ममता की धूप और भोर की नई किरण

 आज राघव के बत्तीसवें जन्मदिन पर जब वे लड्डू बाँट रही थीं, तभी आश्रम के बाहर एक चमचमाती बड़ी गाड़ी आकर रुकी। गाड़ी का दरवाजा खुला और उसमें से राघव उतरा। उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं, कपड़े अस्त-व्यस्त थे और आँखों में गहरा पछतावा था। आश्रम के लोगों में कानाफूसी शुरू हो गई।

राघव तेजी से कदमों से आँगन की ओर बढ़ा और जानकी के पैरों में गिर पड़ा। वह फफक-फफक कर रोने लगा, माँ! मुझे माफ कर दो माँ! मैं अंधा हो गया था। सुनैना मुझे छोड़कर अपने मायके चली गई है। उसने मुझ पर झूठे केस करने की धमकी दी है। जब विपत्ति आई, तब मुझे समझ आया कि इस पूरी दुनिया में सिर्फ एक तुम ही थीं जो मुझसे बिना किसी स्वार्थ के प्यार करती थीं। माँ, घर चलो। तुम्हारे बिना वह घर श्मशान बन गया है। मैं तुम्हें लेने आया हूँ।

फाल्गुन की गुनगुनी धूप वृद्धाश्रम के विशाल आँगन में बिछी हुई थी। नीम के पुराने दरख्त की छाँव में बैठी जानकी देवी अपनी काँपती हथेलियों से पीले केसरी रंग के बेसन के लड्डू एक-एक कर स्टील की तश्तरी में सजा रही थीं। उनके चेहरे पर समय की लकीरें गहरी थीं, मगर आँखों में एक अजब सी उदासी भरी चमक तैर रही थी। सफेद सूती साड़ी के पल्लू से अपनी आँखों का कोना पोंछते हुए उन्होंने पास बैठी सरला जी की ओर एक लड्डू बढ़ाया और धीमी, स्नेहभरी आवाज में कहा, लो दीदी, मुँह मीठा करो। आज मेरे राघव का जन्मदिन है। पूरे बत्तीस साल का हो गया मेरा लल्ला।

पास बैठी कल्याणी जी ने गहरी साँस भरी और जानकी देवी का थरथराता हाथ अपने हाथों में थामते हुए रुंधे गले से कहा, जानकी, तुम भी किस मिट्टी की बनी हो बहन? वही राघव जिसने छह महीने पहले तुम्हें इस आश्रम के गेट पर यह कहकर छोड़ दिया था कि शहर के फ्लैट में तुम्हारे लिए अलग कमरा नहीं है… वही बेटा जो आज तक मुड़कर यह देखने भी नहीं आया कि उसकी माँ जिंदा भी है या नहीं, तुम आज भी उसी के नाम पर लड्डू बाँट रही हो? उसने तो अपनी दुनिया से तुम्हारा वजूद ही मिटा दिया, फिर यह ममता कैसी?

जानकी देवी के होंठों पर एक फीकी, मद्धम मुस्कान तैर गई। वे शून्य में ताकते हुए बुदबुदाईं, दीदी, बेटा अपनी औलाद होने का फर्ज भूल सकता है, पर एक माँ अपनी कोख की तड़प कैसे भूल सकती है? आज बाईस फरवरी है। यही वह तारीख थी जब मेरी सूनी गोद में जिंदगी की सबसे बड़ी सौगात आई थी। कैसे भूल जाऊँ वह दिन जब मुझे पहली बार ‘माँ’ कहकर पुकारा गया था?

जानकी जी की आँखें अतीत के झरोखों में तैरने लगीं। शादी के बाद पूरे ग्यारह साल तक उनके आँगन में किसी बच्चे की किलकारी नहीं गूँजी थी। उस दौर में छोटे से कस्बे में एक निःसंतान स्त्री का जीवन किसी जीवित लाश से कम नहीं होता था। ससुराल वाले हर सुबह नए ताने के साथ उनका स्वागत करते थे। सास कौशल्या देवी हर पूजा-पाठ में उन्हें अशुभ मानकर किनारे कर देती थीं। देवरानी-जेठानी अपने बच्चों को जानकी की गोद में देने से कतराती थीं, मानो उनकी नजर लगते ही बच्चे बीमार पड़ जाएँगे। पति महेश चंद्र यूँ तो बुरे इंसान नहीं थे, पर समाज और माँ के भारी दबाव के आगे उनका पौरुष भी मौन हो जाता था।

