“मेरा दिमाग अब जाकर सही ठिकाने पर आया है, फैजान। जो लड़की अपने उन माँ-बाप के प्यार और भरोसे की नहीं हो सकी जिन्होंने उसे उंगली पकड़कर चलना सिखाया, वह कल तुम्हारी कैसे हो सकती है? और तुम… अगर तुम मुझसे वाकई सच्चा प्यार करते, तो मुझे इस तरह रात के अंधेरे में अपनों की नजरों में गिराकर भगाने की जगह, दिन के उजाले में मेरे पिता के सामने खड़े होकर मेरा हाथ मांगते। तुमने मुझे चोर बनना सिखाया, हमसफर नहीं।”
दीवार पर टंगी पुरानी पेंडुलम वाली घड़ी में रात के सवा ग्यारह बज चुके थे। कमरे में पसरे घने सन्नाटे के बीच उसकी टिक-टिक की आवाज जैसे सीधे सीने पर हथौड़े की तरह पड़ रही थी। अनन्या अपने बिस्तर पर शांत पड़ी थी, लेकिन उसके अंदर बेचैनी का ऐसा बवंडर उठ रहा था जो किसी भी पल सब कुछ तहस-नहस करने को तैयार था। उसकी मुट्ठियाँ भींची हुई थीं और हथेलियाँ ठंडे पसीने से भीग चुकी थीं। आज वह रात थी जिसका ताना-बाना पिछले पंद्रह दिनों से कॉलेज के पीछे वाली तंग सड़क पर, मोबाइल की धीमी आवाजों में बुना जा रहा था। आज उसे इस घर की दहलीज लांघकर हमेशा के लिए चले जाना था।
उसका प्रेमी फैजान बाहर शहर के मुख्य चौराहे के पास काली गाड़ी लेकर उसका इंतजार करने वाला था। योजना के मुताबिक रात के ठीक बारह बजे घर के पीछे वाले बगीचे की जाली के पास गाड़ी का धीमा हॉर्न दो बार बजना था। वही संकेत था कि अनन्या को चुपचाप पिछले दरवाजे से बाहर निकलना है। उसकी सारी तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं। उसके कुछ जरूरी कपड़े और मार्कशीटें फैजान ने दो दिन पहले ही अपनी बहन के जरिए मंगवा ली थीं। घर से अनन्या को सिर्फ अपनी माँ के अलमारी से निकाले गए कुछ पुश्तैनी जेवर और बैंक से निकाले गए जरूरी रुपये लेकर निकलने थे।
वह छोटा सा लेदर का बैग उसके पलंग के नीचे छिपा हुआ था। अनन्या ने धीरे से झुककर उस बैग को बाहर खींचा। जिप खोलकर देखा तो सोने के वो कंगन चमक रहे थे जो उसकी माँ, जानकी देवी, ने पिछले साल अपनी बरसों की जमा-पूंजी से उसके ब्याह के लिए बनवाए थे। उन गहनों पर हाथ फेरते ही अनन्या की रूह कांप गई। उसे याद आया कि माँ ने जब वो कंगन उसे पहनाए थे, तो उनकी आँखों में आँसू थे और चेहरे पर गर्व भरी मुस्कान। बैग के एक कोने में एक छोटी सी फ्रेम रखी थी, जिसमें पापा, माँ और उसका छोटा भाई आरव हँसते हुए खड़े थे। वह पिछले साल शिमला यात्रा की तस्वीर थी। उस तस्वीर में तीनों कितने निश्चिंत और खुश दिख रहे थे, उन्हें जरा भी इल्म नहीं था कि जिस बेटी को उन्होंने अपनी पलकों पर बिठाकर पाला है, वही एक दिन उनके मान-सम्मान की चिता सजाकर चली जाएगी।
अनन्या ने कांपती उंगलियों से उस तस्वीर को छुआ। उसे लगा जैसे तस्वीर में मुस्कुराते पापा की आँखें अचानक नम हो गई हों और वे बेबसी से पूछ रहे हों, “अनन्या, क्या यही हमारी परवरिश की कीमत है?”
