स्वाभिमान मेरा भी – सीमा सिंघी

शंकर मेरे भाई कैसे हो?? आज बड़ी याद आ रही थी तुम्हारी??

मैं मानता हूं मैंने बहुत बड़ी भूल की है.. पाप किए हैं मैंने मेरे भाई….अपने हिस्से की जमीन के साथ साथ तुम्हारे हिस्से की जमीन भी बेचकर चुपचाप शहर चला आया। जो मुझे नहीं करना था

क्योंकि शुरुआती दिन महीने तो मैं बड़ा खुश था मगर बाद में धीरे-धीरे मेरी यह खुशी पछतावे में बदल गई । आज इस बात को करीब दस बरस हो चुके हैं मगर दिन रात यही ख्याल आते हैं कि मैंने अपने ही छोटे भाई के साथ इतना बड़ा अन्याय किया । तुमने भी तो पलटकर कभी कुछ नहीं कहा।

आज इतने वर्षों बाद भीमा भैया की आवाज सुनकर शंकर हैरान था क्यों कि जो इंसान उसके हिस्से की जमीन बेचकर उसके पैसे भी खुद ले गया ।

आज अचानक उस इंसान को अपने इस छोटे भाई की याद कैसे आ गई। वो मन ही मन सोचने लगा। क्या इसमें भी कोई स्वार्थ छिपा है.. बात करूं या ना करूं.. सोचते सोचते फोन की लाइन कट करने जा ही रहा था कि भीमा फिर बोल उठा। लाइन मत काटना मेरे भाई…

तब शंकर गुस्से में बोल उठा। 

मैं क्या बात करूं उस इंसान से… जो अपने निजी सुख के लिए शहर में अपना घर बसाने और व्यापार जमाने के लिए मुझे बर्बाद करके.. मुझे खून के आंसू रुलाके.. चला गया । आज अचानक उसे मेरी याद आई है तो जरूर इसमें भी कोई स्वार्थ ही छिपा होगा क्योंकि.. आप बिना स्वार्थ के तो मुझे याद कर ही नहीं सकते… अगर आज भी आपको मुझसे किसी चीज की जरूरत है तो.. मैं आपको क्या दे सकता हूं क्योंकि.. एक मेरे पास जमीन थी।

वह भी आपने बेच दी। अब तो मेरे पास ईमानदारी और मेरे स्वाभिमान के अलावा मेरे पास कुछ नहीं बचा है। जिसे मैं आपको दे सकूं। आपने मेरे सरल स्वभाव का बड़ा ही फायदा उठाया । वैसे क्या आप जानते हैं.. आपके जाने के बाद खेत तो हमारे पास रहा नहीं था इसीलिए.. हम दोनों पति-पत्नी ने कितनी मेहनत से अपने परिवार का पालन पोषण किया । हमने लोगों के घर में मजदूरी की। तब जाकर इस घर में अनाज आया। 

जो अनाज कुछ दिन पहले अपने खेत में होता था । वही अनाज मैं लोगों के घर में मजदूरी कर के लाने लगा और यह सब आपका ही किया धरा था इसकी वजह सिर्फ आप थे क्योंकि… आपको शहर में बसना था । आपको पैसे की इतनी भूख थी…जिसके खातिर आपने रातों की नींद खो दी और ईश्वर के दरबार में अपने हिस्से के खाते में बईमानी भी लिखवा दी।

आपने तो मां बाबूजी के संस्कार भी छोड़ दिए और खुद के भाई के पीठ पर वार भी कर दिया और हां भैया जो भी हो…. हमारे पास ज्यादा कुछ ना होते हुए भी ईमानदारी की चार रोटी और अपना स्वाभिमान भरपूर है । जिसकी वजह से हम चैन की नींद सोते हैं।

अपने छोटे भाई शंकर की यह बात सुनकर भीमा निराश भरी आवाज में फिर कहने लगा । तुमने जो भी कहा.. सब सही कहा.. मैं गलत था.. मेरे मन में लालच आ गया था। मुझे तुम्हारी भाभी और बच्चों की चिंता थी इसीलिए.. मैंने अपना घर बसाने के लिए तुम्हारे साथ अन्याय किया।

मगर सच कहूं तो तुम्हारे साथ अन्याय करके मैं शुरुआती दिनों में तो बड़ा खुश था मगर धीरे-धीरे मेरी यह खुशी दुख में बदल गई । मैं कभी चैन की नींद नहीं सोया और अब तो हालत यह है कि मैं तन और मन दोनों से कमजोर हो चुका हूं.. हार चुका हूं… आज मैं तुमसे क्षमा चाहता हूं… मुझे क्षमा कर दे मेरे भाई। 

अपने बड़े भाई भीमा की बात सुनकर भी आज शंकर का मन नहीं पिघला। वह उसी लहजे में फिर बोल उठा। आज इतने बरसों बाद अब क्षमा मांगने से क्या होगा। जो सजा हमने बिना कसूर के पाई है। जिस तरह तकलीफों के दिन हमने निकाले हैं… वह अब मैं और मेरी पत्नी और बच्चे कैसे भूल सकते हैं।

अब हम परिवार कैसे हो सकते हैं… परिवार तो उसे कहते हैं जिसमें एक भाई दूसरे भाई की तकलीफों को समझता है मगर… आप तो स्वयं ही उस तकलीफ के जिम्मेदार बन गए।  मुझे आज भी आपकी सोच पर आश्चर्य होता है भैया क्योंकि पराए घर से आई हुई हमारी पत्नियों की सोच अलग हो सकती हैं क्योंकि…

सब अपने अलग-अलग मायके से संस्कार लेकर आई हुई होती है मगर.. एक ही माँ की कोख से जन्म लेकर दोनों भाइयों की सोच कैसे इतनी ज्यादा अलग हो सकती है….. कैसे एक भाई दूसरे भाई के साथ ऐसा अन्याय कर सकता है। 

मां ने हम दोनों के ही नाम भीमा और शंकर रखें जो शिव और उनकी अति शक्ति को दर्शाते हैं । आप चाहते तो  गांव में हम दोनों मिलकर अन्याय के विरुद्ध खड़े होकर लोगों को न्याय दिलाते और इस नाम को सफल बनाते मगर आपने तो इस नाम को ही बदनाम कर दिया इसीलिए माफ करना भैया…जब तक आपके मन में ईमानदारी थी।

मैंने हमेशा आपसे नजदीकियां बनाए रखी। कभी अपने स्वाभिमान का ख्याल नहीं किया मगर… अब स्वाभिमान मेरा भी है। आज मैं अपनी पत्नी और बच्चों से क्या कहूं कि…आज मेरे उस भाई का फोन आया है और मुझसे क्षमा चाहता है… जिसने बरसों पहले हमें दर-दर ठोकर खाने को छोड़ दिया था।  सच कहूं तो भैया अब हमारा दूर रहना ही ठीक है ।

जब आपने बड़े भाई होने का फर्ज नहीं निभाया तो आप भी आज के बाद मुझसे भी क्षमा की कोई उम्मीद मत करना और ना ही सम्मान की कह कर फोन रख दिया। 

स्वरचित 

सीमा सिंघी 

गोलाघाट असम

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