घर में फुसफुसाहटें शुरू हो गई थीं कि खानदान का चिराग बुझने नहीं दिया जा सकता, महेश का दूसरा ब्याह कराना ही होगा। एक दिन जब जानकी ने रसोई में अपनी सास को कहते सुना कि गाँव के जमींदार की छोटी बेटी से बात पक्की हो रही है, तब उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई थी। वे रात-रात भर कुलदेवी की तस्वीर के आगे रोतीं, अपनी हथेलियों को छाती से भींचकर यही गुहार लगातीं कि हे ईश्वर, या तो मेरी गोद भर दे या मेरी साँसें छीन ले।

और फिर वह चमत्कार हुआ। जब उम्मीद की आखिरी किरण भी दम तोड़ रही थी, वैद्य जी ने जानकी की नब्ज थामकर मुस्कुराते हुए खुशखबरी सुनाई। उस दिन लगा मानो तपती बंजर जमीन पर अमृत बरस गया हो। जो सास कल तक जानकी की परछाईं से बचती थीं, वे खुद बादाम का हलवा बनाकर उनके कमरे में लाने लगीं। जो पति दूसरी शादी की तैयारियों पर आँखें मूँदे बैठा था, वह जानकी के पैरों में तेल लगाने लगा। ग्यारह साल की उपेक्षा, तिरस्कार और अपमान एक झटके में आदर और दुलार में बदल गए। समाज का यह दोहरा चेहरा जानकी ने उसी दिन अपनी अंतरात्मा में दर्ज कर लिया था कि यहाँ कद्र इंसान की नहीं, उसकी उपयोगिता और वंश की होती है।

प्रसव की वह रात जानकी को आज भी रूह तक याद थी। कड़ाके की ठंड थी और बाहर घनघोर ओलावृष्टि हो रही थी। कस्बे के छोटे से अस्पताल में बिजली गुल थी। दर्द इतना भयानक था कि जानकी की चीखें अस्पताल की दीवारों से टकराकर लौट रही थीं। अट्ठाईस घंटे तक वे जिंदगी और मौत के झूले में झूलती रहीं। जब डॉक्टर ने भी कह दिया कि जच्चा या बच्चा में से किसी एक को ही बचाया जा सकता है, तब जानकी ने अपने पति का हाथ पकड़कर अंतिम साँस की तरह कहा था, महेश जी, मुझे कुछ भी हो जाए, मेरे बच्चे को खरोंच नहीं आनी चाहिए। यह सिर्फ एक बच्चा नहीं, मेरी ग्यारह साल की तपस्या और मेरा सम्मान है।

अगली सुबह जब पहली सुनहरी किरण फूटी, तब राघव का जन्म हुआ। जब नर्स ने उस लाल-गुलाबी नन्हे से जीव को जानकी की छाती पर रखा, तो उसके नन्हे होंठों की छुअन ने जानकी के सारे दर्द, सारे घाव एक पल में भर दिए। उन्होंने अपने काँपते होंठों से उसके माथे को छुआ। उस दिन जानकी सिर्फ एक माँ नहीं बनी थीं, समाज की नजरों में एक सम्मानित स्त्री के रूप में उनका पुनर्जन्म हुआ था।

राघव जानकी की आँखों की पुतली था। महेश जी का देहांत तब हो गया जब राघव केवल बारह वर्ष का था। उसके बाद तो जानकी ने जैसे अपनी हर इच्छा, हर सुख की बलि राघव के चरणों में चढ़ा दी। कस्बे के स्कूल में सिलाई-कढ़ाई सिखाकर, घरों में पापड़-अचार बेचकर उन्होंने राघव की पढ़ाई में कभी कोई कमी नहीं आने दी। राघव को जब ठंड में हल्की सी खाँसी भी होती, तो जानकी रात भर जागकर उसके सीने पर गर्माहट देतीं। राघव कहता था, माँ, जब मैं बड़ा होकर अफसर बनूँगा, तो तुम्हें रानी बनाकर रखूँगा। जानकी उन मासूम बातों पर अपनी सारी थकान भूल जाती थीं।

समय का पहिया घूमा। राघव पढ़-लिखकर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में बड़ा अधिकारी बन गया। उसकी शादी एक बड़े घराने की पढ़ी-लिखी लड़की सुनैना से हुई। शादी के शुरुआती दिनों में सब ठीक रहा, मगर धीरे-धीरे जानकी की सादगी, उनका सूती साड़ियों में रहना और उनका देहाती लहजा सुनैना को अपनी आधुनिक जीवनशैली में खटकने लगा। राघव भी अब माँ का लाडला बेटा नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट का महत्वाकांक्षी अफसर और पत्नी की हर बात में हाँ मिलाने वाला पति बन चुका था।

