“आप कहीं नहीं जाएंगे बाबूजी,” विक्रम ने दृढ़ता से कहा। उसने पीछे मुड़कर देखा और आवाज दी, “मीरा! जरा स्टोर रूम से वह कमोड वाली कुर्सी तो जल्दी से लेकर आना।”
“जी, मैं अभी लाई,” मीरा तुरंत कुर्सी लेने दौड़ पड़ी।
दीनानाथ जी ने विक्रम का हाथ पकड़ लिया और कांपती हुई आवाज में बोले, “अरे नहीं बेटा… यह सब क्या कर रहा है तू? मैं चला जाऊंगा। एक बाप अपने जवान बेटे से यह सब कैसे करवा सकता है? मेरा मैला मेरा बेटा उठाएगा? यह सब बहुत अजीब लगता है बेटा… मुझे जाने दे… आह!” दर्द की एक और लहर उठी।
शाम का धुंधलका धीरे-धीरे गहरा रहा था और सर्दियों की हल्की दस्तक हवा में महसूस की जा सकती थी। विक्रम अपनी बालकनी में रखी आराम कुर्सी पर बैठा हुआ था, लेकिन उसकी निगाहें सामने के खाली आसमान पर टिकी थीं, मानो वह शून्य में कुछ तलाश रहा हो। हवा के झोंके आ रहे थे, लेकिन विक्रम को किसी भी बात का कोई होश नहीं था। वह बिल्कुल बुत बना हुआ था। अंदर रसोई से चाय के प्यालों की खनक के साथ मीरा बाहर आई। उसने विक्रम के सामने मेज पर चाय का प्याला रखा, लेकिन विक्रम ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
“विक्रम… ओ विक्रम… सुन रहे हो?” मीरा ने उसके कंधे पर हल्के से हाथ रखते हुए उसे झकझोरा।
विक्रम जैसे किसी गहरी नींद से जागा। “हां… हां मीरा… कहो, क्या बात है?” उसने हड़बड़ाते हुए कहा।
मीरा ने कुर्सी खींचकर उसके करीब बैठते हुए कहा, “बात तो तुम बताओगे। मैं पिछले पंद्रह मिनट से तुम्हें देख रही हूं। चाय ठंडी हो रही है और तुम ऐसे गुमसुम बैठे हो जैसे दुनिया भर का बोझ तुम्हारे कंधों पर हो। तुम्हारी आंखें भी लाल हो रही हैं और पलकों पर नमी है। क्या बात है विक्रम? तुम मुझसे कुछ छिपा रहे हो?”
मीरा के इतने अपनेपन से पूछते ही विक्रम का वह बांध टूट गया जिसे वह काफी देर से रोके हुए था। मीरा ने आगे बढ़कर उसे अपने सीने से लगा लिया।
“कुछ नहीं मीरा…” विक्रम ने भारी गले से कहा, “बस अभी सामने वाले गुप्ता अंकल और आंटी को वैष्णो देवी की यात्रा से लौटते हुए देखा। उनके माथे पर माता की लाल चुनरी बंधी थी और चेहरे पर वही पुरानी चमक थी। उन्हें देखकर मुझे अचानक मां और बाबूजी की याद आ गई। तुम्हें तो पता ही है, हर साल नवरात्रों के समय मां और बाबूजी बिना किसी नागे के वैष्णो देवी के दर्शन के लिए जाते थे। चाहे घर में कितनी भी बड़ी परेशानी क्यों न हो, उनकी वह यात्रा कभी नहीं रुकी। लेकिन इस साल…” विक्रम का गला रुंध गया।
मीरा उसकी पीठ सहलाती रही। वह जानती थी कि छह महीने पहले विक्रम की मां के अचानक निधन ने इस परिवार को, खासकर विक्रम के पिता, दीनानाथ जी को अंदर से कितना तोड़ दिया था।
विक्रम ने आंसू पोछते हुए आगे कहा, “मां का यूं अचानक हमें छोड़कर चले जाना बाबूजी को जैसे अंदर तक खोखला कर गया है। वो अब सिर्फ शरीर से ही नहीं, बल्कि मन से भी बहुत कमजोर हो गए हैं। पिछले हफ्ते मैंने उनसे कहा भी था कि बाबूजी, चलिए इस बार नवरात्रों में मैं और मीरा आपको वैष्णो देवी के दर्शन करवा लाते हैं। मां नहीं हैं तो क्या हुआ, हम तो हैं। लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि उनका मन अब कहीं नहीं लगता। मैं जानता हूं मीरा, उस यात्रा के हर कदम पर उन्हें मां का साथ याद आता है। वो दोनों कितनी खुशी-खुशी जाते थे और जब लौटते थे तो उनके चेहरों पर जो सुकून होता था, वो आज गुप्ता अंकल के चेहरे पर देखकर मैं अपनी पुरानी यादों में खो गया।”
मीरा ने विक्रम का हाथ अपने हाथों में थाम लिया और बहुत ही कोमलता से बोली, “शांत हो जाओ विक्रम। देखो, जो इंसान इस दुनिया से चला गया, उसे तो हम वापस नहीं ला सकते। यह भगवान का नियम है। लेकिन जो हमारे पास हैं, जो हमारे सामने हैं, उनकी देखभाल करना और उन्हें खुश रखना तो हमारे हाथ में है ना? तुम और मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं कि बाबूजी को कभी मां की कमी या कोई तकलीफ महसूस न हो। मुझे पूरा विश्वास है कि हमारे प्यार और सेवा से बाबूजी जल्द ही इस गहरे दुख से बाहर निकल आएंगे।”
अभी मीरा अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि अचानक बाबूजी के कमरे की तरफ से एक जोरदार आवाज आई। धड़ाम!
