बी थी जिसमें दो साधारण राखियाँ और एक पाव काजू कतली का डिब्बा रखा था।

कल्याणी जी का दिल अंदर तक भर आया। उन्होंने खुद को रोकते हुए पूछा, “और प्रणय के लिए क्या लाई है? उसके और साक्षी के लिए कोई कपड़ा या तोहफ़ा नहीं लिया तूने?”

नीलिमा ने बड़ी बेपरवाही से कंधे उचकाते हुए जवाब दिया, “माँ, आप भी कैसी बातें करती हो! अवनि भइया पूरे शहर के जाने-माने आर्किटेक्ट हैं। उनका अपना बड़ा फ़र्म है। वो हर त्योहार पर मुझे सोने-चाँदी के सिक्के, महँगे तोहफ़े और दस-बीस हज़ार का लिफ़ाफ़ा थमाते हैं। तो उनके मान-सम्मान के हिसाब से मुझे भी तो कुछ ख़ास देना पड़ेगा ना! अब प्रणय क्या देता है? वही फटा-पुराना पाँच सौ या हज़ार का नोट! जब उसका बजट ही इतना है, तो मैं हज़ारों रुपये उसके ऊपर क्यों फूँकूँ? जो जैसा देता है, उसे वैसा ही तो लौटाया जाता है। दुनियादारी इसी को कहते हैं माँ।”

कल्याणी जी के सीने में एक टीस उठी। उन्होंने नीलिमा की आँखों में झांकते हुए बड़ी नर्मी से कहा, “बेटा, भाई-बहन का रिश्ता कोई बाज़ार की दुकान नहीं है जहाँ तराज़ू पर तौलकर प्यार खरीदा जाए। भाई छोटा हो या बड़ा, अमीर हो या ग़रीब, बहन के लिए तो दोनों की कलाई का मोल एक जैसा होना चाहिए।”

पर नीलिमा ने माँ की बातों को अनसुना कर दिया। उसके दिमाग में पैसे की चमक और स्टेटस का घमंड इस कदर हावी था कि उसे अपने छोटे भाई की मजबूरियाँ दिखाई ही नहीं देती थीं।

असल में, पिछले एक साल से प्रणय की ज़िंदगी में काफी उथल-पुथल मची हुई थी। जिस ऑटोमोबाइल कंपनी में वह बतौर सीनियर सुपरवाइज़र काम कर रहा था, वह अचानक भारी घाटे के चलते बंद हो गई थी। प्रणय अचानक बेरोज़गार हो गया था। घर का किराया, बूढ़ी माँ की दवाइयों का आधा खर्च और रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करने के लिए वह दिन-रात संघर्ष कर रहा था। इन दिनों वह एक छोटी सी लॉजिस्टिक्स कंपनी में मामूली पगार पर अस्थाई नौकरी कर रहा था और देर रात तक नई नौकरी की तलाश में इंटरव्यू की तैयारी करता था। उसकी पत्नी साक्षी भी एक छोटे प्ले-स्कूल में पढ़ाकर घर का सहारा बनने की कोशिश कर रही थी। इसके विपरीत, बड़ा बेटा अवनि अपनी रियल एस्टेट और आर्किटेक्चरल कंसल्टेंसी से लाखों रुपये महीने कमा रहा था।

नीलिमा कुछ ही मिनटों में प्रणय के किराए के छोटे से दो कमरों वाले मकान में पहुँची। दरवाज़ा साक्षी ने खोला। जैसे ही उसने नीलिमा को देखा, उसका चेहरा खिल उठा, “अरे दीदी! आइए, आइए! प्रणय कब से आपकी राह देख रहे थे।”

प्रणय अंदर के कमरे से भागता हुआ आया, “अरे नीलू! आ गई तू! मुझे लगा कहीं तू सीधे भइया के पास ही तो नहीं रुक गई।”

प्रणय के चेहरे पर अपनी बहन को देखकर जो खुशी थी, वह किसी अनमोल खज़ाने से कम नहीं थी। उसने तुरंत अपनी पत्नी से कहा कि दीदी के लिए शिकंजी और गर्म पकौड़े बनाए। लेकिन नीलिमा बिना मन के सोफे के एक कोने पर बैठ गई। उसने इधर-उधर नज़र घुमाई और पंखे की धीमी हवा पर नाक-भौं सिकोड़ने लगी।

