धूप-छाँव की देहरी

“सही कह रही हो मनोरमा। आज की बहुओं को सास-ससुर फूटी आँख नहीं सुहाते। ज़रूर रागिनी ने ही शर्त रखी होगी कि जब तक तुम्हारे माँ-बाप घर खाली नहीं करेंगे, मैं पाँव नहीं रखूँगी। तभी तो बेचारी सुमित्रा को भरी दुपहरी से पहले ही घर छोड़ना पड़ा। ऊपर से नाम लगा दिया बेटी का! अरे बेटी को मदद चाहिए थी, तो क्या बेटा-बहू से दो दिन मिलकर नहीं जा सकती थी?”

सुमित्रा जी के पुश्तैनी मकान की पुरानी लोहे की सांकल जब भी खड़कती, तो पूरी गली में उसकी आवाज़ गूँज जाती थी। शांत, एकांत से भरे कस्बे के उस मोहल्ले में हर किसी की नज़र दूसरों के आँगन पर यूँ ही सहज भाव से टिकी रहती थी। सुबह की पहली किरण अभी नीम के पत्तों से छनकर ज़मीन पर उतरी ही थी कि मनोरमा अपने हाथों में पूजा की थाली लिए मंदिर की ओर बढ़ रही थी। अचानक उसकी नज़र सामने वाले मकान पर पड़ी।

पचहत्तर साल के हरिशंकर जी कंधे पर भूरे रंग का भारी पिट्ठू बैग टाँगे बाहर निकल रहे थे और पीछे-पीछे उनकी पत्नी सुमित्रा जी अपने आंचल से चश्मे का शीशा पोंछते हुए मुख्य दरवाज़े पर पीतल का भारी ताला जड़ रही थीं। दोनों की उम्र की ढलान उनके धीमे कदमों और झुकी हुई कमर से साफ़ झलक रही थी।

“अरे सुमित्रा जी! इतनी सुबह-सुबह आप दोनों पति-पत्नी थैला-झोला उठाकर कहाँ की तैयारी कर चुके? हम तो आज दोपहर में आपके यहाँ आने की सोच रहे थे। हमारे दामाद जी ने शहर से जो बनारसी साड़ियाँ भेजी थीं, सोचा था आपको दिखाते चलें।” मनोरमा ने अपनी उत्सुकता दबाए बिना दरवाज़े के करीब पहुँचकर पूछा।

सुमित्रा जी ने सिर पर पल्लू ठीक किया और हल्की सी थकी हुई मुस्कान बिखेरते हुए बोलीं, “अरे मनोरमा बहन, क्या बताएं। छोटी बिटिया नैना का कल रात ही फ़ोन आया था। दामाद जी की पदोन्नति के बाद अब उनका नया ट्रांसफर दूसरे शहर में हो गया है। बिटिया के दोनों बच्चे अभी छोटे हैं—एक तो बमुश्किल तीन साल का है और दूसरा साल भर का। घर का सारा सामान समेटना, बच्चों को संभालना और ऊपर से दामाद जी की तबीयत भी कुछ नासाज़ चल रही है। बिटिया अकेली सब कैसे संभालेगी? कभी उसकी सास जाकर हाथ बंटा आती हैं, तो कभी हमारी बारी आ जाती है। हम दोनों बस उसी के पास जा रहे हैं, कम से कम पंद्रह-बीस दिन तो लगेंगे ही।”

हरिशंकर जी ने घड़ी देखते हुए कहा, “चलो भाग्यवान, ऑटो वाला मोड़ पर खड़ा इंतज़ार कर रहा होगा। स्टेशन समय से नहीं पहुँचे तो पैसेंजर ट्रेन निकल जाएगी।”

मनोरमा ने सहानुभूति जताते हुए कहा, “हाँ-हाँ, जाइए भाई। बेटियाँ भी तो अपनी ही होती हैं। पर इस उम्र में आप दोनों की भागदौड़ देखकर सचमुच दया आ जाती है।”

दोनों बुजुर्ग हाथ जोड़कर गली के नुक्कड़ की तरफ बढ़ गए। मनोरमा कुछ देर वहीं खड़ी उन्हें देखती रही और फिर मन ही मन बुदबुदाती हुई मंदिर की ओर बढ़ गई।

