सुबह के सात बज रहे थे। रसोई में चाय की खुशबू फैल रही थी और खिड़की के बाहर अमलतास के पीले फूल हवा के साथ झूम रहे थे। मीरा ने चाय का कप ट्रे में रखा और हमेशा की तरह पहले सास-ससुर के कमरे की ओर बढ़ी।
“माँजी, चाय रख दूँ?”
अंदर से आवाज आई, “हाँ बहू, और सुनो… आज दोपहर में मेरी सहेली आ रही है। कुछ अच्छा-सा बना लेना।”
“जी माँजी।”
मीरा ने मुस्कुराकर हामी भर दी।
पच्चीस साल से यही तो करती आई थी वह—‘जी माँजी’, ‘जी पिताजी’, ‘जी सुनिए’, ‘अभी करती हूँ’, ‘अच्छा, जैसा आप कहें।’
शादी के बाद उसने कभी किसी बात को लेकर जिद नहीं की थी। पति अरुण की पसंद को अपनी पसंद मान लिया, सास की आदतों को अपना कर्तव्य और बच्चों की जरूरतों को अपनी प्राथमिकता।
धीरे-धीरे उसका अपना ‘मैं’ कहीं पीछे छूट गया था।
कभी उसे किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। कॉलेज में वह हिंदी साहित्य की छात्रा थी और कविताएँ लिखा करती थी। शादी के बाद भी उसने अपनी पुरानी डायरी संभालकर रखी थी। मगर एक दिन सास ने हँसते हुए कहा था, “अब इन कविताओं-वविताओं में क्या रखा है? घर-गृहस्थी संभालो, वही सबसे बड़ा साहित्य है।”
मीरा ने उस दिन डायरी संदूक में रख दी थी।
फिर बच्चे हुए। उनकी पढ़ाई, बीमारी, स्कूल, टिफिन, परीक्षाएँ… समय कब बीतता गया, उसे पता ही नहीं चला।
अब बच्चे बड़े हो चुके थे। बेटा विदेश में नौकरी करता था और बेटी अपने शहर में ब्याही थी। दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त थे।
एक शाम मीरा बालकनी में बैठी पुराने कागजों की सफाई कर रही थी। अचानक उसकी वही पुरानी डायरी हाथ लग गई।
उसने धीरे से उसे खोला।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“एक दिन मैं अपनी कहानी खुद लिखूँगी।”
मीरा देर तक उस वाक्य को देखती रही।
फिर जाने क्यों उसकी आँखें भर आईं।
“क्या हुआ?” अरुण ने कमरे में आते हुए पूछा।
मीरा ने डायरी बंद कर दी।
“कुछ नहीं।”
“फिर आँखों में आँसू क्यों हैं?”
मीरा कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “अरुण, क्या तुम्हें याद है मैं कभी कविताएँ लिखती थी?”
अरुण मुस्कुराया।
“हाँ, याद है। कॉलेज में तुम कवयित्री हुआ करती थीं।”
“और अब?”
अरुण के पास कोई उत्तर नहीं था।
अगले दिन मीरा ने शहर के एक साहित्यिक समूह की बैठक में जाने का निश्चय किया। कार्यक्रम दोपहर में था। उसने हल्की-सी साड़ी पहनी और बाल सँवारे।
तभी सास की आवाज आई—
“कहाँ जाने की तैयारी है?”
“माँजी, साहित्यिक गोष्ठी है। वहाँ जाना है।”
सास ने आश्चर्य से देखा।
“इस उम्र में?”
मीरा पहली बार बिना झिझके मुस्कुराई।
“हाँ माँजी, इसी उम्र में।”
“घर का काम कौन करेगा?”
“दोपहर का खाना मैंने बना दिया है। शाम की चाय अरुण बना लेंगे।”
अरुण ने पहली बार बीच में बोलते हुए कहा, “बिल्कुल बना लूँगा।”
सास चुप हो गईं।
मीरा बाहर निकल गई।
साहित्यिक गोष्ठी में जब उसने अपनी कविता पढ़ी तो तालियाँ देर तक बजती रहीं। एक वरिष्ठ साहित्यकार ने उससे कहा, “आपने इतने वर्षों तक लिखना क्यों छोड़ दिया?”
मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “शायद मुझे लगता था कि घर की जिम्मेदारियाँ और मेरे सपने एक साथ नहीं चल सकते।”
साहित्यकार ने कहा, “जिम्मेदारियाँ जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन वे जीवन का पूरा अर्थ नहीं होतीं।”
वह वाक्य मीरा के भीतर कहीं गहरे उतर गया।
उस दिन घर लौटते हुए उसे लगा जैसे वह वर्षों बाद अपने ही घर की ओर लौट रही हो।
कुछ दिनों बाद उसने अपनी कविताएँ एक पत्रिका को भेज दीं।
एक महीने बाद उसके नाम एक पत्र आया।
उसकी कविता प्रकाशित होने वाली थी।
मीरा ने वह पत्र अरुण को दिखाया।
अरुण की आँखों में गर्व था।
“मुझे तुम पर गर्व है,” उसने कहा।
मीरा ने धीरे से पूछा, “और अगर मैंने यह सब पहले किया होता?”
अरुण कुछ क्षण चुप रहा।
“तो शायद मुझे भी पहले समझ आ जाता कि तुम्हें केवल मेरी पत्नी या बच्चों की माँ बनकर नहीं रहना था। तुम्हारी अपनी भी एक पहचान है।”
मीरा मुस्कुराई।
उस शाम उसने अपनी पुरानी डायरी निकाली और पहला पन्ना फिर खोला।
“एक दिन मैं अपनी कहानी खुद लिखूँगी।”
उसने नीचे एक नई पंक्ति जोड़ दी—
“वह दिन आज है।”
समय बीतता गया। मीरा की रचनाएँ पत्रिकाओं में छपने लगीं। कभी-कभी उसे साहित्यिक कार्यक्रमों में बुलाया जाने लगा। घर के काम भी चलते रहे, रिश्ते भी चलते रहे, लेकिन अब वह हर काम को अपना कर्तव्य समझकर नहीं, अपनी इच्छा और सामर्थ्य के अनुसार करती थी।
एक दिन बेटी ने फोन पर पूछा, “माँ, आपने अचानक इतना बदलने का फैसला कैसे कर लिया?”
मीरा हँस पड़ी।
“मैं बदली नहीं हूँ बेटा। मैं बस अपने उस हिस्से को वापस ले आई हूँ, जिसे वर्षों पहले कहीं रखकर भूल गई थी।”
“क्या तुम्हें कभी अपराधबोध नहीं हुआ?”
“बहुत हुआ। लेकिन फिर समझ आया कि हर समय दूसरों को खुश रखने की कोशिश भी एक तरह का बंधन है।”
कुछ पल रुककर उसने कहा—
“बेटी, रिश्ते निभाना बहुत जरूरी है, लेकिन ऐसे रिश्ते नहीं जिनमें अपनी साँस लेने की जगह ही न बचे। प्रेम वह है जिसमें साथ हो, अधिकार नहीं; जिम्मेदारी हो, कैद नहीं।”
फोन रखने के बाद मीरा बालकनी में आकर बैठ गई।
सामने अमलतास फिर पीले फूलों से लदा था।
हवा चली तो कुछ फूल नीचे आ गिरे।
मीरा ने उन्हें हथेली पर रख लिया।
उसे लगा, फूल भी कितने अजीब होते हैं—जब तक शाख से बँधे रहते हैं, सुंदर लगते हैं; लेकिन जब समय आता है तो शाख का बंधन छोड़कर धरती पर गिर जाते हैं और फिर भी अपनी सुंदरता नहीं खोते।
उसने आसमान की ओर देखा।
उसे आज पहली बार महसूस हुआ कि कुछ बंधन रिश्तों को जोड़ते हैं, उन्हें संभालकर रखना चाहिए।
लेकिन कुछ बंधन ऐसे भी होते हैं जो इंसान को भीतर से बाँध देते हैं—दूसरों की अपेक्षाओं के, समाज की धारणाओं के, अपराधबोध के और उस डर के कि लोग क्या कहेंगे।
ऐसे कुछ बंधनों को तोड़ देना ही अच्छा होता है।
क्योंकि जिंदगी केवल निभाने का नाम नहीं।
कभी-कभी जिंदगी को सचमुच जीने के लिए भी कुछ बंधन तोड़ने पड़ते हैं।
सर्वथा अप्रकाशित एवं मौलिक रचना
लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’