सावित्री देवी पिछले कई दिनों से अपनी बेटी के इस बदलते हुए रूप को बहुत करीब से देख रही थीं। एक माँ की नज़र से भला बच्चे का दुःख कैसे छिप सकता है? कई बार उन्होंने डाइनिंग टेबल पर या सुबह की चाय के वक्त नेहा से कुरेद-कुरेद कर पूछने की कोशिश की थी, लेकिन हर बार नेहा “कुछ नहीं माँ, बस ऑफिस का स्ट्रेस है” कहकर बात को टाल जाती थी। लेकिन सावित्री देवी जानती थीं कि बात सिर्फ ऑफिस के काम की नहीं है। उनकी बेटी कोई मामूली लड़की नहीं थी, वह इस घर की सबसे मजबूत नींव थी।
शीशे के सामने खड़ी नेहा की आँखें सूजी हुई थीं। वह लगातार अपने चेहरे पर पानी के छपाके मार रही थी, ताकि बाहर जाने पर किसी को उसके रोने का पता न चले। पिछले एक महीने से यही उसका रोज़ का नियम बन गया था। ऑफिस से लौटना, बिना किसी से ज्यादा बात किये सीधे अपने कमरे में चले जाना और घंटों दरवाज़ा बंद रखना। जिस घर में कभी नेहा की चहचहाहट से सुबह होती थी और उसी की बातों से रात का सन्नाटा टूटता था, आज उसी घर में एक अजीब सी मनहूस खामोशी पसरी हुई थी।
सावित्री देवी पिछले कई दिनों से अपनी बेटी के इस बदलते हुए रूप को बहुत करीब से देख रही थीं। एक माँ की नज़र से भला बच्चे का दुःख कैसे छिप सकता है? कई बार उन्होंने डाइनिंग टेबल पर या सुबह की चाय के वक्त नेहा से कुरेद-कुरेद कर पूछने की कोशिश की थी, लेकिन हर बार नेहा “कुछ नहीं माँ, बस ऑफिस का स्ट्रेस है” कहकर बात को टाल जाती थी। लेकिन सावित्री देवी जानती थीं कि बात सिर्फ ऑफिस के काम की नहीं है। उनकी बेटी कोई मामूली लड़की नहीं थी, वह इस घर की सबसे मजबूत नींव थी।
नेहा के पिता, रामेश्वर जी एक रिटायर्ड स्कूल टीचर थे। जीवन भर की जमापूंजी उन्होंने बच्चों की पढ़ाई और घर के छोटे-मोटे खर्चों में लगा दी थी। रिटायरमेंट के कुछ साल बाद ही उन्हें किडनी की गंभीर बीमारी ने घेर लिया। हफ्ते में दो बार डायलिसिस होता था, जिसका खर्च उठाना रामेश्वर जी की पेंशन के बस की बात नहीं थी। ऐसे में परिवार की पूरी ज़िम्मेदारी नेहा ने अपने नाज़ुक कंधों पर उठा ली थी। वह एक बड़ी आईटी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी। नेहा से छोटी एक बहन थी, प्रिया, जो अभी मेडिकल की तैयारी कर रही थी। प्रिया की कोचिंग की फीस से लेकर पिता के डायलिसिस और घर के राशन तक का पूरा हिसाब नेहा ही रखती थी।
रामेश्वर जी अपनी इस होनहार बेटी को देखकर अक्सर भावुक हो जाते थे। उन्हें लगता था कि उनकी वजह से उनकी बेटी अपनी जवानी, अपने शौक सब भूल चुकी है। इसी आत्मग्लानि के चलते उन्होंने नेहा की शादी की जिद पकड़ ली थी। उनका कहना था कि जब तक उनकी सांसें चल रही हैं, वह अपनी बेटी के हाथ पीले होते देखना चाहते हैं। नेहा ने बहुत समझाया कि अभी वह शादी के लिए तैयार नहीं है, अभी प्रिया की पढ़ाई पूरी होनी है, लेकिन पिता की बिगड़ती तबीयत और उनकी भावुक कसमों के आगे नेहा को हार माननी पड़ी।
