वंदना ने आगे बढ़कर तुरंत अपने पिता के कंधे थामे और उन्हें जबरन सीधा खड़ा किया। उसके चेहरे पर गुस्से की जगह एक असीम गरिमा और दृढ़ता थी। उसने अपने आंचल से पिता के आंसू पोंछे और कहा, “पिताजी, जिन पैरों ने मुझे सीधे खड़े होकर सच की राह पर चलना सिखाया, वे पैर आज इस लालच की चौखट पर कभी नहीं झुकेंगे। सिर उठाइए, आपने कोई अपराध नहीं किया है।”
ओंकारेश्वर जी सकपका गए, लेकिन अपनी रौबदार आवाज में बोले, “बहू, बड़ों की बातचीत के बीच में यूं बिना इजाजत चले आना तुम्हारी बदतमीजी को दिखाता है। अपने पिता को समझाओ कि अपनी झूठी शान छोड़कर समझदारी से काम लें।”
शाम ढलते ही आंगन में बिछी सफेद चादरों पर रिश्तेदारों की गहमागहमी बढ़ गई थी। तांबे के लोटे में रखी ठंडी शिकंजी और थालियों में सजे काजू-कतली के टुकड़े सगाई के इस उत्सव में एक नई मिठास घोल रहे थे। हरिनारायण जी हाथ जोड़े हर आने-जाने वाले का स्वागत कर रहे थे। चेहरे पर बेटी के अच्छे घर में ब्याह की निश्चिंतता तो थी, पर भीतर दिल की धड़कनें किसी अनजाने डर से तेज थीं। रेलवे के एक छोटे से क्लर्क के रूप में पैंतीस साल तक पसीना बहाकर उन्होंने अपने चार बच्चों को पाला-पोसा था। दो बेटियों और दो बेटों के इस भरे-पूरे संसार में मर्यादा और संस्कार ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी थे। बड़ी बेटी का विवाह किसी तरह कर्ज लेकर निपटाया था, जिसका आधा भार आज भी उनकी बूढ़ी रीढ़ पर लदा हुआ था। अब मंझली बेटी वंदना के हाथ पीले करने की बारी थी।
वंदना बचपन से ही किताबों की दुनिया में रमी रहने वाली लड़की थी। शांत, गंभीर और आत्मविश्वासी। दिन-रात मेहनत करके उसने राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास की थी और वर्तमान में वाणिज्य कर विभाग में वरिष्ठ अधिकारी के पद पर नियुक्त थी। पूरा कस्बा गर्व करता था कि हरिनारायण बाबू की बिटिया अफसर बन गई है। वंदना जब भी अपने पहले वेतन से घर के खर्चों में हाथ बंटाना चाहती, हरिनारायण जी बड़ी ममता से उसका सिर सहलाते और कहते, “बिटिया, जिस आंगन से बेटी विदा होकर पराए घर जाती है, उस आंगन में उसके पसीने की कमाई का एक कतरा भी रह जाए तो बाप के कंधों का बोझ बढ़ जाता है। तू अपनी कमाई को अपने भविष्य के लिए सहेज कर रख, मुसीबत के दिन कभी पूछकर नहीं आते।”
वंदना अक्सर रूठकर कहती, “पिताजी, आपने दिन-रात एक करके, अपने फटे जूतों को छुपाकर मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं समाज में सिर उठाकर चल सकूं। क्या सिर्फ बेटा ही मां-बाप का सहारा होता है? क्या बेटी अपने परिवार की ढाल नहीं बन सकती?” लेकिन हरिनारायण जी के स्वाभिमानी सिद्धांतों के आगे वंदना की हर दलील खामोश हो जाती थी।
सगाई का शगुन हो चुका था। लड़के वालों की तरफ से आए सोने के कंगन वंदना की कलाई में पहना दिए गए थे। लड़का, सिद्धार्थ, एक निजी बैंक में उप-प्रबंधक था। रूप-रंग और बातचीत में शालीन दिखता था। उसके पिता, ओंकारेश्वर जी, इलाके के एक बड़े ठेकेदार थे। सगाई की रस्म पूरी होने के बाद जब अधिकांश मेहमान भोजन के लिए उठ गए, तब ओंकारेश्वर जी ने हरिनारायण जी को एक कोने वाले कमरे में चलने का इशारा किया।