पहले जानकी को घर के मुख्य हिस्से से हटाकर बालकनी के पास वाले छोटे से स्टोर रूम में शिफ्ट किया गया। फिर धीरे-धीरे घर में होने वाली बड़ी पार्टियों में जानकी का बाहर निकलना बंद करवा दिया गया। जानकी सब सहती रहीं, सिर्फ इसलिए कि उनका बेटा खुश रहे। मगर हद तो तब हो गई जब सुनैना के माता-पिता शहर आए और सुनैना ने साफ कह दिया कि इस छोटे से फ्लैट में दो परिवारों का एक साथ रहना मुमकिन नहीं है।

उस बारिश की शाम को राघव ने जानकी से कहा था, माँ, कुछ महीनों के लिए शहर के बाहर एक बहुत शांत और सुंदर गेस्ट हाउस है, तुम वहाँ रह आओ। वहाँ तुम्हारे हमउम्र लोग मिलेंगे, तुम्हारा मन भी बहल जाएगा।

जानकी अनपढ़ जरूर थीं, मगर माँ थीं। वे समझ गईं कि ‘गेस्ट हाउस’ का असली मतलब क्या है। उन्होंने न कोई चीख-पुकार की, न कोई तमाशा किया। चुपचाप अपने फटे पुराने ट्रंक में पति की तस्वीर और राघव के बचपन के पहले खिलौने को समेट लिया। जब वे कार में बैठ रही थीं, तो राघव की नजरें झुकी हुई थीं। आश्रम के गेट पर जब राघव ने उनके हाथ में कुछ रुपए थमाने चाहे, तो जानकी ने उसका हाथ पीछे धकेल दिया था और कहा था, राघव, माँ का प्यार बिकाऊ नहीं होता बेटा। तू खुश रह, मेरी दुआएँ हमेशा तेरे साथ हैं।

आश्रम में बिताए गए ये छह महीने जानकी के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे। मगर इस एकांत ने उन्हें एक नया नजरिया दिया था। वे रोज देखती थीं कि आश्रम में कितनी ही ऐसी माताएं और पिता हैं जो अपनी ही औलादों के ठुकराए हुए हैं, मगर वे केवल रो-रोकर अपनी बची-खुची जिंदगी गँवा रहे हैं। जानकी ने खुद से एक सवाल पूछा, क्या एक स्त्री का जीवन सिर्फ किसी की बेटी, किसी की पत्नी और किसी की माँ बनकर ही खत्म हो जाता है? क्या मेरा अपना कोई अस्तित्व नहीं? यदि मेरे बेटे ने अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ लिया, तो क्या मुझे भी अपनी बची हुई जिंदगी घुट-घुट कर मार देनी चाहिए?

आज राघव के बत्तीसवें जन्मदिन पर जब वे लड्डू बाँट रही थीं, तभी आश्रम के बाहर एक चमचमाती बड़ी गाड़ी आकर रुकी। गाड़ी का दरवाजा खुला और उसमें से राघव उतरा। उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं, कपड़े अस्त-व्यस्त थे और आँखों में गहरा पछतावा था। आश्रम के लोगों में कानाफूसी शुरू हो गई।

राघव तेजी से कदमों से आँगन की ओर बढ़ा और जानकी के पैरों में गिर पड़ा। वह फफक-फफक कर रोने लगा, माँ! मुझे माफ कर दो माँ! मैं अंधा हो गया था। सुनैना मुझे छोड़कर अपने मायके चली गई है। उसने मुझ पर झूठे केस करने की धमकी दी है। जब विपत्ति आई, तब मुझे समझ आया कि इस पूरी दुनिया में सिर्फ एक तुम ही थीं जो मुझसे बिना किसी स्वार्थ के प्यार करती थीं। माँ, घर चलो। तुम्हारे बिना वह घर श्मशान बन गया है। मैं तुम्हें लेने आया हूँ।

आश्रम का पूरा माहौल एकदम शांत हो गया। कल्याणी जी और सरला जी को लगा कि अब जानकी का कलेजा पसीज जाएगा, वे तुरंत अपने बेटे को गले से लगा लेंगी और उसके साथ लौट जाएँगी। हर भारतीय माँ की तरह वे भी शायद बेटे के आँसू देखकर पिघल जाएँगी।

जानकी देवी ने राघव के सिर पर धीरे से हाथ फेरा। उनकी आँखों से एक बूँद आँसू टपका, मगर अगले ही पल उनके चेहरे पर एक अद्भुत, अडिग और शांत तेज छा गया। उन्होंने राघव के कंधे पकड़कर उसे खड़ा किया।

जानकी ने अपनी आवाज को स्थिर रखते हुए कहा, उठो राघव। रोना बंद करो।

राघव ने उम्मीद भरी नजरों से देखा, माँ, सामान बाँध लो, हम घर चल रहे हैं।

जानकी देवी ने एक गहरी साँस ली और बहुत ही सौम्य किंतु दृढ़ स्वर में कहा, नहीं राघव। मैं अब उस घर में वापस नहीं जाऊँगी।

राघव सन्न रह गया। उसने अविश्वास से माँ की ओर देखा, यह क्या कह रही हो माँ? तुम मुझसे नाराज हो? मैं तुम्हारी हर सजा भुगतने को तैयार हूँ, पर यहाँ इस वृद्धाश्रम में मत रहो। लोग क्या कहेंगे कि बड़ा अफसर होकर अपनी माँ को अनाथालय में छोड़ रखा है?

