सामने का नजारा उनकी सोच की धज्जियां उड़ा रहा था। जमीन पर गिरा, धूल में लथपथ, गिड़गिड़ाता हुआ वह शख्स वही सुसंस्कृत, इत्र की खुशबू वाला, सभ्य विक्रम सेठ था, जिसकी नजरें शर्म और खौफ से जमीन में गड़ी थीं। और उसके ऊपर, अपनी जान की परवाह किए बिना उस रईस को दबोचे बैठा वह इंसान कोई और नहीं, वही कुरूप, भयानक दिखने वाला मुंशी मंगलू था, जिसे सब दरिंदा और कठोर दिल समझते थे।
शहर की सीमा पर ईंट-भट्ठे की चिमनियों से उठता काला धुआँ आसमान की छाती पर मानों गरीबी और लाचारी की इबारत लिख रहा था। उसी भट्ठे के ठीक पीछे, बंजर पड़ी पथरीली जमीन पर तीस-चालीस फूस और तिरपाल की झुग्गियां कतार में खड़ी थीं। इन्हीं कच्ची झोपड़ियों में सांस लेती थी उन बेबस मजदूरों की ज़िंदगी, जो दिनभर तपती धूप में पसीना बहाकर दूसरों के सपनों के आशियाने की ईंटें तैयार करते थे।
इन्हीं में से एक झुग्गी थी गंगू की। पचास पार का गंगू, उसकी पत्नी पार्वती और उनका अठारह साल का बेटा सूरज, सुबह सूरज निकलने से लेकर सांझ ढलने तक भट्ठे की चिकनी मिट्टी को गूंथते, सांचों में ढालते और धूप में सुखाते। इस परिवार की सबसे नन्हीं जान थी दस बरस की मुन्नी। मुन्नी बहुत मासूम, बड़ी-बड़ी कजरारी आँखों वाली चंचल बच्ची थी। गरीबी ने उसके बदन पर फटे और मटमैले कपड़े जरूर डाल दिए थे, पर उसकी मुस्कान में पूरे जहाँ की मासूमियत झलकती थी।
भट्ठे पर काम बहुत कठिन था। पार्वती और गंगू सुबह जल्दी निकलते तो मुन्नी के सिर पर हाथ फेरते हुए हमेशा एक ही हिदायत देते, “बिटिया, जब तक हम लौट न आएँ, झोपड़ी से बाहर मत निकलना। बाहर की दुनिया बहुत जालिम है।” दरवाजे के नाम पर बांस की खपच्चियों को पुराने बोरे से सिलकर बनाया गया एक पर्दा लटका रहता था, जिसे भीतर से एक भारी पत्थर टिकाकर बंद कर दिया जाता था। वही पर्दा उस मासूम की दुनिया और बाहर के भेड़ियों के बीच की एकमात्र दीवार थी।
उस भट्ठे पर काम की देखरेख का जिम्मा था मंगलू पर। मंगलू भट्ठे का पुराना मुंशी और सुपरवाइजर था। उसका कद लंबा, चौड़ा डील-डौल, चेहरे पर चेचक के गहरे दाग और एक आँख पर कटे का गहरा निशान था। मुँह में हमेशा कड़वा तंबाकू दबाए रहने के कारण उसके होंठ काले और दांत बदरंग दिखते थे। आवाज इतनी भारी और कर्कश थी कि जब वह चिल्लाता तो बच्चे सहम जाते थे।
जब भी मंगलू मुन्नी की झुग्गी के पास से गुजरता, वह अपनी रूखी आवाज में जोर से कहता, “अरे ओ लड़की! अंदर क्या बैठी है? बाहर आ, देख तेरे लिए क्या लाया हूँ।” कभी वह अपनी खुरदरी जेब से गुड़ की डली निकालता तो कभी मेले से खरीदी कोई सस्ती सी रंगीन चूड़ी। पर जब भी वह अपने बदरंग दांत दिखाकर हंसता, मुन्नी के रोंगटे खड़े हो जाते।
मुन्नी जब भी मंगलू को देखती, उसका दिल तेजी से धड़कने लगता। वह फौरन टाट के पर्दे के पीछे छिप जाती। मंगलू बाहर खड़ा होकर जोर से हंसता, “बड़ी डरपोक है रे! भागती क्यों है? खा थोड़ी न जाऊँगा!”