उसने एक गहरी सांस ली और अपने चेहरे पर आ गए आँसुओं को पोंछा। स्टडी टेबल पर रखी सफेद चिट्ठी उसकी नजरों के सामने थी। उस चिट्ठी पर उसने अपने कांपते हाथों से अपनी मजबूरी दर्ज की थी। उसने लिखा था कि वह फैजान के बिना नहीं जी सकती और जानती है कि परिवार कभी दूसरे मजहब के लड़के से उसका रिश्ता स्वीकार नहीं करेगा। उसने लिखा था कि कल सुबह जब यह चिट्ठी मिलेगी, तो शायद पूरा खानदान शर्म से गड़ जाएगा, लोग पापा के स्वाभिमान पर उंगलियां उठाएंगे, पर वह लाचार है।
घड़ी की सुइयां अब पौने बारह बजा रही थीं। समय रेत की तरह फिसल रहा था। अनन्या ने अपना बैग उठाया, दुपट्टा संभाला और आहिस्ता से अपने कमरे की कुंडी खोली। लकड़ी के पुराने फर्श पर कदम रखते हुए वह बिल्ली की तरह दबे पाँव आगे बढ़ी।
लिविंग रूम में अंधेरा था। तभी अचानक उसे रसोई की तरफ से हल्की सी रोशनी और बर्तनों की धीमी खनक सुनाई दी। अनन्या का दिल हलक में आ गया। क्या कोई जाग रहा है? वह दीवार से सटकर खड़ी हो गई। उसने देखा कि रसोई में मद्धिम पीली बत्ती जल रही थी और उसकी माँ गैस चूल्हे के पास खड़ी थीं। माँ के हाथ में काढ़े की कटोरी थी।
उसी वक्त मास्टर बेडरूम का दरवाजा खुला और उसके पिता, दीनानाथ जी, खांसते हुए बाहर निकले। उनका शरीर कमजोर था, हाल ही में दिल के दौरे से उबरे थे। अनन्या ने देखा कि पिता ने अपने सीने पर हाथ रखा हुआ था और चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी।
“जानकी, इतनी रात को क्यों जाग रही हो? जाकर सो जाओ,” दीनानाथ जी ने धीमी आवाज में कहा।
माँ ने काढ़े की कटोरी उनके हाथ में थमाते हुए कहा, “आपकी खांसी रुक नहीं रही थी, मुझे नींद कैसे आती? डॉक्टर ने कहा है कि आपको किसी भी तरह का तनाव नहीं लेना है। आपका दिल अभी बहुत कमजोर है।”
दीनानाथ जी ने एक घूंट भरा और मुस्कुराए, “तनाव किस बात का? जब तक मेरी अनन्या जैसी समझदार बेटी मेरे घर में है, मुझे क्या फिक्र? कल उसके कॉलेज की फीस जमा करनी है, मैंने अपनी पुरानी बीमा पॉलिसी तुड़वा दी है। बस उसकी पढ़ाई पूरी हो जाए, फिर उसके हाथ पीले करके गंगा नहा लूंगा। बेटी नहीं, मेरी पगड़ी है वो। शहर में सिर उठाकर जीता हूँ तो सिर्फ अपने बच्चों के संस्कारों की बदौलत।”
माँ ने नम आँखों से कहा, “हाँ, सही कहते हैं। हमारी अनन्या कभी ऐसा कोई काम नहीं करेगी जिससे हमारी गर्दन झुके। बस भगवान उसकी तकदीर अच्छी रखे।”
दीनानाथ जी ने कटोरी रखी, माँ के कंधे पर हाथ रखा और दोनों धीरे-धीरे अपने कमरे की ओर बढ़ गए। कमरे का दरवाजा बंद हो गया और फिर से सन्नाटा छा गया।
