“आँगन की छाँव”

शिखा अपनी माँ की बात सुनकर सन्न रह गई। उसे पहली बार एहसास हुआ कि मायका सिर्फ बेटियों के आरामगाह का नाम नहीं है। उसे याद आया कि कैसे पिछली बार उसने अंजलि को कितना परेशान किया था।

सुमित्रा देवी ने बहुत ही शांति से अपनी बेटी को जीवन का एक बहुत बड़ा पाठ पढ़ा दिया था। एक औरत ही दूसरी औरत की दुश्मन होती है, यह कहावत आज सुमित्रा देवी ने झूठी साबित कर दी थी। उन्होंने अपनी बहू के आत्मसम्मान और उसके अधिकारों की रक्षा के लिए वह कदम उठाया था, जो शायद ही कोई सास उठाती।

सर्दियों की गुनगुनी धूप ने सुमित्रा देवी के आँगन में दस्तक दे दी थी। सुमित्रा देवी अपने खपरैल वाले पुराने लेकिन बेहद खूबसूरत और सजे हुए घर के बरामदे में बैठी अखबार के पन्ने पलट रही थीं। तभी रसोई से चाय की सोंधी महक उठी और उनकी बहू अंजलि चाय का कप लिए बाहर आई। अंजलि स्वभाव से बेहद शांत, संस्कारी और पूरे घर को सहेज कर रखने वाली लड़की थी। उसकी शादी को तीन साल हो चुके थे

और इन तीन सालों में उसने सुमित्रा देवी को कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वह उनकी बहू है, बल्कि उसने हमेशा एक बेटी की तरह उनकी और पूरे घर की देखभाल की थी। सुमित्रा देवी का बेटा विक्रम एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था और अपनी पत्नी अंजलि के इस समर्पण से बेहद खुश था। सुमित्रा देवी चाय का पहला घूंट ले ही रही थीं कि अचानक उनके पास रखे फोन की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर उनकी इकलौती बेटी शिखा का नाम चमक रहा था।

“हेलो, कैसी है मेरी बच्ची?” सुमित्रा देवी ने वात्सल्य भरे स्वर में कहा।

“मम्मी, मैं एकदम ठीक हूँ। आपके लिए एक बहुत अच्छी खबर है। कल सुबह मैं घर आ रही हूँ, पूरे पंद्रह दिनों के लिए!” शिखा की आवाज में गजब का उत्साह था।

सुमित्रा देवी खुश तो हुईं, लेकिन उन्होंने हैरानी से पूछा, “पंद्रह दिनों के लिए? अचानक कैसे? दामाद जी को ऑफिस से इतनी लंबी छुट्टी मिल गई क्या?”

“अरे नहीं मम्मी, वो बात नहीं है। दरअसल, कल से ही मयंक पंद्रह दिनों के लिए अपनी कंपनी के एक अहम प्रोजेक्ट की वजह से सिंगापुर जा रहे हैं। अब पंद्रह दिन मैं इस बड़े से फ्लैट में अकेले बोर हो जाती, इसलिए मैंने सोचा कि क्यों न अपना सूटकेस पैक करूँ और मायके आ जाऊँ। खूब मजे करेंगे। और हाँ मम्मी, अंजलि भाभी से कह दीजिएगा कि कल मेरे आने की खुशी में मेरे पसंद के मटर वाले समोसे और गाजर का हलवा बनाकर रखें। बस अब तो मायके में पंद्रह दिन महारानियों की तरह आराम करूंगी। अच्छा मम्मी, मुझे अभी पैकिंग करनी है, मैं कल सुबह की फ्लाइट से पहुँच रही हूँ।” शिखा ने अपनी बात पूरी की और फोन काट दिया।

सुमित्रा देवी ने धीरे से फोन टेबल पर रखा। उनके चेहरे की मुस्कान अब एक गहरी सोच में बदल चुकी थी। शिखा उनकी लाडली बेटी थी, इसमें कोई शक नहीं था। लेकिन सुमित्रा देवी एक बेहद सुलझी हुई और दूरदर्शी महिला थीं। वे जानती थीं कि शिखा जब भी मायके आती है, तो उसका व्यवहार कैसा होता है। शिखा यह मानकर चलती थी कि मायका उसका वह रिसॉर्ट है जहाँ उसे उंगली तक नहीं हिलानी है। और इस पूरे आराम की कीमत कौन चुकाता था? अंजलि। सुमित्रा देवी को याद आ गया कि पिछली बार जब शिखा हफ्ते भर के लिए आई थी, तो उसने पूरे घर को अपने हुक्म पर नचा दिया था। “भाभी मेरी साड़ी प्रेस कर दीजिए”, “भाभी आज चाइनीज खाने का मन है”, “भाभी मेरे लिए नींबू पानी ले आइए”—शिखा के फरमान खत्म ही नहीं होते थे। और अंजलि, जो कि शिखा से उम्र में दो साल छोटी थी, ननद के प्यार और सम्मान में सुबह छह बजे से लेकर रात के बारह बजे तक कोल्हू के बैल की तरह काम में जुटी रहती थी। पिछली बार शिखा के जाने के बाद अंजलि को थकान की वजह से तीन दिन तक तेज बुखार रहा था।