कुछ महीने पहले ही नेहा का रिश्ता समीर नाम के लड़के से तय हुआ था। समीर का अपना कंस्ट्रक्शन का बड़ा बिज़नेस था और परिवार आर्थिक रूप से बहुत संपन्न था। रामेश्वर जी को लगा कि उनकी बेटी ने बचपन से जो आर्थिक तंगी और संघर्ष देखा है, वह समीर के घर जाकर दूर हो जाएगा। लड़के वाले भी इसी शहर के थे, इसलिए रामेश्वर जी और भी खुश थे कि उनकी बेटी शादी के बाद भी उनकी आँखों के सामने रहेगी। तीन महीने पहले बहुत ही धूमधाम से नेहा और समीर की सगाई हो गई थी। सगाई के दिन रामेश्वर जी के चेहरे पर जो सुकून था, उसे देखकर नेहा को लगा था कि उसने समीर से शादी के लिए हाँ कहकर बिल्कुल सही फैसला लिया है।
लेकिन सगाई के इन तीन महीनों के भीतर ही नेहा की ज़िंदगी किसी भयानक सपने में तब्दील हो चुकी थी। उसका वह चमकता हुआ चेहरा, जिस पर हमेशा आत्मविश्वास की लाली रहती थी, अब एक मुरझाए हुए पत्ते की तरह पीला पड़ चुका था। आँखों के नीचे काले घेरे आ गए थे और उसके होंठों से वह प्यारी सी मुस्कान जैसे हमेशा के लिए गायब हो गई थी। सावित्री देवी अपनी बेटी को हर रोज़ तिल-तिल कर घुटते हुए देख रही थीं और उनका कलेजा फटा जा रहा था। आज उन्होंने ठान लिया था कि चाहे जो हो जाए, वह अपनी बेटी के इस अज्ञात दुःख की जड़ तक पहुँच कर ही रहेंगी।
शाम के करीब सात बज रहे थे। नेहा थकी हारी ऑफिस से लौटी। उसने सोफे पर अपना लैपटॉप बैग रखा और बिना किसी से कुछ कहे अपने कमरे की ओर बढ़ गई। रामेश्वर जी अपनी आरामकुर्सी पर आंखें मूंदे लेटे थे। सावित्री देवी तुरंत किचन में गईं। उन्होंने एक ट्रे में अदरक वाली कड़क चाय और नेहा के मनपसंद सूजी के टोस्ट रखे और सीधे नेहा के कमरे में पहुँच गईं।
नेहा बिस्तर पर औंधे मुंह लेटी हुई थी। सावित्री देवी ने दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया और चाय की ट्रे साइड टेबल पर रखकर नेहा के पास बैठ गईं। उन्होंने बड़े प्यार से नेहा के सिर पर हाथ फेरा। माँ का स्पर्श पाते ही नेहा के अंदर जो भावनाओं का गुबार हफ्तों से दबा हुआ था, वह छलकने को बेताब हो उठा।
“उठ जा मेरी बच्ची, देख मैं तेरे लिए क्या लाई हूँ। सुबह से तूने ठीक से कुछ खाया भी नहीं था,” सावित्री देवी ने पुचकारते हुए कहा।
नेहा ने बिना माँ की तरफ देखे भारी आवाज़ में कहा, “मेरा कुछ भी खाने का मन नहीं है माँ। आप प्लीज इसे ले जाइये, मुझे थोड़ी देर सोना है।”
सावित्री देवी ने नेहा को कंधे से पकड़कर सीधा किया और उसका चेहरा अपने हाथों में ले लिया। “क्या बात है नेहा? तू अपनी इस माँ से भी अपनी तकलीफ छुपाएगी? क्या मैं तेरी दोस्त नहीं हूँ? कुछ तो है जो तुझे अंदर ही अंदर खाये जा रहा है। सगाई के बाद से तू एकदम बदल गई है। कुछ ही महीनों में तेरी शादी है, लेकिन तेरे चेहरे पर दुल्हन वाली कोई खुशी नहीं है। क्या बात है बेटा? क्या ऑफिस में कोई दिक्कत है या… या समीर से कोई बात हुई है?”
समीर का नाम सुनते ही नेहा का धैर्य जवाब दे गया। वह सावित्री देवी के गले लग गई और फूट-फूट कर रोने लगी। उसकी सिसकियों से पूरा कमरा गूंज उठा। सावित्री देवी घबरा गईं। उन्होंने नेहा को अपनी छाती से चिपका लिया और उसकी पीठ सहलाने लगीं। “रो ले बेटा, जी भरकर रो ले। पर मुझे बता कि आखिर माजरा क्या है। किसने मेरी बच्ची को इतना रुलाया है?”