“आह!…” एक दर्दभरी चीख ने घर के सन्नाटे को चीर दिया।
विक्रम और मीरा दोनों बुरी तरह चौंक गए। दोनों ने एक-दूसरे की तरफ घबराहट भरी नजरों से देखा।
“बाबूजी!…” दोनों एक साथ चिल्लाए और बालकनी से उठकर तेजी से अंदर की ओर दौड़े।
कमरे में बाबूजी नहीं थे, लेकिन बाथरूम का दरवाजा आधा खुला था और वहीं से कराहने की आवाज आ रही थी। विक्रम ने जैसे ही बाथरूम का दरवाजा पूरा खोला, उसके होश उड़ गए। दीनानाथ जी बाथरूम की गीली फर्श पर गिरे पड़े थे। उनका शरीर दर्द से कांप रहा था और वह उठने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। शायद नहाने के लिए गए थे और पैर फिसल जाने के कारण गिर पड़े थे।
“बाबूजी! आप ठीक तो हैं?” विक्रम ने घुटनों के बल बैठते हुए उन्हें सहारा देने की कोशिश की। “मीरा, तुम जल्दी से डॉक्टर भार्गव को फोन लगाओ और कहो कि तुरंत घर आएं!”
“जी… मैं अभी फोन करती हूं,” मीरा कांपते हाथों से फोन मिलाते हुए बाहर भागी।
विक्रम ने बहुत ही सावधानी से अपने पिता को अपनी बाहों में उठाया। दीनानाथ जी का शरीर दर्द से अकड़ रहा था, लेकिन विक्रम ने उन्हें बिना ज्यादा हिलाए-डुलाए, सहारा देकर बिस्तर तक पहुंचाया और धीरे से लिटा दिया। उनके माथे पर पसीने की बूंदें छलक आई थीं और वह दर्द से लगातार कराह रहे थे।
कुछ ही देर में डॉक्टर भार्गव अपना बैग लेकर आ गए। वे उनके पुराने फैमिली डॉक्टर थे। उन्होंने दीनानाथ जी का चेकअप किया, उनके पैरों और कमर को हल्का सा दबाकर देखा।
“देख विक्रम,” डॉक्टर भार्गव ने गंभीर स्वर में कहा, “गनीमत है कि कोई बड़ा फ्रैक्चर नहीं लग रहा है। लेकिन उम्र ज्यादा है और हड्डियों में कमजोरी है, इसलिए अंदरूनी चोट या मांसपेशियों में खिंचाव हो सकता है। एहतियात के तौर पर हमें कल सुबह इनका एक एक्स-रे करवाना होगा। तब तक के लिए मैं इन्हें दर्द निवारक का एक इंजेक्शन लगा रहा हूं और कुछ दवाइयां दे रहा हूं। इससे इन्हें काफी आराम मिल जाएगा।”
इंजेक्शन लगाने के बाद डॉक्टर ने सख्त हिदायत दी, “इस बात का खास ख्याल रखना कि दीनानाथ जी को बिल्कुल भी हिलने-डुलने नहीं देना है। इन्हें बिस्तर से नीचे कदम नहीं रखना है। कोई भी झटका इनके लिए खतरनाक साबित हो सकता है।”
डॉक्टर की बातें सुनकर विक्रम और मीरा की जान में जान आई। विक्रम डॉक्टर को बाहर दरवाजे तक छोड़ने गया। जब वह वापस कमरे में लौटा, तो उसने देखा कि दीनानाथ जी करवट लेकर उठने की कोशिश कर रहे हैं। उनके चेहरे पर अजीब सी बेचैनी थी।
“अरे बाबूजी! यह आप क्या कर रहे हैं? डॉक्टर ने आपको हिलने से बिल्कुल मना किया है। आपको कमर में बहुत गहरी चोट लगी है,” विक्रम ने दौड़कर उन्हें वापस लिटाने की कोशिश की।
दीनानाथ जी ने झेंपते हुए और दर्द से कराहते हुए कहा, “अरे बेटा… मुझे बाथरूम जाना है… पेट में बहुत तेज दबाव महसूस हो रहा है। मुझे जाने दे।”
“नहीं बाबूजी, आप अभी अपने पैरों पर खड़े नहीं हो सकते। अगर आप गिरे तो चोट और बढ़ जाएगी,” विक्रम ने उन्हें रोकते हुए कहा।
“अरे तो क्या यहीं बिस्तर पर सब कर दूं? कपड़े भी खराब होंगे और पूरा कमरा भी गंदा हो जाएगा। मुझे जाने दे विक्रम, मैं किसी तरह दीवार पकड़ कर चला जाऊंगा। यह सब मुझसे नहीं होगा… मुझे शर्मिंदगी होती है।” दीनानाथ जी की आंखों में लाचारी और शर्मिंदगी के आंसू तैरने लगे।