दिन के करीब बारह बजे थे। सूरज सिर पर चढ़ आया था। मनोरमा अपनी छत पर पापड़ सुखाने गई थी कि अचानक उसकी नज़र हरिशंकर जी के घर पर पड़ी। उसने जो देखा, उस पर उसे अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हुआ। घर का मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था और बरामदे में एक बड़ी सी गाड़ी खड़ी थी, जिसकी डिक्की से सामान उतारा जा रहा था।

“अरे! ये क्या तमाशा है? अभी चार घंटे पहले तो दोनों बुज़ुर्ग स्टेशन के लिए निकले थे। क्या ट्रेन छूट गई जो इतनी जल्दी लौट आए?” सोचते हुए मनोरमा उत्सुकतावश अपनी साड़ी का पल्लू संभालती हुई फौरन नीचे उतर आई और सीधे हरिशंकर जी के दरवाज़े पर जा पहुँची।

उसने दरवाज़े की कुंडी खटखटाई, “सुमित्रा जी! अरे ओ सुमित्रा जी! ट्रेन नहीं मिली क्या?”

अंदर से आवाज़ आई, “कौन है? आइए…”

सामने जो चेहरा उभरा, उसे देखकर मनोरमा के कदम ठिठक गए। सामने हरिशंकर जी या सुमित्रा जी नहीं, बल्कि उनका बड़ा बेटा निशांत खड़ा था। उसके पीछे उसकी पत्नी रागिनी पानी का गिलास लिए आ रही थी।

“अरे निशांत बेटा, तुम? और रागिनी बहू, तुम दोनों कब आए?” मनोरमा ने हैरान होकर पूछा।

“अरे मनोरमा चाची, नमस्ते! हम बस आधा घंटा पहले ही शहर से पहुँचे हैं। आइए न अंदर बैठिए,” रागिनी ने मुस्कुराते हुए आग्रह किया।

मनोरमा ने चौखट के भीतर कदम तो रखा, पर उसका दिमाग तेज़ी से दौड़ रहा था। उसने सीधे पूछा, “बेटा, तुम दोनों अभी-अभी शहर से अपनी इतनी लंबी यात्रा करके आए हो, और तुम्हारे बाबूजी और माँ तो सुबह सात बजे ही अपनी गठरी उठाकर तुम्हारी छोटी बहन नैना के घर के लिए निकल गए! क्या उन्हें पता नहीं था कि तुम दोनों इतने दिनों बाद गाँव आ रहे हो?”

निशांत ने मुस्कुराते हुए पानी का घूंट भरा और बड़ी सहजता से कहा, “हाँ चाची, उन्हें बिल्कुल पता था। बल्कि हमारा आना तय था, इसीलिए तो वे सुबह निकले। उनका जाना बहुत ज़रूरी था। हमारे पास घर की दूसरी चाबी हमेशा रहती है, तो हम लोग जब-तब बिना किसी झिझक के आ जाते हैं। इसमें कोई अचरज की बात नहीं।”

मनोरमा के चेहरे पर अविश्वास की लकीरें खिंच गईं। उसने कहा, “पता था? फिर भी रुक नहीं सके? बेटा-बहू महीनों बाद घर आएं और माँ-बाप मुँह मोड़कर बेटी के यहाँ चले जाएं? यह कैसा रिश्ता है भाई!”

रागिनी ने बीच में टोकते हुए नरमी से कहा, “चाची जी, ऐसी कोई बात नहीं है। आप बैठिए, मैं आपके लिए ठंडा पानी लाती हूँ।”

लेकिन मनोरमा का मन अब वहाँ बैठने का नहीं था। उसके मन में संदेह का कीड़ा कुलबुलाने लगा था। वह बोली, “नहीं-नहीं बहू, मुझे घर में दाल चढ़ानी है। मैं तो बस ताला खुला देखकर चली आई थी। तुम लोग आराम करो।”

मनोरमा उलटे पाँव अपने घर लौट आई, लेकिन उसका पेट इस बात को पचा नहीं पा रहा था। शाम होते-होते वह मोहल्ले की दूसरी पड़ोसन कौशल्या के दालान में जा बैठी। वहाँ तीन-चार औरतें पहले से ही शाम की चाय पर गपशप कर रही थीं। मनोरमा ने मौका पाते ही सुमित्रा जी के घर का किस्सा छेड़ दिया।