सुमित्रा देवी ने एक गहरी सांस ली। उन्होंने मन ही मन एक बहुत कड़ा और गैर-पारंपरिक फैसला लिया। उन्होंने तुरंत अंजलि को आवाज दी, “अंजलि बेटा, जरा विक्रम को बाहर भेजना।”

कुछ ही देर में विक्रम अपना लैपटॉप बंद करते हुए बाहर आया, “जी माँ, क्या हुआ? सब ठीक तो है?”

सुमित्रा देवी ने बिल्कुल शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “विक्रम, अंजलि का सूटकेस पैक करवा दे। आज शाम की ट्रेन से ही उसे उसके मायके लखनऊ छोड़ आ। मैंने उसके पापा को फोन करके बता दिया है कि वह पंद्रह दिन वहीं रहेगी।”

विक्रम हक्का-बक्का रह गया। “क्या? मायके? लेकिन माँ, अचानक क्यों? अंजलि ने तो जाने के लिए कुछ नहीं कहा, और न ही घर में कोई ऐसा काम है। फिर अचानक उसे लखनऊ क्यों छोड़ आऊँ?”

सुमित्रा देवी ने विक्रम की आँखों में देखते हुए कहा, “अभी शिखा का फोन आया था। दामाद जी पंद्रह दिन के लिए विदेश जा रहे हैं, तो वो महारानी यहाँ अपना डेरा डालने आ रही है। इसीलिए मैं चाहती हूँ कि अंजलि पंद्रह दिन के लिए अपने मायके चली जाए।”

तभी अंजलि भी वहाँ आ गई। उसने सुमित्रा देवी की बात सुन ली थी। वह घबराते हुए बोली, “माँ जी, आप यह क्या कह रही हैं? शिखा दीदी आ रही हैं, यह तो बहुत खुशी की बात है। वो हमारे घर की बेटी हैं। उनके आने पर मेरा घर में रहना तो और भी जरूरी है। मैं उनके लिए उनके पसंद का खाना बनाऊंगी, उनके साथ समय बिताऊंगी। अगर मैं ही मायके चली गई, तो उनका ध्यान कौन रखेगा?”

विक्रम ने भी अंजलि की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, “बिल्कुल सही कह रही है अंजलि। माँ, शिखा आ रही है, तो दोनों ननद-भाभी मिलकर घर में रौनक बढ़ाएंगी। ऐसे में अंजलि को मायके भेजना मुझे तो कोई समझदारी का काम नहीं लग रहा। आखिर शिखा भी तो इसी घर की बेटी है।”

सुमित्रा देवी ने एक व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ विक्रम की ओर देखा और फिर अंजलि का हाथ अपने हाथ में लेकर बोलीं, “बेटी तो तू भी है किसी की अंजलि। और इस घर की भी तू बेटी ही है। बेटा विक्रम, तुम्हें लगता है कि मैं अंजलि को इसलिए भेज रही हूँ क्योंकि मुझे शिखा का आना बुरा लगा? नहीं! मुझे मेरी बेटी के आने की बहुत खुशी है। लेकिन मैं उस सच से मुँह नहीं मोड़ सकती जो इस समाज के हर घर में होता है और हमारे घर में भी पिछली बार हुआ था।”

सुमित्रा देवी की आवाज अब थोड़ी भारी हो गई थी, “अंजलि का यह समर्पण, इसका यह बड़प्पन इसे यह सब देखने नहीं देता। यह कहती है कि शिखा इसे बेटियों की तरह प्यार करती है, लेकिन सच्चाई यह है कि शिखा यहाँ आकर सिर्फ एक हुक्मरान बन जाती है। ‘भाभी ये कर दो, भाभी वो कर दो।’ और अंजलि ननद के सत्कार के नाम पर अपने शरीर की क्षमता से ज्यादा काम करती है। एक बेटी अपने मायके में पंद्रह दिन आराम करेगी, और दूसरी बेटी, जो किसी और घर से हमारे आँगन में आई है, वह उसके आराम के लिए नौकरानी बनकर सुबह से रात तक खटेगी? क्या यह न्याय है? क्या बहुओं का शरीर लोहे का बना होता है?”

