आज, मोहिनी ने वही किया था। वह अपने ही घर में एक चोर की तरह दबे पांव उठी थी। अलमारी से अपनी मां के गहनों का डिब्बा निकाला, कुछ नगद रुपये रखे और अपनी सालों की यादों को एक छोटे से बैग में ठूंसकर उस दहलीज को पार कर गई, जिसने उसे चलना सिखाया था। घर छोड़ते वक्त उसके कदम एक पल के लिए डगमगाए थे। उसे अपनी मां का वह मासूम चेहरा याद आया था जो हर सुबह उसे प्यार से माथा चूमकर जगाती थी। उसे पापा की वह हंसी याद आई थी जब उन्होंने उसके कॉलेज में टॉप करने पर पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटी थी। लेकिन विकास के प्यार के सम्मोहन ने उन सभी यादों को धुंधला कर दिया। गली के नुक्कड़ पर विकास उसका इंतजार कर रहा था। उसे देखते ही मोहिनी ने अपने सारे डर भुला दिए और उसके साथ उस बस में आकर बैठ गई जो उन्हें उनके ‘सपनों के शहर’ ले जा रही थी।
सर्दियों की वह रात बहुत खामोश थी, लेकिन मोहिनी के मन के भीतर एक भयानक तूफान उठ रहा था। वॉल्वो बस के शीशे से बाहर भागते हुए पेड़ और अंधेरे में डूबे खेत उसके अतीत और भविष्य दोनों की तरह धुंधले लग रहे थे। बस के पहियों की गड़गड़ाहट के बीच उसे बार-बार अपने बड़े भाई, सुमित के वे शब्द याद आ रहे थे जो उसने दो दिन पहले ही कहे थे— ‘मोहिनी , तू अभी दुनिया नहीं समझती। जिस विकास को तू अपना सब कुछ मान बैठी है, उसकी आंखों में मुझे सच्चाई नहीं दिखती। प्यार और फरेब में बहुत बारीक अंतर होता है, मेरी बहन। लौट आ इस रास्ते से, वरना यह रास्ता तुझे वहां ले जाएगा जहां से वापसी मुमकिन नहीं होगी।’
सुमित भैया की वह फिक्रमंद आवाज जैसे बस के एसी की ठंडी हवा के साथ मिलकर मोहिनी के कानों में सीसा पिघला रही थी। लेकिन तब मोहिनी कहां कुछ सुनने को तैयार थी? प्यार का अंधा चश्मा जब आंखों पर चढ़ता है, तो अपनों के आंसू और उनकी चिंताएं सिर्फ एक बंदिश लगने लगती हैं। मोहिनी के साथ भी यही हुआ था। वह अपने घर की सबसे छोटी और लाडली बेटी थी। माता-पिता ने उसे कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी और सुमित भैया तो जैसे उस पर जान छिड़कते थे। लेकिन पिछले आठ महीनों में उसकी जिंदगी में विकास नाम के उस लड़के ने ऐसी जगह बना ली थी, जिसके आगे उसे अपना भरा-पूरा परिवार भी दुश्मन नजर आने लगा था।
विकास देखने में आकर्षक था, मीठी बातें करने में माहिर था और उसने मोहिनी को ऐसे सुनहरे सपनों की दुनिया में पहुंचा दिया था, जहां सिर्फ और सिर्फ वे दोनों थे। जब सुमित को भनक लगी कि मोहिनी किसी ऐसे लड़के के संपर्क में है जिसका न तो कोई स्थायी काम है और न ही पारिवारिक पृष्ठभूमि साफ है, तो उसने मोहिनी को बहुत समझाया। उसने कहा, ‘गुड़िया, अगर तेरा प्यार इतना ही सच्चा है, तो उसे कह कि घर आकर पापा से बात करे। हम लोग कोई पुराने जमाने के दुश्मन तो हैं नहीं, लेकिन उस लड़के के तेवर मुझे ठीक नहीं लगते।’