“अरे कौशल्या, ज़माना कितना खराब आ गया है, तुमने देखा हरिशंकर जी के घर का हाल? सुबह-सुबह बुढ़ाऊ और बुढ़िया दोनों को बोरिया-बिस्तर समेटकर बेटी के घर भेज दिया गया और दोपहर होते ही बेटा-बहू ठाठ से कार लेकर घर में दाखिल हो गए! बेटा खुद अपने मुँह से कह रहा था कि माँ-बाप को पता था कि हम आ रहे हैं, फिर भी वे चले गए। सोचो जरा, बेटा-बहू अपने बूढ़े माँ-बाप का मुँह तक नहीं देखना चाहते! साथ रहना तो दूर, एक ही छत के नीचे दो दिन गुज़ारना भी उन्हें गवारा नहीं। कैसी औलादें हैं आजकल की!”

कौशल्या ने भी अपनी सुई में धागा पिरोते हुए हामी भरी, “सही कह रही हो मनोरमा। आज की बहुओं को सास-ससुर फूटी आँख नहीं सुहाते। ज़रूर रागिनी ने ही शर्त रखी होगी कि जब तक तुम्हारे माँ-बाप घर खाली नहीं करेंगे, मैं पाँव नहीं रखूँगी। तभी तो बेचारी सुमित्रा को भरी दुपहरी से पहले ही घर छोड़ना पड़ा। ऊपर से नाम लगा दिया बेटी का! अरे बेटी को मदद चाहिए थी, तो क्या बेटा-बहू से दो दिन मिलकर नहीं जा सकती थी?”

एक अन्य महिला ने आह भरते हुए कहा, “कलियुग है भाई, कलियुग! जिन माँ-बाप ने खून-पसीना एक करके बेटे को इंजीनियर बनाया, शहर में फ्लैट दिलाया, आज वही माँ-बाप अपने ही पुश्तैनी घर में मुसाफ़िर बन गए हैं। बेटा आता है तो माँ-बाप को बाहर जाना पड़ता है।”

पूरी महफ़िल में निशांत और रागिनी को स्वार्थी, बेमुरव्वत और संस्कारहीन साबित करने की होड़ लग गई। सबने अपनी-अपनी कल्पना के रंग भरकर कहानी को इतना कड़वा बना दिया कि सुनने वाले को लगे कि सुमित्रा जी पर घोर अत्याचार हो रहा है।

अगले दिन सुबह मनोरमा से रहा नहीं गया। वह यह देखने के लिए फिर हरिशंकर जी के घर पहुँची कि देखें आज बेटा-बहू क्या कर रहे हैं। उसने सोचा कि शायद बहू आराम फरमा रही होगी और बेटा हुक्म चला रहा होगा।

जब वह मुख्य द्वार पर पहुँची, तो उसने देखा कि घर के अंदर अजीब सी गहमागहमी थी। कोई आराम नहीं चल रहा था, बल्कि घर के आँगन में बिजली का मिस्त्री, प्लंबर और एक बढ़ई काम कर रहे थे।

आँगन में पुराने सीलन भरे बाथरूम की दीवारें तोड़ी जा रही थीं। निशांत खुद पुरानी टी-शर्ट और पजामे में पसीने से लथपथ होकर मलबे को हटाने में मजदूरों की मदद कर रहा था। दूसरी तरफ, रागिनी रसोई के पुराने, धुएँ से काले पड़े कोनों को साफ़ करवा रही थी और बढ़ई से कह रही थी, “भैया, इस शेल्फ को थोड़ा नीचे बनाइएगा, ताकि माँ जी को डिब्बे उतारने में हाथ ऊपर न खींचना पड़े। उनके कंधों में बहुत दर्द रहता है।”

मनोरमा दरवाज़े पर ही ठिठक गई। उसने हैरान होकर पूछा, “अरे निशांत! यह सब क्या हो रहा है? घर में तोड़-फोड़ क्यों मची है?”