बहुत देर तक रोने के बाद, जब नेहा थोड़ी शांत हुई, तो उसने सुबकते हुए कहना शुरू किया, “माँ, मैं यह शादी नहीं कर सकती। मैं समीर के साथ नहीं जी पाऊंगी। अगर मेरी शादी वहाँ हो गई, तो मैं घुट-घुट कर मर जाऊंगी।”
सावित्री देवी स्तब्ध रह गईं। “क्या कह रही है तू? ऐसा क्या हो गया है? समीर तो इतना अच्छा लड़का है, उसका परिवार इतना नामी है। और शादी से पहले ही तुम्हारी बात भी तो होती है, फिर अचानक ऐसा क्या हुआ?”
नेहा ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा, “यही तो बात है माँ। आप लोग जो बाहर से देख रहे हैं, वह सच नहीं है। सगाई के कुछ दिनों तक सब ठीक था। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, समीर का असली चेहरा मेरे सामने आ रहा है। वह बहुत ही शक्की और हावी होने वाले मिज़ाज का इंसान है।”
नेहा ने एक गहरी सांस ली और अपने अंदर का सारा ज़हर उगलने लगी। “माँ, वह बात-बात पर मुझ पर शक करता है। मैं ऑफिस में काम करती हूँ, मैं एक सॉफ्टवेयर डेवलपर हूँ। मुझे अपने प्रोजेक्ट्स के लिए अपनी टीम के साथ लगातार मीटिंग्स करनी पड़ती हैं, जिनमें मेरे पुरुष सहकर्मी भी होते हैं। लेकिन समीर को यह बिल्कुल पसंद नहीं है। वह मुझे दिन में दस बार फोन करता है। अगर मैं किसी मीटिंग में हूँ और फोन नहीं उठा पाती, तो वह लगातार पच्चीस-तीस मिसकॉल कर देता है। जब मैं वापस कॉल करती हूँ, तो वह मुझसे अजीब-अजीब सवाल पूछता है – ‘तुम किसके साथ थीं?’, ‘पीछे से किसकी आवाज़ आ रही थी?’, ‘तुमने फोन क्यों काटा?'”
सावित्री देवी चुपचाप सुन रही थीं। नेहा की बातें उनके रोंगटे खड़े कर रही थीं।
“सिर्फ इतना ही नहीं माँ,” नेहा आगे बोली, “वह अब बिना बताए मेरे ऑफिस के बाहर आ जाता है। परसों की ही बात है। हमारी एक बहुत ज़रूरी क्लाइंट मीटिंग थी। मीटिंग लंबी खिंच गई और मुझे ऑफिस से निकलने में आठ बज गए। मेरी टीम के एक सहकर्मी, अमित, जो मेरे साथ ही प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं, वो मुझे गेट तक छोड़ने आ गए क्योंकि हम रास्ते भर प्रोजेक्ट के एक बग (bug) पर बात कर रहे थे। समीर वहां अपनी कार में खड़ा था। अमित को मेरे साथ देखकर वह आपा खो बैठा। उसने सबके सामने मुझसे बदतमीजी से बात की और मुझे ज़बरदस्ती कार में बैठाकर ले गया। कार में उसने मुझे जो-जो बातें कहीं, जिन गंदे शब्दों का इस्तेमाल किया, वह मैं आपको बता भी नहीं सकती माँ। उसने मेरे चरित्र पर उंगली उठाई।”
नेहा फिर से रोने लगी। “माँ, मेरा ऑफिस का काम मेरे लिए सिर्फ शौक नहीं है। यह मेरी मजबूरी और मेरी ज़िम्मेदारी दोनों है। पापा की दवाइयाँ, प्रिया की फीस, सब इसी से चलता है। समीर चाहता है कि मैं शादी के बाद नौकरी छोड़ दूँ। जब मैंने उसे याद दिलाया कि मैंने सगाई से पहले ही साफ कर दिया था कि मैं नौकरी नहीं छोडूंगी क्योंकि मेरे परिवार को मेरी ज़रूरत है, तो उसने कहा कि ‘मेरे घर की बहुएं दूसरों के सामने जाकर नौकरी नहीं करतीं।’ वह मुझ पर हर वक्त नज़र रखता है। मेरे कपड़ों पर, मेरे बात करने के तरीके पर, मेरे बाहर जाने पर, हर चीज़ पर उसे कंट्रोल चाहिए। अगर मैं विरोध करती हूँ, तो वह इमोशनल ब्लैकमेल करता है और मुझे धमकाता है। पापा की तबीयत इतनी खराब है, अगर मैं अभी यह रिश्ता तोड़ती हूँ, तो पापा को सदमा लगेगा। उन्हें लगेगा कि उनकी वजह से मेरा घर नहीं बस पा रहा। इसी डर से मैं सब कुछ चुपचाप सह रही थी। पर अब मुझसे और नहीं सहा जाता माँ। वह इंसान एक मानसिक बीमार है।”
अपनी बेटी की यह पूरी दास्तान सुनकर सावित्री देवी के चेहरे के भाव पूरी तरह बदल चुके थे। उनके चेहरे पर अब कोई चिंता या घबराहट नहीं थी, बल्कि एक शांत और प्रखर गुस्सा था। उन्होंने अपने जीवन में हमेशा समझौते किए थे, लेकिन अपनी बेटी की ज़िंदगी की कीमत पर वह कोई समझौता करने वाली नहीं थीं।
सावित्री देवी उठीं और उन्होंने नेहा के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थामकर उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा, “चुप हो जा मेरी शेरनी। तू रामेश्वर जी की बेटी है, जिसने अपने दम पर इस पूरे घर को संभाला है। तूने यह सब मुझे पहले क्यों नहीं बताया? क्या तुझे लगा कि तेरे पापा की बीमारी तेरी खुशियों से बढ़कर है?”