जानकी मुस्कुराईं, पर इस बार उस मुस्कान में स्वाभिमान की चमक थी। वे बोलीं, राघव, जब तुम मुझे यहाँ छोड़कर गए थे, तब मुझे लगा था कि मेरी जिंदगी खत्म हो गई। लेकिन इन छह महीनों में मैंने यहाँ एक नई जिंदगी पाई है। यहाँ मैंने देखा कि समाज ने जिन बुजुर्गों को कचरा समझकर फेंक दिया, उनके सीनों में कितना प्यार और हुनर बाकी है। राघव, पिछले दो महीनों से मैंने और यहाँ की दस बहनों ने मिलकर आश्रम के ट्रस्ट के साथ एक सिलाई और हस्तशिल्प केंद्र शुरू किया है। आज शहर की कई दुकानों में हमारे बनाए कपड़े और अचार जाते हैं। हम यहाँ किसी पर बोझ नहीं हैं, हम अपना खर्च खुद उठाते हैं और जो थोड़ा-बहुत बचता है, उससे पास की बस्ती के गरीब अनाथ बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाते हैं।

राघव अवाक खड़ा अपनी माँ को देख रहा था। उसे अपनी सीधी-सादी, अनपढ़ माँ के भीतर से एक नई, सबल और स्वतंत्र स्त्री बोलती हुई नजर आ रही थी।

जानकी ने आगे कहा, बेटा, जब तुम आए थे, तब तुम अपने अकेलेपन और अपनी तकलीफ के डर से आए हो, मेरे प्रति अपने प्यार की वजह से नहीं। यदि आज तुम्हारी जिंदगी में वह संकट न आता, तो शायद तुम्हें मेरी याद भी न आती। मैं तुम्हारी माँ हूँ, मेरी दुआएँ, मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारी रक्षा करेगा। राघव, आज तुम्हारा जन्मदिन है, यह लड्डू खाओ और अपने जीवन को सही रास्ते पर ले जाओ। अपनी पत्नी से बात करो, अपने रिश्ते को समझदारी से बचाओ। लेकिन अब मैं उस चारदीवारी में वापस नहीं लौट सकती जहाँ मेरा सम्मान मेरी उपयोगिता पर निर्भर करे। यह आश्रम अब मेरा घर है, और यहाँ के बेसहारा लोग मेरा परिवार। मुझे अब किसी के सहारे की जरूरत नहीं है, मैंने खुद का सहारा बनना सीख लिया है।

जानकी ने एक लड्डू राघव की हथेली पर रख दिया और उसके सिर पर आशीर्वाद का हाथ रख दिया। राघव की आँखों से लगातार पश्चाताप के आँसू बह रहे थे। उसने पहली बार अपनी माँ को एक लाचार औरत के रूप में नहीं, बल्कि एक अडिग वटवृक्ष के रूप में देखा था। वह सिर झुकाए धीरे-धीरे आश्रम के मुख्य द्वार की ओर बढ़ गया, उसका अहंकार पूरी तरह टूट चुका था और माँ के प्रति एक नया, सच्चा आदर उसके दिल में जन्म ले चुका था।

सूरज की किरणें अब पूरे आँगन में फैल चुकी थीं। जानकी देवी ने आश्रम के बच्चों को आवाज लगाई जो पास ही खेल रहे थे। बच्चे दौड़ते हुए आए और जानकी से लिपट गए। जानकी ने हँसते हुए सभी को लड्डू बाँटने शुरू कर दिए। उनके चेहरे पर अब कोई मलाल नहीं था, कोई विवशता नहीं थी। उन्होंने मातृत्व की परिधि को संकुचित स्वार्थ से निकालकर पूरे संसार के लिए विस्तीर्ण कर दिया था। त्याग की मूर्ति कही जाने वाली स्त्री ने आज आत्मसम्मान का वह दीपक जलाया था, जिसकी लौ कभी बुझने वाली नहीं थी।

एक माँ का समर्पण अनमोल होता है, मगर जब वही समर्पण उसकी कमजोरी समझा जाने लगे, तो उसका स्वाभिमान जागना ही सच्ची मुक्ति है। क्या जानकी देवी का अपने बेटे के साथ वापस न जाकर अपने आत्मसम्मान और नई राह को चुनना सही फैसला था? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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 मूल लेखिका : संगीता त्रिपाठी

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