समझौता – सीमा सिंघी

आंगन में धूप खिलाई थी। ऐसे भी जाड़े की धूप बड़ी भली लगती है इसीलिए ललिता जी अपने हाथों में एक प्याली चाय की लेकर बाहर खुले आंगन में लगी हुई सोफा पर आकर बैठ गई और इत्मीनान से पीने लगी। 

अब धीरे धीरे बालों की सफेदी ने भी उनसे थोड़ा बहुत आंख मिचौली का खेल खेलना शुरू कर दिया था इसीलिए चाय खत्म होते ही उन्होंने सर्वप्रथम सर के अध पके बालों को रंगना शुरू कर दिया । कहने को वो अपने बालों में रंग जरूर लगा रही थी मगर..उनका मन बीते दो दिनों से सुरभि पर ही टिका हुआ था। जो सुरभि सुबह होते ही खिलती धूप की तरह खिल उठती थी । 

न जाने इन बीते दो दिनों में ऐसी क्या बात हो गई । जो बहुत निराश सी दिखने लगी थी। ऐसा लग रहा था। उसकी हंसी कहीं किसी गुमनाम अंधेरे में गुम हो  चुकी हो।

आज ललिता जी ने मन ही मन में ठान लिया कि कुछ भी हो जाए । वह सुरभि से जान कर रहेगी और यही सोचकर वो सुरभि से पूछ बैठी।

 क्या बात है बहू.. अचानक ऐसी क्या परेशानी आ गई… जो तुम हंसना भूल गई हो। मेरा अनुभव तो यही कहता है कि.. किसी से अपनी परेशानी बांट लो तो… वह हल्की हो जाती है और रास्ता भी मिल जाता है। हां अगर.. तुम्हें लगता है कि.. मैं तुम्हारी परेशानी बांट सकती हूं तो… तुम बेशक मुझसे कह सकती हो।  मैं शायद तुम्हारी कोई मदद कर दूं …और अगर तुम्हें ऐसा लगता है कि.. मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकती। 

ललिता जी आगे कुछ और कहती इसके पहले ही सुरभि अचानक से बोल पड़ी। नहीं-नहीं मम्मी जी… आप ऐसा बिल्कुल ना सोचे बल्कि मैं तो यह सोचकर आपसे अपनी परेशानी .. अपनी उलझन..नहीं बांटना चाह रही थी कि.. नाहक ही मैं आपको क्यों परेशान करूं।

सुरभि की बात सुनकर ललिता जी फिर प्यार से बोल उठी। अरे बहु तूने ऐसा सोच भी कैसे लिया कि.. मैं परेशान हो जाऊंगी बल्कि मैं तो यह कहना चाहूंगी कि दो लोगों के बीच आपस में उस परेशानी को.. उस उलझन को कहकर बहुत अच्छे से सुलझाया जा सकता है।

अच्छा छोड़ यह बातें… और अपनी परेशानी मुझे जल्दी से कह डाल कहते हुए ललिता जी सुरभि की ओर देखने लगी। 

ललिता जी एक बहुत सुलझी हुई औरत थी। वो हर किसी की कोई परेशानी हो.. कोई सुख दुख हो.. तुरंत भाप लिया करती थी और यकीनन उनके पास हर परेशानी का हल भी तुरंत मिल जाता था इसीलिए सोसाइटी में भी सभी औरतों के बीच उनका बहुत मान सम्मान था । उनके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान हमेशा बनी रहती थी और अहम से तो उनका दूर-दूर तक कोई नाता ही नहीं था।

 शायद इसीलिए हर कोई चाहे वह छोटा हो या बड़ा …  सब की पसंदीदा थी वो ।

मगर आज सुरभि के चेहरे को निराश देखकर यकीनन ललिता जी को बहुत तकलीफ हुई इसीलिए वह अपनी बहू सुरभि से पूछ बैठी थी।

अचानक सुरभि ललिता जी के करीब बैठ गई और कहने लगी। क्या बताऊं मम्मी जी… हमारी सोसाइटी की जो किटी पार्टी ग्रुप है । वह शुरुआती दिनों में तो सिर्फ हंसी मजाक और एक दूसरे के यहां खाना खिलाना.. मस्ती करना.. आदि पर ही चल रहा था। मगर इन दिनों में हमारे ग्रुप का रंग कुछ बदल सा गया है। मैं जब भी किसी के घर जाती हूं ।

