तान्या ने माँ के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए। उसकी आँखों में गुस्सा और दर्द दोनों साफ झलक रहे थे। “मम्मी, आखिर कब तक? कब तक आप इस घर में एक बेनाम मजदूर की तरह जीती रहेंगी? क्या आपकी अपनी कोई पहचान नहीं है? क्या आपका अपना कोई सम्मान नहीं है? आप क्यों हर किसी की झिड़कियां चुपचाप सह लेती हैं?”
सुबह के ठीक चार बजे जब अलार्म की हल्की सी सुई खटकी, तो जानकी ने बिना किसी आहट के बिस्तर छोड़ दिया। बाहर अभी भी गहरा अंधेरा था और घर के बाकी सदस्य गहरी नींद में डूबे थे, लेकिन जानकी के लिए यह दिन की कोई नई शुरुआत नहीं थी, बल्कि पिछले बाईस वर्षों से चली आ रही एक थका देने वाली दिनचर्या का हिस्सा थी। पैर दबाते हुए वह सीधे रसोई में पहुँची, जहाँ सबसे पहले उसने तांबे के बड़े बर्तन में पानी चढ़ाया और दादी सास के लिए काढ़ा, ससुर जी के लिए बिना चीनी की काली चाय और बाकी सबके लिए अदरक-इलायची की चाय की तैयारी में जुट गई।
जानकी जब महज उन्नीस साल की थी, तब उसकी शादी शहर के एक नामी और प्रतिष्ठित कारोबारी परिवार में हुई थी। जानकी अपने पिता की चार बेटियों में सबसे बड़ी थी। पिता एक छोटे से कस्बे में मिडिल स्कूल के साधारण शिक्षक थे। परिवार की आर्थिक तंगी और चार-चार बेटियों की शादी का बोझ पिता की रीढ़ को दिन-प्रतिदिन झुका रहा था। जानकी पढ़ने-लिखने में बहुत होशियार थी, उसका सपना था कि वह कॉलेज जाकर प्रोफेसर बने, लेकिन पिता की मजबूरी और बेबसी देखकर उसने अपनी सारी ख्वाहिशों का गला घोंट दिया। जब शहर के इतने बड़े परिवार से रिश्ता आया, तो पिता ने सोचा कि उनकी सीधी-सादी बेटी राज करेगी। पर उन्हें क्या पता था कि जिस बड़े घर में वे अपनी फूल जैसी बेटी भेज रहे हैं, वहाँ वह सिर्फ एक बिना वेतन की गृहणी बनकर रह जाएगी।
ससुराल की चौखट लांघते ही जानकी के कंधों पर जिम्मेदारियों का पहाड़ रख दिया गया। घर क्या था, पूरा कुनबा था। सास-ससुर, नब्बे साल की दादी सास, दो ननदें और दो छोटे देवर। इतने बड़े परिवार में केवल झाड़ू-पोछे के लिए एक कामवाली आती थी, बाकी सुबह के नाश्ते से लेकर रात के बर्तनों तक का सारा भार जानकी के ही नाजुक कंधों पर आ टिका था। ननदें कॉलेज जाती थीं, सजने-संवरने का शौक रखती थीं और घर में रहकर केवल अपनी पसंद के पकवानों की फरमाइशें करती थीं। ससुराल के लोग खाने-पीने के बेहद शौकीन थे। कभी किसी को दक्षिण भारतीय डोसा चाहिए होता, तो कभी किसी को कश्मीरी दम आलू या राजस्थानी दाल-बाटी। जानकी ने मायके में साधारण दाल-चावल और रोटी के अलावा कभी कुछ नहीं देखा था, लेकिन उसने हर दिन जली हुई उंगलियों और कटते हुए आंसुओं के साथ नई-नई पाक कलाएं सीखीं। उसने हर किसी की जुबान का स्वाद पहचान लिया और रसोई को ही अपनी पूरी दुनिया मान बैठी।