मुन्नी ने कई बार शाम को चूल्हे के पास बैठी अपनी माँ पार्वती से कहा था, “माँ, मुझे वह मुंशी मंगलू बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। जब भी वो मुझे देखता है, मुझे बहुत डर लगता है। उसकी आँखें बहुत बुरी लगती हैं माँ।”
पार्वती अपनी बेटी को समझाते हुए कहती, “अरे पगली, वो भले ही देखने में डरावना है और बोलता कड़वा है, पर आदमी बुरा नहीं है। जब तेरे बापू बीमार पड़े थे, तो उसी ने मालिक से कहकर पेशगी दिलवाई थी। तू बस उसके सामने मत जाया कर, डरने की कोई बात नहीं।” लेकिन मुन्नी का बाल-मन उस खुरदुरे चेहरे के पीछे छिपी किसी अनजानी दहशत को महसूस कर लेता था।
इसके बिल्कुल उलट, भट्ठे का मालिक विक्रम सेठ था। विक्रम सेठ शहर का एक नामी गिरामी रईस था। सफेद, बेदाग खादी का कुर्ता-पायजामा, आँखों पर सोने के फ्रेम का चश्मा, कलाई पर कीमती घड़ी और जब भी वह अपनी चमचमाती बड़ी सफेद गाड़ी से उतरता, तो उसके बदन से उठने वाली इत्र की खुशबू पूरे भट्ठे की बदबूदार हवा में घुल जाती थी। वह जब भी मजदूरों से बात करता, बहुत धीमे और मीठे स्वर में बात करता। भट्ठे के आसपास वह समय-समय पर बच्चों के लिए फल, बिस्कुट और खिलौने बंटवाता था।
मुन्नी जब भी विक्रम सेठ को देखती, मंत्रमुग्ध हो जाती। उसे लगता कि परियों की कहानियों में आने वाले भले राजा ऐसे ही होते होंगे। सेठ जी की बड़ी गाड़ी को देखकर वह अक्सर सोचती कि काश एक बार उसे उस ठंडी और खुशबूदार गाड़ी में बैठने का मौका मिल जाए। जब भी सेठ जी भट्ठे पर आते और मुन्नी दूर खड़ी उन्हें निहारती, तो सेठ जी उसकी तरफ देखकर एक बेहद सौम्य और नफीस मुस्कान बिखेर देते। कभी-कभी वे अपनी जेब से कोई महंगी विदेशी चॉकलेट निकालकर मुन्नी की तरफ बढ़ा देते और बड़े प्यार से उसके गाल थपथपा देते।
सूरज और गंगू भी सेठ जी के गुण गाते नहीं थकते थे। गंगू अक्सर कहता, “भगवान ने सेठ जी को दिल भी सोने का दिया है। इतना बड़ा आदमी होकर भी गरीबों से कितने प्यार से पेश आते हैं। वरना आज के जमाने में अमीरों को तो गरीबों की परछाईं से भी नफरत होती है।”
समय अपनी गति से बीत रहा था। चैत्र का महीना था और भट्ठे पर ईंट पकाने का काम अपनी चरम सीमा पर था। भट्ठे की भट्टी में आग धधक रही थी और सभी मजदूर, औरतें और मर्द, दूर खदान से ईंटें ढोने में जुटे हुए थे। दोपहर की तपिश आसमान से आग बरसा रही थी। सूरज, पार्वती और गंगू तीनों काफी दूर वाले गड्ढे में मिट्टी तैयार करने गए थे। भट्ठे की झुग्गियों के आसपास एकदम सन्नाटा पसरा हुआ था। केवल सूखे पत्तों के सरसराने और दूर भट्टी की चिमनी से उठती गरमाहट की आवाज आ रही थी।
मुन्नी अपनी झोपड़ी में अकेली बैठी थी। उसने फटे कपड़ों से एक छोटी सी गुड़िया बनाई थी और उसी से बातें कर रही थी।
तभी झोपड़ी के बाहर हलकी सी आहट हुई। किसी के कदमों की दबी हुई आवाज सूखे तिनकों पर सुनाई दी। मुन्नी का दिल धक से रह गया। उसने सोचा कि शायद मंगलू मुंशी आया होगा। वह डर के मारे झोपड़ी के अंधेरे कोने में दुबक गई और अपनी गुड़िया को सीने से भींच लिया।
