“जाओ काव्या, लौट जाओ अपने घर,” कबीर ने गाड़ी का दरवाजा खोलते हुए कहा। “यह तुम्हारे लिए एक सबक है। भगवान का शुक्र मनाओ कि मैं कोई बुरा इंसान नहीं था, वरना रात के इस अंधेरे में तुम्हारा क्या अंजाम होता, तुम सोच भी नहीं सकती। मैंने तुम्हें सिर्फ यह एहसास दिलाने के लिए यहाँ बुलाया था कि दुनिया की कोई भी चकाचौंध माता-पिता के प्यार और उनके भरोसे से बड़ी नहीं होती। लौट जाओ, इससे पहले कि तुम्हारे माता-पिता जाग जाएं।”
शहर के एक शांत और पुराने मोहल्ले में रहने वाले दीनानाथ जी का घर भले ही छोटा था, लेकिन उस घर में गूंजने वाली खुशियाँ किसी महल से कम नहीं थीं। दीनानाथ जी एक साधारण से क्लर्क थे, लेकिन उनकी इकलौती बेटी काव्या उनके लिए किसी राजकुमारी से कम नहीं थी। काव्या की माँ, सुमित्रा, एक बेहद संस्कारी और ममतामयी महिला थीं, जिनका पूरा दिन अपनी बेटी की पसंद का खाना बनाने और उसके भविष्य के सपने बुनने में बीत जाता था। काव्या पढ़ने में बहुत होशियार थी, और इसी वजह से दीनानाथ जी ने अपनी तमाम इच्छाओं का गला घोंटकर, अपने फटे हुए जूतों में गत्ते लगाकर, काव्या को शहर के सबसे महंगे और नामी कॉलेज में दाखिला दिलवाया था। उनका सपना था कि उनकी बेटी पढ़-लिखकर एक बड़ी अफसर बने और समाज में उनका नाम रोशन करे।
काव्या भी अपने माता-पिता से बहुत प्यार करती थी। वह जानती थी कि उसके पिता ने उसकी हर जिद पूरी करने के लिए कितनी रातों की नींदें हराम की हैं। जब काव्या ने कॉलेज में कदम रखा, तो उसकी दुनिया बिल्कुल बदल गई। किताबों और घर की चारदीवारी से निकलकर उसने एक नई चमक-दमक वाली दुनिया देखी। इसी दुनिया में उसकी मुलाकात हुई कबीर से। कबीर, जो उसी कॉलेज के फाइनल ईयर का छात्र था। वह देखने में बेहद आकर्षक, बातों में माहिर और एक अमीर घर का लड़का था। कबीर के पास महंगी गाड़ी थी, वह ब्रांडेड कपड़े पहनता था और उसके आस-पास हमेशा दोस्तों का एक जमघट लगा रहता था। काव्या जैसी साधारण और सीधी-सादी लड़की के लिए कबीर का ध्यान उसकी तरफ जाना किसी फिल्मी कहानी के सच होने जैसा था।
शुरुआत में दोनों के बीच सिर्फ दोस्ती हुई, लेकिन कबीर की मीठी बातों और उसके द्वारा दिखाए गए सुनहरे सपनों ने जल्द ही काव्या को अपनी गिरफ्त में ले लिया। कबीर अक्सर काव्या से कहता था कि वह उसे दुनिया की हर खुशी देगा, उसे कभी किसी चीज की कमी नहीं होने देगा। काव्या, जिसने बचपन से ही एक मध्यमवर्गीय परिवार के संघर्ष देखे थे, कबीर की इन बातों में बहक गई। उसे लगने लगा कि कबीर ही वह इंसान है जो उसे वो जिंदगी दे सकता है, जिसकी उसने हमेशा कल्पना की थी। प्यार का नशा ऐसा होता है कि इंसान को सही और गलत के बीच का फर्क नजर आना बंद हो जाता है। काव्या के साथ भी यही हुआ। वह अपने माता-पिता के प्यार, उनके बलिदान और उनके संघर्षों को भूलने लगी। उसे अब अपने घर की पुरानी दीवारें और पिता की नसीहतें चुभने लगी थीं।
