“भैया, मुझसे अब नहीं सहा जाता। मुझे बहुत तेज भूख लगी है और मेरा पूरा शरीर दुख रहा है। मां कैसे करती हैं यह सब? सुबह पांच बजे उठने से लेकर रात के ग्यारह बजे तक वह बिना रुके चलती रहती हैं। कभी हमारे लिए नाश्ता, कभी पापा का टिफिन, कभी कपड़े धोना, कभी झाड़ू-पोंछा… और हमने कभी उनके काम की कद्र नहीं की। हम हमेशा सोचते थे कि वह घर पर करती ही क्या हैं!”
सुबह की पहली सुनहरी किरण जब बालकनी के पर्दों को चीरती हुई ड्राइंग रूम में फैली, तो घर का सन्नाटा कुछ अजीब सा लगा। यह वह घर था जहां सुबह छह बजते ही जीवन की हलचल अपने पूरे शबाब पर होती थी। कुकर की पहली सीटी, अदरक वाली ताज़ा चाय की भीनी-भीनी महक, और रेडियो पर बजते पुराने नगमे—यही इस घर की रोज की पहचान थी। लेकिन आज घड़ी के कांटे सात बजा चुके थे और चारों तरफ एक अजीब सा, भारी सन्नाटा पसरा हुआ था।
आयुष ने अलसाते हुए अपनी आंखें मलीं। कॉलेज का उसका तीसरा साल चल रहा था, पर आदतें अब भी किसी छोटे बच्चे जैसी ही थीं। बिस्तर पर पड़े-पड़े ही उसने आवाज लगाई, “मां! आज चाय अभी तक नहीं आई? सिर फटा जा रहा है, जल्दी से एक कप कड़क अदरक वाली चाय दे दो ना!”
सन्नाटे ने उसकी आवाज को सोख लिया। कोई जवाब नहीं आया। आयुष को थोड़ी खीझ हुई। उसने तकिया एक तरफ फेंका और पैर घसीटते हुए बाहर निकला। सामने वाले कमरे से उसकी छोटी बहन तान्या भी अपने बिखरे बालों को समेटते हुए बाहर आई। तान्या बारहवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी कर चुकी थी और अक्सर दिनभर अपनी सहेलियों के साथ फोन पर बातें करने या रील्स देखने में ही व्यस्त रहती थी।
“भैया, आज मां कहां हैं? मुझे अपनी नीली कुर्ती पहननी थी, पर वह कहीं दिख नहीं रही। मां को सौ बार कहा है कि मेरे कपड़े प्रेस करके वॉर्डरोब में आगे की तरफ टांग दिया करें,” तान्या ने चिढ़ते हुए कहा।
दोनों रसोई की तरफ बढ़े। रसोई का चूल्हा बिल्कुल ठंडा पड़ा था। स्लैब पर न तो चाय का सस्पैन चढ़ा था और न ही नाश्ते के लिए कोई तैयारी दिख रही थी। पूरे घर में मां, यानी कल्याणी जी, कहीं नजर नहीं आ रही थीं। दोनों को कुछ अनहोनी का अहसास हुआ और वे माता-पिता के बेडरूम की तरफ लपके।
कमरे का दरवाजा आधा खुला था। अंदर का दृश्य देखकर दोनों ठिठक गए। कल्याणी जी बिस्तर पर बैठी एक छोटा सा ट्रैवल बैग पैक कर रही थीं। उनके चेहरे पर गहरी चिंता और उदासी की लकीरें खिंची हुई थीं। पास ही उनके पिता, रमाकांत जी, हाथ में पानी का ग्लास लिए खड़े थे।
“मां! क्या बात है? आप कहीं जा रही हैं क्या? और आज नाश्ता क्यों नहीं बना? हमें भूख लगी है,” आयुष ने दरवाजे पर खड़े होकर एक साथ कई सवाल दाग दिए।
कल्याणी जी ने बैग की ज़िप बंद की और सिर उठाकर दोनों बच्चों को देखा। उनकी आंखों में एक अजीब सी खामोशी थी। रमाकांत जी ने एक गहरी नजर अपनी पत्नी पर डाली, मानों दोनों के बीच बिना बोले ही कोई मौन संवाद हो चुका हो।
कल्याणी जी ने शांत लेकिन भारी आवाज में कहा, “बेटा, तुम्हारे मामा जी का फोन आया था। गांव में दादा-दादी (नाना-नानी) दोनों की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई है। नानी को तेज बुखार है और नाना जी की पुरानी बीमारी फिर से उभर आई है। मामा अकेले सब कुछ नहीं संभाल पा रहे हैं। मुझे तुरंत वहां पहुंचना होगा। गाड़ी तैयार है, तुम्हारे पापा मुझे स्टेशन छोड़ने जा रहे हैं।”
तान्या ने घबराकर कहा, “पर मां, आप अचानक ऐसे कैसे जा सकती हैं? हमारा क्या होगा? घर कौन देखेगा? खाना कौन बनाएगा?”
