‘मुनिया’ – श्वेता अग्रवाल 

अभी अम्मा जी दोपहर का खाना खाकर लेटी ही थी कि अचानक गेट खटखटाने की जोर-जोर से आवाज़ आने लगी। 

“अम्मा! ओ अम्मा दरवाजा खोलो।”

“आ रही हूॅं। कौन आ गया इस वक्त? दो घड़ी सुस्ताने भी नहीं देता।” धीरे-धीरे दरवाजे की ओर बढ़ती अम्मा जी बड़बड़ाई।

लेकिन जैसे ही वह दरवाजे के करीब पहुॅंची उनकी बड़बड़ाहट ने खुशी का रूप ले लिया।बाहर से उनके बेटे और बहू की आवाज़ आ रही थी। 

उन्होंने जल्दी से दरवाजा खोला “अरे! रमेश बिटवा, बहुरिया तुम लोग अचानक कैसे?” 

“अम्मा, अंदर तो आने दो। सारी जांच- पड़ताल दरवाजे पर ही कर लेगी क्या?” 

रमेश ने अंदर आते हुए कहा। 

“आओ बैठो और बताओ क्या खाओगे? पहले बताया होता तो मैं कछु बना कर रखती।” 

“आप परेशान ना हो अम्मा हमने रास्ते में खाना खा लिया है आप तो बस आराम से हमारे पास बैठो।” बहू रीमा ने पांव छूते हुए कहा। 

“जुग-जुग जियो। दूधो नहाओ पूतों फलों। बहुरिया ठीक है खाना ना सही, चाई तो पियोगे ना गुड वाली। मैं अभी बनाकर लाई।” 

“अम्मा आप क्यों परेशान हो रही है। चाय मुनिया बना लेगी।” 

“कौन मुनिया?” 

“हमारी नौकरानी अम्मा। मुंबई से हमारे साथ आई है।”

“मुनिया जा तीन कप चाय बनाकर ले आओ। किचन उस साइड में है।” हाथ से किचन की ओर इशारा करते हुए रीमा बोली। 

“अरे बहुरिया! यह बच्ची ऐसे कैसे बना लेगी। इस सामान-वामान तो बताना पड़ेगा। तुम दोनों हाथ मुंह धो लो। तब तक मैं चाय तैयार करवाती हूॅं।”

“आ बिटिया, चल मेरे साथ” 

“जी माई।” 

फिर जरा ठहर कर अम्मा की ओर देखकर बोली “मैं आपको माई बुला सकती हूॅं ना।”

“तेरा जो मन करे वह बोल। पर अभी जल्दी-जल्दी चल। पहले कभी गुड़ की चाय बनाई है?”

“नहीं। पर आप बताते जाना। मैं फट से बना लूंगी।” 

“बातें बहुत बनाती है। चल उसे भगोने में पानी चढ़ा। फिर गुड डाल। अरे! तुलसी पत्ते तो लाना ही भूल गई…उम्र के साथ मेरी तो याददाश्त भी जाने लगी है, जाने क्या-क्या कहाँ रखकर भूल जाती हूँ।” 

मैं ले आऊं? आते वक्त देखा था पीछे बगीचे में…..” बोलकर वह बगीचे में भाग गई। 

“लो माई। तुलसी जी।”

“ले भी आई तू लड़की है या जिन्न!”

“क्या माई आप भी!” मुनिया ने हंसते हुए कहा “आप बाहर साब-मेमसाब से गप्पें मारो, मैं अभी चाय लाती हूॅं।”

कुछ ही देर में मुनिया गरमा गरम चाय लेकर पहुंच गई। 

“यह लो माई आपकी गुड वाली चाय। जैसे आपने बताया था वैसे ही बनाई है पीकर बताओ कैसी बनी है?”

अम्मा जी ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा “एक बात तो माननी पड़ेगी बिटिया जितनी लच्छेदार बातें तुम बनाती हो उतनी ही लाजवाब यह चाय बनी है।” 

फिर अपने बेटे और बहू की ओर देखकर बोली

“और बताओ रमेश बिटवा, बहुरिया तुम लोगों का अचानक कैसे आना हुआ?”

“अम्मा ऑफिस में 2 दिन की छुट्टी थी तो तुम्हारी बहुरिया ने जिद पकड़ ली कि तुमसे मिलना है तो हम चले आए।”

“अच्छा किया।” बोलते बोलते अम्मा जी मुस्कुरा दी। 

“अम्मा, आप हम लोगों के साथ शहर चलो ना। आप अकेले यहां रहती हैं तो हमें आपकी बहुत चिंता होती है।”बहू रीमा ने अम्मा का हाथ पकड़ते हुए कहा। 

“अरे बहुरिया काहे मुझे बुढ़िया की इतनी चिंता करती है। तुझे तो पता है इस घर में तेरे बाबूजी की यादें हैं तो मैं इसे छोड़कर कहीं नहीं जाने वाली”

“ठीक है अम्मा। अगर आप हमारे साथ नहीं चलेगी तो मुनिया यहां आपके पास रहेगी। आपका ध्यान रखने के लिए।” रीमा ने ज़िद करते हुए कहा। 

“अरे इस बच्ची को क्यों परेशान कर रही हो?”

