नया आँगन, वही ममता

 राधिका जब भी मायके जाने के लिए तैयार होती, तो उसकी आँखों में एक अलग ही चमक होती थी। सुमित्रा जी खुद उसके लिए मिठाइयाँ और शगुन के कपड़े पैक करवातीं। “जा बेटा, कुछ दिन अपनी माँ के लाड़-प्यार में जी ले। यहाँ तो ज़िम्मेदारियाँ ही ज़िम्मेदारियाँ हैं,” सुमित्रा जी हँसते हुए कहतीं।

और जब राधिका मायके से वापस लौटती, तो घर का हर कोना मानो ज़िंदा हो उठता। सुमित्रा जी समझ चुकी थीं कि एक बेटी अपने पिता का घर छोड़कर किसी और के बेटे के सपनें सजाने आती है, यह कोई साधारण बात नहीं है। यह एक बहुत बड़ा त्याग है, जिसे समाज अक्सर ‘फर्ज़’ का नाम देकर छोटा कर देता है।

सुबह की पहली किरण ने जब सुमित्रा जी के घर के आँगन को छुआ, तो आज उस रोशनी में एक अलग ही चमक थी। घर के मुख्य द्वार पर कुमकुम से सने दो छोटे-छोटे पैरों के निशान अभी भी ताज़ा लग रहे थे। ये निशान सिर्फ रंग के नहीं थे, बल्कि एक नए जीवन, एक नई उम्मीद और एक नए रिश्ते के आगाज़ के प्रतीक थे।

दो दिन पहले ही उनके बेटे आयुष का विवाह हुआ था और घर में उनकी नई बहू, राधिका आई थी। सुमित्रा जी अपनी सुबह की चाय का प्याला थामे उन लाल पदचिह्नों को निहार रही थीं और उनका मन अतीत और वर्तमान के बीच झूल रहा था। उन्हें याद आ रहा था अपना वह दिन, जब वे भी इसी तरह लाल जोड़े में, मन में हज़ारों सवाल और आँखों में आँसू लिए इस घर में आई थीं।

राधिका जब विदा होकर इस घर की दहलीज़ पर खड़ी थी, तो सुमित्रा जी ने उसके चेहरे को बहुत करीब से पढ़ा था। उसके माथे की बिंदी के पीछे एक अनजाना सा डर छिपा था। जब उसने अपने पाँव के अँगूठे से चावल से भरा कलश भीतर की ओर लुढ़काया, तो सुमित्रा जी को लगा जैसे उसने अपने मायके की तमाम यादों, बचपन की सहेलियों, पिता के आँगन के उस पुराने झूलों और अपनी माँ के उस सुरक्षित आँचल को हमेशा के लिए पीछे छोड़ दिया है।

एक लड़की के लिए यह कितना अजीब और कठिन होता है कि जिस घर में वह जन्मी, पली-बढ़ी, जहाँ की दीवारों से उसने बातें कीं, रातों-रात वह घर उसके लिए ‘मायका’ हो जाता है और एक बिल्कुल अनजान घर उसका ‘अपना’ घर कहलाने लगता है। सुमित्रा जी ने मन ही मन तय कर लिया था कि वे राधिका को कभी यह महसूस नहीं होने देंगी

कि वह पराई है। वह इस घर में बहू बनकर ज़रूर आई थी, लेकिन सुमित्रा जी उसे बेटी बनाने का संकल्प ले चुकी थीं।

घर में नई नवेली दुल्हन के आने से एक अलग ही रौनक छाई हुई थी। रिश्तेदारों का आना-जाना लगा हुआ था। राधिका बहुत ही संकोच के साथ, भारी साड़ियों और गहनों में लिपटी, हर किसी का अभिवादन कर रही थी। उसकी आँखें बार-बार दरवाज़े की तरफ उठ जाती थीं,

शायद किसी अपने को तलाश रही थीं। सुमित्रा जी समझ रही थीं कि राधिका का मन अभी भी अपने माता-पिता के घर में अटका हुआ है। कल रात ही तो सुमित्रा जी ने राधिका को अपने कमरे में छिपकर रोते हुए सुना था। वह अपनी माँ से फोन पर बात कर रही थी और उसकी रुलाई फूट पड़ी थी।

सुमित्रा जी कमरे के बाहर ही खड़ी रह गईं। उन्होंने दखल देना उचित नहीं समझा, लेकिन उस रात उन्हें भी ठीक से नींद नहीं आई।

