सुशीला देवी दरवाज़े के बाहर बैठी मंत्र जाप कर रही थीं, यह सोचकर कि वह अपनी बेटी का उद्धार कर रही हैं, जबकि असल में वह अपनी ही बेटी की हत्यारी बन रही थीं। उस दिन पल्लवी ने किसी तरह रोते हुए श्रुति से कहा था, “मुझे यहाँ से निकाल ले श्रुति, वरना मैं घुट-घुट कर मर जाऊँगी। मेरी माँ मुझे मार डालेगी।”
आज श्रुति की मदद से ही पल्लवी किसी तरह घर से भाग निकलने में कामयाब हुई थी और सीधा इस कालिका मंदिर की ओर चली आई। वह खून से लथपथ घुटनों के साथ जब मंदिर के गर्भगृह की चौखट पर पहुँची, तो उसकी हिम्मत जवाब दे गई। वह वहीं औंधे मुँह गिर पड़ी। श्रुति ने भागकर उसका सिर अपनी गोद में रख लिया।
जेठ की चिलचिलाती धूप में, जब इंसान तो क्या, परिंदे भी छाँव ढूँढते हैं, तब नंगे पैर पथरीली सीढ़ियाँ चढ़ना किसी खौफनाक सज़ा से कम नहीं था। लेकिन पल्लवी के कदम रुक नहीं रहे थे। उसके पैरों के तलवों से खून रिसने लगा था और पसीने से लथपथ उसका चेहरा किसी गहरी पीड़ा की गवाही दे रहा था। उसके ठीक पीछे उसकी सबसे करीबी दोस्त, श्रुति, हाँफती हुई आ रही थी। श्रुति के हाथ में पानी की बोतल थी, और आँखों में अपनी दोस्त के लिए बेतहाशा तड़प। दोनों शहर से मीलों दूर, अरावली की पहाड़ियों पर स्थित प्राचीन कालिका माता के मंदिर की ओर बढ़ रही थीं। यह रास्ता इतना दुर्गम था कि आम दिनों में भी लोग यहाँ आने से कतराते थे, और आज तो दोपहर की आग बरसती गर्मी थी।
“पल्लवी, मेरी बात मान, रुक जा! तेरे पैरों से खून बह रहा है। माता रानी भाव की भूखी होती हैं, इस तरह खुद को लहूलुहान करके कौन सी मन्नत पूरी होती है? प्लीज, थोड़ी देर छाँव में बैठ जा,” श्रुति ने लगभग रोते हुए पल्लवी का हाथ पकड़ने की कोशिश की।
पल्लवी ने झटके से अपना हाथ छुड़ा लिया। उसकी आँखों में एक अजीब सा सूनापन और दृढ़ संकल्प था। “नहीं श्रुति, मुझे मत रोक। मैंने मन्नत मानी है कि मैं मंदिर की आखिरी एक सौ एक सीढ़ियाँ घुटनों के बल चढ़कर माता के दर्शन करूँगी। तूने देखा था न उस दिन, मेरे कमरे की हालत? मैं दुनिया की किसी अदालत में नहीं जा सकती, क्योंकि मेरे खिलाफ कोई और नहीं, मेरी अपनी सगी माँ खड़ी है। मुझे अपनी माँ से बचने के लिए उस जगन्माता के दरबार में ही हाजिरी लगानी होगी। तू बस मेरे साथ चल, मुझे कमज़ोर मत पड़ने दे।”
पल्लवी के इन शब्दों ने श्रुति को खामोश कर दिया। श्रुति जानती थी कि पल्लवी किन अमानवीय हालातों से गुज़र कर यहाँ तक पहुँची है। जैसे ही पल्लवी ने घुटनों के बल मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ना शुरू किया, नुकीले पत्थरों ने उसके घुटनों को छील दिया, लेकिन पल्लवी के होठों से एक आह तक नहीं निकली। शारीरिक दर्द से कहीं ज्यादा गहरा दर्द उसकी आत्मा में था। घुटनों के छिलने की यह जलन तो उस पीड़ा के सामने कुछ भी नहीं थी, जो पिछले एक महीने से वह अपने ही घर में सह रही थी।