तब उसकी बेटे रमेश ने पास बैठते हुए कहा “अम्मा मुनिया अनाथ है। इसकी माॅं हमारे पास ही काम करती थी। पिछले महीने ही चल बसी है। ये यहां रहेगी तो इसे तुम्हारा और तुम्हें इसका सहारा हो जाएगा। सोच लो हम तुम्हें यहां अकेले तो नहीं रहने देंगे।”

यह सुनते ही अम्मा मान गई। मुनिया इतनी चुलबुली और हंसमुख थी कि अपनी प्यारी-प्यारी बातों से अम्मा का मन लगाए रखती। गुड वाली चाय, बाजरे की खिचड़ी तो अब अम्मा से भी अच्छी बनाने लगी थी। सुबह-शाम अम्मा के घुटनों की मालिश करती। शाम को उन्हें मंदिर ले जाती। उनकी पसंद का खाना बनाती और उनका हर तरह से ध्यान रखती।

अम्मा जी भी मुनिया को बेटी सा प्यार करती। मुनिया की देखभाल से अम्मा जी पहले से ज्यादा स्वस्थ हो गई थी। 

एक बार अम्मा जी ने गांव वालों के साथ झील वाली माता के दर्शन का प्रोग्राम बनाया। मुनिया भी अम्मा जी के साथ जाना चाहती थी लेकिन बस में सीट भर चुकी थी। 

“माई, हम आपको अकेले नहीं जाने देंगे। हम भी चलेंगे।” मुनिया मान ही नहीं रही थी। 

“मुनिया फिक्र मत कर। हम तेरी माई का अच्छे से ध्यान रखेंगे और कल शाम तक तेरी माई लौट ही आएगी।”

“हाॅं मुनिया जिद मत कर। कल शाम तक तो मैं लौट ही आऊंगी। तू घर का ध्यान रखना।” 

“ठीक है ।लेकिन आप अपनी दवाई टाइम पर ले लेना। कई अब ध्यान रखना अम्मा अपनी दवाई लेना भूल जाती है।”

“हाॅं- हाॅं, हम ध्यान रखेंगे तू चिंता ना कर।”

मुनिया मन मार कर रह गई। उधर अम्मा जी गांव वालों के साथ झील वाली माता के दर्शन के लिए निकल पड़ी। वे माता का दर्शन कर अगले दिन शाम तक घर पहुंचने वाली थी। 

लेकिन अभी बस आधी दूर ही पहुंची थी कि अचानक एक झटके के साथ रुक गई। सामने एक बहुत बड़ा पेड़ टूट कर गिर गया था जिससे आगे का पूरा रास्ता बंद हो चुका था। प्रशासन सबको वापस लौटा रहा था। मजबूरीवश उन्हें भी बिना माता के दर्शन के वापस लौटना पड़ा। कल शाम के बजाय वे आज शाम ही लौट आए। 

अम्मा जी जैसे ही घर पहुंची, दरवाजे पर ताला देखकर उन्हें जोर का झटका लगा। लेकिन फिर उन्होंने सोचा मुनिया मंदिर तक गई होगी इसीलिए…ज्यादा सोच विचार न कर कर उन्होंने पड़ोस वाली कई से घर की दूसरी चाबी लेकर ताला खोला। 

अम्मा को घर आए अब 2 घंटे से ऊपर हो गए थे। अंधेरा घिर आया था। लेकिन मुनिया का कोई अता पता नहीं था। अम्मा जी बरामदे में खड़ी उसका इंतजार कर रही थी। तभी वहाॅंं से गुजर रहे बंसी काका ने उन्हें वहां खड़ा देखकर हंसते हुए कहा “अरे अम्मा जी! आज अकेली कैसे? तेरी मुनिया कहाॅं गई? आज वह अपनी चटर-पटर नहीं सुन रही तुम्हें?”

“पता नहीं बंशीधर! मैं आई तब भी घर पर नहीं थी। शायद मंदिर गई होगी। अब तो अंधेरा भी होने आया लेकिन अब तक नहीं आई ।” अम्माजी चिंतित स्वर में बोली।

“नहीं, वह मंदिर में तो नहीं है मैं तो मंदिर से ही आ रहा हूॅं।”

“हे भगवान तो कहाॅं गई?”

“कहीं भाग तो नहीं गई? देख लो घर में सारे कीमती सामान सही सलामत तो है?” 

