माधव, जो उम्र के इस पड़ाव पर आकर थोड़े और भावुक हो गए थे, एक बच्चे की तरह जिद पर अड़ जाते। जैसे कोई छोटा बच्चा अपनी मनमानी करता है, वैसे ही वे सुलोचना को समझाते हुए कहते, “सुलोचना, मेरी बात समझने की कोशिश करो। तुमने जिंदगी भर मुझे सिर्फ खुशियाँ दी हैं।
तुमने मुझे कभी कोई तकलीफ नहीं होने दी। मैं तुम्हें वह दर्द कैसे दे सकता हूँ? अगर मैं पहले चला गया, तो तुम्हारा रो-रोकर क्या हाल होगा, यह सोचकर ही मेरी रूह काँप जाती है।
लेकिन अगर तुम पहले चली गईं… तो मेरा क्या होगा? इस घर की दीवारों में तुम्हारा अक्स है। तुम्हारी आवाज के बिना यह घर मुझे खा जाएगा। मैं तुम्हारे बिना एक पल भी जीवित नहीं रह पाऊँगा। इसलिए, मैं ही पहले जाऊँगा, ताकि तुम्हें मेरे बिना उस सूनेपन का सामना न करना पड़े।”
शहर के शोर-शराबे से दूर, एक छोटी सी कॉलोनी के कोने में बने घर ‘प्रेमकुंज’ में माधव और सुलोचना की दुनिया बसती थी। उनकी शादी को बयालीस साल बीत चुके थे, लेकिन उनके रिश्ते की ताजगी आज भी वैसी ही थी जैसे बारिश की पहली बूँद पड़ने पर मिट्टी से उठने वाली सोंधी महक होती है।
आस-पड़ोस के लोग उन्हें देखकर अक्सर यही कहते थे कि अगर राम-सीता का जोड़ा कलयुग में देखना हो, तो माधव जी और सुलोचना जी को देख लो। इन बयालीस सालों में किसी ने कभी उनके घर से ऊँची आवाज नहीं सुनी। बर्तनों के खटकने की आवाज तो दूर, उनके बीच कभी मनमुटाव की कोई लकीर तक नहीं खिंची।
उनका घर हमेशा माधव के धीमे-धीमे गुनगुनाने और सुलोचना की खनकती हँसी से गूँजता रहता था। क्रोध, निराशा या कड़वाहट जैसे शब्द तो मानो उनकी डिक्शनरी में थे ही नहीं। जब भी उनके बीच कोई बहस होती, तो वह भी इतनी मीठी और प्यार भरी होती कि सुनने वाला भी मुस्कुराए बिना न रह सके।
सुलोचना को जिसने भी करीब से जाना, वह बस यही कहता कि ऐसी औरतें अब दुनिया में कहाँ मिलती हैं। वह सिर्फ एक पत्नी नहीं, बल्कि माधव के जीवन की धुरी थी। सलीके से साड़ी पहने, माथे पर एक बड़ी सी लाल बिंदी लगाए सुलोचना जब घर के काम करती, तो लगता जैसे साक्षात अन्नपूर्णा और गृहलक्ष्मी एक साथ उस घर में उतर आई हों।
सेवा-भाव, करुणा, धीरज और असीम प्रेम से भरी सुलोचना ने कभी अपने पति से कोई शिकायत नहीं की। न कभी गहनों की जिद, न कभी किसी बात पर रूठना। माधव अक्सर अपने दोस्तों से कहते थे कि उन्हें समझ नहीं आता कि उन्होंने पिछले जन्म में ऐसा कौन सा पुण्य किया था
जो उन्हें सुलोचना जैसी जीवनसंगिनी मिली। कभी-कभी तो माधव भावुक होकर सुलोचना का हाथ अपने हाथों में लेकर कह बैठते, “सुलोचना, तुम सच में इंसान हो या कोई देवी? इंसान में तो फिर भी कोई न कोई कमी होती है, कोई स्वार्थ होता है, गुस्सा होता है। पर तुम्हारे अंदर तो सिर्फ प्यार ही प्यार है। क्या तुम्हें कभी मुझ पर गुस्सा नहीं आता?”