जब काव्या की पढ़ाई पूरी होने वाली थी, तब एक दिन दीनानाथ जी ने बड़े प्यार से काव्या को अपने पास बिठाया और कहा, “बेटी, अब तेरी पढ़ाई पूरी होने वाली है। मेरे एक दोस्त के बेटे का रिश्ता आया है। लड़का बहुत सीधा और होनहार है, बैंक में नौकरी करता है। मैंने और तेरी माँ ने सोचा है कि एक बार तू उससे मिल ले।” यह सुनकर काव्या के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने तुरंत साफ शब्दों में कह दिया कि वह अभी शादी नहीं करना चाहती। लेकिन अंदर ही अंदर वह जानती थी कि वह कबीर के बिना अपनी जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकती।
अगले दिन कॉलेज में काव्या ने रोते हुए कबीर को सारी बात बताई। कबीर ने उसे गले लगाते हुए सांत्वना दी और एक ऐसी बात कही जिसने काव्या की सोचने-समझने की शक्ति को पूरी तरह से खत्म कर दिया। कबीर ने कहा, “काव्या, तुम्हारे माता-पिता एक साधारण परिवार से हैं और मेरे पिताजी एक बड़े बिजनेसमैन। वे कभी हमारी शादी के लिए नहीं मानेंगे। और तुम्हारे घरवाले भी मेरी हैसियत देखकर डर जाएंगे। हमारे पास सिर्फ एक ही रास्ता है। हम भागकर शादी कर लेते हैं। एक बार शादी हो गई, तो सब धीरे-धीरे मान ही जाएंगे।”
काव्या पहले तो घबराई। उसने कबीर से कहा, “नहीं कबीर, मेरे माता-पिता मेरी जान हैं। अगर मैंने ऐसा किया तो वे जीते जी मर जाएंगे। मेरे पिताजी को समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं छोडूंगी।” लेकिन कबीर ने अपनी बातों का ऐसा जाल बिछाया कि काव्या मजबूर हो गई। कबीर ने कहा, “अगर तुम मुझसे सच्चा प्यार करती हो, तो तुम्हें मेरे लिए यह कदम उठाना ही होगा। वरना आज के बाद हम कभी नहीं मिलेंगे।” प्यार के मोहपाश में जकड़ी काव्या ने आखिरकार कबीर के आगे घुटने टेक दिए और वह फैसला कर लिया, जो उसे कभी नहीं करना चाहिए था।
तय हुआ कि मंगलवार की रात जब घर में सब सो जाएंगे, तो काव्या अपना जरूरी सामान और कुछ पैसे-जेवर लेकर शहर के बाहरी इलाके में स्थित पुराने शिव मंदिर के पास पहुंचेगी, जहाँ कबीर अपनी गाड़ी लेकर उसका इंतजार करेगा और वहां से वे हमेशा के लिए शहर छोड़ देंगे।
मंगलवार की वह रात काव्या के लिए कयामत की रात थी। रात के 12 बज चुके थे। घर में खामोशी छाई हुई थी। सिर्फ दीनानाथ जी के खांसने की हल्की आवाज कभी-कभी सन्नाटे को चीर रही थी। काव्या ने अपने कमरे में एक छोटा सा बैग तैयार किया। उसने अपनी माँ के दिए हुए कुछ सोने के गहने और अपनी बचत के कुछ पैसे बैग में रख लिए। जब वह दबे पाँव अपने कमरे से बाहर निकली, तो उसकी नजर अपने माता-पिता के कमरे की ओर गई। दरवाजा आधा खुला था। हल्की रोशनी में उसने देखा कि उसके पिता चादर ओढ़े बेसुध सो रहे थे। उनके तकिए के पास काव्या के कॉलेज की फीस की वह रसीद रखी थी, जिसे चुकाने के लिए उन्होंने अपना पुश्तैनी खेत गिरवी रख दिया था। काव्या का दिल एक पल के लिए कांप उठा। उसकी आँखों से आंसू छलक पड़े। उसके कदम पीछे हटने लगे, लेकिन तभी उसके फोन की स्क्रीन पर कबीर का मैसेज चमका— “मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ, जल्दी आओ।” प्यार की उस अंधी पट्टी ने एक बार फिर उसकी आँखों पर पर्दा डाल दिया। उसने आंसुओं को पोंछा और चुपचाप घर का मुख्य दरवाजा खोलकर बाहर निकल गई।
