आज शारदा जी बहुत गमगीन होकर विचारों में डूबी हुई थी। सिंगापुर में रहने वाली उनकी बेटी संजना की तबियत बहुत खराब थी। पिछले माह ही उसके सिज़ेरियन सैक्शन से बेटा हुआ था पर उन्हें कोई खुशी नहीं हुई थी। एकदम निर्विकार भाव से सब देखती सुनती रही थी।
सच तो ये था कि वो अपने इस बेमेल विवाह को स्वीकार ही नहीं कर पाई थीं। एक बारह साल की बेटी के पिता को वो मन से पति ही नहीं मान सकी थीं। संजना बेचारी तो बलि का बकरा बन ही चुकी थी। वो उनकी आँख की किरकिरी की तरह हर समय उनकी अवमानना का शिकार होती रहती थी पर वो मासूम उनके आगे पीछे ‘मम्मी मम्मी’ करते घूमती रहती।
वो आरामकुर्सी पर झूला झूलते हुए आँखें मूंदे हुए थी। पुरानी बातें चलचित्र की तरह स्मृतिपटल पर हलचल मचा कर उन्हें बिलोए हुई थीं। जैसे उसी दिन की बात हो…उनकी शादी की सालगिरह थी। संजना ने बड़े शौक से केक बनाया था और दादीजी की मदद से उनकी पसंद के कटलेट बना कर टेबिल पर सजाए थे। पापाजी को मनुहार करके फैक्ट्री से बुला चुकी थी। उनके कमरे में आकर उनका हाथ पकड़ा ही था कि चीख उठीं थीं,
“क्या तमाशा बना रखा है। अपने पापा से केक कटवाओ और उन्हें ही खिलाओ।”
बेचारी कितनी सहम गई थी पर फिर भी हिम्मत करके कह बैठी थी,
“प्लीज़ मम्मी, चलो ना। आज आपकी शादी की सालगिरह है। पापा बाहर वेट कर रहे हैं।”
उनको तो जैसे मिर्गी का दौरा ही पड़ गया था। उसको इतनी जोर से धक्का दिया कि सम्हल ना सकी और दूर जा गिरी थी। उस दिन पहली बार हर्ष बाबू उन पर चिल्लाए थे और बिटिया को गोदी में उठा कर ले गए थे। वो उस दिन थोड़ी शर्मिंदा भी हुई थीं पर फिर उनका आहत मन सिर उठा चुका था…मेरी चिंता तो किसी ने नहीं की…मैं ही क्यों इस पराई लड़की के लिए मरती रहूँ। मेरे बाबूजी ने तो अपनी सगी बिटिया को इस आग में झोंक दिया…।
चार साल बाद उसके विवाह में भी उन्होंने कोई रुचि नहीं दिखाई थी। जब वो उनसे लिपट कर रोई थी…उस समय उनके अंदर की औरत जाग गई थी। थोड़ी ही देर के लिए ही वो ममतामयी माँ बन गई थी…बस थोड़ी ही देर के लिए।
पिछले दिनों नाती के जन्म की खबर आई थी…सब खुश थे पर वो उसी तरह निर्विकार थीं। आज जब संजना की तबीयत काफ़ी गड़बड़ होने की खबर आई है…वो व्याकुल सी हो गई हैं। वो स्वयं ही नहीं समझ पा रही हैं …ये उनको क्या हो रहा है। संजना और उसके बच्चे की फोटो देख रही हैं और रो रही हैं। घर में मची हलचल को महसूस कर रही थीं। हर्षजी और रिश्ते की भाभी सीमा जी सिंगापुर जाने की तैयारियों में भागदौड़ कर रहे थे। वो मन से टूट रही थीं…आज उनसे कोई कुछ नहीं कह रहा। वो चीख चीख कर रोना चाह रही थी पर उनका ईगो इसकी गवाही नहीं दे रहा था। आखिर इन हालातों के लिए वो स्वयं ही तो जिम्मेदार थीं। तभी संजना का फोन आ गया और उधर से मरियल आवाज़ में वो कह रही थी,
“मम्मी, आप भी आ जाओ ना। आपका नाती आपको बुला रहा है।”
अब वो और अधिक कंट्रोल नहीं कर सकीं और दादीजी के गले लग कर रोते हुए बेसाख्ता चिल्ला पड़ी थीं,
“बेटी मेरी बीमार है …तो मैं ही तो जाऊँगी। ये सीमा भाभी क्यों जाएँगी। मैं नानी बनी हूँ। मेरा नाती मुझे पुकार रहा है। मेरे जाने का प्रबंध करवा दीजिए।”
वहाँ खड़े सब लोग मुस्कुरा कर उस ममता की मूरत को देख रहे थे। हर्षजी जल्दी जल्दी ट्रैवल एजेंट को फोन करने लगे थे।
नीरजा कृष्णा
पटना