तीन होनहार बेटों और भरे-पूरे संसार के बीच जब एक माँ ने अचानक अनाथालय से नन्हीं जान को गोद लेने की ज़िद ठानी, तो पूरा परिवार स्तब्ध रह गया; पर उसके पीछे की जो वजह सामने आई, उसने हर किसी की आँखें नम कर दीं।
शाम की हल्की ढलती धूप जब विशाल बैठक के बड़े शीशों से छनकर आती, तो पूरे कमरे में एक सुनहरी चमक बिखर जाती थी। पैंतालीस वर्ष की कल्याणी अक्सर उसी वक्त बालकनी की रेलिंग थामे चुपचाप बाहर की तरफ ताकती रहती। बाहर से देखने वाले किसी भी इंसान के लिए कल्याणी का जीवन किसी सपने जैसा था। पति आलोक शहर के एक जाने-माने और बेहद सफल व्यवसायी थे, जो कल्याणी की हर छोटी-बड़ी जरूरत और सम्मान का पूरा ध्यान रखते थे। आर्थिक रूप से परिवार में किसी भी भौतिक सुख-साधन की रत्ती भर कमी नहीं थी। शहर के पॉश इलाके में बना तिमंजिला खूबसूरत मकान, गाड़ियों की कतार और हर काम के लिए तैनात घरेलू सहायक।
इतना ही नहीं, कल्याणी की गोद भी सूनी नहीं थी। उसके तीन स्वस्थ और होनहार बेटे थे। बड़ा बेटा अक्षत मेडिकल की पढ़ाई के अंतिम पड़ाव पर था, दूसरा बेटा समर कानून की डिग्री ले रहा था और सबसे छोटा आरव अभी ग्यारहवीं कक्षा में दाखिल हुआ था। तीनों बेटे अपनी पढ़ाई और करियर को लेकर बेहद संजीदा थे। घर में हर तरह की खुशहाली, मान-सम्मान और वैभव था। कल्याणी भी दिन भर घर के प्रबंध, रसोई और परिजनों की देखरेख में जुटी रहती थी, लेकिन दिन ढलते ही उसके भीतर एक अजीब सा खालीपन और अनकही बेचैनी पसर जाती थी। एक ऐसा सन्नाटा, जिसे वह चाहकर भी किसी लफ्ज़ में बयां नहीं कर पाती थी।
अक्सर रात को जब सब सो जाते, तो आलोक कल्याणी के चेहरे पर छाई उस खामोश उदासी को भांप लेते। वे कई बार पूछते, “कल्याणी, तुम्हें किस बात की चिंता है? सब कुछ तो ठीक है। बच्चे अपनी राह पर बढ़ रहे हैं, व्यापार फल-फूल रहा है, फिर तुम्हारे दिल में यह कौन सा दर्द है जो कभी मुस्कान बनकर बाहर नहीं आता?” कल्याणी बस एक फीकी हंसी हंस देती और कह देती, “कुछ नहीं, बस यूँ ही थोड़ी थकान है।” पर सच तो यह था कि वह खुद भी अपनी इस भीतरी तड़प की थाह नहीं ले पा रही थी।
धीरे-धीरे समय ने अपनी रफ्तार पकड़ी और तीनों बच्चे अब बाल्यकाल की सीमाओं को पार कर पूरी तरह वयस्क पुरुष बनने की दिशा में बढ़ चुके थे। अब वे स्कूल से लौटकर माँ के आंचल में छुपने वाले या दिन भर की बातें चहक-चहक कर सुनाने वाले छोटे बालक नहीं रहे थे। अब उनके अपने दायरे बन चुके थे। कॉलेज, करियर की योजनाएं, शेयर बाजार, राजनीति, गाड़ियां और खेलकूद—उनकी बातचीत के केंद्र में यही सब बातें होती थीं। शाम के वक्त जब वे डाइनिंग टेबल पर बैठते, तो उनकी चर्चाएं सीधे अपने पिता आलोक के विचारों से मेल खाती थीं। आलोक भी बेटों के साथ इन गंभीर विषयों पर मशविरा करते, नई योजनाओं पर बात करते। कल्याणी गर्म-गर्म रोटियां सेककर उनकी प्लेटों में परोसती, उनके चेहरों को निहारती और इंतज़ार करती कि काश कोई एक बेटा अपनी थाली से नज़र उठाकर पूछे कि माँ, आज तुम्हारा दिन कैसा बीता? या कोई आकर उसके