कल्याणी जी ने तान्या के गाल पर हाथ फेरते हुए एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, “बेटा, तुम दोनों अब समझदार हो चुके हो। कॉलेज जाते हो, बड़ी-बड़ी बातें करते हो। आज तक मैंने हर जिम्मेदारी उठाई, लेकिन आज मुझे वहां होना जरूरी है जहां मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है। दो-चार दिन की बात है, तुम दोनों मिलकर घर संभाल लेना। पापा तो दोपहर में ऑफिस की कैंटीन में ही लंच कर लेते हैं, रात को आ जाएंगे। फ्रिज में कुछ सब्जियां और दूध है। तुम लोग समझदार हो, अपना ख्याल रखना।”
इतना कहकर कल्याणी जी ने बैग उठाया। जाते-जाते उन्होंने रमाकांत जी की तरफ एक रहस्यमयी नजरों से देखा। रमाकांत जी के चेहरे पर भी एक हल्की सी, छिपी हुई मुस्कान तैर गई, जिसे दोनों बच्चे पकड़ नहीं सके। कुछ ही मिनटों में गाड़ी का हॉर्न बजा और मां चली गईं।
घर का मुख्य दरवाजा बंद होते ही आयुष और तान्या एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। अचानक आजादी मिलने की जो पहली खुशी मन में आई थी, वह पेट में उठती भूख की ज्वाला के सामने तुरंत गायब हो गई।
“अब क्या करें भैया? मुझे तो बहुत तेज भूख लग रही है,” तान्या ने पेट पकड़ते हुए कहा।
“चल, स्विगी या ज़ोमैटो से कुछ अच्छा सा मंगवा लेते हैं। मां नहीं हैं तो क्या हुआ, आज बाहर का नाश्ता करते हैं,” आयुष ने अपना फोन निकालते हुए उत्साह से कहा।
तभी तान्या ने उसे टोकते हुए याद दिलाया, “भैया, याद है ना पापा का क्या उसूल है? हम एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार हैं। पापा ने हर महीने का बजट तय कर रखा है। अगर बाहर से उल्टा-सीधा खाना मंगाया और बिल का पता पापा को चला, तो शाम को उनकी डांट सुननी पड़ेगी। और फिर सुबह-सुबह बाहर का तला-भुना खाने से पेट भी खराब हो सकता है।”
आयुष ने फोन जेब में रख लिया। बात तो सच थी। उनके घर में कभी भी फिजूलखर्ची को बढ़ावा नहीं दिया गया था। हर चीज का एक हिसाब होता था।
“तो फिर उपाय क्या है? खुद ही कुछ बनाना पड़ेगा,” आयुष ने ठंडी सांस भरते हुए कहा।
“लेकिन हमें आता क्या है? हमने तो कभी चाय की पत्ती का डिब्बा भी ठीक से नहीं देखा,” तान्या ने बेबसी से कहा।
“अरे, यूट्यूब है ना! दुनिया भर की रेसिपी भरी पड़ी हैं वहां। चल, कुछ आसान सा ढूंढते हैं… हां, उपमा! उपमा सबसे आसान लगता है। सूजी भूनो, पानी डालो, तैयार!” आयुष ने आत्मविश्वास से कहा।
