मेरे बचपन की यादें मेरी माँ की साड़ी के पल्लू और उनके हाथों से बने गाजर के हलवे की खुशबू से जुड़ी थीं। जब तक माँ थीं, हमारा घर एक घर था। पिताजी दफ्तर से आते, तो पूरा घर उनकी हंसी से गूंज उठता था। लेकिन मेरे चौदहवें जन्मदिन से ठीक दो महीने पहले, एक लंबी बीमारी ने माँ को मुझसे हमेशा के लिए छीन लिया। उस दिन के बाद, मेरे घर की दीवारों ने जैसे हंसना बंद कर दिया था। पिताजी उदास रहने लगे थे और मैं अपने कमरे में माँ की तस्वीरों के साथ सिमट कर रह गई थी।
रिश्तेदारों ने पिताजी को समझाया कि घर में एक औरत का होना बहुत ज़रूरी है, खासकर एक जवान होती बेटी के लिए। मुझे भी लगा कि शायद घर का सूनापन दूर हो जाएगा। और फिर, एक दिन पिताजी ने दूसरी शादी कर ली। घर में नीलम जी का प्रवेश हुआ। उनके साथ उनकी अपनी बेटी भी आई, स्नेहा, जो उस समय महज़ आठ साल की थी। नीलम जी दिखने में बेहद सौम्य थीं। बाहर वालों को लगता कि मेरे पिताजी को एक बहुत ही समझदार और संस्कारी जीवनसाथी मिल गई है। शुरुआत के कुछ दिन उन्होंने मुझसे भी बहुत मीठी बातें कीं, लेकिन बच्चे बहुत जल्दी समझ जाते हैं कि कौन सी मुस्कान होठों से आ रही है और कौन सी दिल से। उनकी आँखों में मेरे लिए कभी वो वात्सल्य नहीं दिखा जिसकी मुझे उस उम्र में सबसे ज्यादा ज़रूरत थी।
वक्त के साथ नीलम जी का असली रूप सामने आने लगा। घर की हर सुख-सुविधा, हर फैसले पर सिर्फ और सिर्फ स्नेहा का हक़ होने लगा। जब स्नेहा के लिए बाज़ार से नए कपड़े आते, तो मुझे माँ के संदूक से निकाले गए पुराने कपड़ों को ही पहनने की सलाह दी जाती। अगर कभी मैं कुछ अपनी पसंद का खाने को मांगती, तो जवाब मिलता, “तुम तो अब बड़ी हो गई हो, ये सब शौक बच्चों के होते हैं, स्नेहा को खाने दो।” मुझे उस आठ साल की बच्ची से कोई शिकायत नहीं थी, लेकिन उस भेदभाव से मेरा दिल रोज़ कटता था। पिताजी जो कभी मेरी हर छोटी-बड़ी बात का ख्याल रखते थे, वो अब पूरी तरह से नीलम जी के प्रभाव में थे।
मैंने कई बार रात के अंधेरे में पिताजी से अपनी तकलीफ़ साझा करने की कोशिश की। मैं रोती थी, उनसे पूछती थी, “पापा, क्या माँ के जाने के बाद मैं आपके लिए कुछ भी नहीं रही? क्या मैं आपकी बेटी नहीं हूँ?”
