लेकिन तभी हॉल के मुख्य दरवाज़े पर एक अजीब सा शोर हुआ। दरबान किसी को अंदर आने से रोक रहे थे, और वह व्यक्ति ज़ोर-ज़ोर से गालियां बक रहा था।
“अरे हटो… मेरा बेटा है वो… मुझे रोकोगे तुम? मैं बाप हूँ उसका, आईएएस का बाप!”
आवाज़ सुनकर सुमेधा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पूरा हॉल अचानक शांत हो गया। संगीत बंद हो गया और सबकी नज़रें दरवाज़े की तरफ घूम गईं।
वहाँ प्रकाश खड़ा था। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे, बाल बिखरे हुए थे, और वह ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। शराब की बदबू दूर तक महसूस की जा सकती थी। वह लड़खड़ाते कदमों से, मेहमानों को धक्के मारता हुआ मंच की तरफ बढ़ने लगा। लोग हतप्रभ होकर उसे देख रहे थे। किसी के चेहरे पर हैरानी थी, तो किसी के चेहरे पर घृणा। कानाफूसी शुरू हो गई थी।
शहर के एक साधारण से परिवार के लड़के, सिद्धार्थ ने सिविल सर्विसेज़ की परीक्षा में पूरे राज्य में टॉप किया था और आज उसी की कामयाबी का जश्न मनाया जा रहा था। शहर के नामी-गिरामी लोग, बड़े अधिकारी, रिश्तेदार और सिद्धार्थ के होने वाले ससुराल पक्ष के लोग इस दावत में शरीक हुए थे।
इन सबके बीच, एक कोने में खड़ी सुमेधा की आँखों में खुशी और गर्व के आँसू छलक रहे थे। उसने आज गहरे नीले रंग की एक खूबसूरत रेशमी साड़ी पहनी थी। चेहरे पर एक शांत सी चमक थी, जो बरसों के संघर्ष के बाद आई थी। लोगों की बधाइयों का तांता लगा हुआ था। हर कोई सुमेधा के पास आकर कह रहा था, “सुमेधा जी, आज तो आपका सीना गर्व से चौड़ा हो गया होगा। आखिर आपकी सालों की मेहनत रंग लाई।” सुमेधा बस हाथ जोड़कर, एक मीठी सी मुस्कान के साथ सबका अभिवादन कर रही थी। लेकिन अगर कोई उस मुस्कान के पीछे झांककर देखता, तो उसे एक अजीब सी बेचैनी, एक अनजाना सा डर नज़र आता।
सुमेधा की नज़रें बार-बार हॉल के मुख्य दरवाज़े की तरफ उठ रही थीं। वह किसी को ढूँढ रही थी। उसका पति, प्रकाश। यह सिद्धार्थ की ज़िंदगी का सबसे बड़ा दिन था, लेकिन प्रकाश का कहीं कोई अता-पता नहीं था। सुमेधा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसे रह-रहकर अपने अतीत के वो पन्ने याद आ रहे थे, जिन्हें वह आज के दिन बिल्कुल नहीं खोलना चाहती थी।
प्रकाश हमेशा से ऐसा नहीं था। शुरुआत में वह एक ज़िम्मेदार इंसान था, लेकिन फिर गलत संगति और शराब की ऐसी लत लगी कि घर का सारा सुख-चैन छिन गया। सुमेधा ने सिलाई मशीन चलाकर, ट्यूशन पढ़ाकर और पाई-पाई जोड़कर सिद्धार्थ को पढ़ाया था। प्रकाश ने तो जैसे परिवार से अपना हर नाता ही तोड़ लिया था। उसकी दुनिया बस बोतल के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई थी। सुमेधा ने अपने बेटे को पिता की इस छाया से दूर रखने की हर मुमकिन कोशिश की। उसने अपने आँसुओं को कभी सिद्धार्थ की किताबों पर नहीं गिरने दिया।
आज जब सिद्धार्थ आईएएस बन गया था और उसकी सगाई एक बहुत ही प्रतिष्ठित परिवार में हो रही थी, तो सुमेधा को लगा था कि शायद आज के दिन प्रकाश अपनी ज़िम्मेदारी समझेगा। सुबह उसने प्रकाश के कपड़े निकालकर रखे थे, उसे समझाया भी था कि आज बहुत बड़े-बड़े लोग आ रहे हैं, कम से कम आज के दिन वो उस मनहूस चीज़ को हाथ न लगाए। प्रकाश ने हामी भी भरी थी। लेकिन शाम से ही वह गायब था।
कार्यक्रम आगे बढ़ रहा था। अब मंच पर सिद्धार्थ को सम्मानित करने का समय आ गया था। एंकर ने माइक पर घोषणा की, “देवियों और सज्जनों, अब मैं गुज़ारिश करूँगा हमारे आज के मुख्य आकर्षण, सिद्धार्थ के माता-पिता से, कि वे मंच पर आएं और अपने होनहार बेटे को आशीर्वाद दें।”
तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठा। सुमेधा के पैर जैसे ज़मीन में गड़ गए। उसने घबराहट में चारों तरफ देखा। होने वाले समधी जी और उनकी पत्नी मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देख रहे थे। सिद्धार्थ मंच पर खड़ा अपनी माँ और पिता का इंतज़ार कर रहा था। सुमेधा ने हिम्मत जुटाई और कांपते कदमों से मंच की तरफ बढ़ने लगी। उसने सोचा कि वह अकेले ही मंच पर चली जाएगी और कह देगी कि प्रकाश की तबीयत अचानक खराब हो गई है।
लेकिन तभी हॉल के मुख्य दरवाज़े पर एक अजीब सा शोर हुआ। दरबान किसी को अंदर आने से रोक रहे थे, और वह व्यक्ति ज़ोर-ज़ोर से गालियां बक रहा था।
“अरे हटो… मेरा बेटा है वो… मुझे रोकोगे तुम? मैं बाप हूँ उसका, आईएएस का बाप!”