पल्लवी एक होनहार लड़की थी और अपने कॉलेज के ही एक सहपाठी, कुणाल से बेइंतहा प्यार करती थी। कुणाल एक सुलझा हुआ, होनहार और बहुत ही नेक दिल इंसान था, जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी नौकरी कर रहा था। दोनों ने अपने भविष्य के सुनहरे सपने बुने थे। लेकिन उनके प्यार की सबसे बड़ी दीवार पल्लवी की माँ, सुशीला देवी थीं। सुशीला देवी एक बेहद दकियानूसी और अंधविश्वासी महिला थीं, जिनका उठना-बैठना, सोचना-समझना सब उनके गुरुजी, स्वामी भैरवानंद के इशारों पर होता था। जब सुशीला को पल्लवी और कुणाल के रिश्ते के बारे में पता चला, तो घर में भूचाल आ गया। कुणाल की जाति अलग थी, और सुशीला देवी के लिए यह किसी पाप से कम नहीं था। लेकिन हद तो तब हो गई जब सुशीला ने स्वामी भैरवानंद को घर बुलाया।
ढोंगी बाबा ने पल्लवी की कुंडली देखते ही घर में मातम का माहौल बना दिया। उसने ऐलान कर दिया कि पल्लवी पर किसी ‘प्रेतनी’ का साया है और उसकी कुंडली में चांडाल योग है, जिसकी वजह से उसका दिमाग भ्रष्ट हो गया है और वह धर्म-भ्रष्ट करने वाले रास्ते पर चल पड़ी है। बाबा ने कहा कि यह प्रेम नहीं, बल्कि उस बुरी आत्मा का प्रभाव है जो इसे दूसरी जाति के लड़के की तरफ खींच रहा है। अगर इसका इलाज नहीं किया गया, तो पूरे परिवार का सर्वनाश हो जाएगा।
पल्लवी के पिता, राघव जी, जो एक सरकारी बैंक में अफसर थे और अक्सर टूर पर रहते थे, इन सब बातों से अंजान थे। उनकी गैरमौजूदगी में सुशीला देवी ने अपनी ही बेटी पर जुल्म ढाने शुरू कर दिए। पल्लवी का फोन छीन लिया गया, उसका घर से निकलना बंद कर दिया गया। लेकिन क्रूरता की सारी हदें तब पार हो गईं, जब बाबा के कहने पर सुशीला ने पल्लवी को ‘शुद्ध’ करने के लिए अनुष्ठान शुरू किया।
पल्लवी को घुटनों के बल घिसटते हुए देखकर श्रुति की आँखों के सामने वह मंज़र तैर गया, जब वह दो दिन पहले छुपकर पल्लवी से मिलने उसके घर गई थी। पल्लवी को घर के सबसे पिछले, बिना खिड़की वाले अंधेरे स्टोर रूम में बंद रखा गया था। बाबा ने सुशीला को आदेश दिया था कि लगातार सात दिनों तक पल्लवी को उस कमरे में बंद रखा जाए और दिन में दो बार उसके सामने सूखी लाल मिर्चों की धूनी दी जाए, ताकि सूखी मिर्चों के दमघोंटू धुएँ से उसके अंदर बैठी ‘प्रेतनी’ तड़प कर बाहर निकल जाए।
जब श्रुति ने वेंटिलेटर से झाँक कर देखा था, तो पल्लवी फर्श पर बेसुध पड़ी थी। सूखी मिर्चों के धुएँ ने उसके फेफड़ों को छलनी कर दिया था। उसकी आँखें सूज कर लाल हो गई थीं, गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी, और उसे कई दिनों से ठीक से खाना भी नहीं दिया गया था। सुशीला देवी दरवाज़े के बाहर बैठी मंत्र जाप कर रही थीं, यह सोचकर कि वह अपनी बेटी का उद्धार कर रही हैं, जबकि असल में वह अपनी ही बेटी की हत्यारी बन रही थीं। उस दिन पल्लवी ने किसी तरह रोते हुए श्रुति से कहा था, “मुझे यहाँ से निकाल ले श्रुति, वरना मैं घुट-घुट कर मर जाऊँगी। मेरी माँ मुझे मार डालेगी।”