अंजलि की आँखें भर आईं। उसने भरे गले से कहा, “लेकिन माँ जी, मुझे कोई बुरा नहीं लगता। दीदी हैं मेरी। मुझे उनके लिए काम करना अच्छा लगता है। और वैसे भी बेटियां तो मायके में ही आराम करती हैं ना।”

“यही तो सबसे बड़ी समस्या है अंजलि!” सुमित्रा देवी ने टोकते हुए कहा। “तुम्हें बुरा नहीं लगता, क्योंकि समाज ने तुम्हें यही सिखाया है कि बहू का काम सिर्फ बलिदान देना और खटना है। ‘बेटियां मायके में आराम करती हैं’—बिल्कुल सही! तो क्या तुम्हारा मायका नहीं है? क्या तुम्हें आराम का हक नहीं है? जब दामाद जी पंद्रह दिन के लिए बाहर गए, तो शिखा ने तुरंत अपना सूटकेस पैक कर लिया आराम करने के लिए। लेकिन विक्रम तो हर दिन ऑफिस जाता है, क्या तुमने कभी कहा कि तुम पंद्रह दिन के लिए सिर्फ आराम करने अपने मायके जाओगी? नहीं ना! क्योंकि तुम्हारे दिमाग में यह बात डाल दी गई है कि इस घर की सारी जिम्मेदारी तुम्हारी है।”

विक्रम अभी भी अपनी बात पर अड़ा था। अपनी बहन का पक्ष लेते हुए उसने कहा, “माँ, आप छोटी सी बात का बतंगड़ बना रही हैं। घर में दो ही तो औरतें हैं। अगर बहन आ रही है, तो भाभी का फर्ज है उसकी खातिरदारी करना। इसमें इतना सोचना क्या है? शिखा सुनेगी तो उसे कैसा लगेगा कि उसके आते ही आपने अंजलि को मायके भेज दिया।”

सुमित्रा देवी का पारा अब चढ़ गया। “अच्छा? तो अब तू मुझे सिखाएगा कि सही क्या है और गलत क्या? तुझे शिखा के बुरा मानने की चिंता है, लेकिन अपनी पत्नी की सेहत और उसके आत्मसम्मान की कोई फिक्र नहीं? अगर घर में बहन आ रही है, तो क्या सिर्फ भाभी का ही फर्ज है? तेरा कोई फर्ज नहीं? क्या तू ले सकता है पंद्रह दिन की छुट्टी अपनी बहन की खातिरदारी के लिए? क्या तू बना सकता है उसके लिए तीनों टाइम का खाना? नहीं ना! क्योंकि तुझे पता है कि तेरे हिस्से का काम अंजलि करेगी। और शिखा को भी पता है कि उसके हिस्से का काम अंजलि करेगी। मैं इस अन्याय का हिस्सा नहीं बनूंगी।”

उन्होंने अंजलि की तरफ मुड़ते हुए बेहद प्यार से कहा, “अंजलि, एक घर तब घर बनता है जब उसमें रहने वाले हर इंसान का सम्मान हो। शिखा मेरी बेटी है, मैं उसे बहुत प्यार करती हूँ। लेकिन मैं उसे यह गलत आदत नहीं दे सकती कि वह किसी और औरत के श्रम का शोषण करे। अगर वो यहाँ आकर तुम्हारे साथ घर के काम में हाथ बंटाती, तुम्हारे कंधे से कंधा मिलाकर चलती, तो मैं तुम्हें कभी नहीं भेजती। लेकिन वह ऐसा नहीं करेगी। इसलिए, तुम आज शाम ही लखनऊ जा रही हो। शिखा की खातिरदारी मैं करूंगी। मैं उसकी माँ हूँ, वो मेरी जिम्मेदारी है, तुम्हारी नहीं।”

अंजलि अब फूट-फूट कर रोने लगी। लेकिन ये आंसू दुःख के नहीं, बल्कि उस असीम सम्मान और प्यार के थे, जो उसे अपनी सास से मिल रहा था। समाज में जहाँ सासों पर बहुओं को प्रताड़ित करने के आरोप लगते हैं, वहीं सुमित्रा देवी उसके हक के लिए अपनी ही बेटी और बेटे से लड़ रही थीं। विक्रम को भी अब अपनी माँ की बात का मर्म समझ में आ गया था। उसे अपनी सोच पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। उसने आगे बढ़कर अंजलि का हाथ पकड़ा और कहा, “माँ बिल्कुल सही कह रही है अंजलि। जाओ, तुम भी पंद्रह दिन अपने मम्मी-पापा के साथ बिता कर आओ। तुम्हें भी उस आराम की जरूरत है जिसकी तलाश में शिखा यहाँ आ रही है।”

