नींव के पत्थर: एक बेटी के सपनों की उड़ान

“तुम्हारे सपने शादी के साथ ही खत्म हो जाने चाहिए थे स्मिता ,” समीर ने कठोरता से कहा।

उनकी ये बहस बाहर तक सुनाई दे रही थी। स्मिता  की सास, सुमित्रा देवी, भी वहाँ आ गईं। जब उन्हें पता चला कि बहू बाहर जाकर काम करना चाहती है, तो उन्होंने भी आसमान सिर पर उठा लिया। “हे भगवान! अब इस बुढ़ापे में मुझे यही देखना बाकी रह गया था। घर में राजपाट है और इसे बाहर जाकर नौकरी करनी है। कल को बच्चा होगा तो क्या उसे आया के भरोसे छोड़ेगी? मैंने तो पहले ही कहा था, इतनी पढ़ी-लिखी लड़की घर बिगाड़ देती है।”

सुबह के पाँच बज रहे थे। अलार्म बजने से पहले ही स्मिता  की आँख खुल गई। यह उसकी सालों की आदत थी। बिस्तर से उठकर उसने सबसे पहले अपनी सास के लिए गरम पानी और नींबू तैयार किया, फिर ससुर जी की बिना शक्कर वाली चाय और पति समीर के लिए कड़क कॉफी। रसोई में बर्तनों की खनक के बीच स्मिता  की अपनी ज़िंदगी कहीं गुम सी हो गई थी। वो एक ऐसी मशीन बन चुकी थी जिसका काम सिर्फ़ परिवार के हर सदस्य के चेहरे पर मुस्कान लाना था, भले ही इसके लिए उसे अपने आँसुओं को पल्लू में ही क्यों न छिपाना पड़े। पीहर में माता-पिता की उम्मीदें और ससुराल में एक आदर्श बहू बनने की होड़—इन दोनों के बीच स्मिता  कहीं पीस सी गई थी।

स्मिता  कोई साधारण लड़की नहीं थी। वो वास्तुकला (आर्किटेक्चर) में यूनिवर्सिटी की गोल्ड मेडलिस्ट थी। जब वो कॉलेज में थी, तो उसकी बनाई गई डिज़ाइन्स और मॉडल्स को देखकर प्रोफेसर्स भी दंग रह जाते थे। उसके पिता ने उसे हमेशा यही सिखाया था कि बेटियाँ बेटों से कम नहीं होतीं। उन्होंने अपनी हैसियत से बढ़कर स्मिता  को इस मुकाम तक पहुँचाया था। लेकिन, हमारे समाज में बेटियों के लिए सबसे बड़ी डिग्री अक्सर उनकी शादी को ही मान लिया जाता है। जैसे ही स्मिता  की पढ़ाई खत्म हुई, समीर के परिवार से रिश्ता आ गया। समीर का परिवार शहर के नामी और रसूखदार लोगों में गिना जाता था। स्मिता  के पिता इस लालच में आ गए कि उनकी बेटी इतने बड़े घर में राज करेगी और उन्होंने आनन-फानन में उसकी शादी कर दी।

शादी के जोड़े में सजी स्मिता  ने अपने सपनों के ब्लूप्रिंट्स को एक पुराने ट्रंक में बंद कर दिया था। उसे लगा था कि शायद शादी के बाद वो अपनी फर्म खोल लेगी या किसी अच्छी जगह नौकरी कर लेगी। लेकिन ससुराल का माहौल बिल्कुल अलग था। यहाँ औरतों का काम सिर्फ घर संभालना, मेहमानों की खातिरदारी करना और वंश आगे बढ़ाना माना जाता था।

समीर एक सफल बिज़नेसमैन था। उसे इस बात का बहुत घमंड था कि वह अपनी पत्नी को रानी बनाकर रखता है। जब भी स्मिता  अपने करियर की बात छेड़ती, समीर का एक ही रटा-रटाया जवाब होता, “तुम्हें काम करने की क्या ज़रूरत है? मेरे पास पैसों की कोई कमी है क्या? घर में नौकर-चाकर हैं, तुम आराम से मालकिन बनकर रहो। माँ जी को भी तुम्हारी ज़रूरत होती है। हमारे खानदान की औरतें बाहर जाकर धक्के नहीं खातीं।”

