सुबह के सात बज रहे थे। रसोई में चाय की महक के साथ प्रेशर कुकर की सीटी घर के सन्नाटे को तोड़ रही थी। रिया जल्दी-जल्दी नाश्ता तैयार कर रही थी। सामने रखे मोबाइल पर ऑफिस से लगातार संदेश आ रहे थे।
आज उसकी जिंदगी का एक बड़ा दिन था। पिछले छह महीने से जिस प्रोजेक्ट पर वह काम कर रही थी, उसकी प्रस्तुति आज कंपनी के बड़े अधिकारियों के सामने होनी थी। प्रोजेक्ट सफल होता तो उसके प्रमोशन की संभावना लगभग तय थी।
लेकिन तभी सास की आवाज आई—
“रिया, आज जरा जल्दी घर आ जाना। शाम को मेहमान आने वाले हैं।”
रिया ने पलटकर देखा।
“मम्मी जी, आज मेरी बहुत जरूरी मीटिंग है। कोशिश करूंगी कि समय से आ जाऊँ।”
“कोशिश नहीं, रिया। घर की भी तो कुछ जिम्मेदारियाँ होती हैं।”
रिया चुप हो गई।
वह यह बात पिछले चार सालों से सुनती आ रही थी—घर की जिम्मेदारी।
शादी के बाद उसने नौकरी नहीं छोड़ी थी। यह उसका पहला समझौता था। ससुराल वालों ने साफ कहा था कि नौकरी कर सकती हो, लेकिन घर की जिम्मेदारियाँ भी निभानी होंगी।
रिया ने इसे गलत नहीं माना था।
उसे लगता था कि विवाह दो लोगों का साथ है, इसलिए दोनों को कुछ न कुछ समझौते करने पड़ते हैं।
पति निखिल भी नौकरी करता था। रिया ने कभी उससे यह नहीं कहा कि वह घर के सारे काम करे। लेकिन धीरे-धीरे एक अजीब व्यवस्था बन गई थी।
निखिल की नौकरी जरूरी थी।
रिया की नौकरी भी जरूरी थी।
लेकिन घर का काम केवल रिया की जिम्मेदारी थी।
शुरुआत में उसने इसे सहजता से स्वीकार किया।
सुबह जल्दी उठना, खाना बनाना, ऑफिस जाना, लौटकर घर संभालना—उसे थकान होती, मगर वह खुद को समझाती, “यही तो जिंदगी है।”
फिर एक दिन उसकी मां ने फोन पर पूछा—
“बेटा, खुश है?”
रिया कुछ क्षण चुप रही।
“हां मां।”
“सच?”
इस बार रिया के पास जवाब नहीं था।
उसने फोन रख दिया।
उस रात वह देर तक जागती रही।
उसे महसूस हुआ कि पिछले चार वर्षों में उसने कितने छोटे-छोटे समझौते किए थे।
पहले उसने अपनी पसंद का शहर छोड़ा।
फिर अपनी पसंद का कोर्स।
फिर दोस्तों से मिलना कम किया।
फिर अपनी बचत का बड़ा हिस्सा घर की जरूरतों में लगाना शुरू किया।
फिर उसने अपनी पदोन्नति के लिए मिलने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रम को इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वह दूसरे शहर में था।
हर बार उसने खुद से कहा था—“कोई बात नहीं।”
लेकिन उन कोई बात नहीं के नीचे उसकी अपनी कितनी इच्छाएँ दबती जा रही थीं, इसका हिसाब उसने कभी नहीं रखा।
रिया की छोटी बहन मीरा उससे बिल्कुल अलग थी।
मीरा ने हाल ही में पढ़ाई पूरी की थी और एक अच्छी कंपनी में नौकरी शुरू की थी।
एक दिन दोनों बहनें कॉफी पी रही थीं।
मीरा ने पूछा, “दीदी, आप हमेशा समझौते की बात क्यों करती हैं?”