दोनों रसोई में दाखिल हुए। रसोई, जो हमेशा करीने से सजी और शांत दिखती थी, आज किसी रहस्यमयी प्रयोगशाला जैसी लग रही थी। सबसे पहले तो सूजी ढूंढने में ही उनके पंद्रह मिनट बर्बाद हो गए। मां किस डिब्बे में क्या रखती थीं, इसका कोई अता-पता नहीं था। कभी दाल का डिब्बा खुलता तो कभी मैदा निकल आता। जैसे-तैसे सूजी मिली।
अब बारी आई सब्जियां काटने की। तान्या ने प्याज और हरी मिर्च उठाई। जैसे ही उसने प्याज पर चाकू चलाया, प्याज फिसल गया और उसकी उंगली पर हल्का सा चीरा लग गया। वह दर्द से चीख उठी। आयुष ने पानी से उसका हाथ धोया। फिर प्याज काटने की जिम्मेदारी आयुष ने ली। चाकू चलाते ही आंखों में ऐसी जलन उठी कि आंसुओं की धार बह निकली। नाक बहने लगी और आंखें लाल हो गईं।
“बाप रे! मां रोज यह सब कैसे काटती हैं? मेरी तो आंखें ही नहीं खुल रहीं,” आयुष आंसू पोंछते हुए बड़बड़ाया।
खैर, गैस जलाई गई। पैन में तेल डाला गया। तेल अभी पूरी तरह गर्म भी नहीं हुआ था कि तान्या ने उसमें राई और कटी हुई मिर्चियां डाल दीं। छन-छन की जोरदार आवाज के साथ तेल के छींटे उड़े और दोनों पीछे हटकर चिल्लाए। आंच बहुत तेज थी। अगले ही पल प्याज और राई काले पड़ने लगे और रसोई में धुएं का गुबार भर गया।
“पानी डाल! पानी डाल!” तान्या चिल्लाई।
आयुष ने बिना सोचे-समझे एक लोटा पानी पैन में उड़ेल दिया। तेज आवाज और धुएं के साथ एक अजीब सी गंध फैल गई। फिर किसी तरह उन्होंने सूजी डाली, लेकिन सूजी पहले से भुनी नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि उपमा बनने के बजाय एक गाढ़ा, चिपचिपा, गांठों से भरा लेई जैसा घोल तैयार हो गया, जिसमें आधे प्याज जले हुए थे और आधे बिल्कुल कच्चे।
किसी तरह उस मलबे को प्लेट में निकाला गया। दोनों ने डाइनिंग टेबल पर बैठकर एक-एक चम्मच मुंह में डाला।
पहला निवाला अंदर जाते ही दोनों के चेहरे के भाव बदल गए। नमक इतना तेज था कि गले में चुभने लगा, सूजी कच्ची थी और जले हुए प्याज का कड़वा स्वाद पूरी जीभ पर फैल गया। दोनों ने तुरंत पानी पिया और प्लेट खिसका दी।
“यह तो निगला भी नहीं जा रहा,” तान्या की आंखों में आंसू आ गए।
उस वक्त आयुष को याद आया कि कैसे हर रविवार मां सुबह-सुबह उनके लिए गर्मागर्म, खिले-खिले उपमे या पोहे बनाती थीं। ऊपर से भुनी हुई मूंगफली और बारीक कटा हरा धनिया डालकर सजाती थीं। और वे दोनों? वे प्लेट सामने आते ही नुक्स निकालते थे—”मां, इसमें कढ़ी पत्ता क्यों डाल दिया?”, “मां, आज नमक थोड़ा कम है!”, “मां, मुझे उपमा नहीं, परांठा खाना था!”