लेकिन अनन्या के कानों में सन्नाटा नहीं था, वहाँ तो जैसे कोई महाप्रलय आ चुका था। ‘मेरी पगड़ी है वो…’ पिता के ये शब्द उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गूंज रहे थे।
उसका पूरा शरीर थर-थर कांपने लगा। उसने अपने हाथ में पकड़े उस बैग को देखा जिसमें घर की इज्जत, माँ के कंगन और उसके गुनाह का बोझ बंद था। उसने खिड़की की ओर देखा। ठीक बारह बज चुके थे। बाहर गली के नुक्कड़ से दो बार धीमी सी हॉर्न की आवाज आई—फैजान आ चुका था। वह उसका हमसफर बनने का दावा करने वाला शख्स था, जो उसे उसके ही घर से एक चोर की तरह भगा ले जाने के लिए बाहर खड़ा था।
अनन्या ने खुद से एक कड़ा सवाल पूछा: जो प्यार आज मुझे मेरे जन्मदाताओं के आंसुओं, उनकी बरसों की प्रतिष्ठा और पिता की कमजोर सांसों का सौदा करने पर मजबूर कर रहा है, क्या वह प्यार सचमुच पवित्र है? जो रिश्ता झूठ, चोरी और फरेब की नींव पर शुरू होगा, क्या वह कभी मुझे सच्ची खुशी और आत्मसम्मान दे पाएगा? कल जब सुबह होगी और उसके पिता यह चिट्ठी पढ़ेंगे, तो क्या उनका कमजोर दिल यह आघात सह पाएगा? उस दिन अखबारों और मोहल्ले की जुबानों पर सिर्फ एक खबर होगी—‘मास्टर दीनानाथ की बेटी गहने लेकर भाग गई।’ पिता जो आज समाज में सिर उठाकर चलते हैं, कल किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। शायद वे जिंदा ही मर जाएंगे।
एक झटके में अनन्या की आँखों पर पड़ा मोह का पर्दा उतर गया। उसे समझ आ गया कि भागना मोहब्बत की जीत नहीं, बल्कि अपनी कायरता का सबसे घिनौना सबूत है। अगर उसकी मोहब्बत सच्ची है, तो उसे अंधेरे में चोरों की तरह भागने की जरूरत क्यों है? उसे दिन के उजाले में, सच्चाई और हिम्मत के साथ अपनी बात रखनी चाहिए, न कि अपने माता-पिता की पीठ में छुरा घोंपकर।
उसने अपने कदम पीछे खींच लिए। वह तेजी से अपने कमरे में लौटी। उसने टेबल पर रखी वह चिट्ठी उठाई और बिना किसी हिचकिचाहट के उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। उसने उस बैग से माँ के कंगन और पैसे निकाले और चुपचाप उसी अलमारी में वापस रख दिए जहाँ से चुराए थे।
फिर उसने अपना फोन निकाला। स्क्रीन पर फैजान के कई मैसेज चमक रहे थे—‘अनन्या, कहाँ हो? जल्दी आओ, कोई देख लेगा।’
अनन्या ने गहरी सांस ली और फोन को कान से लगाया।
“फैजान,” उसकी आवाज में अब कोई थरथराहट नहीं थी, बल्कि एक चट्टान जैसी दृढ़ता थी।
“अनन्या! तुम बाहर क्यों नहीं आईं? मैं कब से गाड़ी स्टार्ट किए खड़ा हूँ!” फैजान ने घबराते हुए कहा।
“फैजान, गाड़ी मोड़ लो और वापस चले जाओ। मैं नहीं आ रही हूँ,” अनन्या ने साफ शब्दों में कहा।
“क्या? तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया? सारी तैयारी हो चुकी है! अब पीछे कैसे हट सकती हो?”