समय अपनी रफ्तार से बीतता गया। इस बीच जानकी ने दो बच्चों को जन्म दिया—बड़ी बेटी तान्या और छोटा बेटा कबीर। जानकी की जिंदगी में बच्चे ही खुशियों की एकमात्र किरण बनकर आए थे। कुछ वर्षों बाद दोनों ननदों की शादियां बड़े घरों में हो गईं। जानकी को लगा कि शायद अब जिम्मेदारियां थोड़ी कम होंगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। दोनों देवरों की शादियां हुईं और घर में दो नई बहुएं—शिवांगी और कृतिका आईं। शिवांगी एक बड़े उद्योगपति की बेटी थी और कॉरपोरेट कंपनी में सीनियर मैनेजर थी, वहीं कृतिका एक नामी डॉक्टर की बेटी थी और एक मल्टीनेशनल बैंक में काम करती थी।
दोनों छोटी बहुओं के आते ही घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। वे दोनों सुबह आठ बजे सूट-बूट पहनकर अपने दफ्तरों के लिए निकल जातीं और रात को आठ बजे थकी-हारी लौटतीं। घर के किसी भी काम में हाथ लगाना तो दूर, वे अपनी चाय का खाली कप भी मेज से उठाने की जहमत नहीं उठाती थीं। सास, विमला देवी, अपनी दोनों पढ़ी-लिखी और पैसे कमाने वाली छोटी बहुओं पर जान छिड़कती थीं। जब भी मोहल्ले या खानदान की कोई महिला घर आती, विमला देवी अपनी दोनों छोटी बहुओं के पैकेज और उनके रईस मायके की तारीफों के पुल बांधते नहीं थकती थीं।
“हमारी शिवांगी तो महीने के डेढ़ लाख कमाती है, और कृतिका को तो बैंक ने अलग से गाड़ी दे रखी है। आज के जमाने में लड़कियों को ऐसा ही होना चाहिए,” सास गर्व से सीना फुलाकर कहतीं। और उसी समय, जानकी पसीने से तर-बतर, रसोई में गरमा-गरम कचौड़ियां और इमरती तलकर मेहमानों के आगे परोस रही होती। उस समय विमला देवी बड़ी बेरुखी से कहतीं, “अरे जानकी, चटनी में नमक कम है, जाओ दूसरी कटोरी लाओ। यह तो बस चूल्हा-चौका ही संभाल सकती है, दिमाग तो भगवान ने इसे दिया नहीं।”
यह सुनकर जानकी का कलेजा छलनी हो जाता था। वह अक्सर रात को अकेले में तकिए में मुंह दबाकर रोती थी। उसके पति, हेमंत, अपने पारिवारिक कपड़े के कारोबार में इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें अपनी पत्नी के भीतर चल रहे इस तूफान का कभी अहसास ही नहीं हुआ। हेमंत के लिए जानकी केवल एक ऐसी व्यवस्था थी जो सुबह समय पर नाश्ता देती थी, कपड़े धोकर प्रेस करती थी और रात को बिस्तर लगा देती थी। उन्होंने कभी एक पल रुककर यह जानने की कोशिश नहीं की कि उस शांत चेहरे के पीछे कितना गहरा दर्द और खालीपन छुपा हुआ है।
दिन, महीने और साल बीतते गए। तान्या अब ग्रेजुएशन के आखिरी साल में थी और कबीर बारहवीं की पढ़ाई कर रहा था। दोनों बच्चे अब इतने समझदार हो चुके थे कि वे घर में अपनी माँ के साथ हो रहे दोयम दर्जे के व्यवहार को साफ-साफ महसूस कर सकते थे। वे देखते थे कि कैसे उनकी माँ दिन-रात खटती है, बीमार होने पर भी रसोई में खड़ी रहती है, लेकिन बदले में उसे परिवार से केवल उपेक्षा, ताने और तिरस्कार मिलता है। चाचियों को घर में सिर-माथे पर बिठाया जाता था क्योंकि वे कमाती थीं, जबकि जानकी का कोई वजूद ही नहीं था।