“प्रणय, जल्दी कर लो, मुझे बड़े भइया के यहाँ भी जाना है और शाम को घर लौटना है,” नीलिमा ने घड़ी देखते हुए रूखे स्वर में कहा।

प्रणय चुपचाप मुस्कुराते हुए सामने रखी चौकी पर बैठ गया। नीलिमा ने रस्म अदायगी की तरह उसकी कलाई पर राखी बाँधी, माथे पर तिलक लगाया और एक छोटा सा काजू कतली का टुकड़ा उसके मुँह में डाल दिया। प्रणय ने श्रद्धा से झुककर अपनी बड़ी बहन के पैर छुए। फिर उसने अपनी जेब से एक साधारण सा सफ़ेद लिफ़ाफ़ा निकाला और नीलिमा के हाथ में थमा दिया।

नीलिमा ने लिफ़ाफ़ा खोलकर देखा, उसमें पाँच-पाँच सौ के दो नोट थे—कुल एक हज़ार रुपये। नोटों को देखते ही नीलिमा के चेहरे का रंग उड़ गया। उसके होंठों पर एक तल्ख मुस्कुराहट तैर गई जिसे वह छिपा न सकी।

“दीदी, बस दो मिनट बैठिए, मैंने आपके पसंद की खीर बनाई है,” साक्षी रसोई से हाथ पोंछते हुए बाहर आई।

“नहीं भाभी, मुझे बिल्कुल भूख नहीं है। और मुझे बहुत से काम हैं, अवनि भइया इंतज़ार कर रहे होंगे,” यह कहते हुए नीलिमा लिफ़ाफ़ा अपने पर्स में ठूँसकर तेज़ी से बाहर निकल गई। साक्षी और प्रणय दरवाज़े पर खड़े एक-दूसरे का मुँह ताकते रह गए। प्रणय की आँखों में एक गहरी उदासी उतर आई, जिसे उसने अपनी पत्नी से छिपाने के लिए नज़रों को झुका लिया।

शाम को जब अवनि और नेहा अपनी ससुराल से वापस लौटे, तो घर का माहौल बिल्कुल बदल गया। नीलिमा का चेहरा खिलखिला उठा। उसने बड़े ही उत्साह से आरती का थाल सजाया, रेशम की महँगी राखी निकाली और अवनि की कलाई पर बाँधी। अवनि और नेहा के लिए जो महँगे कपड़े वह लाई थी, उन्हें बड़े गर्व से सबके सामने खोला और उनकी खूबियाँ गिनाने लगी।

अवनि ने भी अपनी रईसी के मुताबिक नीलिमा को एक नया स्मार्टफोन और इक्कीस हज़ार रुपये का शगुन का लिफ़ाफ़ा थमाया। नेहा ने भी उसे एक महँगी कलाई घड़ी उपहार में दी। उपहार पाकर नीलिमा फूली नहीं समा रही थी। वह बार-बार अपने तोहफ़ों को उलट-पलट कर देख रही थी और अपनी बड़ी भाभी की तारीफ़ों के पुल बाँध रही थी।

रात को विदाई की बेला आई। जब नीलिमा जाने लगी, तो कल्याणी जी कमरे से बाहर आईं। हमेशा की तरह नीलिमा को उम्मीद थी कि माँ उसे विदाई में कोई नई साड़ी, शगुन के पैसे या कोई सोने-चाँदी की चीज़ ज़रूर देंगी, जैसा कि वह हर साल दोनों बेटियों को देती आई थीं।

लेकिन इस बार कल्याणी जी ने केवल आगे बढ़कर नीलिमा के सिर पर हाथ रखा और शांत स्वर में कहा, “सदा सुहागन रहो बेटा, अपने घर में खुश रहो।” इसके अलावा उन्होंने न तो कोई लिफ़ाफ़ा दिया और न ही कोई कपड़े की थैली।

नीलिमा को बहुत अजीब लगा। उसे लगा शायद माँ भूल गई होंगी, लेकिन उसने उस समय पूछना ठीक नहीं समझा और मन में हल्की सी खीझ लेकर अपने ससुराल लौट गई।

अगले दिन सुबह-सुबह नीलिमा ने अपनी बड़ी बहन अंजलि को फोन किया। बातों-बातों में जब राखी के लेन-देन की बात छिड़ी, तो अंजलि खुशी से चहकते हुए बोली, “अरे नीलू, माँ ने इस बार मुझे बहुत ही खूबसूरत चंदेरी सिल्क की साड़ी दी है और साथ में शगुन के पूरे पाँच हज़ार रुपये भी दिए। पापा की पुरानी सेविंग्स में से माँ ने हम दोनों के लिए कुछ रखा था ना, वही दिया।”