समीर की यह बातें स्मिता  के दिल में तीर की तरह चुभती थीं। क्या एक औरत का काम सिर्फ पैसों के लिए होता है? क्या उसकी अपनी कोई पहचान, कोई आत्मसम्मान नहीं है? हर गुज़रते दिन के साथ स्मिता  और समीर के बीच एक अजीब सी खामोशी और दूरी बढ़ने लगी थी। स्मिता  अब सिर्फ एक ज़िम्मेदारी निभा रही थी, उसका अपनापन और उसकी वो खिलखिलाती हँसी कहीं खो चुकी थी।

एक दिन स्मिता  की पुरानी कॉलेज की दोस्त, अंजलि, उससे मिलने आई। अंजलि खुद एक जानी-मानी आर्किटेक्चर फर्म में सीनियर पार्टनर बन चुकी थी। जब अंजलि ने स्मिता  को रसोई में मसाले पीसते और घर के कामों में उलझा देखा, तो उससे रहा नहीं गया। बातों ही बातों में अंजलि ने स्मिता  से उसके पुराने डिज़ाइन्स मांगे। स्मिता  हिचकिचाई, लेकिन अंजलि की ज़िद के आगे उसे अपना वो पुराना ट्रंक खोलना पड़ा। उन डिज़ाइन्स को देखकर अंजलि की आँखें चमक उठीं। उसने तुरंत कहा, “स्मिता , तुम्हारी ये प्रतिभा इस रसोई की कालिख में बर्बाद होने के लिए नहीं है। मेरी फर्म को एक लीड डिज़ाइनर की तलाश है जो एक बड़े प्रोजेक्ट को संभाल सके। और सच कहूँ तो, तुम्हारे अलावा मुझे कोई और इसके काबिल नज़र नहीं आता।”

अंजलि की बातों ने स्मिता  के अंदर बरसों से सोई हुई उस महत्वाकांक्षी लड़की को फिर से जगा दिया। उसने पहली बार अपने लिए कुछ करने की ठानी। रात को जब समीर घर आया, तो स्मिता  ने हिम्मत जुटाकर अंजलि के ऑफर के बारे में बात की।

“तुम पागल हो गई हो क्या?” समीर ने झल्लाते हुए कहा। “तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें नौ से पाँच की नौकरी करने दूंगा? लोग क्या कहेंगे कि समीर की कमाई कम पड़ गई जो उसकी बीवी को काम करना पड़ रहा है? और घर कौन संभालेगा? माँ जी के घुटनों में दर्द रहता है, उन्हें तुम्हारी ज़रूरत है।”

स्मिता  की आँखों में आँसू आ गए। “समीर, मैं सिर्फ पैसों के लिए काम नहीं करना चाहती। वो मेरा जुनून है, मेरी पहचान है। मैंने पाँच साल दिन-रात एक करके वो पढ़ाई की है। क्या मेरे सपनों की कोई कीमत नहीं?”

“तुम्हारे सपने शादी के साथ ही खत्म हो जाने चाहिए थे स्मिता ,” समीर ने कठोरता से कहा।

उनकी ये बहस बाहर तक सुनाई दे रही थी। स्मिता  की सास, सुमित्रा देवी, भी वहाँ आ गईं। जब उन्हें पता चला कि बहू बाहर जाकर काम करना चाहती है, तो उन्होंने भी आसमान सिर पर उठा लिया। “हे भगवान! अब इस बुढ़ापे में मुझे यही देखना बाकी रह गया था। घर में राजपाट है और इसे बाहर जाकर नौकरी करनी है। कल को बच्चा होगा तो क्या उसे आया के भरोसे छोड़ेगी? मैंने तो पहले ही कहा था, इतनी पढ़ी-लिखी लड़की घर बिगाड़ देती है।”

स्मिता  का दिल टूट गया। उसे लगा कि अब वह कभी इस पिंजरे से बाहर नहीं निकल पाएगी। उसने रोते हुए अपने डिज़ाइन्स वापस ट्रंक में रखने शुरू कर दिए।

तभी कमरे के दरवाज़े पर किसी के कदमों की आहट हुई। स्मिता  के ससुर, रघुनाथ जी, वहाँ खड़े थे। रघुनाथ जी एक रिटायर्ड जज थे और घर में उनका बहुत सम्मान था। वे अक्सर घर के मामलों में कम ही बोलते थे, लेकिन जब बोलते थे, तो उनकी बात कोई टाल नहीं सकता था।

रघुनाथ जी गंभीर कदमों से कमरे में आए। उन्होंने सुमित्रा देवी और समीर को देखा, और फिर स्मिता  के बिखरे हुए डिज़ाइन्स की तरफ नज़र डाली। उन्होंने एक ब्लूप्रिंट उठाया और उसे ध्यान से देखा।