“बंशीधर यह क्या बोल रहा है!” अम्मा गुस्साई। 

अभी बंशीधर कुछ जवाब देता उसे पहले ही पड़ोस वाली राधा का की बोल उठी “अम्मा इस पर बाद में गुस्साना। पहले जाकर घर में अपनी कीमती सामान तो देखलो।”

यह सुनते ही अम्मा अंदर गई और अपनी अलमारी खोली और उसे खोलते ही चिल्ला पड़ी

“हे राम! जेवर और पैसे कहाॅ गए?”

“देखा! मैंने कहा था ना अम्मा की वह तेरे पीछे से तेरा सारा कीमती सामान ले भागी।” 

इतना बड़ा विश्वासघात! नहीं मुनिया ऐसा नहीं कर सकती।” अम्मा धम्म से जमीन पर बैठ गई।

बंशीधर काका ने उसके बेटे बहु को फोन कर सारी बात बताई। मुनिया की असलियत सुनकर उनके भी पैरों तले जमीन खिसक गई। वे तुरंत दौड़े आए। 

“अम्मा, मुनिया इतना बड़ा विश्वासघात करेगी मैं तो सपने में भी नहीं सोच सकता।बस अब आप यहां नहीं रहेंगी। जेवर और पैसे गए कोई बात नहीं। लेकिन अगर आपको कुछ हो जाता तो हम क्या करते? आपका सामान पैक कर रहा हूॅं।

कल सुबह होते ही आप हमारे साथ चलेगी।” उनका बेटा रमेश उनके गले लगकर बोला। 

“मैंने उसे इतना प्यार दिया। अपनी बेटी की तरह रखा और उसने!” अम्मा रो पड़ी।

“अम्मा अब उसे धोखेबाज के बारे में सोचना बंद कीजिए और खाना खा लीजिए।” बहू रीमा बोली ।

दूसरे दिन जैसे ही वो लोग शहर जाने के लिए गाड़ी में बैठने लगे,उन्हें मुनिया आती दिखाई दी। 

“अरे भैया -भाभी आप ! और अम्मा आप ठीक तो है ना? आप तो आज शाम को आने वाली थी।”

“आप सब लोग कहाॅं जा रहे हैं?” मुनिया एक के बाद एक सवाल पूछे जा रही थी।

“मुनिया, यह सब बातें छोड़ और यह बता तू कहाॅं गई थी? अम्मा के जेवर कहाॅं है? तुझे शर्म नहीं आई हमारे साथ इतना बड़ा विश्वासघात करते हुए।” रीमा ने उसकी ओर जलती हुई निगाहों से देखते हुए कहा।

“भाभी, यह आप क्या कह रहे हैं! मैंने कोई जेवर नहीं चुराए। मैं तो पहाड़ी वाले बाबा के पास गई थी अम्मा के घुटनों के लिए लेप लाने के लिए। बहुत सिद्ध बाबा हैं। मैं तो कल अम्मा के निकलते ही निकल गई थी। सोचा था रात तक वापस आ जाऊंगी। लेकिन वह इतनी भीड़ थी कि निकलते-निकलते सुबह हो गई।” बोलते-बोलते मुनिया रो पड़ी। 

तभी रमेश ने गुस्से से उबलते हुए कहा “यह सब कहानियाॅं बनाना छोड़। बता अम्मा के गहने कहाॅ है?” 

यह सुनकर मुनिया अपने ऑंसू पोंछते हुए अंदर आई और उन्हें स्टोर रूम में ले गई “भैया-भाभी, माई की आदत तो आप दोनों को पता ही है हर आने जाने वाले के सामने अपनी अलमारी खोलकर रख देती है। इसीलिए मैंने जेवर और पैसे इस पुराने कपड़ों के ट्रंक में छुपा दिए थे और सोचा था कि अबकी बार जब आप लोग आएंगे तो आपसे कह कर इन लॉकर में रखवा दूंगी। मैंने माई को भी इस बारे में बताया था। लेकिन माई भूल गई।” मुनिया ने स्टोर के पुराने कपड़ों के ट्रंक से छोटा सा संदूक निकलते हुए कहा। 

“इसकी चाबी कहाॅं है? रमेश ने उसे घूरते हुए कहा। 

“इसकी चाबी अम्मा जी के कान्हा के मंदिर में कान्हा के झूले के अंदर है। माई ने खुद अपने हाथों से रखी है। लीजिए तसल्ली कर लीजिए। अम्मा के सारे गहने सही सलामत है और हाॅं यह लेप माई के घुटनों में नियम से लगा दीजिएगा।” कहते हुए मुनिया रोते हुए जाने लगी।

तभी अम्मा ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया। अपनी माई को छोड़कर कहाॅं जाएगी? मुनिया तेरी माई से तो कुछ भी नहीं संभलता। तू भी चल जाएगी तो उन्हें कौन संभालेगा?”

 और मुनिया भी रोते हुए उनके गले लग गई।

धन्यवाद।

साप्ताहिक विषय प्रतियोगिता- #विश्वासघात 

शीर्षक- मुनिया 

लेखिका- श्वेता अग्रवाल 

धनबाद, झारखंड।

error: Content is protected !!