निशांत ने पसीना पोंछते हुए चाची को देखा और हाथ जोड़कर बोला, “प्रणाम चाची जी। आइए, बैठिए। बस यह थोड़ा घर का जीर्णोद्धार करवा रहे हैं।”

“जीर्णोद्धार? पर बेटा, तुम तो शहर से आराम करने आए थे न? छुट्टियाँ बिताने आए थे। और सुमित्रा जी के जाने के तुरंत बाद यह सब?” मनोरमा की आँखों में अब भी शक था।

निशांत ने एक कुर्सी झाड़कर मनोरमा के आगे रख दी और खुद एक टूटे हुए पीढ़े पर बैठ गया। उसके चेहरे पर एक गंभीर और बेहद संवेदनशील भाव उभर आया।

उसने कहा, “चाची जी, कल जब आप आई थीं, तो मैंने देखा था कि आपके मन में कई सवाल थे। शायद आप ही नहीं, पूरे मोहल्ले को लग रहा होगा कि हम कैसे असंवेदनशील बच्चे हैं जो माँ-बाप के रहते घर नहीं आए और उनके जाते ही आ धमके।”

मनोरमा झेंप गई, पर उसने कुछ कहा नहीं।

निशांत ने गहरी साँस ली और कहना शुरू किया, “चाची जी, बाबूजी की उम्र अस्सी के करीब पहुँच रही है और माँ भी पचहत्तर की हो चुकी हैं। बाबूजी के घुटनों का ऑपरेशन होना है, पर वे इस उम्र में अस्पताल जाने से डरते हैं। हमारा यह पुराना पुश्तैनी मकान बहुत सुंदर है, पर इसमें बनी पुरानी सीढ़ियाँ और ऊँचा भारतीय शैली का शौचालय अब उनके कमजोर जोड़ों के लिए किसी सज़ा से कम नहीं था। पिछले महीने जब मैं यहाँ आया था, तो मैंने देखा कि माँ रात के अँधेरे में सीढ़ियों पर फिसलते-फिसलते बचीं। बाबूजी को उठने-बैठने में इतनी तकलीफ़ होती है कि वे कई बार दर्द के मारे कराह उठते हैं, पर हमसे कभी कुछ नहीं कहते कि कहीं बच्चे परेशान न हों।”

निशांत की आवाज़ थोड़ी भर्रा गई। उसने आगे कहा, “मैंने शहर में उनके लिए फ्लैट में कमरा तैयार करवाया, पर बाबूजी कहते हैं कि उस कंक्रीट के डिब्बे में उनका दम घुटता है। वे अपनी ज़िंदगी की आखिरी साँसें इसी पुश्तैनी मिट्टी, इसी आँगन और अपने पुराने दोस्तों के बीच लेना चाहते हैं। जब वे हमारे पास रहने को तैयार नहीं हुए, तो रागिनी और मैंने तय किया कि हम इस घर को उनके रहने लायक सुरक्षित बनाएंगे।”

“तो फिर उन्हें भेज क्यों दिया? उनके सामने भी तो काम हो सकता था?” मनोरमा ने धीरे से पूछा, उसकी आवाज़ में अब पहले जैसी तल्ख़ी नहीं थी।

रागिनी हाथ में चाय की ट्रे लिए बाहर आई। उसने एक कप मनोरमा को थमाते हुए बहुत आदर से कहा, “चाची जी, अगर माँ जी और बाबूजी यहाँ रहते, तो क्या वे कभी हमें यह सब करने देते? बाबूजी एक-एक पैसे का हिसाब रखने वाले पुराने इंसान हैं। वे कहते कि ‘हमारा बुढ़ापा तो कट ही गया, अब घर में पैसे बर्बाद करने की क्या ज़रूरत है?’ दूसरी बात, धूल, सीमेंट, पेंट की गंध और दिनभर की खट-पट… इस उम्र में उनके फेफड़े और उनका स्वास्थ्य यह सब बर्दाश्त नहीं कर पाता। और सबसे बड़ी बात, बाबूजी का स्वाभिमान। अगर वे यहाँ रहते, तो खुद बीमार घुटनों से मज़दूरों के पीछे भागते, सामान उठाते और अपनी तबीयत और बिगाड़ लेते।”