“क्या तुम्हें लगता है कि ये सिर्फ कुछ कागज़ के टुकड़े हैं?” रघुनाथ जी ने समीर से पूछा। उनकी आवाज़ शांत थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी कशिश थी।

समीर ने हिचकिचाते हुए कहा, “पिताजी, मैं तो बस…”

“चुप रहो समीर,” रघुनाथ जी ने उसे बीच में टोकते हुए कहा। फिर वे अपनी पत्नी सुमित्रा देवी की तरफ घूमे। “सुमित्रा, तुम कह रही थी ना कि घर बिगड़ जाएगा? क्या तुम्हें मालूम है कि एक पढ़े-लिखे इंसान को, जिसने अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा किसी हुनर को सीखने में लगाया हो, उसे यूँ घर की चारदीवारी में कैद कर देना कितना बड़ा मानसिक अत्याचार है?”

कमरे में सन्नाटा छा गया। सुमित्रा देवी ने डरते हुए कहा, “लेकिन जी, हमारी भी तो कुछ इज़्ज़त है। और फिर घर का काम, आने-जाने वाले…”

“घर का काम करने के लिए हम दो और नौकर रख सकते हैं, सुमित्रा,” रघुनाथ जी ने दृढ़ता से कहा। “मुझे आज यह एहसास हो रहा है कि हम कितने स्वार्थी हो गए हैं। हमने एक ऐसी बेटी को अपने घर की बहू बनाया जो आसमान छू सकती थी, और हमने उसे रसोई के धुएँ में झोंक दिया। स्मिता  के पिता ने उसे इसलिए नहीं पढ़ाया था कि वो ज़िंदगी भर सिर्फ हमारे लिए रोटियाँ बेले और हमारी तीमारदारी करे।”

उन्होंने स्मिता  की तरफ देखा, जिसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। रघुनाथ जी के स्वर में अब पिता जैसी कोमलता थी। “बेटा स्मिता , मुझे माफ़ कर देना। मैं भी इस घर का मुखिया होने के नाते तुम्हारी इस घुटन का बराबर ज़िम्मेदार हूँ। मैंने सब कुछ देखते हुए भी अपनी आँखें मूँद रखी थीं। लेकिन अब और नहीं।”

इसके बाद रघुनाथ जी ने समीर की तरफ पलटकर एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने पूरे घर की हवा बदल दी। “समीर, अपनी झूठी शान और मर्दानगी के अहंकार से बाहर निकलो। तुम्हारी पत्नी तुम्हारी जागीर नहीं है, एक स्वतंत्र इंसान है। अगर वह अपनी पहचान बनाना चाहती है, तो तुम्हें उसका साथ देना चाहिए था, लेकिन तुम अपनी ज़िद पर अड़े रहे। आज से स्मिता  अंजलि की फर्म में काम करने जाएगी। यह इस घर के मुखिया का आदेश नहीं, एक पिता का अपनी बेटी को दिया गया वचन है।”

समीर और सुमित्रा देवी के पास कहने को कुछ नहीं बचा था। रघुनाथ जी के इस फैसले ने स्मिता  को वो पंख लौटा दिए थे जिन्हें उसने बहुत पहले खो दिया था।

अगले दिन सुबह, स्मिता  रसोई में नहीं, बल्कि अपने आईने के सामने खड़ी थी। उसने एक आत्मविश्वास से भरी फॉर्मल ड्रेस पहनी थी। जब वह नीचे आई, तो मेज़ पर नाश्ता लगा हुआ था। सुमित्रा देवी ने खुद अपने हाथों से उसे दही-शक्कर खिलाया और मुस्कुराते हुए कहा, “जाओ बेटी, अपना मुकाम हासिल करो।”

समीर ने भी अपनी गलती मानते हुए उसे कार तक छोड़ा और ‘ऑल द बेस्ट’ कहा। स्मिता  ने जब आसमान की तरफ देखा, तो उसे वो पहले से कहीं ज़्यादा नीला और अपना सा लगा। आज उसने सिर्फ एक नौकरी नहीं पाई थी, बल्कि अपना खोया हुआ वजूद और सम्मान वापस पा लिया था। और यह सब मुमकिन हुआ था एक ऐसे ससुर के कारण, जिसने अपनी बहू में एक बेटी को देखा और उसके सपनों की उड़ान को एक नई ज़मीन दी।

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#नींव के पत्थर: एक बेटी के सपनों की उड़ान

लेखिका : नेहा पटेल

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