आज ‘पहली रसोई’ की रस्म थी। घर के सभी लोग डाइनिंग टेबल पर इंतज़ार कर रहे थे और रसोई में राधिका खड़ी थी। सुमित्रा जी जानती थीं कि आज का दिन हर नई बहू के लिए कितनी घबराहट लेकर आता है। वे दबे पाँव रसोई के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। राधिका के हाथों में कड़छी थी और वह बार-बार मसालों के डिब्बों को ऐसे देख रही थी

जैसे कोई बहुत बड़ी परीक्षा देने जा रही हो। उसकी उंगलियाँ हल्की-हल्की काँप रही थीं। सुमित्रा जी के होठों पर एक प्यारी सी मुस्कान तैर गई। वे चुपचाप अंदर गईं और राधिका के कंधे पर हल्के से हाथ रख दिया। राधिका बुरी तरह चौंक गई।

“माँ जी, वो… मैं खीर बना रही थी, पर समझ नहीं आ रहा कि मीठा कितना डालूँ। आयुष जी को कैसा मीठा पसंद है?” राधिका की आवाज़ में एक अजीब सी झिझक और घबराहट थी।

सुमित्रा जी ने बड़ी आत्मीयता से राधिका के हाथ से कड़छी ले ली और बोलीं, “अरे पगली, तू इतनी घबरा क्यों रही है? क्या तूने अपने मायके में कभी रसोई नहीं संभाली? यहाँ कोई परीक्षा थोड़ी चल रही है। और सुन, आज से मुझे ‘माँ जी’ नहीं, सिर्फ ‘माँ’ कहना। आयुष को तो बहुत तेज़ मीठा पसंद है, लेकिन तू वैसी ही खीर बनाना जैसी तुझे पसंद है। आज सब तेरी पसंद का ही खाएंगे।”

सुमित्रा जी के इन दो मीठे बोलों ने राधिका के मन का सारा बोझ हल्का कर दिया। उसने एक गहरी साँस ली और मुस्कुरा कर बोली, “जी माँ।” उस दिन रसोई में सिर्फ खीर नहीं पक रही थी, बल्कि दो अजनबी महिलाओं के बीच एक अटूट रिश्ते की चाशनी भी तैयार हो रही थी। सुमित्रा जी ने उसे बताया कि घर में किसे क्या पसंद है, पर साथ ही यह भी कहा कि किसी को खुश करने के लिए उसे खुद को बदलने की ज़रूरत नहीं है।

जब राधिका ने सबको खीर परोसी और आयुष ने उसकी तारीफ की, तो राधिका की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसकी खिलखिलाहट से पूरा घर गूँज उठा। सुमित्रा जी को लगा जैसे उनके घर के आँगन में कोई मुरझाया हुआ फूल अचानक से खिल गया हो।

दिन बीतते गए और राधिका धीरे-धीरे घर के माहौल में ढलने लगी। लेकिन सुमित्रा जी यह भी देख रही थीं कि राधिका अभी भी अपनी कुछ चीज़ों को लेकर बहुत भावुक थी। एक दिन दोपहर के समय, जब घर में सब आराम कर रहे थे,

सुमित्रा जी ने देखा कि राधिका अलमारी में कुछ किताबें और एक पुरानी सी डायरी बहुत सहेज कर रख रही है। सुमित्रा जी को याद आया कि आयुष ने बताया था कि राधिका को पढ़ने और डायरी लिखने का बहुत शौक है, लेकिन शादी की तैयारियों और नई ज़िम्मेदारियों के बीच शायद उसने अपनी वह दुनिया पीछे छोड़ दी थी।

सुमित्रा जी राधिका के पास गईं और बिस्तर पर बैठते हुए बोलीं, “राधिका, मुझे पता है तूने अपनी पढ़ाई, अपनी वो बेफिक्री की दुनिया, अपने वो सपने… सब कुछ पीछे छोड़ दिया है। एक लड़की जब विदा होती है, तो वो सिर्फ अपना घर नहीं छोड़ती, अपना एक हिस्सा भी वहीं छोड़ आती है। लेकिन मैं नहीं चाहती कि तू यहाँ खुद को खो दे। तूने हमारे घर को अपनाया है, इसका मतलब यह नहीं कि तू अपनी पहचान भूल जाए।”

राधिका की आँखें भर आईं। वह सुमित्रा जी के गले लग गई और रोने लगी। सुमित्रा जी ने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा, “रो ले बेटा, मन हल्का हो जाएगा। जब मेरी बेटी श्रुति की विदाई हुई थी, तो मैं भी ऐसे ही रोई थी। मुझे श्रुति की बहुत याद आती है, लेकिन जब से तू आई है, मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरी श्रुति वापस आ गई हो।”