नेहा ने कहा, “लेकिन पापा…”
“पापा की चिंता तू मत कर,” सावित्री देवी ने बीच में ही टोकते हुए कहा। “तुम्हारे पापा ने तुम्हें पढ़ा-लिखाकर एक आज़ाद और समझदार इंसान इसलिए नहीं बनाया था कि कोई भी आकर तुम्हें अपनी जागीर समझ ले और तुम्हारे आत्मसम्मान को कुचलता रहे। तू हमारे लिए कोई बोझ नहीं है बेटा, तू तो हमारी रीढ़ की हड्डी है। जिस लड़के को तेरी और तेरे काम की इज़्ज़त करनी नहीं आती, वह तुझे उम्र भर क्या खुशी देगा? ऐसा लड़का मेरी बेटी के लायक हो ही नहीं सकता।”
सावित्री देवी का वह रूप नेहा ने आज से पहले कभी नहीं देखा था। एक साधारण सी घरेलू महिला, आज अपनी बेटी के लिए दुर्गा बन चुकी थी।
सावित्री देवी ने अपना फोन निकाला और बिना एक पल की देरी किए समीर के पिता को फोन मिला दिया।
“हेलो, भाईसाहब,” सावित्री देवी की आवाज़ में एक गज़ब की दृढ़ता थी।
“हाँ भाबीजी, कहिये,” उधर से आवाज़ आई।
“भाईसाहब, मुझे सीधी बात करना पसंद है। यह रिश्ता आगे नहीं बढ़ सकता। हम यह सगाई तोड़ रहे हैं।”
फोन के दूसरी तरफ जैसे सन्नाटा छा गया। “क्या कह रही हैं भाबीजी? कोई गलती हो गई क्या? शादी के कार्ड छपने वाले हैं और आप…”
“गलती हमसे हुई थी भाईसाहब, जो हमने आपके बेटे को समझे बिना अपनी फूल सी बच्ची उसके हाथ में देने का फैसला कर लिया। आपके बेटे को एक पत्नी नहीं, बल्कि एक गुलाम चाहिए जिस पर वह अपना हुक्म चला सके और जिस पर शक कर सके। मेरी बेटी कोई बेजान खिलौना नहीं है। आप लोग शादी की तैयारियां रोक दीजिए। यह शादी नहीं होगी। नमस्ते।”
इतना कहकर सावित्री देवी ने फोन काट दिया और नेहा की तरफ मुड़कर उसे अपनी बांहों में भर लिया। नेहा के सीने से जैसे कोई बहुत बड़ा पत्थर हट गया था। वह खुलकर सांस ले पा रही थी।
“अब तू आराम से सो जा। बाहर तेरे पापा को मैं खुद संभाल लूंगी। वह भी एक पिता हैं, जब उन्हें असलियत पता चलेगी, तो वह खुद तेरे इस फैसले पर गर्व करेंगे। आज से तू उस इंसान के बारे में सोचना बंद कर दे,” सावित्री देवी ने नेहा का माथा चूमते हुए कहा।
उस रात नेहा के कमरे की खामोशी टूट चुकी थी। वहाँ अब घुटन नहीं, बल्कि एक नई आज़ादी की ठंडी हवा बह रही थी। उस दिन एक माँ ने सिर्फ एक रिश्ता नहीं तोड़ा था, बल्कि अपनी बेटी के पैरों में पड़ने वाली एक उम्रकैद की बेड़ियां काट दी थीं।
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#टूटती बेड़ियाँ: एक बेटी के आत्मसम्मान की कहानी
लेखिका : रमा शुक्ला