शिवानी अपनी तीन साल की नन्ही बेटी, काव्या को अपने हाथों से नाश्ता करा रही थी। काव्या की मीठी तोतली बातें और उसकी मासूम हंसी से पूरा घर गूंज रहा था। शिवानी के पति, राघव, अखबार पढ़ते हुए
बीच-बीच में अपनी बेटी की हरकतों पर मुस्कुरा देते थे। बाहर से देखने पर यह एक बेहद मुकम्मल और खुशहाल परिवार लगता था। लेकिन इस खुशनुमा माहौल में शिवानी की सास, कौशल्या देवी के चेहरे पर एक अजीब सी असंतुष्टि के भाव थे। वे चाय का कप मेज पर रखते हुए काव्या को एकटक देख रही थीं।
कुछ देर की खामोशी के बाद कौशल्या देवी ने गला साफ किया और उसी पुरानी बात को फिर से छेड़ दिया, जिसे सुनकर शिवानी पिछले कई महीनों से अनसुना करती आ रही थी।
“राघव बेटा,” कौशल्या देवी ने अपने बेटे की तरफ देखते हुए कहा, “काव्या अब तीन साल की हो गई है। मेरा मानना है कि अब तुम दोनों को एक और बच्चे के बारे में सोचना चाहिए। घर में एक ‘कुल का दीपक’ भी तो होना चाहिए। अभी मेरे और तेरे बाबूजी के शरीर में जान है, हम बच्चे को आसानी से संभाल लेंगे।”
शिवानी के हाथ ठिठक गए। उसने बहुत ही संयम और नम्रता के साथ जवाब दिया, “माँ जी, हमारी काव्या ही हमारे लिए सब कुछ है। लड़का हो या लड़की, आजकल के जमाने में क्या ही फर्क रह गया है? और मान लीजिए अगर दूसरा बच्चा भी लड़की हो गई, तो क्या हम उसके साथ न्याय कर पाएंगे?”
कौशल्या देवी जैसे शिवानी के इस तर्क का ही इंतजार कर रही थीं। उन्होंने तुरंत तपाक से कहा, “अरे, दूसरी लड़की कैसे होगी! मैंने पंडित जी को काव्या की कुंडली दिखाई थी, उन्होंने साफ कहा है कि अगली संतान सौ प्रतिशत लड़का ही होगा। और तू यह जो कहती है न कि लड़के-लड़की में कोई अंतर नहीं है,
यह सब सिर्फ किताबों और भाषणों में अच्छा लगता है। असल जिंदगी की सच्चाई यही है कि लड़की तो पराया धन होती है। आज नहीं तो कल उसे अपना घर छोड़कर जाना ही है। बुढ़ापे में पानी तो बेटा ही पिलाता है। अपना वंश तो बेटा ही आगे बढ़ाता है। अब तू ही देख ले, ब्याह के बाद तू अपने माँ-बाप को छोड़कर हमारे घर आ गई न? क्या तू उनके पास रह रही है? नहीं ना! लेकिन मेरा बेटा राघव तो मेरे बुढ़ापे की लाठी बनकर मेरे साथ खड़ा है।”
सालों से चली आ रही इस दकियानूसी सोच और काव्या के वजूद को इस तरह कमतर आंकने पर शिवानी के भीतर का सब्र आज टूट गया। वह हमेशा बड़ों का लिहाज करती थी, लेकिन आज बात उसकी बेटी और एक औरत के अस्तित्व पर आ गई थी।
शिवानी ने काव्या को अपनी गोद से उतारा और उसे खेलने के लिए हॉल में भेज दिया। फिर उसने अपनी सास की आँखों में सीधा देखते हुए, बिना किसी झिझक के अपनी बात कहनी शुरू की।
“माँ जी, आप कहती हैं कि लड़कियां अपने माँ-बाप के पास नहीं रह सकतीं। पर कभी आपने सोचा है कि यह नियम किसने बनाया? भगवान ने तो कोई ऐसी लकीर नहीं खींची थी। यह नियम आप और हम जैसे लोगों के इसी समाज ने बनाया है। इसमें उस बेचारी लड़की का क्या दोष है? क्या एक लड़की अपने माँ-बाप की सेवा नहीं करना चाहती? बिल्कुल करना चाहती है, लेकिन जब वह ऐसा करती है, तो यही समाज उसके माँ-बाप को ताने मारता है। और आप कहती हैं कि बेटा ही बुढ़ापे की लाठी होता है? तो फिर पास वाले शर्मा अंकल का बेटा उन्हें यहाँ अकेले तड़पता हुआ छोड़कर विदेश क्यों बस गया? क्यों वे आज वृद्धाश्रम जैसी जिंदगी जी रहे हैं? क्या उनका वो ‘कुल का दीपक’ उनके किसी काम आया?”