लेकिन बांस की खपच्चियों का वह हल्का पर्दा जब एक तरफ हटा, तो अंदर कोई और दाखिल हुआ। सामने सफेद लिबास में विक्रम सेठ खड़े थे। उनके चेहरे पर आज वह हमेशा वाली सौम्य और दयालु मुस्कान नहीं थी। उनकी आँखों में एक अजीब सी, डरावनी चमक थी जो मुन्नी ने पहले कभी नहीं देखी थी।
“अरे मुन्नी बेटी… डर क्यों रही हो? देखो, तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ,” सेठ ने अपनी जेब से एक बहुत बड़ी लाल रंग की डिब्बी निकाली और बेहद धीमी, फुसफुसाती आवाज में कहा।
मुन्नी पीछे हटने लगी, उसकी पीठ मिट्टी की दीवार से जा लगी। उसके नन्हे गले से आवाज ही नहीं निकल रही थी। उसने कांपते हुए कहा, “साहब… बापू और माँ काम पर गए हैं… आप बाहर जाइए…”
“अरे जाने दो उन्हें, आज मैं तुम्हें अपनी उस बड़ी गाड़ी में घुमाने ले चलूँगा। बहुत अच्छी गाड़ी है, बिल्कुल ठंडी… चलो मेरे साथ…” सेठ ने आगे बढ़कर मुन्नी की कलाई कसकर पकड़ ली। उसकी उंगलियों की पकड़ में कोई स्नेह नहीं था, बल्कि एक शिकारी की वहशी जकड़न थी।
मुन्नी दर्द और दहशत से चीखने ही वाली थी कि सेठ के भारी, पसीने से भीगे हाथ ने उसके मुँह को पूरी ताकत से दबा दिया। “चुप! अगर एक आवाज भी निकाली तो जान से मार दूँगा!” सेठ की आवाज में अब वह मिठास कहीं नहीं थी, सिर्फ एक घिनौना, खूंखार जानवर फुंकार रहा था। वह उस दस साल की मासूम बच्ची को जमीन पर घसीटने लगा। मुन्नी की आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा, वह अपनी पूरी ताकत से हाथ-पैर मार रही थी, पर उस हैवान की पकड़ लोहे जैसी मजबूत थी। मासूमियत की अस्मत तार-तार होने की कगार पर थी।
तभी अचानक झोपड़ी का पर्दा तिनके की तरह हवा में उड़ गया।
एक भयानक दहाड़ गूंजी, “अरे नीच! छोड़ उस बच्ची को!”
इससे पहले कि विक्रम सेठ कुछ समझ पाता, एक भारी, खुरदरा हाथ उसकी गर्दन पर पड़ा और उसने सेठ को पीछे की तरफ इतनी जोर से झटका दिया कि सेठ झोपड़ी के बाहर पथरीली जमीन पर जा गिरा।
मुन्नी हाँफती हुई रोने लगी। बाहर आकर उसने देखा, वही भयानक दिखने वाला मंगलू मुंशी अपनी पीतल की मूठ वाली छड़ी को एक तरफ फेंककर विक्रम सेठ की छाती पर चढ़ा बैठा था। मंगलू की आँखों में खून उतर आया था। उसका चेहरा गुस्से से इतना विकराल लग रहा था मानो साक्षात काल खड़ा हो।
“तू मालिक है तो क्या भगवान हो गया रे? गरीबों की खून-पसीने की कमाई खाकर भी तेरा पेट नहीं भरा जो इस मासूम बच्ची पर अपनी गंदी नजर डाली? आज मैं तेरी रईसी का सारा नशा उतार दूँगा!” मंगलू ने एक जोरदार घूँसा सेठ के जबड़े पर जड़ दिया।
सेठ का सोने के फ्रेम वाला चश्मा टूटकर दूर जा गिरा। उसके सफेद खादी के कुर्ते पर धूल और खून के लाल धब्बे लग गए। वह गिड़गिड़ाने लगा, “मंगलू… छोड़ मुझे! जितने पैसे चाहिए ले ले… पचास हजार, एक लाख… पर छोड़ मुझे! किसी को मत बताना!”
“थूकता हूँ तेरे पैसों पर!” मंगलू ने दूसरा थप्पड़ रसीद करते हुए गरजा, “हम गरीब हैं, भूखे मर जाएँगे, पर अपनी बेटियों की इज्जत का सौदा नहीं करेंगे!”