आवाज़ सुनकर सुमेधा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पूरा हॉल अचानक शांत हो गया। संगीत बंद हो गया और सबकी नज़रें दरवाज़े की तरफ घूम गईं।
वहाँ प्रकाश खड़ा था। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे, बाल बिखरे हुए थे, और वह ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। शराब की बदबू दूर तक महसूस की जा सकती थी। वह लड़खड़ाते कदमों से, मेहमानों को धक्के मारता हुआ मंच की तरफ बढ़ने लगा। लोग हतप्रभ होकर उसे देख रहे थे। किसी के चेहरे पर हैरानी थी, तो किसी के चेहरे पर घृणा। कानाफूसी शुरू हो गई थी।
“ये कौन है?”
“अरे, ये तो सिद्धार्थ के पिता हैं। हे भगवान, ये तो पूरी तरह धुत्त हैं!”
“इतने बड़े अवसर पर ऐसी हरकत? कैसी परवरिश है?”
सुमेधा को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसे बीच चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया हो और उसके कपड़े नोच लिए हों। बरसों से जिस इज़्ज़त को उसने तिनका-तिनका जोड़कर बनाया था, वह आज एक झटके में बिखर रही थी। सिद्धार्थ का सिर शर्म से झुक गया था। उसके होने वाले ससुर का चेहरा गुस्से से लाल हो चुका था।
प्रकाश लड़खड़ाता हुआ मंच की सीढ़ियों तक पहुँचा और एक सीढ़ी पर उसका पैर फिसल गया। वह धड़ाम से नीचे गिर पड़ा। हॉल में एक सन्नाटा छा गया।
सुमेधा के पास सोचने का समय नहीं था। वह दौड़कर प्रकाश के पास पहुँची। उसने प्रकाश को उठाने की कोशिश की। प्रकाश ज़ोर से हँसने लगा, “अरे सुमेधा, देख… आज तेरा पति मंच पर जाएगा। मेरा बेटा अफ़सर बन गया…”
सुमेधा की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन उसने झट से उन्हें पोंछ लिया। उसने बहुत ही धीमी लेकिन सख्त आवाज़ में प्रकाश के कान में कहा, “तमाशा मत बनाइए। कम से कम अपने बेटे की मेहनत और उसकी होने वाली पत्नी के परिवार का तो लिहाज़ कीजिए। उठिए यहाँ से।”
सुमेधा ने वेटर को इशारा किया और सिद्धार्थ के एक दोस्त की मदद से प्रकाश को सहारा देकर वहाँ से हॉल के पिछले हिस्से में ले गई। पीछे मुड़कर उसने मेहमानों की तरफ हाथ जोड़कर एक ऐसी नज़र से देखा, जिसमें माफी, लाचारी और एक बेबस औरत का दर्द सब कुछ शामिल था।
उस रात जश्न तो पूरा हुआ, लेकिन सुमेधा के लिए उस जश्न की सारी रौनक मर चुकी थी। लोग खाना खाकर चले गए, बधाइयां देकर चले गए, लेकिन उन बधाइयों में जो तंज़ छिपे थे, वे सुमेधा के कलेजे को छलनी कर रहे थे। एक शराबी इंसान ने कभी यह नहीं सोचा कि उसकी एक पल की कमज़ोरी, एक औरत की ज़िंदगी भर की इज़्ज़त को कैसे तार-तार कर सकती है। सुमेधा बस यही सोच रही थी कि क्या समाज सिर्फ औरत की कामयाबी देखता है, या फिर उसके पीछे खड़े उस शराबी मर्द के साये को, जिससे वह कभी पीछा नहीं छुड़ा सकती।
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