मां कभी बुरा नहीं मानती थीं। बस मुस्कुराकर कहती थीं, “अच्छा बाबा, अगली बार तुम्हारी पसंद का बना दूंगी।” आज जब खुद एक निवाला बनाने बैठे, तो अपनी औकात समझ आ गई थी।
भूख से दोनों का बुरा हाल था। मजबूरी में फ्रिज से रात की बची हुई दो ठंडी रोटियां निकाली गईं और उस पर थोड़ा सा अचार लगाकर दोनों ने पेट की आग बुझाई।
घड़ी की टिक-टिक के साथ समय बीत रहा था। दोपहर के बारह बज चुके थे। नाश्ते की इस जंग के बाद दोनों सोफे पर ढह गए थे। लेकिन मुसीबत अभी खत्म नहीं हुई थी। अब लंच का समय हो रहा था। पापा तो कैंटीन में खा लेंगे, लेकिन शाम तक वे दोनों क्या खाएंगे? पेट में चूहे कूद रहे थे।
“भैया, अब क्या करें? भूख फिर से लग रही है,” तान्या ने दीन स्वर में कहा।
“अब कोई प्रयोग नहीं करेंगे। कुछ ऐसा बनाते हैं जो सबसे सीधा हो। खिचड़ी या दाल-चावल। यूट्यूब पर देखा है, कुकर में सब कुछ एक साथ डाल दो, दो सीटी में दाल-चावल तैयार हो जाते हैं,” आयुष ने अपनी नई रणनीति समझाई।
दोनों फिर से उस युद्धक्षेत्र यानी रसोई में पहुंचे। सिंक पहले से ही जले हुए बर्तनों और छिलकों से भरा पड़ा था। फर्श पर आटा और तेल गिरा हुआ था।
आयुष ने एक कटोरी दाल और एक कटोरी चावल एक साथ मिला दिए। उन्हें नल के नीचे धोया। तान्या ने फ्रिज से एक टमाटर और थोड़ा सा धनिया निकाला। सब कुछ कुकर में डाल दिया गया। हल्दी और नमक का अंदाज किसी को नहीं था, तो तान्या ने अपनी समझ से दो-दो चम्मच भर के डाल दिया।
“पानी कितना डालना है?” तान्या ने पूछा।
“अरे डाल दे दो-तीन गिलास, पकना ही तो है,” आयुष ने लापरवाही से कहा।
गैस जलाई गई और कुकर चढ़ा दिया गया। दोनों राहत की सांस लेकर ड्राइंग रूम में टीवी देखने बैठ गए। उन्हें लगा कि इस बार सब ठीक हो जाएगा। लेकिन वे यह भूल गए थे कि गैस की आंच को धीमा भी करना होता है।
दस मिनट बाद ही रसोई से कुछ जलने की तीखी गंध आने लगी।
“भैया! यह कैसी महक है?” तान्या चौंकी।
दोनों रसोई की तरफ भागे। कुकर से सीटी तो नहीं आई थी, लेकिन उसके किनारों से काला धुआं रिस रहा था। नीचे का तला पूरी तरह जल चुका था। आयुष ने घबराकर गैस बंद की। जब थोड़ी देर बाद सावधानी से कुकर का ढक्कन खोला गया, तो अंदर का नजारा देखकर दोनों का रोना निकल गया। दाल-चावल नीचे पूरी तरह जलकर कोयला हो चुके थे और ऊपर का पानी सूखकर एक बदबूदार पपड़ी बन चुका था। कुकर का निचला हिस्सा पूरी तरह काला हो चुका था, जिसे शायद अब कभी साफ नहीं किया जा सकता था।
अब भूख, थकान और असफलता ने दोनों के सब्र का बांध तोड़ दिया। तान्या वहीं स्लैब का सहारा लेकर रोने लगी।
“भैया, मुझसे अब नहीं सहा जाता। मुझे बहुत तेज भूख लगी है और मेरा पूरा शरीर दुख रहा है। मां कैसे करती हैं यह सब? सुबह पांच बजे उठने से लेकर रात के ग्यारह बजे तक वह बिना रुके चलती रहती हैं। कभी हमारे लिए नाश्ता, कभी पापा का टिफिन, कभी कपड़े धोना, कभी झाड़ू-पोंछा… और हमने कभी उनके काम की कद्र नहीं की। हम हमेशा सोचते थे कि वह घर पर करती ही क्या हैं!”
