सात समंदर पार का सन्नाटा

 रोहन की बात सुनकर देवकी के पास कहने को कुछ नहीं बचा था। रोहन ने कुछ गलत नहीं कहा था। उसने वही किया जो उसकी माँ ने उसे सिखाया था। देवकी ने ही उनके कोमल मनों में यह बात डाली थी कि विदेशी सरजमीं ही सफलता का आखिरी मुकाम है। उसने बच्चों को उड़ना सिखाया, लेकिन यह भूल गई कि जब पंछी दूर आसमान में निकल जाते हैं, तो वे वापस अपने पुराने घोंसले में सिर्फ मेहमान बनकर ही आते हैं।

कॉल कटने के बाद देवकी बहुत देर तक रोती रही। उसे अपनी उस अंधी चाहत पर पछतावा हो रहा था जिसने उसके भरे-पूरे परिवार को एक डिजिटल स्क्रीन में समेट कर रख दिया था। उसे एहसास हो गया था कि बुढ़ापे में इंसान को डॉलर और पाउंड नहीं, बल्कि अपनों के स्पर्श, अपनों की आवाज़ और एक कप चाय के साथ की गई दो मीठी बातों की जरूरत होती है।

चंडीगढ़ के पॉश इलाके में बनी उस आलीशान कोठी में आज भी सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उस बड़े से घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा रहता था। यह कहानी है देवकी और उनके पति सुधीर की। पच्चीस साल पहले जब देवकी ब्याह कर इस शहर में आई थी, तब यहाँ का माहौल देखकर वह भी उसी रंग में रंग गई थी। देवकी का एक बड़ा फ्रेंड सर्कल था, जिसमें शहर के नामी-गिरामी परिवारों की महिलाएँ शामिल थीं। हर महीने होने वाली किटी पार्टियों में बातों का सबसे बड़ा और अहम विषय यही होता था कि किसके बच्चे किस देश में सेटल हो गए हैं।

“तुम्हें पता है देवकी, मेरा बड़ा बेटा सिडनी में अपना खुद का घर ले चुका है,” मिसेज चड्ढा बड़ी शान से अपने हीरे के कंगन खनकाते हुए कहती थीं। तो वहीं मिसेज वालिया भी पीछे नहीं रहतीं, “अरे, मेरी बेटी तो टोरंटो में इतने बड़े बैंक में मैनेजर है कि उसे तो बात करने की भी फुर्सत नहीं मिलती।”

इन बातों को सुन-सुनकर देवकी के मन में भी एक गहरी ग्रंथि बैठ गई थी। उसने भी ठान लिया था कि चाहे जो हो जाए, वह अपने बच्चों को इसी तरह सात समंदर पार भेजेगी। उसके लिए विदेश में बच्चों का बसना सिर्फ उनके उज्जवल भविष्य का सवाल नहीं था, बल्कि समाज में अपना रुतबा और शान बढ़ाने का सबसे बड़ा जरिया बन चुका था।

देवकी के दो बच्चे थे, बड़ी बेटी सौम्या और छोटा बेटा रोहन। जब सौम्या ने अपनी ग्रेजुएशन पूरी की, तो सुधीर चाहते थे कि वह यहीं रहकर किसी अच्छे कॉलेज से एमबीए करे। सुधीर का मानना था कि बच्चे आँखों के सामने रहें, वही सबसे बड़ा सुख है। लेकिन देवकी ने साफ इंकार कर दिया। उसका तर्क था कि शहर की सभी सहेलियों की बेटियाँ या तो लंदन में हैं या अमेरिका में, तो उसकी बेटी यहाँ क्यों धक्के खाएगी। उसने दिन-रात एक करके सौम्या के दिमाग में यह बात डाल दी कि उसकी जिंदगी का असली मुकाम भारत में नहीं, बल्कि लंदन में है। सौम्या भी अपनी माँ की बातों में आ गई। सुधीर को झुकना पड़ा और भारी मन से उन्होंने सौम्या को पढ़ाई के लिए लंदन भेज दिया।