निशांत ने बात आगे बढ़ाई, “नैना को सचमुच हमारी ज़रूरत थी। उसके बच्चे छोटे हैं और दामाद जी का तबादला हो गया है। तो हमने पूरी योजना बनाई। नैना ने माँ-बाबूजी को बुला लिया ताकि वे वहाँ नाती-पोतों के साथ हँसी-खुशी वक़्त बिता सकें और बिटिया का सहारा भी बन जाएं। इस तरह उन्हें यह भी नहीं लगा कि उन्हें घर से हटाया जा रहा है, बल्कि उन्हें लगा कि वे अपनी बेटी के काम आ रहे हैं। बड़ों को जब यह महसूस होता है कि परिवार को आज भी उनकी ज़रूरत है, तो उनकी उम्र दस साल बढ़ जाती है।”

रागिनी की आँखों में चमक थी, उसने आँगन की ओर इशारा करते हुए कहा, “देखिए चाची जी, हम यहाँ क्या करवा रहे हैं। नीचे वाले कमरे के साथ ही एक वेस्टर्न टॉयलेट बनवा रहे हैं, जिसमें चारों तरफ पकड़ने के लिए सेफ्टी रॉड्स लगेंगी ताकि बाबूजी बिना किसी सहारे के खुद जा सकें। फर्श पर एंटी-स्किड टाइलें लग रही हैं ताकि फिसलने का डर न रहे। पूरे घर में इन्वर्टर की नई वायरिंग करवा दी है ताकि गर्मियों में बिजली जाने पर माँ को पंखा न झलना पड़े। और रसोई में मॉड्यूलर फिटिंग्स करवा रहे हैं ताकि माँ को झुकना न पड़े।”

निशांत ने मुस्कुराते हुए कहा, “हम दोनों ने अपने दफ़्तर से पंद्रह दिन की छुट्टी सिर्फ़ इसीलिए ली है ताकि यहाँ खड़े रहकर हर काम अपनी निगरानी में करवा सकें। जब पंद्रह दिन बाद नैना के यहाँ से बाबूजी और माँ लौटेंगे, तो उन्हें यह घर बाहर से तो वही उनका प्यारा पुश्तैनी आशियाना दिखेगा, पर अंदर से वह उनके बुढ़ापे की लाठी बन चुका होगा। हम उनके आने से पहले सब कुछ साफ़-सुथरा करके, उनके बिस्तरों पर नई चादरें बिछाकर उनका स्वागत करेंगे।”

मनोरमा के हाथ में चाय का कप कांप रहा था। उसके गले में जैसे कोई गोला अटक गया था। उसे अपने उन तमाम शब्दों पर, जो उसने कल शाम कौशल्या के दालान में कहे थे, घोर पश्चाताप होने लगा। उसने जिन बच्चों को कल ‘कलियुगी और बेमुरव्वत’ कहा था, वे तो वास्तव में श्रवण कुमार की तरह अपने माता-पिता के स्वाभिमान और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए चुपचाप पसीना बहा रहे थे। बिना किसी दिखावे के, बिना किसी आत्म-प्रशंसा के।

मनोरमा ने भर आई आँखों से निशांत के सिर पर हाथ रखा और थरथराती आवाज़ में बोली, “बेटा निशांत… बहू रागिनी… मुझे माफ़ कर देना। हम दुनिया वाले कितने अंधे होते हैं। हम सिर्फ़ वही देखते हैं जो हमारी छोटी और संकीर्ण सोच हमें दिखाना चाहती है। बंद दरवाज़े और ताले को देखकर हमने न जाने क्या-क्या ताने बुन लिए, जबकि उस ताले के पीछे तो तुम दोनों का अथाह प्रेम और त्याग छुपा था। तुमने आज मेरी आँखें खोल दीं।”

रागिनी ने मनोरमा के हाथ थाम लिए और कहा, “नहीं चाची जी, माफ़ी मत मांगिए। दुनिया बाहर से जो देखती है, वही सोचती है। पर हमारा मानना है कि माता-पिता की सेवा का ढिंढोरा पीटने से बेहतर है कि उनकी ज़रूरतों को इस तरह पूरा किया जाए कि उनके आत्मसम्मान को कभी ठेस न पहुँचे। वे हमें बड़ा करते हुए कभी अहसान नहीं जताते, तो हम उनका ख्याल रखते हुए ढोल क्यों पीटें?”