कौशल्या देवी शिवानी के इस तीखे लेकिन सत्य रूपी वार से अवाक रह गईं। राघव ने भी अपना अखबार नीचे रख दिया था और वह चुपचाप शिवानी की बातें सुन रहा था।
शिवानी की आँखों में अब आंसू तैरने लगे थे, जो गुस्से और दर्द का मिला-जुला रूप थे। उसने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “मैं सिर्फ इसलिए दूसरा बच्चा पैदा करूँ क्योंकि पहली संतान एक लड़की है? क्या मेरी बेटी कोई कमी है, जो मुझे एक बेटे से पूरी करनी है? लड़की होना कोई पनौती या श्राप नहीं है माँ जी। आप जाकर उन अनाथालयों में देखिए, उन अस्पतालों के चक्कर काटते जोड़ों से पूछिए जो सालों से सिर्फ एक बच्चे की किलकारी सुनने के लिए लाखों रुपये बहा रहे हैं, मन्नते मांग रहे हैं। उनके लिए इस बात का कोई मोल नहीं होता कि बच्चा लड़का है या लड़की। भगवान ने हमें इतनी आसानी से एक स्वस्थ, प्यारी सी बच्ची दे दी, तो आज हम उसकी नेमत की कद्र करने के बजाय उसमें कमियां निकालने लगे हैं। मेरी काव्या मेरा गुरूर है, और मैं उसे कभी यह महसूस नहीं होने दूंगी कि वह हमारे लिए ‘पराया धन’ या कोई अधूरी सौगात है।”
डाइनिंग टेबल पर एक भारी सन्नाटा छा गया। शिवानी के एक-एक शब्द में इतनी गहराई और इतनी सच्चाई थी कि कौशल्या देवी के पास कोई जवाब नहीं बचा था। उनके अंदर की वह पुरानी पितृसत्तात्मक सोच शिवानी के मजबूत स्वाभिमान के आगे घुटने टेक चुकी थी।
तभी राघव अपनी कुर्सी से उठा और आकर शिवानी के कंधे पर हाथ रख दिया। उसने अपनी माँ की तरफ देखते हुए बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा, “माँ, शिवानी बिल्कुल सही कह रही है। हम काव्या के माता-पिता हैं और हमारे लिए हमारा परिवार पूरा हो चुका है। मुझे नहीं चाहिए कोई कुल का दीपक, मेरी काव्या ही मेरे घर की वो रौशनी है जो मेरी जिंदगी के हर अंधेरे को दूर कर देगी। हमें इस बात पर बहस करने के बजाय अपनी बेटी को इस काबिल बनाना चाहिए कि कल को दुनिया उस पर फक्र कर सके।”
राघव का यह समर्थन देखकर शिवानी के होठों पर एक संतोष भरी मुस्कान आ गई। कौशल्या देवी ने भी धीरे से अपनी नजरें झुका लीं, शायद उन्हें भी यह बात समझ आ गई थी कि प्यार और बुढ़ापे का सहारा जेंडर (लिंग) देखकर नहीं, बल्कि अच्छे संस्कारों से मिलता है। शिवानी ने उठकर काव्या को अपनी गोद में उठा लिया। आज उसने सिर्फ अपनी सास को जवाब नहीं दिया था, बल्कि समाज की उस हर सड़ी-गली सोच पर एक गहरी चोट की थी जो बेटियों को हमेशा बेटों से कमतर आंकती है।
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लेखिका : रीमा साहू