एक छोटे से कस्बे में रामप्रसाद नाम का छोटा सा कपड़े का व्यापारी अपनी पत्नी सावित्री और बेटी नंदिनी के साथ रहता था। रामप्रसाद मेहनती तो था, लेकिन उसकी एक ही चिंता थी कि उसके घर बेटा नहीं है। वह अक्सर कहता, “काश! मेरे घर भी एक बेटा होता, जो मेरा नाम आगे बढ़ाता।”
उसकी बेटी नंदिनी बचपन से ही पढ़ाई में बहुत होशियार, विनम्र और मेहनती थी। वह अपने माता-पिता का हर काम करती और पढ़ाई में हमेशा प्रथम आती। उसकी माँ उसे प्रोत्साहित करती, लेकिन पिता कभी-कभी उसकी उपलब्धियों को उतना महत्व नहीं देते थे। उनका मानना था कि एक दिन बेटी तो शादी करके दूसरे घर चली जाएगी।
समय बीतता गया। नंदिनी ने कठिन परिश्रम से प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण की और भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में चयनित हो गई। पूरे गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई। समाचार-पत्रों और टीवी चैनलों में उसकी सफलता की चर्चा होने लगी। लोग रामप्रसाद को बधाई देने उनके घर पर आने लगे।
उस दिन रामप्रसाद की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने नंदिनी से कहा, “बेटी, मुझे आज अपनी सोच पर पछतावा हो रहा है। मैंने हमेशा एक बेटे की चाह रखी, लेकिन आज तुमने मेरा सिर गर्व से ऊँचा कर दिया,इतना तो कोई बेटा भी नही करता।”
नंदिनी ने मुस्कुराकर कहक, “पिताजी, बेटा हो या बेटी, यदि अवसर और माता -पिता का विश्वास और आशीर्वाद मिले तो दोनों परिवार का नाम रोशन कर सकते हैं।”
कुछ वर्षों बाद नंदिनी का विवाह एक शिक्षित और संस्कारी युवक दिनकर से हुआ। विवाह के बाद भी नंदिनी ने अपने ससुराल में सभी का सम्मान किया। वह अपने कार्य के साथ-साथ परिवार की जिम्मेदारियाँ भी पूरी निष्ठा से निभाती रही। उसके सास-ससुर भी उसे अपनी बेटी की तरह मानते थे।
एक बार जिले में आई भीषण बाढ़ के दौरान नंदिनी ने अपनी सूझबूझ और साहस से हजारों लोगों की जान बचाई। उसके उत्कृष्ट कार्य के लिए उसे राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया। सम्मान समारोह में उसके माता-पिता और सास-ससुर सभी उपस्थित थे। मंच से जब नंदिनी का नाम पुकारा गया, तब दोनों परिवार गर्व से भर उठे।
समारोह के बाद एक पत्रकार ने रामप्रसाद से पूछा, “आप अपनी बेटी की सफलता के बारे में क्या कहना चाहेंगे?”
रामप्रसाद ने भावुक होकर उत्तर दिया, “पहले मुझे लगता था कि केवल बेटे ही कुल का नाम रोशन करते हैं, लेकिन आज मेरी बेटी ने मेरे साथ-साथ अपने ससुराल का भी सम्मान बढ़ाया है। अब मैं पूरे विश्वास से ये कह सकता हूँ कि बेटियाँ सचमुच दो-दो कुलों का नाम रोशन करती हैं।”
यह बात सुनकर वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने तालियाँ बजाईं। गाँव के और रुढ़िवादी कई लोगों की सोच भी बदल गई। अब वे अपनी बेटियों को पढ़ाने और आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करने लगे।
शिक्षा: बेटियाँ किसी से कम नहीं होतीं। यदि उन्हें शिक्षा, विश्वास और अवसर मिले, तो वे अपने माता-पिता और ससुराल—दोनों परिवारों का नाम गर्व से रोशन करती हैं। इसलिए बेटा-बेटी में भेदभाव न करके दोनों को विकास के समान अवसर देना चाहिए।
वाक्य कहानी प्रतियोगिता
#बेटियाँ दो-दो कुलों का नाम रोशन करती हैं
लेखिका: डॉ आभा माहेश्वरी अलीगढ