ममता का अनमोल आँचल

सुधा की शादी को पूरे दस साल बीत चुके थे, लेकिन उसके आंगन में अब तक किसी बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी थी। मायके से लेकर ससुराल तक, हर जगह उसकी सूनी गोद को लेकर तरह-तरह की बातें होती थीं। कोई ताने मारता, तो कोई हमदर्दी जताता, लेकिन सुधा के दिल का दर्द कोई नहीं समझ पाता था। उसका पति, विकास, बहुत समझदार था और हमेशा उसके साथ खड़ा रहता था, लेकिन एक औरत होने के नाते सुधा के अंदर का मातृत्व अक्सर उसे अकेले में रुला देता था। जब भी वह किसी बच्चे को देखती, उसकी आँखें भर आती थीं।

सुधा का छोटा भाई था अंशुल। अंशुल की पत्नी, प्रज्ञा, सुधा का बहुत सम्मान करती थी। प्रज्ञा और अंशुल का एक पाँच साल का बेटा था—आरव। सुधा अपनी सारी ममता आरव पर लुटाती थी। आरव भी अपनी ‘बुआ’ के बिना एक पल नहीं रह पाता था। प्रज्ञा ने हमेशा महसूस किया था कि उसकी ननद सुधा के दिल में एक बहुत गहरा सूनापन है। प्रज्ञा अक्सर अंशुल से कहती थी, “दीदी ने आरव को इतना प्यार दिया है कि मुझे कभी-कभी लगता है जैसे आरव उनका ही बेटा हो। काश भगवान उनकी यह मुराद भी पूरी कर दे।”

समय अपनी गति से बढ़ता रहा। कुछ समय बाद प्रज्ञा फिर से गर्भवती हुई। इस बार जब सोनोग्राफी हुई तो पता चला कि प्रज्ञा के गर्भ में जुड़वा बच्चे हैं। यह खबर सुनकर पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गई। सुधा की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था। वह अपना सारा दुख भूलकर अपनी भाभी प्रज्ञा की देखभाल में लग गई। सुबह के नाश्ते से लेकर रात की दवाइयों तक, सुधा ने प्रज्ञा को एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ा। प्रज्ञा भी सुधा के इस निस्वार्थ प्रेम को देखकर अक्सर भावुक हो जाती थी। उसने मन ही मन कुछ ऐसा सोच लिया था, जिसका अंदाज़ा शायद घर में किसी को नहीं था।

नौ महीने का सफर कब बीत गया, पता ही नहीं चला। आखिरकार वह दिन आ ही गया जिसका पूरे परिवार को बेसब्री से इंतज़ार था। प्रज्ञा को अस्पताल में भर्ती कराया गया। ऑपरेशन थिएटर के बाहर अंशुल, उसकी माँ कौशल्या देवी और सुधा बेचैनी से चक्कर काट रहे थे। सुधा के होंठ लगातार भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि जच्चा और बच्चा दोनों सुरक्षित रहें।

तभी ऑपरेशन थिएटर का दरवाज़ा खुला और डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए बाहर आकर कहा, “बधाई हो! आपके घर दो नन्ही परियां आई हैं। माँ और दोनों बच्चियां बिल्कुल स्वस्थ हैं।”

यह सुनते ही कौशल्या देवी की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। अंशुल ने खुशी से अपनी माँ और बहन को गले लगा लिया। सुधा की आँखों में तो जैसे खुशी का समंदर उमड़ पड़ा था। वह भागकर मंदिर गई और भगवान को धन्यवाद दिया।

कुछ घंटों बाद जब प्रज्ञा को होश आया और उसे प्राइवेट रूम में शिफ्ट किया गया, तब परिवार के सभी लोग उससे मिलने अंदर गए। प्रज्ञा बेड पर लेटी हुई थी और उसके दोनों तरफ दो बेहद खूबसूरत बच्चियां सो रही थीं। कौशल्या देवी और अंशुल बच्चियों को देखकर निहाल हुए जा रहे थे। तभी सुधा, छोटे आरव का हाथ पकड़े कमरे में दाखिल हुई। प्रज्ञा को सुरक्षित देखकर उसने राहत की सांस ली और बच्चियों के पास जाकर उनके छोटे-छोटे हाथों को चूम लिया।