एक रविवार की दोपहर जब सभी लोग ड्राइंग रूम में बैठे थे, शिवांगी ने अपनी एक सहेली को फोन पर बताया कि उसने एक फाइव स्टार होटल में जो शेफ-स्पेशल कबाब खाए थे, वे कितने लाजवाब थे। जानकी ने उस दिन सुबह से मेहनत करके वही कबाब घर पर बनाए थे और सबके सामने प्लेट रखी। ससुर जी और दोनों देवरों ने उंगलियां चाट-चाट कर खाए, लेकिन तारीफ का एक शब्द भी जानकी के हिस्से नहीं आया। उल्टे विमला देवी बोल पड़ीं, “तेल ज्यादा पी लिया है इसने। थोड़ा हाथ संभाल कर काम किया करो जानकी, घर में पैसे पेड़ पर नहीं उगते।”
यह देखकर तान्या और कबीर का खून खौल उठा। वे अपनी माँ को खींचकर ऊपर के कमरे में ले गए। जानकी की आँखों से आंसुओं की धार बह रही थी।
तान्या ने माँ के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए। उसकी आँखों में गुस्सा और दर्द दोनों साफ झलक रहे थे। “मम्मी, आखिर कब तक? कब तक आप इस घर में एक बेनाम मजदूर की तरह जीती रहेंगी? क्या आपकी अपनी कोई पहचान नहीं है? क्या आपका अपना कोई सम्मान नहीं है? आप क्यों हर किसी की झिड़कियां चुपचाप सह लेती हैं?”
जानकी ने सिसकते हुए कहा, “बेटा, मेरी किस्मत में यही लिखा था। मैं कम पढ़ी-लिखी हूँ, साधारण परिवार से आई हूँ। मैं तुम्हारी चाचियों की तरह अंग्रेजी नहीं बोल सकती, दफ्तर जाकर लाखों नहीं कमा सकती। इस घर की रोटी खाती हूँ, तो यह सब तो सहना ही पड़ेगा।”
“बिल्कुल नहीं मम्मी!” कबीर तड़प कर बोला। “किस्मत कोई पत्थर की लकीर नहीं होती जिसे बदला न जा सके। आप खुद को कमजोर क्यों समझती हैं? क्या पढ़ाई-लिखाई ही सब कुछ होती है? आपके हाथों में जो स्वाद है, वह शहर के बड़े-बड़े होटलों के शेफ के पास भी नहीं है। आप जब खाना बनाती हैं, तो उसमें सिर्फ मसाले नहीं, आपकी ममता और सालों की तपस्या होती है। आज की दुनिया बदल चुकी है मम्मी। आज सोशल मीडिया का जमाना है। लोग अपने हुनर के दम पर दुनिया जीत रहे हैं।”
तान्या ने अपनी माँ के आंसुओं को पोंछते हुए कहा, “मम्मी, कबीर बिल्कुल सच कह रहा है। हम आपकी रसोई के हुनर को, आपके बनाए अनोखे मसालों और पारंपरिक रेसिपीज को एक नई पहचान देंगे। हम आपका एक यूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया पेज शुरू करेंगे—’अन्नपूर्णा: जानकी की रसोई’। मैं और कबीर कॉलेज और पढ़ाई के बीच से समय निकालकर आपके वीडियो रिकॉर्ड करेंगे और उन्हें एडिट करेंगे। आपको बस अपने दिल से वही खाना बनाना है जो आप हमेशा बनाती आई हैं।”
जानकी घबरा गई। “नहीं-नहीं बच्चों, मुझसे यह सब नहीं होगा। इस उम्र में कैमरे के सामने आना, इंटरनेट पर बोलना… लोग क्या कहेंगे? तुम्हारी दादी को पता चला तो घर में तूफान आ जाएगा।”
तान्या ने अपनी माँ के चेहरे को दोनों हाथों से ऊपर उठाया और बड़े विश्वास से कहा, “मम्मी, लोग तब भी बातें बनाते हैं जब आप झुककर सबकी गुलामी करती हैं। अब वक्त आ गया है कि आप अपने लिए खड़ी हों। अगर आज आपने हिम्मत नहीं की, तो आप ताउम्र इसी रसोई के धुएं में घुटकर अपनी पहचान खो देंगी। क्या आप अपने बच्चों के लिए यह एक कदम नहीं उठा सकतीं?”