कमरे का दरवाजा बंद होते ही ओंकारेश्वर जी ने अपने कुर्ते की जेब से पान की डिबिया निकाली, बड़े इत्मीनान से पान मुंह में दबाया और फिर अपनी सफेद मूंछों को सहलाते हुए एक लंबी सांस ली।
हरिनारायण जी ने हाथ जोड़कर पूछा, “कहिए समधी जी, कोई भूल-चूक हो गई हो तो क्षमा कीजिएगा। बिटिया के इस नए सफर के लिए आपकी कोई विशेष इच्छा या रीति-रिवाज की बात हो तो खुल कर कहिए, ताकि आगे कोई असमंजस न रहे।”
ओंकारेश्वर जी मंद-मंद मुस्कुराए, मानो इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे। वे बोले, “अरे हरिनारायण जी, कैसी बातें कर रहे हैं आप! भला दहेज की बात कौन कर रहा है? हम तो उस जमाने के लोग ही नहीं हैं जो मोल-भाव करें। हमें तो बस आपकी संस्कारी और होनहार बेटी चाहिए, जिसने अपनी मेहनत से इतना बड़ा ओहदा पाया है। धन-दौलत तो भगवान का दिया हमारे पास सब कुछ है। पर आप तो खुद दुनियादार आदमी हैं, समाज में चार लोग उठते-बैठते हैं, बिरादरी में हमारी भी एक नाक है।”
हरिनारायण जी का माथा ठनका, “जी, मैं आपकी बात पूरी तरह समझ नहीं पाया समधी जी।”
“समझने में क्या रखा है भाई साहब,” ओंकारेश्वर जी ने सोफे पर पसरते हुए कहा, “अब देखिए, हमारे घर में एक मध्यम गाड़ी तो पहले से ही है, जिससे मैं अपने दफ्तर और साइट पर आता-जाता हूं। सिद्धार्थ भी अपनी गाड़ी से बैंक जाता है। अब आपकी बिटिया सरकारी दफ्तर में बड़े पद पर बैठती है। कल को ब्याह के बाद वो किसी छोटी-मोटी टैक्सी या ऑटो से दफ्तर जाएगी तो लोग क्या कहेंगे? ससुराल वालों का नाम तो हंसेगा ही, आपकी भी बदनामी होगी कि अफसर बेटी को विदा किया और एक ढंग की सवारी भी न दी! इसलिए हम चाहते हैं कि आप एक बड़ी सात सीटर लग्जरी गाड़ी देख लीजिएगा। नई गाड़ी होगी तो कभी पूरा परिवार भी साथ बैठकर तीर्थ-त्योहार पर निकल सकेगा। अब देंगे तो अपनी बेटी को ही देंगे, इसमें हमारा क्या स्वार्थ?”
हरिनारायण जी के पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके सूखे गले से बमुश्किल आवाज निकली, “समधी जी, इतनी बड़ी गाड़ी… उसकी कीमत तो पंद्रह-बीस लाख से कम नहीं होगी।”
“अरे तो बेटी भी तो आपकी राज करेगी!” ओंकारेश्वर जी ने बात काटते हुए आगे कहा, “और सुनिए, बहू-बेटे का जो नया कमरा ऊपर बनवाया है, उसके लिए सागवान का फर्नीचर, इटैलियन मार्बल वाला डाइनिंग सेट, बड़ा स्मार्ट टीवी, दो टन का इन्वर्टर एसी, और कपड़े धोने के लिए वो जो विदेशी फ्रंट-लोड वाली ऑटोमैटिक वाशिंग मशीन आती है, वो सब तो आप अपनी बेटी की सहूलियत के लिए भिजवाएंगे ही। आखिर बेटी आपकी वहां आराम से रहे, यही तो एक पिता चाहता है। बाकी मैं फिर दोहराता हूं, हमें अपने लिए फूटी कौड़ी नहीं चाहिए, ये सब तो आप अपनी लाडली को उसके नए घर के लिए देंगे!”