 सभी औरतें एक दूसरे से अपने घर की बातें साझा करने लगती है जैसे की दो दिन पहले हमारी ही सोसाइटी की आरती के घर पर उसकी सास यानि कि सुषमा आंटी जी से कुछ कहा सुनी हो गई तो वो अपने घर की वह सारी बातें हमारे बीच लेकर आ गई और क्या कहूं… यहां तक की वो सास बहू के रिश्ते को बदनाम करने पर भी आ गई है ।

ललिता जी अपनी बहू सुरभि की बात सुनकर शांत मन से कहने लगी।

बहू तुम बिल्कुल सही कह रही हो । आज की इस दौड़ती जिंदगी में सभी की व्यस्तता को देखते हुए हम औरतों ने कुछ वक्त अपने लिए निकाला ताकि हम अपनी तकलीफें भूल कर… अपनी व्यस्तता भूल कर… थोड़ी खुशी.. थोड़ी हंसी के दौर को जी ले।

सुरभि अपनी सासू मां ललिता जी की बात सुनकर फिर बोल उठी। और नहीं तो क्या.. मैं भी ऑफिस और घर की जिम्मेदारियां के बीच थोड़ा बहुत टाइम निकाल कर जब जाती हूं तो यकीनन मेरा मन प्रफुल्लित हो उठता है मगर अब ऐसी बात नहीं रह गई है।

और तो और वो इस बात को इतना बढ़ावा दे रही है कि अपनी गृहस्थी अलग बसाने तक की सोच चुकी है जबकि वह जानती है रवि सुषमा आंटी के इकलौते बेटे हैं और ऐसे भी मम्मी जी किस घर में ऐसी छोटी-छोटी बातें नहीं होती मगर. यह जरूरी तो नहीं की हर बात घर से बाहर चार लोगों के बीच जाए बल्कि घर में ही बैठकर आपस में सुलझा ली जाए तो कितना बेहतर हो ।

उसने जरा सा भी अपनी सास के साथ रिश्ते में समझौता नहीं किया बल्कि वह तो… हमें भी ऐसा करने की प्रेरणा दे रही है। इसीलिए आज मैंने भी सोच लिया है। मैं भी अब कोई समझौता नहीं करूंगी और उस किटी ग्रुप से हट जाऊंगी ।

अपनी बहू सुरभि की बात सुनकर ललिता जी तुरंत बोल बैठी। अरे बहू..ग्रुप से निकल जाना कहां सही होगा बल्कि तुम्हारी सहेली आरती को यह समझाना होगा कि ऐसी छोटी-मोटी बातें तो परिवार में होती रहती है और सोचो… जिस सुषमा जी ने इतने अरमान से अपना घर बसाया था। उसका यह नतीजा कि छोटी सी बात पर बहु उनसे अलग हो जाए मगर… हां सुषमा जी को भी समझना होगा कि… दोनों पीढ़ियों की सोच में कुछ तो अंतर सदा ही रहने वाला है और आगे भी होता रहेगा इसीलिए एक दूसरे के साथ समझौता करके दोनों का आगे बढ़ जाना ही सही होगा ना कि.. अपनी बात पर अड़े रहना। 

वैसे भी बहू आजकल परिवार बहुत छोटे होते जा रहे हैं तो दोनों तरफ से ही रिश्ते को निभाने के लिए झुक जाना ही बेहतर होता है। 

सुरभि अपनी सासू मां की बात सुनकर चहक कर बोल उठी।

मम्मी जी आप बिल्कुल सही कह रही हैं। मैं अब इस ग्रुप से हटने की नहीं बल्कि अपनी सहेली आरती को सुषमा आंटी के साथ समझौता करके आगे बढ़ जाने को कहूंगी।

यह हुई ना बात.. सच कहूं तो बहू मैं अब बहुत खुश हूं क्योंकि… तुम्हारी वह चहकती हुई हंसी फिर मुझे अभी-अभी तुम्हारे चेहरे पर दिखाई दे गई है । और ऐसे भी घर की बहू बेटियां तो हंसती मुस्कुराती ही अच्छी लगती है और हां… बहू मैं भी सुषमा जी को कुछ अपनी तरफ से बातों ही बातों में मशवरा देना बिल्कुल भी नहीं भूलूंगी कि.. रिश्ते में एक दूसरे के साथ समझौता करके आगे बढ़ जाना ही जिंदगी है कहते हुए ललिता जी मुस्कुरा पड़ी।

स्वरचित 

सीमा सिंघी 

गोलाघाट असम

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