“मेरा दिमाग अब जाकर सही ठिकाने पर आया है, फैजान। जो लड़की अपने उन माँ-बाप के प्यार और भरोसे की नहीं हो सकी जिन्होंने उसे उंगली पकड़कर चलना सिखाया, वह कल तुम्हारी कैसे हो सकती है? और तुम… अगर तुम मुझसे वाकई सच्चा प्यार करते, तो मुझे इस तरह रात के अंधेरे में अपनों की नजरों में गिराकर भगाने की जगह, दिन के उजाले में मेरे पिता के सामने खड़े होकर मेरा हाथ मांगते। तुमने मुझे चोर बनना सिखाया, हमसफर नहीं।”
“अनन्या, तुम्हारे पापा कभी नहीं मानेंगे!” फैजान ने गिड़गिड़ाते हुए कहा।
“मानेंगे या नहीं मानेंगे, यह फैसला उनका होगा। लेकिन मैं अपनी मोहब्बत के लिए अपने पिता की जान और उनका स्वाभिमान दांव पर नहीं लगाऊंगी। अगर हमारे रिश्ते में सच्चाई है, तो हमें धैर्य रखना होगा, खुद को साबित करना होगा और समाज का सामना सिर उठाकर करना होगा। मैं चोर बनकर तुम्हारे साथ नहीं जा सकती। अलविदा।”
अनन्या ने फोन काट दिया और नंबर ब्लॉक कर दिया। उसने एक लंबी, राहत भरी सांस ली। ऐसा लगा जैसे उसके सीने से मनों भारी पत्थर हट गया हो।
अगली सुबह जब सूरज की सुनहरी किरणें आंगन में बिखरीं, तो घर का माहौल हमेशा की तरह सामान्य था। चिड़ियों की चहचहाहट थी और रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी।
अनन्या नहा-धोकर, सादे कपड़ों में रसोई में गई। माँ चाय छान रही थीं और पापा बरामदे में अखबार पढ़ रहे थे। अनन्या ने चाय की ट्रे उठाई और पापा के पास ले गई।
“अरे अनन्या बेटी, आज बड़ी जल्दी उठ गई?” दीनानाथ जी ने मुस्कुराते हुए चश्मे के ऊपर से देखा।
अनन्या ने चाय की प्याली टेबल पर रखी और अचानक पिता के पैरों में बैठ गई। उसने अपना सिर उनके घुटनों पर रख दिया। उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े।
दीनानाथ जी चौंक गए, “क्या हुआ बेटा? तबीयत ठीक नहीं है क्या? कोई परेशानी है?” माँ भी रसोई से निकलकर बाहर आ गईं।
अनन्या ने रोते हुए अपने पिता के हाथ थाम लिए, “पापा, मुझे माफ कर दीजिए। मैं आपसे कुछ बात करना चाहती हूँ… अपनी जिंदगी के बारे में, अपने भविष्य के बारे में। मैंने कॉलेज में एक लड़के को पसंद किया है। लेकिन पापा, मैं आपके आशीर्वाद के बिना, आपके सिर को झुकाकर कोई कदम नहीं उठाऊंगी। आप जो कहेंगे, जैसा कहेंगे, वही होगा। मैं आपकी बेटी हूँ और आपकी पगड़ी का मान मेरी जान से भी ज्यादा बढ़कर है।”
दीनानाथ जी कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गए। कमरे में एक गहरा सन्नाटा छा गया। फिर दीनानाथ जी ने झुककर अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखा और उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया। उनकी अपनी आँखें भी नम थीं।
“पगली, जब तूने अपनी खुशी से पहले मेरे सम्मान को चुना, तो तूने साबित कर दिया कि मेरी परवरिश कभी गलत नहीं हो सकती। हम तेरी बात सुनेंगे, समझेंगे और जो तेरे हित में होगा वही करेंगे। जब तूने सच कहने की हिम्मत दिखाई है, तो तेरा बाप भी तेरे साथ खड़ा रहेगा।”
अनन्या का रोना अब थम चुका था। उसके चेहरे पर एक अलौकिक शांति थी। उसने महसूस किया कि प्यार छिपकर भागने में नहीं, बल्कि अपनों के विश्वास को जीतने में है। रात के उस एक सही फैसले ने न सिर्फ एक परिवार को बिखरने से बचा लिया था, बल्कि एक बेटी को जीवन भर के आत्मग्लानि और अंधकार से निकालकर आत्मसम्मान की रोशनी में खड़ा कर दिया था।
जीवन में कई बार ऐसे मोड़ आते हैं जब भावनाएं हमारे विवेक पर हावी होने लगती हैं, लेकिन क्या क्षणिक आकर्षण या प्रेम के लिए उन माता-पिता के त्याग और सम्मान को दांव पर लगाना उचित है जिन्होंने हमें पहचान दी? यदि आप अनन्या की जगह होते, तो आपका निर्णय क्या होता? अपने विचार नीचे लिखकर जरूर साझा करें।
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लेखिका : लक्ष्मी अग्रवाल