रिया मुस्कुराई।
“क्योंकि रिश्ते समझौते से चलते हैं।”
मीरा ने धीरे से कहा—
“रिश्ते समझौते से नहीं, समझ से चलते हैं। समझौता तो तब होना चाहिए जब दोनों तरफ से हो।”
रिया ने उसकी ओर देखा।
यह बात उसके मन में कहीं गहरे उतर गई।
कुछ महीनों बाद रिया के सामने एक बड़ा अवसर आया।
कंपनी ने उसे दो साल के लिए बेंगलुरु में एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट का नेतृत्व करने का प्रस्ताव दिया।
यह उसके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
वह घर आई तो चेहरे पर खुशी थी।
“निखिल, मुझे प्रमोशन मिला है।”
निखिल ने मुस्कुराकर उसे बधाई दी।
“बहुत अच्छी बात है।”
“लेकिन एक शर्त है।”
“क्या?”
“दो साल के लिए बेंगलुरु जाना होगा।”
कमरे में अचानक चुप्पी छा गई।
निखिल ने कुछ देर बाद कहा—
“दो साल?”
“हां।”
“और घर?”
रिया ने पहली बार प्रतिप्रश्न किया—
“घर सिर्फ मेरा है क्या?”
निखिल चौंक गया।
रिया ने तुरंत अपनी आवाज धीमी कर ली।
“मेरा मतलब… हम दोनों मिलकर रास्ता निकाल सकते हैं।”
लेकिन इस बार बात केवल रास्ता निकालने की नहीं थी।
सास ने साफ मना कर दिया।
“शादी के बाद लड़की इस तरह घर छोड़कर नहीं घूमती।”
रिया ने संयत स्वर में कहा—
“मम्मी जी, मैं घर छोड़कर नहीं जा रही। काम के लिए जा रही हूं।”
“काम तो यहां भी कर रही हो।”
“लेकिन वहां मेरे करियर के लिए बड़ा अवसर है।”
“करियर से ज्यादा जरूरी परिवार होता है।”
रिया चुप रही।
यह वही वाक्य था जो उसने न जाने कितनी बार सुना था।
लेकिन आज पहली बार उसने सोचा—
क्या परिवार का मतलब केवल लड़की के सपनों को छोटा करना है?
रात को रिया और निखिल आमने-सामने बैठे थे।
निखिल ने कहा—
“रिया, मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं।”
“मैं भी समझने की कोशिश कर रही हूं।”
“तुम चली गईं तो मम्मी-पापा अकेले पड़ जाएंगे।”
“तो क्या हम व्यवस्था नहीं कर सकते?”
“तुम्हें पता है, मम्मी-पापा नहीं मानेंगे।”
रिया ने गहरी सांस ली।
“निखिल, मैंने शादी के बाद बहुत सारे समझौते किए हैं।”
“मैं जानता हूं।”
“नहीं, शायद तुम नहीं जानते।”
रिया की आंखें नम थीं।
“मैंने नौकरी नहीं छोड़ी, लेकिन नौकरी को कभी अपनी जिंदगी का अधिकार नहीं दिया। मैंने तुम्हारे माता-पिता को अपने माता-पिता की तरह सम्मान दिया। घर की जिम्मेदारियां निभाईं। तुम्हारे समय के हिसाब से अपना समय बदला। तुम्हारी छुट्टियों के हिसाब से अपनी छुट्टियां तय कीं।”
निखिल चुप था।
“लेकिन अब जब मेरे जीवन में मेरे लिए कुछ बड़ा आया है, तो क्या फिर वही समझौता मैं ही करूं?”
निखिल के पास कोई उत्तर नहीं था।
अगले दिन रिया ने अपनी मां को फोन किया।
“मां, अगर मैं यह नौकरी स्वीकार कर लूं तो क्या मैं स्वार्थी कहलाऊंगी?”
मां कुछ देर शांत रहीं।
फिर बोलीं—
“बेटा, हर समझौता त्याग नहीं होता और हर अपने लिए लिया गया फैसला स्वार्थ नहीं होता।”
रिया चुपचाप सुनती रही।
“शादी में समझौता करना पड़ता है,” मां ने कहा, “लेकिन समझौते की जिम्मेदारी दोनों की होती है। अगर केवल लड़की ही हर बार झुके तो वह समझौता नहीं, आदत बन जाती है।”
रिया की आंखों से आंसू निकल आए।
उसे लगा जैसे मां ने उसके भीतर की वह बात कह दी थी जिसे वह वर्षों से खुद भी नहीं कह पा रही थी।
अगले दिन रिया ने परिवार के सामने अपना फैसला रखा।
“मैं बेंगलुरु जाऊंगी।”
सास का चेहरा कठोर हो गया।
“तो तुम्हारे लिए परिवार से ज्यादा नौकरी जरूरी है?”