हरिनारायण जी के हाथ कांपने लगे। उनकी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा। अपनी सारी जमा-पूंजी, भविष्य निधि का पैसा और ग्रेच्युटी मिलाकर भी वे इस मांग का एक चौथाई हिस्सा पूरा नहीं कर सकते थे। उन्होंने लड़खड़ाती आवाज में कहा, “समधी जी, जब रिश्ता पक्का हुआ था, तब तो आपने कहा था कि आपको सिर्फ एक पढ़ी-लिखी और समझदार बहू चाहिए। अब जब सगाई की अंगूठी पहना दी गई है, समाज के सामने रिश्ता बंध चुका है, तब आप इतनी लंबी सूची रख रहे हैं? यह तो मेरे साथ अन्याय है समधी जी। मैं एक साधारण नौकरीपेशा आदमी हूं, इतना बड़ा बोझ मेरी कमर तोड़ देगा।”
ओंकारेश्वर जी के चेहरे की मिठास पल भर में गायब हो गई। उनकी भवें तन गईं, “हरिनारायण जी, जुबान संभाल कर बात कीजिए। हमने क्या कोई भीख मांगी है आपसे? अपनी हैसियत नहीं थी तो इतने बड़े घराने में हाथ डालने की क्या जरूरत थी? और फिर हम जो मांग रहे हैं, वो अपनी जेब में थोड़ी रख रहे हैं, आपकी बेटी के ऐशो-आराम के लिए ही तो कह रहे हैं। अगर इतना भी नहीं कर सकते तो फिर समझ लीजिए कि बिरादरी में थू-थू किसकी होगी। सगाई टूटने का कलंक तो लड़की के माथे ही लगता है, हमारे लड़के को तो कल दस रिश्ते और मिल जाएंगे।”
बूढ़े हरिनारायण जी की आंखों से आंसू छलक कर उनके गालों पर बहने लगे। वे समाज के डर और लोकलाज के बोझ तले दबकर अपने दोनों हाथ ओंकारेश्वर जी के पैरों में रखने के लिए झुके ही थे कि तभी कमरे का दरवाजा खटखटाए बिना पूरा खुल गया।
दरवाजे पर वंदना खड़ी थी। सगाई के लाल जोड़े में सजी, आंखों में गहरा काजल लगाए वह कोई सहमी हुई दुल्हन नहीं, बल्कि साक्षात आत्मसम्मान की मूरत लग रही थी। उसने बाहर खड़े रहकर कमरे के भीतर चल रहे हर एक शब्द को सुन लिया था। उसके पीछे उसकी मां और कुछ अन्य परिजन भी आ खड़े हुए थे।
वंदना ने आगे बढ़कर तुरंत अपने पिता के कंधे थामे और उन्हें जबरन सीधा खड़ा किया। उसके चेहरे पर गुस्से की जगह एक असीम गरिमा और दृढ़ता थी। उसने अपने आंचल से पिता के आंसू पोंछे और कहा, “पिताजी, जिन पैरों ने मुझे सीधे खड़े होकर सच की राह पर चलना सिखाया, वे पैर आज इस लालच की चौखट पर कभी नहीं झुकेंगे। सिर उठाइए, आपने कोई अपराध नहीं किया है।”
ओंकारेश्वर जी सकपका गए, लेकिन अपनी रौबदार आवाज में बोले, “बहू, बड़ों की बातचीत के बीच में यूं बिना इजाजत चले आना तुम्हारी बदतमीजी को दिखाता है। अपने पिता को समझाओ कि अपनी झूठी शान छोड़कर समझदारी से काम लें।”