कंधे पर सिर रख दे और कहे कि माँ, आज मेरे साथ थोड़ी देर बैठो। पर ऐसा कभी नहीं होता था। बेटे अपनी दुनिया में मग्न थे, दोस्तों और गैजेट्स के साथ उनका समय बीतता था। कल्याणी को लगता कि जिस घर को उसने अपने खून-पसीने से सींचा, उस घर में वह धीरे-धीरे केवल एक व्यवस्थापक बनकर रह गई थी। वह नारी सुलभ कोमलता, वह भावनाओं की बारीक बुनावट और दिल की गहराइयों को छूने वाला अपनापन उस घर से कहीं गायब था।
एक दिन सुबह जब आलोक अपने दफ्तर जाने की तैयारी कर रहे थे और बालकनी में चाय पी रहे थे, कल्याणी उनके पास आकर खड़ी हो गई। उसकी आँखों में एक अजीब सा ठहराव और दृढ़ता थी, जो आलोक ने पहले कभी नहीं देखी थी। कल्याणी ने धीमी मगर गंभीर आवाज़ में कहा, “सुनिए, अगर मैं आपसे अपने जीवन की सबसे बड़ी खुशी मांगूँ, तो क्या आप मुझे देंगे?”
आलोक चौंक पड़े। उन्होंने चाय का कप मेज पर रखा और मुस्कुराते हुए कहा, “यह भी कोई पूछने की बात है कल्याणी? तुमने आज तक अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगा। जो कहना चाहती हो, बेझिझक कहो।”
कल्याणी की हथेलियां पसीने से भीग गईं। उसने एक गहरी सांस ली और सीधे आलोक की आँखों में देखते हुए कहा, “मैं एक नन्ही बच्ची को गोद लेना चाहती हूँ। मुझे एक बेटी चाहिए।”
आलोक के पैरों तले से जमीन खिसक गई। वे अवाक होकर अपनी पत्नी का चेहरा देखने लगे। “कल्याणी! तुम होश में तो हो? हमारे तीन-तीन जवान बेटे हैं। बड़ा बेटा डॉक्टर बनने जा रहा है, कल को घर में बहुएं आएँगी, नाती-पोते खेलेंगे। इस उम्र में दोबारा बच्चों की परवरिश का झंझट? लोग क्या कहेंगे?”
कल्याणी ने आलोक के हाथ थाम लिए और बहुत ही कातर भाव से बोली, “प्लीज़, आज मुझसे कोई तर्क-वितर्क मत कीजिए। मेरी आत्मा जिस खालीपन से रोज तिल-तिल कर मर रही है, उसकी दवा केवल यही है। मुझे एक बेटी चाहिए, बस।”
शाम को इस विषय पर पारिवारिक बैठक बैठी। तीनों बेटों को जब इस फैसले के बारे में पता चला, तो वे भी हैरान रह गए। किसी ने खुलकर अपनी माँ का विरोध तो नहीं किया क्योंकि वे माँ का बेहद आदर करते थे, पर हर चेहरे पर एक अनुत्तरित प्रश्न तैर रहा था कि आख़िर इस भरे-पूरे परिवार में माँ को ऐसी क्या कमी महसूस हो गई?
कल्याणी अपने निर्णय पर अडिग रही। कानूनी औपचारिकताओं और कागजी प्रक्रियाओं को पूरा करने में कुछ महीने लगे और आखिरकार एक दिन अनाथालय से लगभग दो माह की एक अत्यंत रूपवान और भोली बच्ची उस घर की चौखट पर लाई गई। कल्याणी ने उसका नाम रखा—’अन्वी’। उस नन्ही सी जान को जब कल्याणी ने अपने सीने से लगाया, तो उसकी आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। तीन बार माँ बनने के बाद भी, आज उसे महसूस हुआ जैसे उसके मातृत्व का असली अंकुर अब फूटा हो।
अन्वी के घर में आने के कुछ ही हफ्तों बाद एक भव्य नामकरण और स्वागत समारोह रखा गया। सगे-संबंधी, समाज के प्रतिष्ठित लोग और मित्र एकत्र हुए। हर किसी के होठों पर दबी जुबान में वही चर्चा थी कि तीन बेटों के होते हुए इस उम्र में गोद लेने का क्या औचित्य था?
