ये न कहना – डॉ. कविता विकास

काम रोज़ की तरह चल रहे थे लेकिन मन में उत्साह नहीं था। मेहमानों से भरे – पूरे घर में भी एक ख़ालीपन धर गया था। मैं भिंडी काट रही थी कि लगा कोई पीछे से कह रहा है,”फिर आज इतनी देर लगा दी,सब्ज़ी बनी नहीं अभी तक,मैं क्या खा कर जाऊँगी?कॉलेज का समय हो गया है।” आदतन पीछे देखा,लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

असल में जब से मेरी ननद निशा ने यहाँ एडमिशन लिया था, मेरे घर रहने आयी थी ,एक अजीब – सी तनातनी हम तीनों के बीच चल रही थी,तीसरे यानी पतिदेव आशीष । मैं भी उसी कॉलेज में व्याख्याता थी,लेकिन हमारे टाइम अलग – अलग थे। निशा को शुरुआत में बहुत अच्छा लगता था जब उसकी फ़्रेंड्स मेरे लेक्चर की तारीफ़ करते।

मेरे व्यक्तित्व,साड़ी का चुनाव,गेटअप आदि के बारे में जो भी लड़कियाँ कहतीं,निशा को गर्व महसूस होता। लेकिन देखते – देखते मेरी तारीफ़ों से उसे ऊब होने लगी। या यूँ कहूँ तो मुझसे एक तरह की जलन पैदा होने लगी। मेरी साड़ियों को लेकर अधिकार पूर्वक पहनने वाली निशा अब उन्हें देहाती कहती।

मुझे तैयार होते देखकर ताना मारती,” कॉलेज में पढ़ाने जाती हो या रास्ते में किसी को रिझाने? बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम,आदि उसके प्रिय जुमला होते।” आशीष कुछ न कहते। उन्हें लगता बेकार बात बढ़ेगी, वैसे भी निशा उनकी बात कब मानने वाली थी! मैं भी उससे मुँह लगाकर अपनी ताक़त नहीं खोना चाहती थी। फिर भी कभी – कभी उस पर हावी तो हो ही जाती थी।

    हर दिन के बढ़ते कलह से मुझे लगता जल्दी उसकी पढ़ाई ख़त्म हो और वह चली जाए। इसी बीच एक दिन निशा ऑटो से घर आ रही थी। सड़क जाम के कारण ऑटो वाला उसे दूसरे रास्ते से ले जाने लगा। मोबाइल में व्यस्त निशा को इस बात का तब पता चला जब एक संकरी गली में ऑटो ड्राइवर ने ऑटो रोक दी।

अचानक से उसने पूछा, अरे यह कौन जगह है? ऑटो वाले ने कहा, ” ब्रेक में कुछ ख़राबी आ गयी है,आप उतर जाओ,मैं ठीक करता हूँ।” निशा ने उस सुनसान जगह पर उतरने से इंकार कर दिया,तभी चार अन्य युवक आ गए। चारो उसे घेर कर बदतमीज़ी करने लगे।कोई उसके गाल छू रहा था तो कोई सिर। डर के मारे वह रोने लगी।

तभी एक लड़के ने उसे खींच कर ऑटो से निकाल लिया और एक टूटी हुई झोपड़ी की ओर ले जाने लगा। निशा ने पुरज़ोर विरोध किया लेकिन वे लोग उसे थप्पड़ मारने लगे। अचानक दूर से आती हुई एक जीप दिखाई पड़ी,उसके पीछे कुछ और गाड़ियाँ थीं। गाड़ियों को आते देख सभी गुंडे भागकर ऑटो में चढ़ने लगे।

जीप वहाँ के एस पी की थी। शायद जीप की लाल बत्ती देखकर ही वे भागे थे। निशा की हालत देखकर एस पी मनोज शर्मा ने उसे गाड़ी में बिठाया और पानी पिलाया।

उससे बात करते हुए निशा ने सबसे पहले अपने भैया – भाभी के बारे में बताया । भाभी कल्पना रस्तोगी का नाम सुनते ही एस पी साहब ने कहा,” कल्पना रस्तोगी मैडम पी जी में उनके क्लास लिया करती थीं और वह उनके बड़े प्रशंसक हैं। आइपीएस बनने के बाद वे उनसे मिलने भी गए थे।”इस बीच एस पी साहब के सहयोगी गुंडों को पकड़ लाए थे। 

  उन्हें थाने भेजने के बाद एस पी साहब स्वयं अपनी जीप में निशा को बिठा कर मेरे घर आए। निशा मुझसे लिपट कर देर तक रोती रही।आशीष ने समझाया,” यह तो शुक्र मनाओ कि उन्होंने तुम्हारे साथ कुछ ग़लत नहीं किया। समय पर पुलिस आ गयी। ” जाते – जाते एस पी साहब ने भी कहा,” आइंदा मोबाइल पर इतना व्यस्त न रहा करो,तुम्हारी भाभी की सादगी और विद्वता पर यह शहर नाज़ करता है।

उनकी अच्छाइयों का अनुशरण करो, ज़िंदगी बदल जाएगी।” उस दिन के बाद से निशा और मैं भाभी – ननद नहीं रहे। माँ – बेटी की तरह हमारा रिश्ता बन गया। उसकी शादी भी मेरी पसंद के लड़के से हुई। शादी तय होने के बाद निशा ने एक बार पुनः माफ़ी माँगी,” भाभी मुझे माफ़ कर दीजिएगा,मैंने बहुत ग़लत किया था आपके साथ ।

मैं ईर्ष्या की आग में जल रही थी,आपकी तारीफ़ नागवार लगती थी।” मैंने उसे गले लगाते हुए कहा, ”चुप हो जा पगली, फिर कभी ये न कहना। सब समय का खेल है ।” कल से उसकी विदाई के बाद घर में सबके होते हुए भी बेटी की कमी खल रही है। 

#जलन

डॉ. कविता विकास

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