सर्द हवाओं और घने अंधेरे के बीच काव्या तेज कदमों से मंदिर की तरफ बढ़ रही थी। उसके दिल की धड़कनें इतनी तेज थीं कि उसे अपनी ही आवाज सुनाई दे रही थी। लगभग आधे घंटे की पैदल यात्रा के बाद वह उस पुराने शिव मंदिर के पास पहुंची। वहां कबीर की गाड़ी पहले से खड़ी थी। कबीर गाड़ी के बोनट का सहारा लेकर खड़ा था। काव्या उसे देखते ही दौड़कर उसके पास गई और हांफते हुए बोली, “कबीर! मैं आ गई। देखो, मैंने अपना सब कुछ पीछे छोड़ दिया है। अब मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ। चलो यहाँ से, इससे पहले कि कोई हमें देख ले।” काव्या की आँखों में एक उम्मीद थी, एक नए जीवन की चमक थी।
लेकिन कबीर अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। उसने न तो काव्या को गले लगाया और न ही गाड़ी का दरवाजा खोला। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति और कठोरता थी। काव्या ने हैरान होकर पूछा, “क्या हुआ कबीर? तुम ऐसे क्यों खड़े हो? चलो ना, हमें देर हो रही है।”
कबीर ने एक गहरी सांस ली और अपनी नजरें काव्या के उस बैग पर टिका दीं जो वह अपने साथ लेकर आई थी। कुछ पलों की खामोशी के बाद कबीर की आवाज गूंजी, “काव्या, हम कहीं नहीं जा रहे हैं। और न ही हमारी कोई शादी होने वाली है।”
काव्या को लगा जैसे किसी ने उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया हो। “क्या… क्या कह रहे हो तुम कबीर? यह कोई मजाक का वक्त नहीं है। मैं अपना घर-परिवार छोड़कर तुम्हारे पास आई हूँ।”
कबीर की आँखें अब बिल्कुल ठंडी हो चुकी थीं। उसने एक कदम आगे बढ़ाया और सीधे काव्या की आँखों में देखते हुए कहा, “मैं बिल्कुल सच कह रहा हूँ काव्या। मैं तुम्हें बस परखना चाहता था, और आज तुमने साबित कर दिया कि तुम एक धोखेबाज हो।”
“धोखेबाज? मैं? कबीर, तुम होश में तो हो? मैंने तुम्हारे लिए क्या कुछ नहीं किया और तुम मुझे धोखेबाज कह रहे हो?” काव्या का गला रुंध गया था, उसके हाथों से बैग छूटकर जमीन पर गिर पड़ा।
“हाँ, तुम धोखेबाज हो,” कबीर की आवाज अब थोड़ी तेज हो गई थी। “जरा सोचो काव्या, जिन माता-पिता ने तुम्हें जन्म दिया, तुम्हें पाल-पोसकर इतना बड़ा किया। तुम्हारे पिता ने अपने शौक मारकर तुम्हें इस काबिल बनाया कि तुम अपने पैरों पर खड़ी हो सको। तुम्हारी माँ ने अपनी नींदें खराब करके तुम्हारे लिए दुआएं मांगीं। 24 साल तक जिन्होंने तुम्हारे लिए अपना खून-पसीना एक कर दिया… जब तुम उन लोगों की नहीं हो सकी, तो मेरी क्या होगी?”