शाम को विक्रम ने अंजलि को लखनऊ की ट्रेन में बिठा दिया। अगले दिन सुबह शिखा अपने भारी-भरकम सूटकेस के साथ घर पहुँची। दरवाजे पर सुमित्रा देवी खड़ी थीं। शिखा ने अंदर आते ही चारों तरफ नजरें दौड़ाईं।

“मम्मी, भाभी कहाँ हैं? मुझे बहुत तेज भूख लग रही है। मैंने कहा था ना समोसे बनाने के लिए?” शिखा ने सोफे पर धंसते हुए कहा।

सुमित्रा देवी ने रसोई से एक प्लेट में पोहा लाकर शिखा के सामने रखा। “समोसे तो नहीं बने बेटा, पोहा खा ले। और अंजलि घर पर नहीं है। वह पंद्रह दिनों के लिए अपने मायके गई है।”

शिखा चौंक गई। “मायके? अचानक? उसे पता नहीं था क्या कि मैं आ रही हूँ? यह तो अजीब बात है। मेरे आते ही वह मायके चली गई? अब मेरे पंद्रह दिन यहाँ कैसे कटेंगे? मेरा ख्याल कौन रखेगा?”

सुमित्रा देवी आराम से शिखा के पास बैठीं और बोलीं, “यही बात तो मैं भी सोच रही थी शिखा। कि जब तू पंद्रह दिन के लिए आराम करने अपने मायके आ सकती है, तो अंजलि क्यों नहीं जा सकती? क्या उसका मन नहीं करता होगा अपनी माँ के हाथ का खाना खाने का? रही बात तेरा ख्याल रखने की, तो मैं हूँ ना तेरी माँ। मैं रखूंगी तेरा ख्याल। लेकिन मेरी उम्र अब साठ के पार है। तो अगर तुझे समोसे खाने हैं, या हलवा खाना है, तो रसोई घर उधर है। तू खुद भी बना सकती है और मुझे भी खिला सकती है।”

शिखा अपनी माँ की बात सुनकर सन्न रह गई। उसे पहली बार एहसास हुआ कि मायका सिर्फ बेटियों के आरामगाह का नाम नहीं है। उसे याद आया कि कैसे पिछली बार उसने अंजलि को कितना परेशान किया था। सुमित्रा देवी ने बहुत ही शांति से अपनी बेटी को जीवन का एक बहुत बड़ा पाठ पढ़ा दिया था। एक औरत ही दूसरी औरत की दुश्मन होती है, यह कहावत आज सुमित्रा देवी ने झूठी साबित कर दी थी। उन्होंने अपनी बहू के आत्मसम्मान और उसके अधिकारों की रक्षा के लिए वह कदम उठाया था, जो शायद ही कोई सास उठाती।

शिखा ने चुपचाप पोहा खाया और फिर अपनी माँ के गले लग गई। “मुझे माफ़ कर दीजिए मम्मी। मुझे समझ आ गया कि आप क्या कहना चाहती हैं। मैंने हमेशा भाभी को टेकन-फॉर-ग्रांटेड लिया। मैं आज ही उन्हें फोन करके वापस बुलाऊंगी और वादा करती हूँ कि इन पंद्रह दिनों में उन्हें एक गिलास पानी भी खुद नहीं उठाने दूंगी। हम दोनों बहनें मिलकर सारा काम करेंगी और खूब मजे करेंगी।”

सुमित्रा देवी के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान छा गई। उनका घर अब सही मायनों में एक खुशहाल घर बन चुका था, जहाँ बेटियों के साथ-साथ बहुओं का भी पूरा सम्मान था।

आपकी राय:

दोस्तों, क्या सुमित्रा देवी ने अंजलि को उसके मायके भेजकर सही किया? क्या आपको लगता है कि समाज में हर ननद को अपनी भाभी के श्रम और समय का सम्मान करना चाहिए? अगर आप अंजलि या विक्रम की जगह होते, तो आपका क्या फैसला होता? हमें अपने विचार नीचे कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं। आपके अनमोल विचारों का हमें इंतजार रहेगा।

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#”आँगन की छाँव”

 लेखिका : रमा शुक्ला

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