यह सुनते ही नीलिमा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसका खून खौल उठा। उसने बिना एक पल गँवाए तुरंत कल्याणी जी का नंबर मिलाया।

फोन उठते ही नीलिमा बिफर पड़ी, “माँ! आपने मेरे साथ ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों किया? अभी दीदी से मेरी बात हुई, आपने उन्हें इतनी महँगी चंदेरी साड़ी और पाँच हज़ार रुपये का शगुन दिया, और मुझे कल खाली हाथ विदा कर दिया? सिर्फ सूखा आशीर्वाद देकर टाल दिया! क्या मैं आपकी सगी बेटी नहीं हूँ? आपने हम दोनों बहनों में इतना बड़ा भेदभाव क्यों किया माँ? आपको अंदाज़ा भी है कि मुझे कितना बुरा लगा है?” नीलिमा का गला रुंध गया था और उसकी आवाज़ में गहरा आक्रोश था।

फोन के दूसरी तरफ कल्याणी जी बिल्कुल शांत थीं। उन्होंने एक गहरी साँस ली और बड़े ही धीमे लेकिन दिल को चीर देने वाले स्वर में कहा:

“बेटा नीलिमा, मैंने तो सिर्फ एक बार तुम दोनों बहनों के शगुन में थोड़ा सा अंतर किया, और इतने में ही तेरा कलेजा छलनी हो गया? तुझे इतना बुरा लग गया कि तू सुबह-सुबह अपनी माँ पर पक्षपात का इलज़ाम लगाने लगी? ज़रा छाती पर हाथ रखकर सोच बेटा, जो ज़ख्म तू हर साल, हर त्योहार पर अपने उस छोटे भाई प्रणय के सीने पर देती है, उसके दिल पर क्या बीतती होगी?”

नीलिमा सन्न रह गई। उसकी ज़बान जैसे तालू से चिपक गई।

कल्याणी जी आगे बोलीं, “कल जब तू आई, तो अवनि के लिए लाखों की तरह सज-धज कर आई थी, क्योंकि वह अमीर है, वह तुझे बड़ा शगुन देता है। और प्रणय के लिए तेरे पास न प्यार था, न सम्मान और न ही उसके लिए कोई तोहफ़ा। तूने कभी सोचा कि उस प्रणय ने अपनी पहली तनख्वाह मिलने पर सबसे पहले अपनी दोनों बहनों के लिए कान की बालियाँ बनवाई थीं? बचपन में जब तुम दोनों स्कूल जाती थीं, तो वही प्रणय अपनी गुल्लक फोड़कर तुम दोनों के लिए पसंदीदा रंग-बिरंगी राखियाँ और चॉकलेट लाता था। आज उसकी कंपनी बंद हो गई, वह वक्त की मार झेल रहा है, तो अचानक तेरा भाई तेरे लिए पराया और कमतर हो गया?”

माँ के एक-एक शब्द हथौड़े की तरह नीलिमा के कानों में गूँज रहे थे।

“बेटा, दौलत तो आज है, कल नहीं रहेगी। पैसा ढलती हुई धूप की तरह होता है, आज एक के आँगन में है तो कल दूसरे के छत पर। लेकिन जो अपमान और तिरस्कार तूने अपने भाई को उसकी तंगहाली में दिया है ना, वह उसके मन में नासूर बनकर हमेशा टीसता रहेगा। तूने भाई के निस्वार्थ प्यार को बाज़ार का सौदा बना दिया नीलिमा। मैंने तो सिर्फ तुझे यह अहसास कराने के लिए कल शगुन नहीं दिया कि जब अपनों से भेदभाव का सामना करना पड़ता है, तो आत्मा कितनी रोती है।”

कल्याणी जी की आवाज़ भर्रा गई थी। फोन पर सन्नाटा छा गया। नीलिमा की आँखों से आँसुओं की धार बह निकली।

उसे अपनी आँखों के सामने वो सारे दृश्य घूमने लगे जब वह बचपन में प्रणय के साथ आँगन में खेला करती थी। जब भी नीलिमा को चोट लगती थी, तो प्रणय रो पड़ता था। वही प्रणय आज जब आर्थिक तंगी से जूझ रहा था, तो उसने अपनी सीमित आमदनी में से भी एक हज़ार रुपये बचाकर अपनी बहन के मान-सम्मान के लिए लिफ़ाफ़े में रखे थे। और उसने उस लिफ़ाफ़े को देखकर मुँह बनाया था!