पिताजी अपनी नज़रें चुरा लेते। उनके चेहरे पर एक बेबसी होती और वो बस इतना ही कहते, “बेटा, नीलम ने इस घर को संभाला है। स्नेहा छोटी है, उसे ज़्यादा प्यार की ज़रूरत है। तुम समझदार हो, थोड़ा एडजस्ट करना सीखो। घर ऐसे ही चलते हैं।”
उनका यह ‘एडजस्ट’ करने का शब्द मेरे लिए एक ज़हर बन गया था। आखिर एक बच्चा अपने ही घर में कब तक और कितना एडजस्ट करे? मेरी पढ़ाई, मेरे शौक, मेरी कला—सब कुछ धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल दिए गए। मुझे चित्रकारी का बहुत शौक था और मैं मिट्टी के खिलौने और सजावटी सामान बनाने में बहुत अच्छी थी। माँ हमेशा कहती थीं कि मेरे हाथों में जादू है। माँ के जाने के बाद, मेरी वही कला मेरा सुकून बन गई थी। मैंने मिट्टी की एक गुल्लक बनाई थी, जिसमें मैं अपने पॉकेट मनी के बचाए हुए पैसे रखती थी। मेरा सपना था कि जब मैं बारहवीं पास करूँगी, तो उन्हीं पैसों से फाइन आर्ट्स के एक अच्छे कॉलेज में दाखिला लूँगी, ताकि पिताजी को मुझसे कोई आर्थिक परेशानी ना हो।
लेकिन मेरी उस छोटी सी दुनिया को भी नीलम जी की नफरत की नज़र लग गई। मैं सोलह साल की हो चुकी थी। एक दिन, स्नेहा के स्कूल में कोई महंगा समर कैंप जा रहा था, जिसके लिए काफी पैसों की ज़रूरत थी। पिताजी उस समय शहर से बाहर गए हुए थे। मैं स्कूल से लौटी तो देखा कि मेरे कमरे का सारा सामान बिखरा पड़ा है। फर्श पर मेरी बनाई हुई मिट्टी की वो गुल्लक चकनाचूर पड़ी थी और उसके अंदर के सारे पैसे गायब थे। मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वो सिर्फ पैसे नहीं थे, वो मेरी उम्मीदें थीं, मेरी आज़ादी का टिकट थीं।
मैं दौड़ते हुए बाहर गई। नीलम जी आराम से सोफे पर बैठकर टीवी देख रही थीं। मैंने कांपती आवाज़ में उनसे पूछा, “मेरी गुल्लक… मेरे पैसे कहाँ हैं?”
उन्होंने बिना मेरी तरफ देखे बड़ी बेरुखी से जवाब दिया, “स्नेहा को कैंप जाना है। घर में कैश नहीं था, इसलिए मैंने ले लिए। वैसे भी तुम्हें उन पैसों का क्या करना था? कोई राजकुमार तो आने से रहा तुम्हारे लिए।”
मेरे भीतर जैसे कोई ज्वालामुखी फट पड़ा। “वो मेरे पैसे थे! आपने बिना मुझसे पूछे मेरी चीज़ों को हाथ कैसे लगाया? वो मेरी माँ की याद और मेरी मेहनत थी!” मैं चीख पड़ी थी।
नीलम जी ने झटके से उठकर मेरे गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया। “तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझसे इस आवाज़ में बात करने की? बाप के पैसों पर पल रही है और मुझे हिसाब सिखाएगी? तेरा इस घर में है ही क्या? जो है मेरा है और मेरी बेटी का है!”
उस एक तमाचे ने मेरे अंदर के बचे-खुचे सारे भ्रम तोड़ दिए। मुझे एहसास हो गया कि जिस घर की ईंटों को मैं अपना मान रही थी, वो दरअसल मेरे लिए एक सराय से ज़्यादा कुछ नहीं था। वहां मेरा कोई वजूद नहीं था। उस रात मैंने खाना नहीं खाया। मैं अपने कमरे में टूटी हुई गुल्लक के टुकड़ों को समेटती रही। मैंने पिताजी को फोन करने की कोशिश की, लेकिन उनका फोन बंद था। तभी मैंने फैसला कर लिया। अगर इस घर में मेरा कोई हक़ नहीं, तो मैं यहाँ एक पल भी नहीं रुकूँगी।
रात के दो बज रहे थे। मैंने एक छोटे से बैग में माँ की एक तस्वीर, अपने कुछ कपड़े और टूटी गुल्लक का एक टुकड़ा रखा, और चुपचाप उस घर की दहलीज़ को पार कर लिया। बाहर घुप अंधेरा था और हल्की बारिश हो रही थी, लेकिन मेरे अंदर का डर खत्म हो चुका था।