“भाभी, दोनों बिल्कुल आप पर गई हैं,” सुधा ने रुंधे हुए गले से कहा। उसकी आँखों में खुशी तो थी, लेकिन कहीं न कहीं एक बहुत गहरा और खामोश दर्द भी छिपा था। वह सोच रही थी कि शायद उसके भाग्य में कभी यह सुख नहीं लिखा है।

प्रज्ञा ने अंशुल की तरफ देखा। अंशुल की आँखों में भी वही बात थी जो प्रज्ञा सोच रही थी। प्रज्ञा ने सुधा का हाथ पकड़ा और उसे अपने पास बेड पर बैठा लिया।

“दीदी, आपने हमेशा इस घर को अपनी जान से ज्यादा प्यार दिया है। मेरे आरव को आपने एक माँ से भी बढ़कर पाला है,” प्रज्ञा ने बहुत ही कोमल स्वर में कहा।

सुधा कुछ समझ नहीं पाई और बोली, “अरे प्रज्ञा, आरव तो मेरा ही बच्चा है। इसमें एहसान कैसा?”

प्रज्ञा मुस्कुराई और उसने अंशुल को इशारा किया। अंशुल ने आगे बढ़कर एक नवजात बच्ची को बहुत ही सावधानी से उठाया और अपनी बहन सुधा की कांपती हुई बाहों में रख दिया।

सुधा हैरान रह गई। वह कभी बच्ची को देखती, तो कभी अंशुल और प्रज्ञा को। “यह… यह क्या कर रहे हो तुम लोग?”

प्रज्ञा ने सुधा के गालों से बहते आँसुओं को पोंछते हुए कहा, “दीदी, देखिए… अब आपकी गोद सूनी नहीं रही। यह मेरी नहीं, आपकी बेटी है। आज से आप इसकी माँ हैं और यह आपकी परछाई है।”

सुधा के पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गई। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। “पागल हो गई हो तुम प्रज्ञा? कोई माँ अपना बच्चा कैसे दे सकती है? नहीं, मैं यह नहीं ले सकती।”

अंशुल ने अपनी बहन के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “दीदी, प्रज्ञा सच कह रही है। हमने यह फैसला बहुत पहले ही कर लिया था। आपने हमारी हर खुशी में अपना दुख भुला दिया। क्या हम अपनी एक खुशी आपकी सूनी गोद में नहीं रख सकते? यह बच्ची आज से आपकी है, इसे अपने प्यार से सींचिए।”

पास ही खड़ी कौशल्या देवी भी यह सब देखकर फूट-फूट कर रोने लगीं। उन्होंने आगे बढ़कर अपनी बहू प्रज्ञा का माथा चूम लिया और कहा, “मुझे गर्व है कि मेरे घर में तुम जैसी बहू आई है, जिसने अपनी ननद को एक नया जीवन दे दिया।”

सुधा ने अपनी गोद में सो रही उस नन्ही परी को देखा। बच्ची ने नींद में ही मुस्कुरा कर सुधा की उंगली को अपनी छोटी सी मुट्ठी में कस लिया था। उस एक स्पर्श ने सुधा के जीवन के सारे दुख, सारे ताने और सारी उदासी को एक पल में मिटा दिया। सुधा ने उस बच्ची को अपने सीने से लगा लिया और उसकी सिसकियां कमरे में गूंज उठीं। लेकिन यह सिसकियां दुख की नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी पूर्णता की थीं। आज सच में एक माँ ने जन्म दिया था, और दूसरी माँ ने जन्म लिया था।

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लेखक : अनंत मारवाड़ी 

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