विक्रम ने अपने पिता की उस बेबसी को बहुत गहराई से महसूस किया। एक पिता, जिसने जिंदगी भर अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे परिवार का बोझ उठाया हो, आज अपनी ही नजरों में सिर्फ इसलिए गिर रहा था क्योंकि उसका शरीर उसका साथ नहीं दे रहा था।
“आप कहीं नहीं जाएंगे बाबूजी,” विक्रम ने दृढ़ता से कहा। उसने पीछे मुड़कर देखा और आवाज दी, “मीरा! जरा स्टोर रूम से वह कमोड वाली कुर्सी तो जल्दी से लेकर आना।”
“जी, मैं अभी लाई,” मीरा तुरंत कुर्सी लेने दौड़ पड़ी।
दीनानाथ जी ने विक्रम का हाथ पकड़ लिया और कांपती हुई आवाज में बोले, “अरे नहीं बेटा… यह सब क्या कर रहा है तू? मैं चला जाऊंगा। एक बाप अपने जवान बेटे से यह सब कैसे करवा सकता है? मेरा मैला मेरा बेटा उठाएगा? यह सब बहुत अजीब लगता है बेटा… मुझे जाने दे… आह!” दर्द की एक और लहर उठी।
विक्रम ने अपने पिता के माथे पर हाथ रखा और बहुत ही शांत लेकिन भावुक स्वर में बोला, “बस बाबूजी! अब आप एक शब्द भी नहीं कहेंगे। आपने मुझे चलना सिखाया, मेरे बचपन में मेरी हर गंदगी को बिना किसी घिन के साफ किया। आज जब आपको मेरी जरूरत है, तो आप शर्मिंदा क्यों हो रहे हैं?”
तभी मीरा कमोड वाली कुर्सी ले आई और उसने बिस्तर के पास लगा दी। विक्रम ने अपने बाबूजी को सहारा देकर उठाया और बहुत ही सावधानी से उनके कपड़े ढीले करते हुए उन्हें उस कुर्सी पर बिठाया। दीनानाथ जी की आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। यह आंसू दुख के नहीं थे, बल्कि उस असीम स्नेह और सम्मान के थे जो उनका बेटा उन्हें दे रहा था।
विक्रम ने उनके पैरों को सहलाते हुए कहा, “बाबूजी, आप हर साल मां के साथ वैष्णो देवी की लंबी यात्रा पर जाते थे और वहां जाकर माता के दर्शन करते थे। आपने हमेशा कहा है कि तीर्थ करने से जीवन के पाप कटते हैं और पुण्य मिलता है। इस साल आप वहां नहीं जा पाए और मुझे भी नहीं जाने दिया। तो बाबूजी, आज मुझे ही मेरा तीर्थ पूरा करने दीजिए। मेरी वैष्णो देवी, मेरे भगवान, मेरे चारों धाम तो आप ही हैं। आपकी इस लाचारी में आपकी सेवा करना, आपके काम आना ही मेरी सबसे सच्ची और पवित्र तीर्थयात्रा है। मुझे इस पुण्य से मत रोकिए।”
दीनानाथ जी कुछ बोल नहीं पाए। उनका गला पूरी तरह से रुंध चुका था। उन्होंने अपने कांपते हुए हाथ विक्रम के सिर पर रख दिए। उनके आंसुओं की गर्म बूंदें विक्रम के हाथों पर गिर रही थीं, लेकिन उन आंसुओं में अब दर्द नहीं था, बल्कि एक बूढ़े पिता का वह आशीर्वाद था, जो किसी भी मंदिर, मस्जिद या तीर्थस्थान के पुण्य से बहुत बड़ा था। कमरे में छाई खामोशी में भी अनगिनत दुआएं गूंज रही थीं, और विक्रम को महसूस हो रहा था जैसे उसने दुनिया के सारे तीर्थ इसी कमरे में, अपने पिता के कदमों में कर लिए हों।
क्या आप भी कुछ ऐसा ही महसूस करते हैं?
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। क्या आपको भी लगता है कि बुजुर्ग माता-पिता की सेवा ही दुनिया का सबसे बड़ा तीर्थ है? अपने विचार कमेंट में जरूर साझा करें। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसी ही पारिवारिक और मार्मिक कहानियां पढ़ने के लिए हमारे पेज को फॉलो करना न भूलें, धन्यवाद!
#सच्ची तीर्थयात्रा