बच्चों की आँखों में अपने लिए इतना प्यार, सम्मान और अटूट विश्वास देखकर जानकी का भीतर तक सोया हुआ स्वाभिमान अचानक जाग उठा। उसने गहरी सांस ली और अपने आंसू पोंछते हुए सिर हिला दिया।
अगले ही दिन से एक नया सफर शुरू हुआ। दोपहर के समय, जब घर के बाकी लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त होते या आराम कर रहे होते, जानकी रसोई को चमकाकर तैयार रखती। तान्या अपने मोबाइल के कैमरे से रिकॉर्डिंग करती और कबीर लाइटिंग संभालता। शुरुआत में जानकी कैमरे के सामने बहुत हिचकिचाती थी, उसकी आवाज कांपती थी। लेकिन तान्या और कबीर ने हर कदम पर उसका हौसला बढ़ाया। जानकी ने अपनी दादी सास और नानी से सीखे हुए पुराने पारंपरिक नुस्खे, मसालों को कूटने के सही तरीके और बिना किसी केमिकल के लंबे समय तक चलने वाले आचार और मिठाइयों की विधियां साझा करना शुरू किया।
शुरुआती दो-तीन महीनों में बहुत धीमी गति रही। कुछ सौ व्यूज आते थे, लेकिन तान्या और कबीर ने हार नहीं मानी। उन्होंने वीडियो की गुणवत्ता सुधारी और छोटी-छोटी रील्स बनाकर इंस्टाग्राम पर डालनी शुरू कीं। जानकी का सरल, ममतामयी अंदाज, शुद्ध देशी तरीके से समझाना और रसोई के ऐसे गुप्त नुस्खे जो आज की पीढ़ी भूल चुकी थी, लोगों के दिलों को छूने लगे।
चौथे महीने में जानकी का ‘सर्दियों में जोड़ों के दर्द के लिए पारंपरिक मेथी-गोंद के लड्डू’ का एक वीडियो अचानक वायरल हो गया। उस एक वीडियो को लाखों लोगों ने देखा और साझा किया। कमेंट्स की बाढ़ आ गई। देश भर से महिलाएं, बुजुर्ग और यहाँ तक कि विदेशों में रहने वाले भारतीय भी जानकी के उस नुस्खे की तारीफ कर रहे थे। लोगों ने उन्हें ‘यूट्यूब की सबसे प्यारी माँ’ का खिताब दे दिया।
एक साल के भीतर जानकी की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी। ‘अन्नपूर्णा: जानकी की रसोई’ के दस लाख से अधिक सब्सक्राइबर्स हो चुके थे और इंस्टाग्राम पर भी लाखों लोग उन्हें फॉलो कर रहे थे। देश के बड़े-बड़े मसाला और किचन अप्लायंसेज ब्रांड्स जानकी से अपने उत्पादों का प्रचार कराने के लिए कतार में खड़े थे। जानकी के बैंक खाते में अब हर महीने लाखों रुपये आने लगे थे—इतने पैसे, जितने उसकी दोनों कॉरपोरेट देवरानियां मिलकर भी नहीं कमा पाती थीं। लेकिन जानकी के व्यवहार में रत्ती भर भी घमंड नहीं आया। वह आज भी वही सौम्य, शांत और ममतामयी जानकी थी, बस अब उसकी आँखों में एक नया आत्मविश्वास और चेहरे पर गरिमा का तेज था।
घर वालों को इस बात की भनक तब लगी जब शहर के एक बहुत बड़े फाइव स्टार होटल में ‘विमेन एंटरप्रेन्योर एंड शेफ ऑफ द ईयर’ का भव्य राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह आयोजित हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में शहर के मेयर और कई गणमान्य हस्तियां उपस्थित थीं।
उस दिन सुबह जानकी ने हल्के नीले रंग की खूबसूरत और शालीन सिल्क की साड़ी पहनी। तान्या और कबीर ने अपनी माँ को तैयार किया। जब जानकी नीचे आई, तो विमला देवी ने हमेशा की तरह त्योरियां चढ़ाते हुए कहा, “कहाँ की तैयारी है जानकी? आज दोपहर के खाने में कौन सी दाल बनेगी, कुछ तय किया है या नहीं?”