शोर और चीख-पुकार सुनकर भट्ठे पर काम कर रहे तमाम मजदूर, फावड़े और तसले फेंककर पागलों की तरह झुग्गियों की तरफ दौड़े। सबसे आगे सूरज और गंगू थे।
जब सूरज ने अपनी झोपड़ी के बाहर धूल का गुबार और दो लोगों को गुत्थम-गुत्था देखा, तो उसके दिमाग में मुन्नी की पुरानी बातें कौंध गईं—’भैया, वो मुंशी मंगलू बहुत बुरा है…’
सूरज की आँखों में खून उतर आया। उसे लगा कि मंगलू ने उसकी बहन के साथ कोई गलत हरकत की है और सेठ जी बीच-बचाव कर रहे हैं। बिना सोचे-समझे, सूरज ने जमीन से एक नुकीला भारी पत्थर उठाया और पूरी ताकत से मंगलू के सिर पर वार करने के लिए दौड़ा, “कमीने मंगलू! आज मैं तुझे जिंदा नहीं छोड़ूँगा!”
“भैया नहीं! रुक जाओ भैया!”
झोपड़ी की चौखट पकड़कर बदहवास रोती हुई मुन्नी की चीख ने सूरज के उठते हुए हाथ को हवा में ही थाम दिया।
सूरज ठिठक गया। उसने मुन्नी की तरफ देखा। मुन्नी काँपते हाथों से उंगली उठाकर, रोते हुए चिल्लाई, “भैया, मंगलू काका को मत मारो! वो… वो सेठ जी… वो मुझे मार रहे थे… मुंशी काका ने मुझे बचाया है भैया! मुंशी काका ने बचाया है!”
यह सुनते ही जैसे पूरे भट्ठे पर सन्नाटा छा गया। सूरज के हाथ से पत्थर छूटकर नीचे गिर पड़ा। गंगू, पार्वती और वहाँ जमा हुए दर्जनों मजदूरों की आँखें फटी की फटी रह गईं।
सामने का नजारा उनकी सोच की धज्जियां उड़ा रहा था। जमीन पर गिरा, धूल में लथपथ, गिड़गिड़ाता हुआ वह शख्स वही सुसंस्कृत, इत्र की खुशबू वाला, सभ्य विक्रम सेठ था, जिसकी नजरें शर्म और खौफ से जमीन में गड़ी थीं। और उसके ऊपर, अपनी जान की परवाह किए बिना उस रईस को दबोचे बैठा वह इंसान कोई और नहीं, वही कुरूप, भयानक दिखने वाला मुंशी मंगलू था, जिसे सब दरिंदा और कठोर दिल समझते थे।
पार्वती दौड़कर अंदर गई और उसने अपनी कांपती बेटी को छाती से चिपटा लिया। दोनों माँ-बेटी फूट-फूटकर रोने लगीं।
मजदूरों का गुस्सा अब सातवें आसमान पर पहुँच चुका था। जिस सेठ को वे भगवान की तरह पूजते थे, उसके इस घिनौने, भेड़िये जैसे रूप को देखकर उनका खून खौल उठा। कुछ नौजवान मजदूर लाठियां लेकर आगे बढ़े, “इस दरिंदे को यहीं खत्म कर दो! इसकी यह हिम्मत कि हमारे बच्चों पर हाथ डाले!”
माहौल बेहद तनावपूर्ण हो चुका था और भीड़ कानून अपने हाथ में लेने ही वाली थी कि तभी मंगलू उठ खड़ा हुआ। उसने अपने हाथ उठाकर सबको रोका। उसके माथे से पसीना बह रहा था और सांसें फूल रही थीं।
मंगलू ने भारी आवाज में कहा, “रुको भाइयों! रुक जाओ! अगर हमने इसे यहाँ मार दिया, तो हम में और इस भेड़िये में क्या फर्क रह जाएगा? कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं। यह रईस सोचता है कि अपनी दौलत और सफेद कपड़ों के पीछे यह अपने काले कारनामों को छिपा लेगा। आज हम इसे पुलिस के हवाले करेंगे और अदालत में घसीटकर इसकी असली जगह दिखाएंगे। इसकी सजा मौत से भी बदतर होगी जब पूरा शहर इसके चेहरे से यह शराफत का नकाब उतरते देखेगा!”
