आँचल की छाँव

 सलोनी पलटी और उसने गौरव की आँखों में सीधे देखा, “तमाशा मैंने नहीं, तुम्हारी संवेदनहीनता ने खड़ा किया है भैया। जो इंसान कल तुम्हारे लिए एक गैर-जरूरी बोझ था, आज उसके जाने पर तुम्हें सिर्फ अपनी झूठी लोक-लाज की चिंता है? तुम्हें मुबारक हो यह बड़ा मकान, मैं अपने भगवान को अपने साथ ले जा रही हूँ।”

गाड़ी जब मयंक के घर के सामने रुकी, तो रामरतन जी के कदम चौखट पर ठिठक गए। उनके मन में अब भी एक अनजाना संकोच और भय था कि न जाने समधी-समधन का क्या व्यवहार होगा। लेकिन तभी दरवाजा खुला और मयंक के माता-पिता बाहर मुस्कुराते हुए आ गए।

शाम ढलते ही हवेलीनुमा पुराने मकान के दालान में सन्नाटा और गहरा हो जाता था। रामरतन जी अपनी लकड़ी की पुरानी आरामकुर्सी पर बैठे शून्य में ताक रहे थे। उनके काँपते हाथ घुटनों पर रखी उस ऊनी शॉल को सहला रहे थे, जिसे उनकी स्वर्गीय पत्नी जानकी ने कई साल पहले अपने हाथों से बुना था। धुंधली आँखों पर चढ़ा चश्मा बार-बार पसीने और आँसुओं की हल्की नमी से धुँधला हो जाता, जिसे वे अपनी धोती के छोर से पोंछ लेते। भीतर के बैठकखाने से उठती तीखी आवाजें दालान के सन्नाटे को बार-बार चीर रही थीं।

उनका इकलौता नाती, गौरव, ऊँचे स्वर में अपनी पत्नी से कह रहा था, “मुझसे अब यह रोज-रोज का झंझट नहीं झेला जाता। ऑफिस का इतना तनाव, बच्चों की पढ़ाई का खर्च, और ऊपर से नानाजी की लगातार बढ़ती दवाइयों और तीमारदारी का बोझ! डॉक्टर का बिल हर महीने बढ़ता जा रहा है। कल सुबह ही मैं शहर के बाहर वाले शांति निकेतन वृद्धाश्रम जाकर बात पक्की कर आता हूँ। वहाँ इनकी उम्र के तमाम लोग रहते हैं, देखरेख करने वाले नौकर हैं, वहीं इनका मन भी लगा रहेगा और हमारे सिर से यह मानसिक बोझ भी उतरेगा।”

कमरे में कुछ पल की खामोशी के बाद उसकी पत्नी की सहमति भरी आवाज गूँजी, “हाँ, यही ठीक रहेगा। आखिर हम अपनी जिंदगी कब जिएँगे?”

दालान में बैठे रामरतन जी के हाथ वहीं ठहर गए। सीने में एक ऐसी टीस उठी, मानो किसी ने सीधे रूह पर वार कर दिया हो। यह वही गौरव था, जिसे अपनी उँगली पकड़कर उन्होंने चलना सिखाया था। जब गौरव की माँ का साया बचपन में ही उठ गया था, तब रामरतन जी ने अपनी सरकारी नौकरी से मिले सारे पैसों को इस घर और इस बच्चे के भविष्य के लिए न्योछावर कर दिया था। रात-रात भर जब गौरव को बुखार चढ़ता, तो रामरतन जी माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रखते हुए अपनी नींद भूल जाते थे। आज उसी आलीशान मकान के एक कोने में उनके वजूद के लिए जगह कम पड़ गई थी।

उनकी आँखों से आँसू चुपचाप बहकर सफेद दाढ़ी में समाने लगे। उन्होंने कोई विरोध नहीं किया, न ही भीतर जाकर अपना हक जताया। जिस स्वाभिमान के साथ उन्होंने पूरी जिंदगी गुजारी थी, उसने उन्हें गिड़गिड़ाने की इजाजत नहीं दी। उन्होंने धीरे से चश्मा उतारा, मेज पर रखा और पास रखी एक छोटी सी जर्जर ट्रंक की ओर देखा। उसमें उनकी जिंदगी भर की पूँजी सिमटी हुई थी—दो जोड़ी सादे कुर्ते-पाजामे, जानकी की एक पुरानी तस्वीर, उनकी डायरी और कुछ जरूरी दवाइयों की शीशियाँ।

तभी बाहर का मुख्य दरवाजा खुला और हल्की चूड़ियों की खनक के साथ तेज कदमों की आहट हुई। यह रामरतन जी की नवासी, सलोनी थी, जो दो दिन पहले ही अपने मायके आई हुई थी। उसने बैठक में चल रही बातों का आखिरी हिस्सा सुन लिया था। उसके चेहरे पर गहरा अचरज और गहरा दर्द एक साथ तैर गया। वह चुपचाप दालान में आई और अपने नानाजी के पैरों के पास जमीन पर बैठ गई।