लंदन जाने के बाद सौम्या वहीं की होकर रह गई। पढ़ाई पूरी होते ही उसे वहाँ एक अच्छी नौकरी मिल गई। देवकी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उसने पूरे शहर में मिठाई बँटवाई थी। लेकिन देवकी की योजना यहीं खत्म नहीं हुई थी। उसने अपनी सहेलियों से पूछ-पूछ कर सौम्या के लिए लंदन में ही सेटल एक एनआरआई लड़का ढूँढ लिया। सौम्या की शादी बहुत धूमधाम से की गई, जिसमें आधा पैसा तो सिर्फ इस बात का दिखावा करने में खर्च हुआ कि उनकी बेटी और दामाद कितने बड़े एनआरआई हैं। शादी के बाद सौम्या पूरी तरह से अपनी नई दुनिया में व्यस्त हो गई।

अब बारी रोहन की थी। रोहन बचपन से ही अपने पिता के करीब था। उसका सपना था कि वह भारत में ही रहकर अपना कोई स्टार्टअप शुरू करे। उसने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर ली थी और उसके पास कई बेहतरीन आइडियाज थे। लेकिन देवकी के सिर पर तो विदेशी कामयाबी का भूत सवार था। “तू यहाँ रहकर क्या करेगा? तेरे सारे कजिन, तेरे दोस्त, सब अमेरिका और कनाडा में हैं। तू यहाँ रहेगा तो लोग क्या कहेंगे कि देवकी का बेटा कुछ नहीं कर पाया?” देवकी ने रोहन को भावनात्मक रूप से इतना ब्लैकमेल किया कि उसे भी अपने सपने मारने पड़े।

रोहन को एमएस (MS) करने के लिए अमेरिका भेज दिया गया। रोहन के जाने के बाद घर एकदम सूना हो गया, लेकिन देवकी का सीना गर्व से चौड़ा था। वह किटी पार्टियों में सबसे आगे बैठकर बताती, “मेरा तो एक पैर लंदन में रहता है और दूसरा अमेरिका में। बच्चे तो मुझे इंडिया में रहने ही नहीं देना चाहते, पर क्या करूँ, सुधीर जी को अपना घर छोड़ने का मन नहीं करता।” ये बातें कहते हुए देवकी के चेहरे पर जो गुरूर होता था, वह देखने लायक होता था।

रोहन ने अमेरिका में अपनी मास्टर डिग्री पूरी की। वहाँ की चकाचौंध और डॉलर की चमक ने रोहन को भी बदल दिया था। जो लड़का कभी अपने देश में कुछ करना चाहता था, वह अब सिलिकॉन वैली की रेस में दौड़ने लगा था। नौकरी लगते ही देवकी ने रोहन के लिए भी अमेरिका में ही एक अच्छी सी लड़की ढूँढ ली और उसकी भी शादी कर दी।

देवकी का सपना पूरा हो चुका था। उसके दोनों बच्चे दुनिया के सबसे विकसित देशों में बस चुके थे। समाज में देवकी और सुधीर को बड़ी इज्जत की नजर से देखा जाता था। उनके घर में विदेशी चॉकलेट्स, ब्रांडेड परफ्यूम और महंगे कपड़ों की लाइन लगी रहती थी। हर त्योहार पर डॉलर और पाउंड में पैसे आते थे। बाहरी दुनिया के लिए देवकी का जीवन किसी रानी से कम नहीं था।

लेकिन समय का पहिया अपनी गति से घूमता है। जवानी के जोश और दिखावे की भूख में हम जो फैसले लेते हैं, बुढ़ापे की दहलीज़ पर वही फैसले हमसे हमारा सब कुछ छीन लेते हैं। सुधीर अब रिटायर हो चुके थे और देवकी के भी घुटनों ने जवाब देना शुरू कर दिया था। उस छह कमरों की आलीशान कोठी में अब सिर्फ दो बूढ़े पति-पत्नी और उनके काम करने वाले नौकर ही बचे थे।

त्योहारों के दिन वह बड़ा सा डाइनिंग टेबल बिल्कुल सूना रहता। दिवाली के दिन जब पूरे शहर में पटाखे फूटते और पड़ोसियों के घर में बच्चों की किलकारियां गूंजतीं, तब देवकी और सुधीर लैपटॉप के सामने बैठकर वीडियो कॉल कनेक्ट होने का इंतजार करते। सौम्या लंदन की भागदौड़ में उलझी रहती और रोहन अमेरिका के टाइम जोन में फंसा रहता। दस मिनट की वीडियो कॉल में रस्मी तौर पर ‘हैप्पी दिवाली’ कहकर फोन कट जाता और देवकी की आँखें स्क्रीन को देखते हुए नम हो जातीं।