काव्या बुत बनकर खड़ी रह गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या सुने और क्या महसूस करे।
कबीर ने अपनी बात जारी रखी, “मैं तो तुम्हें मुश्किल से छह महीने पहले मिला था। मेरी कुछ मीठी बातों और मेरी इस झूठी अमीरी ने तुम्हें इतना अंधा कर दिया कि तुमने एक पल के लिए भी उस पिता के बारे में नहीं सोचा जो कल सुबह जब तुम्हारा खाली कमरा देखेगा, तो शायद सदमे से उसकी जान ही निकल जाए। तुमने प्यार के नाम पर अपने ही भगवान समान माता-पिता को धोखा दिया है। जो लड़की अपने 24 साल पुराने खून के रिश्ते को एक झटके में लात मार सकती है, वो कल को किसी और के बहकावे में आकर मुझे भी लात मार सकती है। मुझे ऐसी लड़की अपनी जिंदगी में नहीं चाहिए जो किसी की सगी न हो।”
काव्या के होंठ कांप रहे थे, लेकिन उसके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था। कबीर के हर शब्द ने उसके दिल पर किसी हथौड़े की तरह वार किया था।
“जाओ काव्या, लौट जाओ अपने घर,” कबीर ने गाड़ी का दरवाजा खोलते हुए कहा। “यह तुम्हारे लिए एक सबक है। भगवान का शुक्र मनाओ कि मैं कोई बुरा इंसान नहीं था, वरना रात के इस अंधेरे में तुम्हारा क्या अंजाम होता, तुम सोच भी नहीं सकती। मैंने तुम्हें सिर्फ यह एहसास दिलाने के लिए यहाँ बुलाया था कि दुनिया की कोई भी चकाचौंध माता-पिता के प्यार और उनके भरोसे से बड़ी नहीं होती। लौट जाओ, इससे पहले कि तुम्हारे माता-पिता जाग जाएं।”
कबीर गाड़ी में बैठा और इंजन स्टार्ट करके वहां से चला गया। गाड़ी की लाल टेल-लाइट्स धीरे-धीरे अंधेरे में गायब हो गईं।
काव्या वहीं उस सुनसान सड़क पर अकेली खड़ी रह गई। उसके पैरों की ताकत जैसे खत्म हो गई थी। वह वहीं धूल भरी सड़क पर घुटनों के बल गिर पड़ी और फूट-फूटकर रोने लगी। उसे अब एहसास हो रहा था कि वह कितनी बड़ी गलती करने जा रही थी। कबीर ने आज उसके गाल पर ऐसा तमाचा मारा था जिसकी गूंज उसे जिंदगी भर सुनाई देने वाली थी। लेकिन यह तमाचा जरूरी था, क्योंकि इसने उसकी नींद तोड़ दी थी।
उसे अचानक अपने पिता का वह थका हुआ चेहरा याद आया। उसे याद आया कैसे तेज बुखार में भी उसके पिता ड्यूटी पर गए थे ताकि उसकी कॉलेज की ट्रिप का पैसा भर सकें। उसे अपनी माँ की वह फटी हुई साड़ी याद आई जिसे पहनकर वह काव्या के लिए नए कपड़े लाती थी। काव्या को खुद से घिन आने लगी। उसने अपने हाथों से अपनी आँखों के आंसू पोंछे। उसने वह बैग उठाया जिसमें उसने अपनी बर्बादी का सामान भरा था।
अब रात का आखिरी पहर चल रहा था। काव्या ने मुड़कर उसी रास्ते पर दौड़ लगाना शुरू किया जहाँ से वह आई थी। उसे बस किसी भी तरह सुबह होने से पहले अपने घर पहुंचना था। वह दौड़ती रही, तब तक दौड़ती रही जब तक उसे अपने घर का वह पुराना लोहे का गेट नहीं दिख गया।
दरवाजा अभी भी वैसे ही खुला था जैसा वह छोड़ गई थी। वह दबे पाँव अंदर गई। माता-पिता अभी भी सो रहे थे। काव्या ने राहत की एक लंबी सांस ली। उसने अपना बैग वापस अलमारी में रखा, गहने अपनी जगह पर रखे और अपनी माँ के बिस्तर के पास जाकर जमीन पर बैठ गई। उसने अपनी माँ के लटकते हुए हाथ को अपने माथे से लगाया और मन ही मन वादा किया, “मुझे माफ कर देना माँ, मैं भटक गई थी। लेकिन आज के बाद आपकी यह बेटी कभी कोई ऐसा काम नहीं करेगी जिससे आपको या पिताजी को कभी नीचा देखना पड़े। अब यह काव्या सिर्फ आपकी है।”
बाहर सवेरा हो रहा था, चिड़ियों की चहचहाहट शुरू हो गई थी। खिड़की से आती सूरज की पहली किरण ने काव्या के चेहरे को रोशन कर दिया। यह सिर्फ एक नया दिन नहीं था, बल्कि काव्या का एक नया जन्म था।
क्या आपको लगता है कि कबीर ने काव्या के साथ जो किया वह सही था? क्या आज की युवा पीढ़ी को इस कहानी से कुछ सीखना चाहिए? अपने विचार और अनुभव हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं!
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#मोहभंग: वो आखिरी कदम