रामरतन जी ने जैसे ही सलोनी को देखा, उन्होंने तुरंत अपने चेहरे पर एक झूठी, कमजोर मुस्कान ओढ़ने की कोशिश की। कंपकंपाती आवाज को सामान्य बनाते हुए वे बोले, “अरे बिटिया, तू यहाँ क्यों बैठ गई? फर्श ठंडा है। देख, मैं तो सोच रहा था कि अब इस उम्र में थोड़ा बाहर की दुनिया भी देख लूँ। गौरव ठीक ही तो कह रहा था, वृद्धाश्रम में मेरी उम्र के कई बुजुर्ग होंगे, सबके साथ भजन-कीर्तन करूँगा, गपशप होगी… मेरा मन वहाँ खूब लग जाएगा।”

लेकिन वे अपनी आँखों की लाचारी और आवाज का कंपन नहीं छिपा सके। सलोनी ने बिना कुछ कहे उस ट्रंक को खोला, उसमें से अपनी नानी की तस्वीर निकाली, उसे अपने सीने से लगाया और फिर नानाजी के दोनों ठंडे, झुर्रीदार हाथों को अपने हाथों में थाम लिया।

“नानाजी, आपको किसी अनजानी जगह जाने की कतई जरूरत नहीं है। उस आश्रम में कोई आपका अपना नहीं है। आप मेरे साथ मेरे घर चलेंगे,” सलोनी ने बेहद शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा।

रामरतन जी हक्के-बक्के रह गए। उनके चेहरे पर घबराहट की लकीरें उभर आईं। वे बोले, “पागल हो गई है क्या सलोनी? तू ब्याही हुई बेटी है। ससुराल में तेरी अपनी एक गृहस्थी है, सास-ससुर हैं, पति हैं। हमारे समाज में नाना या दादा कभी अपनी बेटी या नातिन के घर आश्रय नहीं लेते। मेरी वजह से तेरे वैवाहिक जीवन में कोई कड़वाहट आ जाए, यह मैं जीते जी कभी बर्दाश्त नहीं करूँगा। लोग क्या कहेंगे?”

सलोनी की आँखों में पानी भर आया, लेकिन उसकी आवाज में गजब का आत्मविश्वास था। उसने नानाजी के होठों पर अपनी उँगली रख दी और बोली, “नानाजी, जब माँ गुजर गई थीं और मैं रात को रोती थी, तो आप मुझे अपनी छाती से लगाकर लोरियाँ सुनाते थे। जब मेरी शादी हुई, तो आपने अपनी सारी जमापूँजी मेरे कन्यादान में लगा दी और कहा था कि यह घर हमेशा मेरा रहेगा। क्या आपने कभी मुझे पराया समझा? क्या कभी मुझे अपनी जिम्मेदारी का बोझ माना? फिर आज जब आपको एक सहारे की जरूरत है, तो मैं समाज के दकियानूसी नियमों की दुहाई देकर आपको इस हाल में कैसे छोड़ दूँ? अगर बेटा या नाती सेवा करे तो धर्म, और बेटी या नातिन संभाले तो शर्म? यह कैसी रीत है?”

रामरतन जी के सब्र का बाँध टूट गया। वे एक छोटे बच्चे की तरह फफक-फफक कर रो पड़े। सलोनी ने उन्हें कसकर अपने आगोश में ले लिया।

सलोनी ने उसी पल अपने पति, मयंक, को फोन मिलाया। मयंक शहर की एक निजी कंपनी में काम करता था और एक संवेदनशील इंसान था। सलोनी ने बिना किसी लाग-लपेट के घर के हालात और अपनी भावनाएँ मयंक के सामने रख दीं। फोन के दूसरी तरफ कुछ सेकंड की चुप्पी रही, जिससे सलोनी की धड़कनें तेज हो गईं।

लेकिन मयंक ने जो कहा, उसने सलोनी की आँखों में कृतज्ञता के आँसू ला दिए। मयंक ने कहा, “सलोनी, तुमने यह फैसला लेने से पहले मुझसे इजाजत क्यों माँगी? नानाजी सिर्फ तुम्हारे नहीं, हमारे बुजुर्ग हैं। जिस इंसान ने तुम्हें इतना सुंदर संस्कार और जीवन दिया, उनकी सेवा करना हमारे लिए सौभाग्य की बात है। तुम बिना किसी संकोच के उन्हें लेकर गाड़ी में बैठो। मैं माँ-बाबूजी से बात करके नीचे वाला हवादार कमरा तैयार करवाता हूँ।”

जब सलोनी अपने नानाजी का हाथ पकड़कर घर से बाहर निकलने लगी, तो गौरव और उसकी पत्नी बैठक से बाहर आए। गौरव के चेहरे पर झेंप और थोड़ा गुस्सा था, “सलोनी, यह क्या तमाशा है? लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे कि हम अपने बुजुर्ग को नहीं रख पाए?”