असली दर्द का अहसास तब हुआ जब एक रात सुधीर को अचानक दिल का दौरा पड़ा। रात के दो बज रहे थे। देवकी अकेली थी, घबराई हुई, कांपते हाथों से उसने एम्बुलेंस को फोन किया। पड़ोसियों की मदद से सुधीर को अस्पताल पहुँचाया गया। अस्पताल के बाहर ठंडी बेंच पर बैठी देवकी ने रोते हुए सबसे पहले सौम्या को फोन मिलाया।

“हैलो मम्मा, क्या हुआ इतनी रात को?” सौम्या की उनींदी सी आवाज आई।

“बेटा, तुम्हारे पापा को हार्ट अटैक आया है। वो आईसीयू में हैं। मुझे बहुत डर लग रहा है, तू प्लीज जल्दी आ जा।” देवकी फूट-फूट कर रोने लगी।

सौम्या एक पल के लिए चुप हो गई, फिर बोली, “ओह गॉड! मम्मा, आप प्लीज खुद को संभालो। मैं अभी फ्लाइट चेक करती हूँ, लेकिन मम्मा… यहाँ मेरी बेटी के फाइनल एग्जाम्स चल रहे हैं और मेरे हस्बैंड भी ऑफिस टूर पर गए हैं। मैं चाहकर भी कम से कम दो हफ्ते तक नहीं निकल पाऊंगी। आप रोहन को बोलो, शायद वो आ सके।”

देवकी के हाथ से फोन छूटने लगा। उसने हिम्मत करके रोहन को अमेरिका फोन किया। रोहन ने भी पिता की हालत सुनकर दुख जताया, लेकिन उसका जवाब भी कुछ वैसा ही था। “मम्मा, मेरा अभी नया प्रोजेक्ट लॉन्च होने वाला है। अगर मैंने अभी छुट्टी ली तो मेरा प्रमोशन रुक जाएगा। आप चिंता मत करो, मैं अभी अपने अकाउंटेंट को बोलकर आपके अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करवाता हूँ। आप शहर के सबसे अच्छे डॉक्टर को दिखाओ। और हाँ, मैं एक एजेंसी से बात करके आपके लिए चौबीस घंटे वाली नर्स का इंतजाम कर देता हूँ।”

उस दिन अस्पताल के उस सन्नाटे में देवकी को अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल का अहसास हुआ। उसके बैंक खाते में लाखों रुपये आ गए थे, विदेश से महंगी नर्स का इंतजाम भी हो गया था, लेकिन आईसीयू के बाहर एक गिलास पानी पकड़ने के लिए या उसके कांपते कंधों को सहारा देने के लिए उसका कोई अपना वहाँ मौजूद नहीं था। देवकी को याद आया कि कैसे उसने रोहन को यहाँ रुकने नहीं दिया था। कैसे उसने सौम्या की जिंदगी को सिर्फ एक ‘एनआरआई टैग’ के लिए लंदन भेज दिया था।

सुधीर की हालत धीरे-धीरे सुधरने लगी। एक दिन जब सुधीर को होश आया और उन्होंने चारों तरफ देखा, तो सिर्फ एक नर्स और देवकी ही नजर आए। उन्होंने धीमी आवाज में पूछा, “बच्चे नहीं आए?”

देवकी ने अपने आँसू छुपाते हुए झूठ बोल दिया, “आ रहे हैं सुधीर जी, उन्हें टिकट नहीं मिल रही। उन्होंने बहुत सारे पैसे भेजे हैं आपके इलाज के लिए।”

सुधीर ने एक फीकी सी मुस्कान दी और आँखें बंद कर लीं। उन्हें भी सच्चाई पता थी।

कुछ महीनों बाद सुधीर घर आ गए, लेकिन अब वो पूरी तरह से बिस्तर पर थे। देवकी का पूरा दिन उनकी सेवा में, दवाइयाँ देने में और घर के उस भयानक सन्नाटे से लड़ने में बीतता। एक दिन रोहन का वीडियो कॉल आया। वह अपनी नई कार दिखा रहा था।

“मम्मा, देखो मैंने नई टेस्ला ली है। पापा कैसे हैं?”