आयुष का भी गला भर आया। उसने रसोई की उस बिखरी हुई हालत को देखा। फर्श पर गिरे आलू के छिलके, जले हुए बर्तन, चारों तरफ फैला हुआ धुआं। उसे याद आया कि जब वह कभी कॉलेज से लेट आता था, तो मां कैसे दरवाजे पर उसका इंतजार करती थीं। तुरंत गरम खाना परोसती थीं और पंखा चलाकर उसके पास बैठ जाती थीं। उसने कभी मां से यह नहीं पूछा था कि, “मां, क्या आज आप थक गई हैं?” उसने बस यही कहा था, “खाना ठंडा क्यों है?”
आज केवल छह घंटे मां के बिना गुजरे थे और घर किसी खंडहर जैसा महसूस होने लगा था। उन्हें समझ आ गया कि घर ईंट-पत्थरों से या महंगे सोफों से नहीं बनता, घर तो मां की मौजूदगी और उसके निस्वार्थ परिश्रम से जीवंत रहता है। मां उस अदृश्य धुरी की तरह थी जिसके बिना यह पूरा परिवार एक दिन भी अपनी कक्षा में नहीं घूम सकता था।
तान्या ने रोते हुए अपना फोन उठाया और कांपते हाथों से मां का नंबर मिलाया। फोन की घंटी बजती रही। हर एक सेकंड एक सदी जैसा लग रहा था।
तीसरी घंटी पर फोन उठा। उधर से कल्याणी जी की वही ममतामयी, शांत आवाज आई, “हेलो, तान्या बेटा?”
मां की आवाज सुनते ही तान्या फफक पड़ी, “मां… मां आप कहां हो? प्लीज वापस आ जाओ ना!”
कल्याणी जी के स्वर में चिंता उभर आई, “क्या हुआ बेटा? तुम रो क्यों रही हो? सब ठीक तो है ना? तुम्हारे पापा ठीक हैं? आयुष कहां है?”
आयुष ने तान्या के हाथ से फोन ले लिया। उसकी अपनी आवाज भी भीगी हुई थी, “मां, हम ठीक नहीं हैं। हम बहुत बुरे बच्चे हैं। हमने कभी आपकी मेहनत को नहीं समझा। आज जब आप नहीं हैं, तो यह घर हमें काटने को दौड़ रहा है। हमने रसोई में सब कुछ जला दिया, हमारा खाना नहीं बना, पूरा घर बिखर गया है। पर सबसे ज्यादा तो हमारा दिल रो रहा है मां। हमें समझ आ गया है कि आपके बिना हमारा कोई वजूद नहीं है। नाना-नानी कैसे हैं मां?”
कल्याणी जी ने थोड़ी देर खामोश रहकर कहा, “नाना-नानी अब ठीक हैं बेटा। डॉक्टर ने दवा दे दी है और मामा भी सब संभाल रहे हैं।”
“मां, प्लीज आप उन दोनों को भी अपने साथ यहीं ले आओ ना! हम वादा करते हैं, हम दोनों मिलकर नाना-नानी की भी सेवा करेंगे और आपका भी पूरा हाथ बंटाएंगे। हम कभी कोई शिकायत नहीं करेंगे, कभी खाने में नुक्स नहीं निकालेंगे। बस आप जल्दी घर आ जाओ मां… यह घर आपके बिना वीरान हो गया है,” आयुष ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा।
फोन के दूसरी तरफ एक मीठी सी हंसी गूंज उठी। फिर बैकग्राउंड से एक और जानी-पहचानी हंसी सुनाई दी—वह पापा की हंसी थी!