“माफ कीजिएगा ओंकारेश्वर जी,” वंदना की आवाज में गजब का ठहराव था, “अभी मैं आपकी बहू बनी नहीं हूं, और ईश्वर का लाख-लाख शुक्र है कि सगाई की रस्म के तुरंत बाद ही आपके संस्कारों का यह असली नकाब उतर गया। आप जिस विलासिता को ‘बेटी का सम्मान’ बताकर मेरे पिता के स्वाभिमान की बलि मांग रहे हैं, वह सम्मान नहीं, बल्कि कानूनी और सामाजिक भाषा में खुली डकैती है।”
कमरे में सन्नाटा पसर गया। बाहर खड़े सिद्धार्थ ने अंदर आकर मामला संभालने की कोशिश की, “वंदना, तुम बात का बतंगड़ बना रही हो। पिताजी का मतलब वो नहीं था। वो तो बस हमारे भविष्य और समाज में हमारे स्तर की बात कर रहे थे।”
वंदना ने मुड़कर सीधे सिद्धार्थ की आंखों में देखा, “सिद्धार्थ, अगर आज तुम अपने पिता के इस घटिया लालच के खिलाफ खड़े होने के बजाय इसे ‘हमारा भविष्य’ बता रहे हो, तो मुझे समझ आ गया कि तुम्हारी रीढ़ की हड्डी में कितना दम है। तुम एक बैंक अधिकारी हो, पढ़े-लिखे नौजवान हो, और फिर भी अपने पिता द्वारा बेची जा रही अपनी मर्दानगी पर पर्दा डाल रहे हो? जिस गाड़ी की मांग तुम्हारे पिता कर रहे हैं, उस गाड़ी की हर एक किस्त मेरी मेहनत की कमाई से भी चुकाई जा सकती है, लेकिन मैं किसी ऐसे परिवार में एक भी सांस नहीं ले सकती जहां रिश्तों की कीमत सामान की सूची से तय होती हो।”
यह कहते हुए वंदना ने एक पल भी नहीं गंवाया। उसने अपनी उंगली से सगाई की सोने की अंगूठी निकाली और हाथ से सोने के कंगन उतारकर ओंकारेश्वर जी के सामने मेज पर रख दिए। खनक के साथ गिरी उन धातुओं की आवाज कमरे में एक तमाचे की तरह गूंज उठी।
“यह लीजिए अपनी अमानत,” वंदना ने सीना तानकर कहा, “और अपने इन पुराने विचारों और खोखली शान को अपने साथ ले जाइए। मेरे पिता ने मुझे पढ़ाया-लिखाया, मुझे पंख दिए ताकि मैं आसमान छू सकूं, इसलिए नहीं कि कोई सौदागर आकर मेरे पैरों में दहेज की बेड़ियां बांध दे। यह रिश्ता यहीं और इसी वक्त खत्म होता है।”
ओंकारेश्वर जी गुस्से से कांप उठे, “लड़की, तुझे अपनी इस बदजुबानी की बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। सगाई के मंडप से उठकर जा रही है, पूरे शहर में ढिंढोरा पिट जाएगा कि किस तरह की औरत है तू। कोई दूसरा शरीफ खानदान तेरे दरवाजे पर कदम नहीं रखेगा!”