श्रुति, सुमित्रा जी की बड़ी बेटी थी, जिसकी शादी दो साल पहले ही हुई थी। राधिका ने अक्सर सुमित्रा जी को श्रुति की पुरानी चीज़ों को निहारते हुए देखा था। एक दिन जब श्रुति मायके आई, तो राधिका थोड़ी सहमी हुई थी। उसे लगा कि शायद श्रुति के आने से सुमित्रा जी का ध्यान बँट जाएगा या शायद ननद-भाभी के बीच जो दूरियों की कहानियाँ उसने समाज में सुनी थीं, वो सच साबित होंगी। लेकिन सुमित्रा जी ने ऐसा माहौल बनाया कि श्रुति और राधिका कुछ ही घंटों में पक्की सहेलियाँ बन गईं। राधिका ने बहुत प्यार से श्रुति का कमरा सजाया और उसकी पसंद का खाना बनाया। श्रुति ने भी राधिका को अपनी पुरानी एल्बम दिखाई और आयुष की बचपन की शरारतों के किस्से सुनाए। सुमित्रा जी दूर बैठी दोनों को हँसते-खिलखिलाते देख रही थीं। उन्हें महसूस हो रहा था कि राधिका सिर्फ उनके बेटे की पत्नी नहीं, बल्कि इस घर की धुरी बन चुकी है।

राधिका जब भी मायके जाने के लिए तैयार होती, तो उसकी आँखों में एक अलग ही चमक होती थी। सुमित्रा जी खुद उसके लिए मिठाइयाँ और शगुन के कपड़े पैक करवातीं। “जा बेटा, कुछ दिन अपनी माँ के लाड़-प्यार में जी ले। यहाँ तो ज़िम्मेदारियाँ ही ज़िम्मेदारियाँ हैं,” सुमित्रा जी हँसते हुए कहतीं। और जब राधिका मायके से वापस लौटती, तो घर का हर कोना मानो ज़िंदा हो उठता। सुमित्रा जी समझ चुकी थीं कि एक बेटी अपने पिता का घर छोड़कर किसी और के बेटे के सपनें सजाने आती है, यह कोई साधारण बात नहीं है। यह एक बहुत बड़ा त्याग है, जिसे समाज अक्सर ‘फर्ज़’ का नाम देकर छोटा कर देता है।

त्योहारों का समय आया, तो घर में दीवाली की तैयारियाँ शुरू हो गईं। राधिका ने पूरे आँगन को रंगोली से सजा दिया। मिट्टी के दीयों की रोशनी में उसका चेहरा एक अलग ही आभा से दमक रहा था। सुमित्रा जी ने राधिका को अपने पास बुलाया और अपने गले से एक पुश्तैनी हार उतारकर राधिका को पहना दिया। “यह हार मेरी सास ने मुझे मेरी पहली दीवाली पर दिया था और कहा था कि यह सिर्फ एक गहना नहीं, इस घर की चाबी है। आज से यह घर, यह परिवार, और यह ज़िम्मेदारी तेरी है। मैं खुश हूँ कि मेरी बेटी श्रुति जहाँ भी है, अपना संसार बसा रही है, और यहाँ, मेरी दूसरी बेटी मेरा संसार रोशन कर रही है।”

राधिका के होंठ काँपने लगे और आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। उसने सुमित्रा जी के पैर छुए, तो सुमित्रा जी ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया। उस रात दीवाली के पटाखों के शोर के बीच, राधिका के मन में एक अजीब सी शांति थी। उसे अब यह घर अनजाना नहीं लगता था। उसे अब रसोई में जाने से डर नहीं लगता था। वह जान गई थी कि इस नए आँगन में भी उसे वही ममता मिली है, जो वह पीछे छोड़ आई थी।

यह कहानी सिर्फ सुमित्रा और राधिका की नहीं है। यह हर उस घर की कहानी हो सकती है जहाँ एक सास अपनी बहु को सिर्फ घर के कामों के लिए नहीं, बल्कि अपने दिल में जगह देने के लिए लाती है। जहाँ एक बहू अपनी सास को ससुराल की तानाशाह नहीं, बल्कि दूसरी माँ के रूप में देखती है। रिश्ते तोड़े और जोड़े नहीं जाते, वे सींचे जाते हैं—समझ से, प्यार से और थोड़ी सी जगह देकर। राधिका ने अपना बचपन, अपनी पुरानी दुनिया छोड़ दी थी, लेकिन सुमित्रा जी के प्यार ने उसे एक ऐसा नया आकाश दिया, जहाँ वह पहले से भी ऊँची उड़ान भर सकती थी। एक घर से बेटी विदा होती है, और दूसरे घर में बेटी जन्म लेती है… बस नज़र और नज़रिया सुमित्रा जी जैसा होना चाहिए।

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#नया आँगन, वही ममता

लेखिका : मंजू अग्रवाल

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