आज श्रुति की मदद से ही पल्लवी किसी तरह घर से भाग निकलने में कामयाब हुई थी और सीधा इस कालिका मंदिर की ओर चली आई। वह खून से लथपथ घुटनों के साथ जब मंदिर के गर्भगृह की चौखट पर पहुँची, तो उसकी हिम्मत जवाब दे गई। वह वहीं औंधे मुँह गिर पड़ी। श्रुति ने भागकर उसका सिर अपनी गोद में रख लिया।
“हे माँ… हे भवानी…” पल्लवी ने अपने काँपते हाथों को जोड़ते हुए मंदिर में रखी विशाल और तेजस्वी मूर्ति की ओर देखा। “मैं यहाँ यह माँगने नहीं आई हूँ कि मेरी कुणाल से शादी करवा दे… मैं यहाँ सिर्फ अपनी ज़िंदगी की भीख माँगने आई हूँ। मुझे मेरी माँ के इस अंधेपन से बचा ले। क्या एक बेटी का किसी से सच्चा प्यार करना इतना बड़ा अपराध है कि उसे साँस लेने का हक भी न रहे? माँ, मुझे इतनी शक्ति दे कि मैं इस पाखंड और अत्याचार के खिलाफ खड़ी हो सकूँ।” पल्लवी फूट-फूट कर रोने लगी। उसका दर्द मंदिर की दीवारों से टकराकर एक अजीब सी गूँज पैदा कर रहा था।
तभी मंदिर की सीढ़ियों पर कुछ लोगों के कदमों की तेज़ आहट सुनाई दी। पल्लवी ने डर के मारे आँखें बंद कर लीं, उसे लगा कि सुशीला देवी और वह पाखंडी बाबा उसे ढूँढते हुए यहाँ तक पहुँच गए हैं। लेकिन जब उसने आँखें खोलीं, तो सामने जो दृश्य था, उसने उसकी आँखों में आंसुओं का एक नया सैलाब ला दिया।
सामने उसके पिता, राघव जी खड़े थे। उनकी आँखों में गुस्सा, पीड़ा और पश्चाताप का मिला-जुला भाव था। उनके साथ कुणाल खड़ा था, जिसकी आँखों में पल्लवी की हालत देखकर खून उतर आया था, और पीछे दो पुलिस वाले भी थे। दरअसल, श्रुति ने पल्लवी को घर से निकालने से पहले ही राघव जी को उनके ऑफिस के नंबर पर फोन करके सारी सच्चाई बता दी थी और कुणाल को भी खबर कर दी थी। राघव जी अपना टूर बीच में ही छोड़कर सीधे शहर पहुँचे थे।
पल्लवी के लहूलुहान घुटनों और सूजे हुए चेहरे को देखकर राघव जी का दिल फट गया। वह दौड़कर अपनी बेटी के पास आए और उसे सीने से लगा लिया। “मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची… मुझे नहीं पता था कि मेरे पीछे से तेरी माँ के सिर पर अंधविश्वास का ऐसा भूत सवार है कि वह तेरी ही जान लेने पर तुल जाएगी। मैं सब ठीक कर दूँगा, तेरा बाबा आ गया है अब।”
कुणाल ने आगे बढ़कर पल्लवी के ज़ख्मों पर अपना रुमाल बाँधा। उसकी आँखों से गिरते आँसू पल्लवी के हाथों पर पड़ रहे थे। “तुमने इतनी बड़ी लड़ाई अकेले क्यों लड़ी पल्लवी? मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ,” कुणाल ने रुँधे हुए गले से कहा।