मंगलू की बात में वह सच्चाई और वजन था जिसने उबलती भीड़ को शांत कर दिया। सूरज की आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और मंगलू के पैरों में झुक गया, “काका… मुझे माफ कर दीजिए। मैंने सिर्फ आपकी सूरत देखी, आपकी सीरत नहीं देखी। अगर आज आप न होते… तो मेरी बहन… हमारा पूरा परिवार तबाह हो जाता काका। मैं आपका यह अहसान जिंदगी भर नहीं चुका पाऊँगा।”
मंगलू ने फौरन झुककर सूरज को अपने मजबूत सीने से लगा लिया। उसकी आँखों में भी नमी तैर आई थी। उसने सूरज की पीठ थपथपाते हुए कहा, “पगले, अहसान कैसा? मैं भी एक बाप हूँ। मेरी भी एक बेटी थी जो बीमारी में बिना इलाज के गुजर गई थी। जब भी मैं मुन्नी को देखता था, मुझे अपनी वही गुड़िया याद आती थी। मेरा चेहरा ही ऐसा है बेटा, विधाता ने रूप ऐसा दिया कि लोग डर जाते हैं, पर मेरे सीने में भी एक इंसान का ही दिल धड़कता है। मुन्नी सिर्फ तुम्हारी नहीं, मेरी भी बेटी है।”
कुछ ही देर में पुलिस की सायरन बजाती गाड़ियाँ भट्ठे पर पहुँच गईं। मंगलू और सूरज ने मिलकर विक्रम सेठ को पुलिस के हवाले कर दिया। जब पुलिस उस तथाकथित सभ्य और रईस सेठ को हथकड़ी पहनाकर ले जा रही थी, तो उसका सिर नीचा था और चेहरे पर जमी कालिख उसकी असलियत बयां कर रही थी। भट्ठे के सभी मजदूर आज एक होकर खड़े थे, किसी के मन में उस रईस का खौफ नहीं था।
उस शाम, भट्ठे की हवा में एक अलग ही सुकून था। मुन्नी अब पूरी तरह संभल चुकी थी। वह बाहर चबूतरे पर बैठी थी।
मंगलू जब अपनी छड़ी टेकते हुए वहाँ से गुजरने लगा, तो इस बार मुन्नी भागी नहीं। उसने न तो अपना मुँह छिपाया और न ही डरी। वह दौड़ती हुई आई और उसने अपने नन्हे हाथों से मंगलू की खुरदरी, पसीने से भीगी उंगलियों को कसकर पकड़ लिया।
उसने अपनी जेब से वही पुरानी गुड़िया निकाली और मंगलू की तरफ बढ़ाते हुए अपनी मीठी आवाज में कहा, “काका, यह मेरी सबसे अच्छी सहेली है। यह आज से आपकी हुई।”
मंगलू के कठोर, चेचक के दागों वाले चेहरे पर एक ऐसी दिव्य और निश्चल मुस्कान खिल उठी, जिसने उसके चेहरे की हर कुरूपता को एक पल में धो दिया। उसने झुककर मुन्नी को अपनी गोद में उठा लिया और उसके माथे को चूम लिया।
पार्वती और गंगू हाथ जोड़े खड़े थे। आज उस कच्ची झोपड़ी के आंगन ने एक बहुत बड़ा सबक सीख लिया था—सोना अक्सर मिट्टी में दबा मिलता है, और चमकता हुआ हर पत्थर हीरा नहीं होता। इंसान की पहचान उसके परिधान, उसकी संपत्ति या उसकी खूबसूरत बनावट से नहीं, बल्कि उसकी रूह की पाकीजगी और उसके कर्मों से होती है। सफेदपोश लिबासों में अक्सर भेड़िए छिपे होते हैं, और फटे हाल इंसानों के भीतर कभी-कभी फरिश्ते सांस लेते हैं।
समाज में अक्सर हम किसी व्यक्ति के बाहरी रूप-रंग, उसकी वेशभूषा और उसके मीठे बोल देखकर उसके चरित्र का अंदाजा लगा लेते हैं। लेकिन क्या सचमुच सुंदरता का संबंध अच्छाई से और कुरूपता का संबंध बुराई से होता है? क्या आपने भी कभी किसी इंसान को केवल उसके बाहरी आवरण से आंकने की भूल की है? आपके विचार हमारे लिए अमूल्य हैं, कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें।
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