माधव की बात सुनकर सुलोचना के चेहरे पर संध्या की लालिमा जैसी एक खूबसूरत चमक आ जाती। वह अपनी आँखों में एक गहरा, शांत समंदर समेटे हुए मुस्कुराकर जवाब देती, “अजी, गुस्सा किस पर करूँ? और क्यों करूँ? आप कोई बाहर वाले थोड़े ही हैं। आप तो मेरी अपनी परछाई हैं। अगर मैं खुद से ही लड़ने लगूँगी, तो फिर मेरा वजूद ही क्या बचेगा? यह जीवन आपके साथ शुरू हुआ है और मेरा तो बस एक ही अरमान है कि जब मेरी साँसें रुकें, तो मेरा सिर आपकी ही गोद में हो।”
यहीं से शुरू होती थी उनके बीच की वह इकलौती और सबसे प्यारी नोकझोंक, जिसका कोई अंत नहीं था। सुलोचना के मुँह से ‘मरने’ या ‘साँसें रुकने’ की बात सुनते ही माधव एकदम से विचलित हो उठते। उनका शांत चेहरा अचानक एक डर से घिर जाता। वे तुरंत टोकते हुए कहते, “कैसी बातें करती हो सुलोचना? तुम जानती हो ना कि मैं यह सब नहीं सुन सकता। मेरी मौत से पहले तुम कहीं नहीं जा सकतीं। यह तय है कि इस दुनिया से पहले मैं ही विदा लूँगा।”
“यह कैसा स्वार्थ है आपका?” सुलोचना की आवाज में एक मीठी सी शिकायत और आँखों में हल्की सी नमी तैर जाती। “आप पति होकर मेरा दुख नहीं समझ रहे? आप चले जाएंगे, तो क्या मैं आपके बिना जी पाऊँगी? आप चाहते हैं कि बुढ़ापे में मैं आपके बिना तड़प-तड़प कर दिन काटूँ? नहीं, यह नहीं हो सकता। भगवान से मेरी यही प्रार्थना है कि वो पहले मुझे अपने पास बुलाए।”
माधव, जो उम्र के इस पड़ाव पर आकर थोड़े और भावुक हो गए थे, एक बच्चे की तरह जिद पर अड़ जाते। जैसे कोई छोटा बच्चा अपनी मनमानी करता है, वैसे ही वे सुलोचना को समझाते हुए कहते, “सुलोचना, मेरी बात समझने की कोशिश करो। तुमने जिंदगी भर मुझे सिर्फ खुशियाँ दी हैं। तुमने मुझे कभी कोई तकलीफ नहीं होने दी। मैं तुम्हें वह दर्द कैसे दे सकता हूँ? अगर मैं पहले चला गया, तो तुम्हारा रो-रोकर क्या हाल होगा, यह सोचकर ही मेरी रूह काँप जाती है। लेकिन अगर तुम पहले चली गईं… तो मेरा क्या होगा? इस घर की दीवारों में तुम्हारा अक्स है। तुम्हारी आवाज के बिना यह घर मुझे खा जाएगा। मैं तुम्हारे बिना एक पल भी जीवित नहीं रह पाऊँगा। इसलिए, मैं ही पहले जाऊँगा, ताकि तुम्हें मेरे बिना उस सूनेपन का सामना न करना पड़े।”
सुलोचना अपने आँसुओं को पलकों की दहलीज पर रोकते हुए एक गहरी साँस लेती। “आपको लगता है कि आप मुझे मेरे दुख से बचा रहे हैं? पर सोचिए, अगर आप मेरे बिना एक पल नहीं रह सकते, तो क्या मेरा दिल पत्थर का है? जो इंसान साये की तरह बयालीस साल मेरे साथ रहा, उसके बिना यह आँगन मुझे श्मशान नहीं लगेगा? मैं तो भगवान से रोज यही कहती हूँ कि जब भी बुलावा आए, हम दोनों का एक साथ आए। न आपको मेरे बिना जीना पड़े, न मुझे आपके बिना साँस लेनी पड़े।”