समारोह के बीच में जब मंच से कल्याणी को अपने विचार रखने के लिए कहा गया, तो उसने माइक हाथ में लिया। उसकी गोद में गुलाबी फ्रॉक पहने नन्हीं अन्वी खेल रही थी। कल्याणी ने शांत भाव से सभा की ओर देखा और कहना शुरू किया, “यहाँ उपस्थित हर व्यक्ति के मन में, और शायद मेरे अपने बेटों के मन में भी यह सवाल गूंज रहा है कि जब भगवान ने मुझे हर सुख दिया, तीन योग्य बेटे दिए, तो फिर मैंने यह कदम क्यों उठाया? आज मैं अपने परिवार और समाज के इसी ‘क्यों’ का जवाब देना चाहती हूँ।”
पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। सब सांस रोके कल्याणी को सुनने लगे।
कल्याणी ने आगे कहा, “पुरुष घर को सुरक्षा और सामर्थ्य दे सकता है, व्यवस्था दे सकता है, पर एक स्त्री ही घर में संवेदनाओं और आत्मीयता का संचार करती है। मेरे तीन बेटे हैं, वे मेरी ताकत हैं, मेरा गर्व हैं। पर वे धीरे-धीरे पुरुष बनकर अपनी दुनिया में सिमट गए। उनके पास पिता से बात करने के लिए दुनिया भर के मुद्दे थे, पर अपनी माँ के मौन को सुनने का समय नहीं था। मैं उनके भीतर अपनी खुद की परछाईं नहीं ढूंढ पाती थी। बेटा बड़ा होकर अपनी गृहस्थी और दुनियादारी में रम जाता है, पर बेटी हमेशा माँ की आत्मा से जुड़ी रहती है। बेटी घर की वह आर्द्रता होती है, जो बिखरी हुई संवेदनाओं को जोड़कर रखती है।”
कल्याणी की आवाज़ में एक गहरा कंपन था, पर शब्दों में अटूट सच्चाई थी। “बेटी केवल संतान नहीं होती, वह शक्ति और सृजन का सबसे पवित्र स्वरूप है। मुझे भीतर तक पीड़ा होती है जब मैं सुनती हूँ कि आज भी कोख में बेटियों को मार दिया जाता है। लोग वंश के नाम पर बेटों की मन्नतें मांगते हैं। मैं आज गर्व से कहना चाहती हूँ कि मेरे पति के कुल और भौतिक वंश को आगे बढ़ाने के लिए मेरे ये तीन बेटे काफी हैं, पर मेरे भीतर की ममता, मेरी भावनाओं और मेरे ‘मातृत्व’ के वंश को केवल एक बेटी ही अमर कर सकती है। अन्वी केवल एक बच्ची नहीं है, वह मेरी अधूरी आत्मा का पूर्ण विस्तार है।”
कल्याणी की यह बात सुनकर पूरे हॉल में मौजूद हर शख्स की आँखें नम हो गईं। किसी के पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे। तभी बड़ा बेटा अक्षत आगे बढ़ा। उसने झुककर अपनी माँ के चरण छुए और अपनी नन्ही बहन अन्वी को अपनी गोद में उठा लिया। उसके पीछे समर और आरव भी आए और अपनी नन्ही बहन के नन्हे गालों को चूमते हुए अपनी माँ के गले लग गए। पूरे हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी। आलोक अपनी पत्नी को एक नए आदर और गर्व से देख रहे थे। उस दिन उस आलीशान घर में केवल एक बच्ची का आगमन नहीं हुआ था, बल्कि वहां प्रेम, संवेदना और रिश्तों की एक नई और अटूट ऊर्जा का संचार हुआ था।
एक माँ का अपनी संतान के प्रति प्रेम कभी कम नहीं होता, लेकिन क्या आपने भी कभी महसूस किया है कि बेटों की तुलना में बेटियां माता-पिता की भावनाओं और उनके मौन को ज्यादा गहराई से समझती हैं? आज के आधुनिक दौर में जहाँ बेटियों को हर क्षेत्र में बराबरी मिल रही है, वहीं समाज में उनके भावनात्मक महत्व पर आपकी क्या राय है? अपनी राय और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमारे साथ जरूर साझा करें।
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