लेकिन मोहिनी ने अपने भाई की एक न सुनी। उसे लगा कि उसका परिवार उसके प्यार के खिलाफ है। विकास ने मोहिनी के दिमाग में यह बात बहुत गहराई से भर दी थी कि उसके घर वाले कभी एक साधारण से लड़के को अपना दामाद नहीं बनाएंगे। उसने मोहिनी से कहा था, ‘तुम्हारे भैया मुझे कभी नहीं अपनाएंगे, मोहिनी । उनके लिए रुतबा और पैसा मायने रखता है, और मेरे पास सिर्फ तुम्हारे लिए प्यार है। अगर हम यहां रहे, तो वे हमारी शादी किसी कीमत पर नहीं होने देंगे। हमें भागना होगा। मेरे एक दोस्त ने चंडीगढ़ में मेरे लिए नौकरी का इंतजाम कर दिया है। हम वहीं एक नई दुनिया बसाएंगे। तुम बस अपने साथ कुछ पैसे और अपनी मां के वो गहने ले आना जो उन्होंने तुम्हारे लिए बनवाए हैं, ताकि शुरुआत के कुछ दिन हमें कोई तकलीफ न हो।’
और आज, मोहिनी ने वही किया था। वह अपने ही घर में एक चोर की तरह दबे पांव उठी थी। अलमारी से अपनी मां के गहनों का डिब्बा निकाला, कुछ नगद रुपये रखे और अपनी सालों की यादों को एक छोटे से बैग में ठूंसकर उस दहलीज को पार कर गई, जिसने उसे चलना सिखाया था। घर छोड़ते वक्त उसके कदम एक पल के लिए डगमगाए थे। उसे अपनी मां का वह मासूम चेहरा याद आया था जो हर सुबह उसे प्यार से माथा चूमकर जगाती थी। उसे पापा की वह हंसी याद आई थी जब उन्होंने उसके कॉलेज में टॉप करने पर पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटी थी। लेकिन विकास के प्यार के सम्मोहन ने उन सभी यादों को धुंधला कर दिया। गली के नुक्कड़ पर विकास उसका इंतजार कर रहा था। उसे देखते ही मोहिनी ने अपने सारे डर भुला दिए और उसके साथ उस बस में आकर बैठ गई जो उन्हें उनके ‘सपनों के शहर’ ले जा रही थी।
सफर शुरू हुए अब लगभग चार घंटे हो चुके थे। बस अपनी रफ्तार से हाइवे पर दौड़ रही थी। मोहिनी ने अपने पास बैठे विकास की ओर देखा। वह आंखें मूंदे हुए था। मोहिनी ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। विकास ने आधी आंखें खोलीं और मुस्कुरा कर कहा, ‘क्या हुआ? डर लग रहा है? चिंता मत करो, अब तुम मेरी जिम्मेदारी हो। बस कुछ घंटों की बात है, फिर हम हमेशा के लिए एक हो जाएंगे। यहां फोन बंद रखना, ताकि तुम्हारे घर वाले हमारी लोकेशन न ट्रेस कर सकें।’ मोहिनी ने हामी में सिर हिलाया और अपना सिर सीट से टिका लिया।
थकान और मानसिक तनाव के कारण मोहिनी की पलकें भारी होने लगीं। एक तरफ एक नए जीवन का रोमांच था, तो दूसरी तरफ एक अपराधबोध कि सुबह जब मां उसके खाली बिस्तर को देखेगी तो उस पर क्या बीतेगी। पापा की तो शायद दुनिया ही उजड़ जाएगी। सुमित भैया पागलों की तरह उसे ढूंढेंगे। यह सोचते-सोचते न जाने कब मोहिनी की आंख लग गई।
अचानक बस एक झटके के साथ रुकी। मोहिनी की नींद टूट गई। बाहर काफी अंधेरा था, शायद कोई ढाबा या रेस्टोरेंट था जहां बस रुकी थी। बस के अंदर की लाइटें जल चुकी थीं और कुछ यात्री नीचे उतर रहे थे। मोहिनी ने अपने बगल में देखा— विकास की सीट खाली थी। उसे लगा शायद वह पानी लेने या वॉशरूम गया होगा। उसने अपनी आंखें मलीं और इंतजार करने लगी। दस मिनट बीत गए। पंद्रह मिनट बीत गए। बस का कंडक्टर आवाज लगाने लगा कि सभी यात्री जल्दी आकर बैठें, बस चलने वाली है।