नीलिमा को अपनी गिरी हुई सोच, अपने झूठे अहंकार और पैसों की इस अंधी दौड़ पर बेइंतहा शर्मिंदगी महसूस होने लगी। उसका दिल आत्मग्लानि से भर गया।

उसने कांपती हुई आवाज़ में रोते हुए कहा, “माँ… मुझे माफ कर दो माँ! मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया। मेरी आँखों पर पैसों की ऐसी पट्टी बँध गई थी कि मुझे अपने ही सगे भाई का तड़पता हुआ दिल नहीं दिखा। मैं रिश्तों को पैसों की तराज़ू में तौलने लगी थी माँ। आपने आज मेरी आँखें खोल दीं। अगर आज आपने मुझे यह आईना न दिखाया होता, तो शायद मैं कभी इंसान ही नहीं बन पाती।”

“सच्ची माफी मुझसे नहीं बेटा, उस भाई से माँगना जिसका दिल तूने दुखाया है,” कल्याणी जी ने नम आँखों से कहा।

नीलिमा ने फोन रखा और तुरंत अलमारी खोली। उसने अपनी बचत में से पैसे निकाले, बाज़ार गई और प्रणय के लिए एक बहुत सुंदर कुर्ता, साक्षी भाभी के लिए एक मनपसंद साड़ी और बच्चों के लिए ढेर सारे खिलौने और मिठाइयाँ खरीदीं।

दोपहर की तपती धूप की परवाह किए बिना वह सीधे प्रणय के घर पहुँची।

दरवाज़ा प्रणय ने ही खोला। सामने अपनी बहन को हाथों में ढेर सारे थैले लिए और आँखों में आँसू भरे देखकर वह घबरा गया, “अरे नीलू! क्या हुआ? सब ठीक तो है ना? तू रो क्यों रही है? किसी ने कुछ कहा क्या?”

नीलिमा ने सारे थैले ज़मीन पर रख दिए और आगे बढ़कर अपने छोटे भाई के गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगी।

“मुझे माफ कर दे मेरे भाई! तेरी इस बहन का दिल बहुत छोटा हो गया था। मैं भूल गई थी कि राखी का धागा रेशम का होता है, किसी नोट की गड्डी का नहीं। मैं बहुत स्वार्थी हो गई थी प्रणय, मुझे माफ कर दे।”

प्रणय की आँखों से भी आँसू छलक पड़े। उसने अपनी बड़ी बहन के सिर पर हाथ रखा और बोला, “दीदी, पगला गई हो क्या? भला भाई भी अपनी बहन से कभी नाराज़ होता है? मेरे लिए तो तुम्हारा आना ही दुनिया की सबसे बड़ी दौलत है।”

साक्षी ने आकर नीलिमा के आँसू पोंछे और उसे पानी पिलाया। उस दिन उस छोटे से किराए के मकान में जो मिठास घुली, वह किसी महँगे महल में भी नहीं मिल सकती थी। नीलिमा ने अपने हाथों से प्रणय और साक्षी को खाना परोसा और शाम तक हँसते-खिलखिलाते हुए बचपन की यादें ताज़ा करती रही।

घर के बँटवारे, दूरियाँ और तल्खियाँ तब खत्म हो जाती हैं जब दिल से पैसों का मैल धुल जाता है। नीलिमा अब समझ चुकी थी कि रिश्ते किस्मत से मिलते हैं और उनका मोल दुनिया की किसी भी दौलत से नहीं चुकाया जा सकता।

आज के इस भौतिकवादी युग में हम अक्सर लोगों की कद्र उनकी जेब और उनकी हैसियत देखकर करने लगते हैं। यहाँ तक कि भाई-बहन के सबसे पवित्र रिश्ते में भी लेन-देन और दिखावे की दीमक लग जाती है।

क्या आपको भी लगता है कि त्योहारों पर उपहारों और शगुन की होड़ ने रिश्तों के निस्वार्थ प्रेम को पीछे धकेल दिया है? क्या आपके आस-पास भी कभी किसी ने अपनों के बीच ऐसा फर्क महसूस किया है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर साझा करें।

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लेखिका : सविता गोयल

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