अगली सुबह मैं दिल्ली जाने वाली एक जनरल ट्रेन के डिब्बे में बैठी थी। शहर बड़ा था, अनजान था। शुरुआत के दिन किसी बुरे सपने से कम नहीं थे। मैंने रेलवे स्टेशन पर रातें गुज़ारीं, मंदिरों के बाहर भूखे पेट सोई। कुछ दिनों बाद मुझे एक छोटे से ढाबे पर बर्तन मांजने का काम मिल गया। वहां का मालिक थोड़ा सख्त ज़रूर था, लेकिन उसने मुझे ढाबे के पीछे की एक छोटी सी कोठरी में रहने की जगह दे दी थी। दिन भर मैं लोगों की जूठी प्लेटें धोती और रात को उसी कोठरी में बैठकर अपनी माँ को याद करके रोती।
लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैं जानती थी कि मुझे बर्तन धोने के लिए अपनी ज़िंदगी नहीं बितानी है। एक दिन ढाबे के पास ही एक पुरानी हैंडीक्राफ्ट (हस्तशिल्प) की दुकान पर मेरी नज़र पड़ी। वहां एक बुजुर्ग आदमी, जिन्हें सब ‘करीम चाचा’ कहते थे, मिट्टी और लकड़ी के खूबसूरत शोपीस बनाते थे। मैं अपने खाली समय में वहां जाकर उन्हें काम करते हुए देखने लगी। बचपन का मेरा शौक एक बार फिर से जाग उठा था। एक दिन जब चाचा बीमार थे और एक बड़ा ऑर्डर पूरा करना था, तो मैंने डरते-डरते उनकी मदद करने की पेशकश की। जब उन्होंने मेरे हाथों की सफाई और मेरी डिज़ाइनिंग देखी, तो वो हैरान रह गए। उन्होंने मुझे अपने शागिर्द के रूप में रख लिया।
करीम चाचा के पास मैंने कला की बारीकियां सीखीं। मैंने दिन-रात मेहनत की। अपनी छोटी सी कोठरी में मैं नए-नए डिज़ाइन बनाती। धीरे-धीरे लोगों को मेरा काम पसंद आने लगा। पांच साल के संघर्ष के बाद, मैंने अपने बचाए हुए पैसों से एक छोटी सी दुकान किराए पर ली। उस दुकान का नाम मैंने रखा— “गुल्लक आर्ट्स”।
वो नाम मेरे लिए सिर्फ एक ब्रांड नहीं, बल्कि मेरे उस टूटे हुए सपने का पुनर्जन्म था। मैंने मिट्टी के पारंपरिक दीयों, मूर्तियों और सजावटी सामानों को एक नया आधुनिक रूप देना शुरू किया। मेरी डिज़ाइन्स में वो दर्द, वो गहराई और वो जज़्बात थे जो मैंने अपनी ज़िंदगी में सहे थे। लोगों ने मेरे काम को हाथों-हाथ लिया। मेरी मेहनत रंग लाने लगी थी।
आज बीस साल बीत चुके हैं। दिल्ली के सबसे पॉश इलाके में “गुल्लक आर्ट्स” का एक बड़ा शोरूम है। मेरे बनाए गए हैंडीक्राफ्ट्स बड़े-बड़े होटलों और विदेशी प्रदर्शनियों में जाते हैं। मेरे नीचे सौ से ज़्यादा कारीगर काम करते हैं। मैं अब उस सहमी हुई सोलह साल की बच्ची से एक आत्मविश्वास से भरी, कामयाब बिज़नेसवुमन बन चुकी हूँ। मेरे पास बड़ा घर है, गाड़ी है, शोहरत है।
लेकिन कहते हैं ना, इंसान चाहे कितनी भी तरक्की कर ले, उसका अतीत कभी उसका पीछा नहीं छोड़ता। आज भी, जब मैं किसी त्यौहार पर अपने शोरूम में परिवारों को एक साथ आते, हंसते-मुस्कुराते और एक-दूसरे के लिए तोहफे खरीदते देखती हूँ, तो मेरे सीने में एक अजीब सी टीस उठती है। मेरी कामयाबी के इस बड़े से महल में सब कुछ है, बस एक चीज़ की कमी है—अपनों की।
पिताजी से मेरी कभी बात नहीं हो पाई। मैंने सुना था कि नीलम जी ने घर बेच दिया था और वो लोग कहीं और शिफ्ट हो गए थे। मैंने उन्हें ढूंढने की कोशिश भी नहीं की। जिस रिश्ते ने मुझे सड़क पर ला खड़ा किया था, उसे वापस जोड़ने की मुझमें ताकत नहीं थी। मैं आज भी उस टूटी हुई मिट्टी की गुल्लक का वो टुकड़ा अपने पर्स में रखती हूँ, जो मुझे याद दिलाता है कि मुझे किसने तोड़ा था और मैं कैसे जुड़ी थी। मेरी ज़िंदगी स्थिर है, सुरक्षित है, लेकिन दिल के एक कोने में वो खालीपन आज भी वैसा ही है, जो शायद कभी नहीं भरेगा। बस यही सोचकर तसल्ली कर लेती हूँ कि अगर वो गुल्लक उस दिन न टूटी होती, तो शायद मैं आज यह मुकाम कभी हासिल नहीं कर पाती।
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