सलोनी पलटी और उसने गौरव की आँखों में सीधे देखा, “तमाशा मैंने नहीं, तुम्हारी संवेदनहीनता ने खड़ा किया है भैया। जो इंसान कल तुम्हारे लिए एक गैर-जरूरी बोझ था, आज उसके जाने पर तुम्हें सिर्फ अपनी झूठी लोक-लाज की चिंता है? तुम्हें मुबारक हो यह बड़ा मकान, मैं अपने भगवान को अपने साथ ले जा रही हूँ।”

गाड़ी जब मयंक के घर के सामने रुकी, तो रामरतन जी के कदम चौखट पर ठिठक गए। उनके मन में अब भी एक अनजाना संकोच और भय था कि न जाने समधी-समधन का क्या व्यवहार होगा। लेकिन तभी दरवाजा खुला और मयंक के माता-पिता बाहर मुस्कुराते हुए आ गए।

मयंक की माँ ने आगे बढ़कर तुरंत रामरतन जी के पैर छुए और उनका हाथ अपने हाथों में ले लिया, “आइए बाबूजी, अपने ही घर में आने के लिए इतनी झिझक कैसी? हमारे घर में तो कब से किसी बड़े-बुजुर्ग का साया नहीं था। आज आपके आने से यह मकान सच मायने में घर बन गया। चलिए, अंदर चलिए, मैंने आपके लिए गर्म तुलसी की चाय बनाई है।”

मयंक के पिता ने मुस्कुराते हुए कहा, “बाबूजी, अब शाम को मेरे साथ बैठकर अखबार पर बहस करने वाला कोई साथी मिल गया। मुझे तो मयंक और सलोनी पर गर्व है कि वे आपको यहाँ ले आए।”

घर का माहौल इतना सहज, सम्मानजनक और आत्मीय था कि रामरतन जी के मन का सारा संकोच आँसुओं के साथ धुल गया। उन्हें लगा जैसे किसी तपती दोपहर के बाद वे एक घने, शीतल बरगद की छाँव में आ गए हों। उन्हें वह कमरा दिया गया जिसकी खिड़की से बगीचे के हरे-भरे पेड़ और फूल दिखते थे।

उस रात, जब पूरा घर शांत हो गया, सलोनी एक कटोरी में सरसों का गुनगुना तेल लेकर नानाजी के कमरे में आई। रामरतन जी बिस्तर पर लेटे दीवार पर टिकी जानकी जी की तस्वीर को निहार रहे थे। सलोनी चुपचाप उनके सिरहाने बैठ गई और उनके सफेद बालों में आहिस्ते-आहिस्ते तेल की मालिश करने लगी।

रामरतन जी ने करवट ली और भरभराई आवाज में पूछा, “बिटिया, दिन भर की भागदौड़ के बाद तू थक गई होगी। तू जाकर आराम कर ले। मेरे लिए इतना कष्ट मत उठा।”

सलोनी मुस्कुराई, उसने झुककर उनके माथे को चूमा और बेहद कोमलता से कहा, “नानाजी, जब बचपन में मैं बीमार पड़ती थी, तो आप पूरी रात अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे जागकर काट देते थे। क्या आपको तब थकान नहीं होती थी? दुनिया कहती है कि शादी के बाद बेटियाँ पराई हो जाती हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि संस्कार और प्यार कभी विदा नहीं होते। आज जब मैं आपकी सेवा कर रही हूँ, तो मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मुझे दुनिया का सबसे बड़ा सुकून मिल गया हो। आपकी गोद में जब सिर रखूँगी, तो मेरी सारी थकान एक पल में उड़ जाएगी।”

रामरतन जी ने अपने काँपते, झुर्रीदार हाथ आगे बढ़ाए और सलोनी के सिर पर रख दिए। उनके होंठों से केवल आशीर्वाद फूट रहे थे। बरसों बाद आज उनकी गोद किसी अपने को सुकून देने के लिए फिर से तैयार थी।

शादी की रस्मों ने बेटी का घर जरूर बदला था, लेकिन उसकी रगों में बहने वाले संस्कारों और प्यार को नहीं। आज वक्त ने करवट बदली थी, और एक नवासी ने अपनी ममता और निष्ठा से यह साबित कर दिया था कि बुढ़ापे की लाठी बनने का हक सिर्फ बेटों का नहीं, बेटियों का भी उतना ही होता है।

माता-पिता या घर के बुजुर्ग कोई ऐसी पुरानी वस्तु नहीं होते जिन्हें अपनी जरूरत खत्म होने पर किसी कोने या वृद्धाश्रम में फेंक दिया जाए। वे तो उस विशाल वृक्ष की तरह हैं, जिसकी जड़ों ने हमें जीवन दिया है। आज के आधुनिक समाज में, क्या एक बुजुर्ग को अपने ही बच्चों के घर में सम्मान से जीने का अधिकार नहीं होना चाहिए? क्या शादी के बाद बेटियों को अपने माता-पिता और बुजुर्गों का सहारा बनने की पूरी आजादी नहीं मिलनी चाहिए? इस विषय पर आपकी क्या राय है, हमें अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें।

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