मनोरमा उस दिन चाय पीकर जब वापस लौटी, तो वह सीधी अपने घर नहीं गई। वह सीधे कौशल्या के दालान की तरफ मुड़ गई। आज उसे उन औरतों के सामने एक नया सच रखना था। उसे बताना था कि हर दिखता हुआ अकेलापन तिरस्कार नहीं होता, कभी-कभी वह अपनों के गहरे प्रेम और समझदारी का परिणाम होता है।

शाम को जब गली में दोबारा वही औरतें बैठीं, तो मनोरमा ने पूरी सच्चाई उनके सामने बयां कर दी। जो औरतें कल थू-थू कर रही थीं, आज उनके सिर शर्म से झुके हुए थे और आँखों में निशांत और रागिनी के लिए असीम आदर था।

पंद्रह दिन पंख लगाकर उड़ गए।

मकान का कायाकल्प हो चुका था। दीवारें हल्के बादामी रंग से दमक रही थीं। न कहीं धूल थी, न सीलन की बू। हर तरफ धूप और ताज़ी हवा का बसेरा था। शाम के वक्त एक टैक्सी आकर हरिशंकर जी के दरवाज़े पर रुकी।

गाड़ी से पहले हरिशंकर जी उतरे, फिर उन्होंने सुमित्रा जी को सहारा देकर उतारा। दोनों के चेहरों पर बेटी के घर से लौटने की तृप्ति भी थी और अपने घर वापस आने का सुकून भी।

जैसे ही हरिशंकर जी ने दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाए, दरवाज़ा अंदर से खुला। सामने निशांत और रागिनी हाथ में आरती की थाली लिए खड़े थे।

“अरे! तुम दोनों अभी तक यहीं हो? गए नहीं?” हरिशंकर जी ने आश्चर्य से पूछा।

रागिनी ने झुककर दोनों के पाँव छुए और बोली, “बाबूजी, अपने घर के मालिकों का स्वागत किए बिना हम कैसे चले जाते?”

जब सुमित्रा जी और हरिशंकर जी ने घर के भीतर कदम रखा, तो वे हक्के-बक्के रह गए। सीढ़ियों पर लगी मजबूत रेलिंग, नीचे बना आधुनिक और सुरक्षित बाथरूम, रसोई की सुगमता और उनके कमरे में लगा आरामदायक गद्दा… हर एक चीज़ उनके बुढ़ापे के दर्द को हरने के लिए तैयार की गई थी।

हरिशंकर जी ने जब यह सब देखा, तो उनकी बूढ़ी आँखें छलक पड़ीं। उन्होंने कांपते हाथों से अपने बेटे को सीने से लगा लिया। वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे, बस उनकी पीठ थपथपा रहे थे।

सुमित्रा जी ने रागिनी को गले से लगाते हुए कहा, “मेरी बच्ची… तूने तो इस पुरानी देहरी को स्वर्ग बना दिया। हम तो सोच रहे थे कि तुम दोनों हमसे मिले बिना चले गए, और तुम यहाँ हमारे लिए यह सब कर रहे थे?”

गली के मोड़ पर खड़ी मनोरमा और मोहल्ले के लोग यह दृश्य देख रहे थे। आज उस घर के आँगन में कोई ताला नहीं था, बल्कि वहाँ सम्मान, समझदारी और संस्कारों की एक ऐसी धूप खिली थी, जिसने हर देखने वाले के दिल को आलोकित कर दिया था। परिवार केवल साथ बैठकर खाना खाने का नाम नहीं है, परिवार तो एक-दूसरे की खामोश ज़रूरतों को बिना कहे समझ लेने और उनका मान रखने का नाम है।

पाठकों से संवाद:

अक्सर हम बाहर से देखकर किसी भी परिवार और रिश्तों के बारे में अपनी राय बना लेते हैं। क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि जिसे आपने गलत समझा, उसके पीछे कोई बेहद खूबसूरत और नेक इरादा निकला हो? माता-पिता के स्वाभिमान को ठेस पहुँचाए बिना उनकी सेवा करने के इस तरीके पर आपकी क्या राय है? हमें अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं।

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मूल लेखिका 

रश्मि प्रकाश 

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