यह बहस हर बार इसी मोड़ पर आकर ठहर जाती। दोनों की आँखें छलक उठतीं। फिर माधव धीरे से सुलोचना के आँसू पोंछते और मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहते, “चलो छोड़ो, जब भगवान की मर्जी होगी तब देखा जाएगा। फिलहाल तुम मुझे अपने हाथ की वह बढ़िया सी इलायची वाली चाय तो पिला दो।” और सुलोचना भी अपने पल्लू से आँखें पोंछकर मुस्कुराते हुए रसोई की तरफ बढ़ जाती।
उनका यह प्रेम सिर्फ बातों तक सीमित नहीं था। माधव की दवाइयों का समय हो या उनके चश्मे का नंबर, सुलोचना को सब जुबानी याद था। वहीं माधव भी सुलोचना के बिना एक कदम नहीं चलते थे। अगर सुलोचना को हल्का सा सिरदर्द भी हो जाता, तो माधव पूरे घर को सिर पर उठा लेते थे। उन्हें लगता था कि दुनिया का सबसे बड़ा संकट उनके घर पर आ गया है। वे तब तक सुलोचना के सिरहाने बैठे रहते, जब तक कि वह पूरी तरह ठीक होकर उठ न जाए।
एक दिन शाम के समय दोनों अपने बगीचे में बैठे थे। पतझड़ का मौसम था और पेड़ से सूखे पत्ते गिर रहे थे। एक पीला पत्ता टूटकर माधव की गोद में आ गिरा। माधव ने उस पत्ते को उठाया और बहुत गहरी सोच में डूब गए।
“क्या सोच रहे हैं आप?” सुलोचना ने उनके पास बैठते हुए पूछा।
माधव ने पत्ते को देखते हुए कहा, “सोच रहा हूँ कि जीवन भी इसी पत्ते की तरह है। एक दिन हम सबको इसी तरह इस पेड़ रूपी दुनिया से टूटकर गिर जाना है।”
सुलोचना ने अपना हाथ माधव के हाथ पर रख दिया और बड़ी ही कोमलता से बोली, “पत्ता चाहे टूट भी जाए, पर जब तक वह पेड़ के साथ था, उसने उसे हरियाली दी, छाँव दी। हमारा साथ भी ऐसा ही है। जब तक हम साथ हैं, हमने एक-दूसरे को भरपूर जीवन दिया है। अब जब भी गिरने की बारी आएगी, तो मुझे यकीन है कि हवा का झोंका हम दोनों को एक साथ उड़ा ले जाएगा।”
माधव ने मुस्कुराते हुए सुलोचना का हाथ और मजबूती से पकड़ लिया। उस दिन के बाद से उन्होंने फिर कभी पहले जाने की बहस नहीं की। उन्होंने मान लिया था कि सच्चा प्यार वह नहीं जो बिछड़ने से डरे, बल्कि सच्चा प्यार वह है जो साथ रहते हुए हर एक पल को पूरी शिद्दत से जिए। उनका जीवन उस शांत नदी की तरह बहता रहा, जिसे समंदर में मिलने की कोई जल्दी नहीं थी, क्योंकि नदी और किनारे का साथ ही उनके लिए सबसे बड़ी मंजिल थी।
दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या आज के दौर में ऐसा निस्वार्थ और सच्चा प्रेम संभव है? जहाँ लोग एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ में लगे रहते हैं, वहीं यह जोड़ा इस बात पर बहस करता है कि अपने साथी को वियोग का दुख न सहना पड़े। अपने विचार कमेंट करके जरूर बताएं।
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#साँसों की वसीयत
लेखिका : रीमा साहू