पल्लवी को लगा जैसे कालिका माता ने उसकी पुकार सुन ली थी। भगवान खुद आसमान से उतरकर नहीं आते, वे हमेशा इंसानों के रूप में, अपनों के प्यार और समर्थन के रूप में हमारी मदद करते हैं।
उसी दिन राघव जी पुलिस को लेकर अपने घर पहुँचे। सुशीला देवी घर में पल्लवी के भाग जाने से बौखलाई हुई थीं और बाबा भैरवानंद से कोई नया तांत्रिक उपाय पूछ रही थीं। राघव जी ने घर में घुसते ही सबसे पहले उस पाखंडी बाबा के गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ा और पुलिस ने तुरंत उसे धोखाधड़ी और जानलेवा हमला करने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया।
राघव जी ने सुशीला की तरफ मुड़कर कहा, “तुम्हें माँ कहते हुए शर्म आती है सुशीला! तुमने अपने अंधविश्वास के लिए अपनी ही बेटी की बलि चढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। धर्म और आस्था हमें जीवन जीना सिखाते हैं, किसी की जान लेना नहीं। तुमने जिस ढोंगी को भगवान मान लिया, वह असल में एक अपराधी है, जो तुम जैसी अंधी महिलाओं को ठगता है।”
सुशीला देवी सन्न रह गईं। जब पुलिस ने बाबा की फाइल खोली, तो पता चला कि वह पहले भी कई शहरों में ऐसे ढोंग रचकर भोली-भाली लड़कियों और उनके परिवारों को लूट चुका है। यह जानकर सुशीला के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस गुरुजी पर वह आँख मूँद कर विश्वास कर रही थीं, वह एक क्रूर अपराधी निकला। सुशीला को अपनी गलती का भयानक एहसास हुआ। वह दौड़कर पल्लवी के पैरों में गिर पड़ी और दहाड़ें मार-मार कर रोने लगी। “मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची… मैं अंधी हो गई थी। मुझे लगा मैं तेरा भला कर रही हूँ, पर मैं तो तेरा घर उजाड़ने चली थी।”
पल्लवी का दिल मोम का था। उसने अपनी माँ को उठाया और गले से लगा लिया। “माँ, अंधविश्वास ने आपकी आँखों पर पट्टी बाँध दी थी। प्यार कोई भूत या प्रेत नहीं है, यह तो ईश्वर का दिया हुआ सबसे सुंदर वरदान है।”
समय ने करवट ली। पल्लवी और कुणाल का प्यार उस कठिन परीक्षा की आग से कुंदन बनकर निकला था। छह महीने बाद, उसी घर में जहाँ कभी सूखी मिर्चों का दमघोंटू धुआँ उठता था, आज वहाँ हवन कुंड की पवित्र और सुंगंधित अग्नि जल रही थी। सुशीला देवी ने खुद कुणाल का हाथ पल्लवी के हाथों में दिया और खुशी-खुशी अपनी बेटी का कन्यादान किया।
पल्लवी की हिम्मत, श्रुति की दोस्ती, और पिता के सही समय पर लिए गए फैसले ने अंधविश्वास के उस घने अँधेरे को चीरकर प्यार और विश्वास का एक ऐसा नया सवेरा ला दिया था, जिसने साबित कर दिया कि अगर नीयत साफ हो और इरादे मज़बूत हों, तो कोई भी पाखंड सच्चे प्रेम को हरा नहीं सकता। पल्लवी की कहानी आज उस पूरे इलाके में एक मिसाल बन चुकी थी, जो सिखाती है कि हमारी आस्था हमारी ताकत होनी चाहिए, न कि हमारे अपनों के लिए कोई सजा।
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