देवकी ने एक लंबी सांस ली और कहा, “रोहन, बेटा क्या तुम कुछ दिनों के लिए इंडिया नहीं आ सकते? तुम्हारे पापा तुम्हें बहुत याद करते हैं। मुझे भी अब अकेले सब कुछ नहीं संभाला जाता। घर बहुत बड़ा और खाली लगता है।”

रोहन ने एक पल के लिए फोन स्क्रीन से नजरें चुराईं और फिर गहरी सांस लेते हुए बोला, “मम्मा, जब मैं छोटा था और यहीं रहना चाहता था, तब आपने ही तो मुझे सिखाया था कि बड़ी कामयाबी के लिए घर छोड़ना पड़ता है। आपने ही तो कहा था कि इंडिया में क्या रखा है, अमेरिका जाओ। मम्मा, हम यहाँ आपकी ही तो इच्छा पूरी कर रहे हैं। अब हम यहाँ सेटल हो चुके हैं। यहाँ घर की किश्तें हैं, बच्चों की महंगी पढ़ाई है, ऑफिस की जिम्मेदारियाँ हैं। हम चाहकर भी सब कुछ छोड़कर वहाँ वापस नहीं आ सकते। हमारी दुनिया अब यही है। जब हमें लंबी छुट्टियां मिलेंगी, हम जरूर आएंगे। तब तक आप पैसे की कोई फिक्र मत करना।”

रोहन की बात सुनकर देवकी के पास कहने को कुछ नहीं बचा था। रोहन ने कुछ गलत नहीं कहा था। उसने वही किया जो उसकी माँ ने उसे सिखाया था। देवकी ने ही उनके कोमल मनों में यह बात डाली थी कि विदेशी सरजमीं ही सफलता का आखिरी मुकाम है। उसने बच्चों को उड़ना सिखाया, लेकिन यह भूल गई कि जब पंछी दूर आसमान में निकल जाते हैं, तो वे वापस अपने पुराने घोंसले में सिर्फ मेहमान बनकर ही आते हैं।

कॉल कटने के बाद देवकी बहुत देर तक रोती रही। उसे अपनी उस अंधी चाहत पर पछतावा हो रहा था जिसने उसके भरे-पूरे परिवार को एक डिजिटल स्क्रीन में समेट कर रख दिया था। उसे एहसास हो गया था कि बुढ़ापे में इंसान को डॉलर और पाउंड नहीं, बल्कि अपनों के स्पर्श, अपनों की आवाज़ और एक कप चाय के साथ की गई दो मीठी बातों की जरूरत होती है।

लेकिन, सालों से ओढ़ा हुआ दिखावे का चोला इतनी आसानी से नहीं उतरता। आज भी जब देवकी अपनी पुरानी सहेलियों के बीच किटी पार्टी में जाती है, तो अपनी लाल सूजी हुई आँखों को महंगे चश्मे के पीछे छुपा लेती है। जब कोई पूछता है, “देवकी, सुधीर जी कैसे हैं? बच्चे नहीं आए?”

तो देवकी अपने चेहरे पर एक बनावटी और गर्व से भरी मुस्कान लाते हुए कहती है, “अरे सुधीर जी तो अब बिल्कुल ठीक हैं। और बच्चे… बच्चे तो बहुत आना चाहते थे, रो रहे थे आने के लिए। लेकिन तुम्हें तो पता ही है, रोहन अमेरिका में इतनी बड़ी कंपनी में डायरेक्टर बन गया है, उसे सांस लेने की फुर्सत नहीं है। और सौम्या ने तो लंदन में नया घर लिया है। इतने बड़े लोग हो गए हैं मेरे बच्चे, उन्हें वहाँ से छुट्टी ही नहीं मिलती।”

यह बोलते हुए देवकी के होंठ मुस्कुराते हैं, लेकिन दिल के किसी गहरे कोने में वो जानती है कि उसने अपने हाथों से अपनी जिंदगी को एक सोने के पिंजरे में कैद कर लिया है, जिसकी चाबी वो खुद ही समंदर में फेंक चुकी है।

आपको क्या लगता है, क्या देवकी की विदेशी रुतबे की चाहत गलत थी? क्या उसने अपने बच्चों का भविष्य संवारा या अपना बुढ़ापा बिगाड़ लिया? या फिर आज के दौर की यही कड़वी और नग्न सच्चाई है जिससे कोई मुँह नहीं मोड़ सकता? अपने विचार हमें कमेंट्स में जरूर बताएं।

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 #सात समंदर पार का सन्नाटा

मूल लेखिका : के कामेश्वरी 

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