रिया ने बहुत शांत स्वर में कहा—
“नहीं मम्मी जी। परिवार मेरे लिए बहुत जरूरी है। लेकिन मेरा भविष्य भी मेरे परिवार का ही हिस्सा है।”
घर में सन्नाटा था।
“मैंने कभी परिवार से भागने की कोशिश नहीं की। आगे भी नहीं करूंगी। हम ऐसी व्यवस्था करेंगे कि आपको परेशानी न हो। जरूरत पड़े तो मैं हर महीने आऊंगी। निखिल भी मेरे साथ कुछ समय रह सकता है। हम आपकी देखभाल के लिए मदद भी रख सकते हैं।”
वह कुछ क्षण रुकी।
“लेकिन इस बार मैं अपने सपने को सिर्फ इसलिए नहीं छोड़ूंगी क्योंकि मैं लड़की हूं।”
यह सुनकर निखिल ने पहली बार उसका हाथ थाम लिया।
“रिया सही कह रही है।”
सास ने उसकी ओर देखा।
निखिल ने आगे कहा—
“मां, अगर मेरी नौकरी दूसरे शहर में होती और मुझे जाना पड़ता तो क्या आप मुझे रोकतीं?”
सास चुप हो गईं।
इस सवाल का जवाब शायद उनके पास था, लेकिन उन्होंने दिया नहीं।
छह महीने बाद रिया बेंगलुरु में थी।
उसका प्रोजेक्ट सफल हो चुका था।
उसे कंपनी में नया पद मिला था।
लेकिन उसकी सबसे बड़ी सफलता प्रमोशन नहीं थी।
सबसे बड़ी सफलता यह थी कि अब वह अपने फैसलों को अपराध समझकर नहीं देखती थी।
वह समझौते के खिलाफ नहीं हुई थी।
उसे आज भी पता था कि रिश्तों में कभी-कभी अपनी पसंद पीछे रखनी पड़ती है।
कभी पति की जरूरत के लिए, कभी माता-पिता के लिए, कभी बच्चों के लिए।
लेकिन अब उसने एक अंतर समझ लिया था—
समझौता वह है जिसमें दोनों थोड़ा-थोड़ा झुकें।
जहां हमेशा एक ही व्यक्ति झुकता रहे, वहां रिश्ता नहीं, असमानता होती है।
एक शाम निखिल उससे मिलने बेंगलुरु आया।
बालकनी में खड़ी रिया शहर की रोशनी देख रही थी।
निखिल ने मुस्कुराकर पूछा—
“खुश हो?”
रिया ने कुछ क्षण सोचा।
फिर कहा—
“हां।”
“बहुत?”
रिया मुस्कुराई।
“बहुत।”
“क्यों?”
“क्योंकि पहली बार मुझे लग रहा है कि मैंने अपने लिए कोई गलत फैसला नहीं किया।”
निखिल ने कहा—
“और अगर कभी तुम्हें मेरे लिए समझौता करना पड़े?”
रिया हंस पड़ी।
“तो करूंगी।”
“और मैं?”
“तुम भी करोगे।”
दोनों हंस पड़े।
उस रात रिया ने अपनी डायरी में केवल एक वाक्य लिखा—
“रिश्ते बचाने के लिए समझौता जरूरी हो सकता है, लेकिन खुद को बचाने के लिए कभी-कभी समझौते से इनकार करना भी जरूरी होता है।”
उसने डायरी बंद की।
बाहर शहर अपनी पूरी रोशनी के साथ जगमगा रहा था।
और रिया को पहली बार लगा कि उस रोशनी में उसका अपना चेहरा भी साफ दिखाई दे रहा है।
स्वरचित मौलिक व अप्रकाशित रचना
लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका ‘