मोहिनी की धड़कनें तेज होने लगीं। उसने घबराकर खिड़की से बाहर देखा, लेकिन विकास कहीं नजर नहीं आ रहा था। वह उठी और बस के दरवाजे तक गई। ढाबे पर लोगों की भीड़ थी, लेकिन वह जाना-पहचाना चेहरा कहीं नहीं था। एक अनजाना सा डर उसके सीने में रेंगने लगा। वह वापस अपनी सीट पर आई। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसने सोचा कि शायद वह अपना मोबाइल भूल गया होगा, उसे फोन कर लूं। मोहिनी ने अपना हैंडबैग उठाया। जैसे ही उसने बैग खोला, उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
बैग अंदर से पूरी तरह खाली था। मां के गहनों का डिब्बा नदारद था, और जिस चेन वाली पॉकेट में उसने अपना कीमती स्मार्टफोन और सारे कैश रखे थे, वह खुली पड़ी थी। मोहिनी की सांसें अटक गईं। उसने पागलों की तरह सीट के नीचे, अपने आसपास सब जगह ढूंढा, लेकिन न तो पैसे थे, न गहने, न मोबाइल और न ही वह इंसान जिसके लिए उसने अपने पूरे परिवार को दांव पर लगा दिया था।
उसका हलक सूख गया था, होंठ कांपने लगे थे। माथे पर दिसंबर की सर्दी में भी पसीने की बूंदें छलक आई थीं। अचानक उसे सुमित भैया की बात याद आई— ‘प्यार और फरेब में बहुत बारीक अंतर होता है…’ वह अंतर आज एक गहरे घाव की तरह उसके सामने खुल गया था। वह विकास नहीं था, वह एक छलावा था, एक बहुरूपिया था जिसने उसकी भावनाओं का, उसके विश्वास का और उसकी नादानी का सौदा किया था।
बस का इंजन स्टार्ट हो गया था। कंडक्टर ने उससे पूछा, “मैडम, आपके साथ वाले भाईसाहब नहीं आए क्या?” मोहिनी के मुंह से एक शब्द नहीं निकला। वह बस फटी-फटी आंखों से कंडक्टर को देखती रही। उसकी आंखों से आंसुओं का एक सैलाब फूट पड़ा। वह रात के उस वीरान ढाबे पर, एक अनजान जगह पर बिल्कुल अकेली खड़ी थी। न उसके पास पैसा था, न फोन, और न ही वह घर, जिसे वह अपनी बेवकूफी में हमेशा के लिए छोड़ आई थी।
उसे अब समझ आ रहा था कि परिवार की बंदिशें दरअसल वह चारदीवारी होती हैं जो हमें दुनिया के खतरनाक भेड़ियों से बचाती हैं। उसने प्यार के नाम पर एक मृगतृष्णा का पीछा किया था, और जब वह उस तक पहुंची, तो वहां सिर्फ रेत थी, जिसने उसे पूरी तरह से लील लिया था। उस बस के ठंडे फर्श पर बैठकर वह फूट-फूट कर रो रही थी, यह सोचकर कि अब वह किस मुंह से अपने पापा के पास जाएगी, कैसे उस सुमित भैया से नजरें मिलाएगी जिसने उसे इस दलदल में गिरने से बचाने की पूरी कोशिश की थी। मोहिनी को अब जीवन की सबसे बड़ी और सबसे क्रूर सीख मिल चुकी थी, लेकिन इसकी कीमत बहुत भारी थी।
आपको क्या लगता है, मोहिनी को अब क्या करना चाहिए? क्या उसे अपने घर वापस लौटकर अपनी गलती मान लेनी चाहिए, या फिर पुलिस की मदद लेकर विकास को सजा दिलवानी चाहिए? अक्सर हम जवानी की दहलीज पर ऐसे फैसले ले लेते हैं जो पूरे परिवार को तोड़ देते हैं। क्या आपके आसपास भी कभी ऐसा कुछ हुआ है? अपने विचार और अनुभव कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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