इससे पहले कि बच्चे कुछ समझ पाते, मुख्य दरवाजे की घंटी बजी—’ट्रिन-ट्रिन…’
आयुष और तान्या ने चौंककर एक-दूसरे को देखा। दोनों दौड़कर दरवाजे की तरफ गए। आयुष ने झटके से दरवाजा खोला।
दरवाजे पर कल्याणी जी और रमाकांत जी खड़े थे। कल्याणी जी के हाथ में वही छोटा बैग था और रमाकांत जी के हाथ में ताज़े समोसे और कचौड़ियों का एक पैकेट था। दोनों के चेहरों पर एक गहरी, अर्थपूर्ण और संतोष भरी मुस्कान थी।
“मां!” तान्या चिल्लाई और जाकर कल्याणी जी के गले से लिपट गई। आयुष ने भी आगे बढ़कर मां को दोनों बांहों में भर लिया।
“आप… आप तो गांव जाने वाली थीं ना?” आयुष ने हैरान होते हुए पूछा।
रमाकांत जी ने आगे बढ़कर दोनों के सिर पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए बोले, “नाना-नानी बिल्कुल ठीक हैं बच्चों। यह सब तुम्हारी मां और मेरा रचा हुआ एक छोटा सा नाटक था। तुम दोनों जिस तरह हर चीज को ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ ले रहे थे, अपनी मां के त्याग और श्रम को कुछ नहीं समझते थे, उसे देखकर हमें लगा कि तुम्हें डांटने या समझाने से काम नहीं चलेगा। तुम्हें अहसास कराना जरूरी था कि जिस थाली में तुम रोज चार गलतियां निकालते हो, उस थाली को सजाने में कितनी तपस्या लगती है।”
कल्याणी जी ने नम आंखों से दोनों बच्चों के आंसू पोंछे और कहा, “मैं कहीं नहीं गई थी बेटा। मैं बस पास ही तुम्हारी मौसी के घर बैठी थी। मुझे पता था कि मेरे बच्चे परेशान होंगे, लेकिन यह सबक तुम्हारे जीवन के लिए बहुत जरूरी था।”
तान्या ने शर्मिंदगी से सिर झुका लिया, “मां, रसोई की हालत बहुत खराब हो गई है। हमने कुकर भी जला दिया…”
“कोई बात नहीं,” कल्याणी जी ने हंसते हुए कहा, “बर्तन तो फिर साफ हो जाएंगे, लेकिन आज जो सबक तुमने सीखा है, वह जिंदगी भर तुम्हारे काम आएगा।”
“नहीं मां, आज आप रसोई में अकेले काम नहीं करेंगी। पहले हम सब मिलकर यह नाश्ता करेंगे, फिर हम दोनों मिलकर पूरी रसोई साफ करेंगे और आज रात का खाना भी हम आपकी मदद से ही बनाएंगे,” आयुष ने दृढ़ता से कहा।
उस शाम घर का माहौल बिल्कुल बदला हुआ था। रसोई में मां खड़ी थीं और उनके दोनों तरफ आयुष और तान्या खड़े थे। कोई आटा गूंथना सीख रहा था, तो कोई सब्जियां धोकर करीने से काटना सीख रहा था। घर में हंसी-ठिठोली की आवाजें गूंज रही थीं और रसोई से उठती भोजन की खुशबू में आज सिर्फ मसालों का नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, समझ और बेपनाह प्यार का स्वाद घुला हुआ था।
दोस्तों, क्या आपके घर में भी किसी ने कभी मां या पत्नी के पूरे दिन के काम को “घर पर रहकर करती ही क्या हो” कहकर नजरअंदाज किया है? क्या हमें सचमुच किसी के महत्व को समझने के लिए उसके दूर जाने का इंतजार करना चाहिए? इस बारे में आपकी क्या राय है, हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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