तभी दरवाजे की घंटी बजी। बाहर एक बड़ी लग्जरी गाड़ी और उसके साथ मीडिया के कैमरामैन खड़े थे। एक राष्ट्रीय समाचार चैनल का रिपोर्टर माइक लेकर अंदर आया और हाथ जोड़कर बोला, “नमस्कार! क्या प्रसिद्ध शेफ और डिजिटल क्रिएटर जानकी जी का घर यही है? हम आज के राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह के लिए उन्हें एस्कॉर्ट करने आए हैं।”
यह सुनकर विमला देवी, ससुर जी, दोनों देवर और देवरानियां—सबके होश उड़ गए। हेमंत अपनी जगह पर पत्थर की तरह जम गए। शिवांगी और कृतिका की आँखें फटी की फटी रह गईं जब उन्होंने देखा कि जिस सास-बहू के चैनल को वे कभी-कभार सोशल मीडिया पर देखती थीं, वह कोई और नहीं बल्कि उनके ही घर की ‘अशिक्षित और साधारण’ जानकी थी।
उस शाम जब सभागार में जानकी का नाम गूंजा, तो तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठा। मंच पर खड़ी होकर जानकी ने ट्रॉफी थामी और माइक के सामने आकर कहा, “यह सम्मान किसी हुनर की जीत नहीं, बल्कि एक माँ के स्वाभिमान की जीत है। मैं एक साधारण स्त्री थी, जिसे लगता था कि चारदीवारी के भीतर खटना ही उसका नसीब है। लेकिन मेरे बच्चों ने मुझे सिखाया कि एक औरत का वजूद केवल दूसरों की सेवा करने में नहीं, बल्कि अपनी पहचान बनाने में है। जब कोई स्त्री अपने भीतर के विश्वास को जगा लेती है, तो दुनिया की कोई ताकत उसे झुकने पर मजबूर नहीं कर सकती।”
सभागार के एक कोने में खड़े हेमंत की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह रहे थे। उन्हें अहसास हुआ कि जिस अनमोल हीरे को वे इतने सालों से केवल पत्थर समझकर दरकिनार करते रहे, वह असल में कितना मूल्यवान था। घर लौटने पर विमला देवी ने कांपते हाथों से अपनी बड़ी बहू के सिर पर हाथ रखा और पहली बार उनकी आँखों में सम्मान और शर्मिंदगी का भाव था। दोनों देवरानियां अब अपनी जेठानी से नजरें नहीं मिला पा रही थीं।
जानकी ने किसी से कोई बदला नहीं लिया, न ही किसी को नीचा दिखाया। उसने सबको उसी प्यार से गले लगाया, लेकिन अब उस घर का संतुलन पूरी तरह बदल चुका था। अब जानकी केवल एक बहू नहीं, बल्कि उस परिवार की सबसे सम्मानित, स्वावलंबी और सशक्त स्तंभ बन चुकी थी। उसने यह साबित कर दिया था कि हुनर किसी डिग्री या रईसी का मोहताज नहीं होता; यदि हौसला और अपनों का साथ हो, तो चूल्हे की राख से भी स्वाभिमान का नया सूरज उगाया जा सकता है।
एक गृहिणी दिन-रात बिना किसी छुट्टी और बिना किसी शिकायत के अपने परिवार के लिए खटती है, लेकिन अक्सर उसी परिवार के लोग उसके इस निस्वार्थ समर्पण को उसकी कमजोरी या मजबूरी समझ बैठते हैं। क्या एक पढ़ी-लिखी और नौकरीपेशा महिला की तुलना में केवल घर संभालने वाली स्त्री का योगदान किसी भी मायने में कम होता है? आपके विचार में आज के समाज में एक गृहिणी को वह सम्मान और आत्मनिर्भरता दिलाने के लिए परिवार को किस तरह का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए? अपने दिल की बात और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमारे साथ जरूर साझा करें।
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