वंदना हल्की सी मुस्कान के साथ बोली, “अगर शरीफ होने का मतलब आपके जैसा लालची और पाखंडी होना है, तो मुझे ऐसे किसी घराने की जरूरत नहीं। मैं अपने पैरों पर खड़ी हूं, समाज की सेवा करने के लिए मेरे पास मेरा पद और मेरी निष्ठा है, और अपने माता-पिता के सम्मान की रक्षा करने के लिए मेरा स्वाभिमान काफी है। अब आप सब इस घर से तुरंत विदा हो सकते हैं, इससे पहले कि एक प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते मुझे दहेज निषेध अधिनियम के तहत पुलिस को बुलाना पड़े।”
दहेज कानून का नाम सुनते ही ओंकारेश्वर जी और उनके रिश्तेदारों के चेहरे का रंग उड़ गया। वे बिना कुछ कहे, सिर झुकाए उल्टे पैरों बाहर निकल गए।
आंगन में सन्नाटा छा गया था। रिश्तेदार तरह-तरह की बातें फुसफुसाने लगे थे—कोई कह रहा था कि लड़की ने बहुत जल्दबाजी कर दी, कोई कह रहा था कि अब इसका ब्याह कौन करेगा। लेकिन हरिनारायण जी, जिनकी आंखों में थोड़ी देर पहले लाचारी के आंसू थे, अब गर्व से अपनी बेटी को देख रहे थे।
वंदना ने आकर पिता के चरण छुए। हरिनारायण जी ने अपनी दोनों बांहें फैलाकर बेटी को गले से लगा लिया। उस बूढ़े बाप के सीने से लगकर वंदना ने पहली बार अपने आंसू बहने दिए, लेकिन ये आंसू कमजोरी के नहीं, बल्कि स्वाभिमान की रक्षा की विजय के आंसू थे।
हरिनारायण जी ने भरे गले से कहा, “बिटिया, आज तूने साबित कर दिया कि तू सिर्फ अपने पैरों पर ही खड़ी नहीं हुई, बल्कि तूने इस बूढ़े बाप की झुकी हुई गर्दन को आसमान जितना ऊंचा कर दिया। अगर हर बेटी तेरे जैसी निडर हो जाए, तो इस समाज के किसी भी लालची के भीतर इतनी हिम्मत नहीं होगी कि वह बेटियों के पिताओं को आंसुओं का नजराना देने पर मजबूर करे।”
समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। वंदना ने अपने कार्यक्षेत्र में अपनी ईमानदारी और लगन से खूब नाम कमाया। उसने कई गरीब और अनाथ बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा उठाया। करीब डेढ़ साल बाद, वंदना के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। उसी के विभाग में कार्यरत एक अत्यंत विनम्र, कर्तव्यनिष्ठ और उच्च पदस्थ अधिकारी, अनुराग, जिसने वंदना के स्वाभिमान और उसके निडर व्यक्तित्व की कहानियां सुनी थीं, खुद अपने माता-पिता को लेकर हरिनारायण जी के घर पहुंचा।
अनुराग के माता-पिता ने जब हरिनारायण जी के सामने बैठकर कहा, “हरिनारायण जी, हमें आपकी बेटी से अपने बेटे का ब्याह करना है। हमें कोई दान, कोई दहेज, कोई दिखावा नहीं चाहिए। जिस घर की बेटी अपने पिता के मान-सम्मान के लिए पूरी दुनिया से लड़ सकती है, वह बेटी जिस घर में जाएगी, उस घर को स्वर्ग बना देगी। हम तो बस इस रिश्ते का सौभाग्य चाहते हैं।”
उस दिन हरिनारायण जी के घर के आंगन में फिर से शहनाई बजी, लेकिन इस बार किसी डर, किसी समझौते या किसी लालच के साए में नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम, बराबरी और स्वाभिमान की मधुर तान पर।
दोस्तों, क्या वंदना ने सगाई तोड़कर सही कदम उठाया या उसे समाज के डर से समझौता कर लेना चाहिए था? आपके विचार में आज के पढ़े-लिखे समाज में भी बेटियों के माता-पिता से परोक्ष रूप से की जाने वाली इन मांगों का अंत कैसे हो सकता है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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लेखिका :रीना साहनी